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Sunday 10 Dec 2017

भीष्म साहनी: सौम्य व्यक्तित्व, अडिग विचारधारात्मक पक्ष

 

चंचल चौहान

173 , कादम्बरी, से. 9

रोहिणी, दिल्ली-10085

मो.9811119391

भी ष्म साहनी से मेरी मुलाक़ात 1970 के प्रारंभिक बरसों में दिल्ली में ही हुई थी। पहली बार मुझे मेरे परमप्रिय मित्र राजकुमार सैनी उनके घर ईस्ट पटेल नगर ले गये थे। राजकुमार सैनी के साथ मेरा साझा कविता संकलन, प्रहार स्याह रात पर, जुलाई 1972 में प्रकाशित हुआ था। शायद उस संकलन को उन्हें देने के प्रयोजन से ही हम लोग वहां गये थे। उस समय तक दिल्ली की साहित्यिक गोष्ठियों में आने जाने और कई लघुपत्रिकाओं में लेख व कविताएं प्रकाशित हो जाने के कारण ज्य़ादातर लेखक बिरादरी में मैं भी शामिल माना जाने लगा था। हिंदी साहित्य में नये सिरे से वामपंथी विचारधारा के उभार का दौर शुरू हो रहा था। इस उभार में उस समय के हम जैसे नये लेखकों और मुक्तिबोध की रचनाओं की एक अहम भूमिका थी। हम अपने जैसे विचारों के सहयोगी, सहचर हर जगह तलाश कर रहे थे।

                दिल्ली में रहने वाले लेखक उन दिनों कनाट प्लेस में दो जगह शामें गुज़ारने और गपशप करने ज़रूर आते थे। युवतर पीढ़ी और ख़ाली जेब लेखक इंडियन काफ़ी हाउस में जो आज के पालिका बाज़ार वाली जगह पर अंदरूनी सर्किल की ओर स्थित था, बैठते थे और वरिष्ठ व बेहतर आमदनी वाले लेखक रीगल सिनेमा से सटे हुए उन दिनों के ‘टी- हाउस’ में जमते थे। पूंजीवाद के विकास ने ये दोनों ही ठिकाने उजाड़ दिये, गऱीबों का काफ़ी हाउस 1975 में आपातकाल के बुलडोजऱ ने उजाड़ दिया। उस जगह भूमिगत पालिका बाज़ार बना। एलीट ‘टी-हाउस’ जहां विष्णु प्रभाकर रोज़ आ कर बैठते थे एक बड़े व्यापारी ने खऱीद कर कपड़े की दुकान में तब्दील कर दिया। आपातकाल का मारा इंडियन काफ़ी हाउस मोहनसिंह पैलेस की छत पर पहुंच गया, तब दोनों जगह बैठने वाले लेखक एकीकृत हो गये और विष्णु प्रभाकर समेत सभी लेखक वहां शनिवार को ज़रूर मिलने लगे। भीष्म जी भी अपनी जीवनसंगिनी शीला जी के साथ वहां अक्सर आते थे और सभी से मुलाक़ात करते थे।

                1970 के शुरू के ही बरसों में वामविचार के लेखकों में संगठित होने की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई। इस इच्छा को अमली शक्ल देने के लिए केदारनाथ अग्रवाल, रणजीत और उनके दोस्तों व सहचरों ने पहल करके 1973 में बांदा सम्मेलन आयोजित किया जिसमें एक साझा मंच, ‘जनवादी लेखक मंच’ नाम से गठित किया गया जिसकी शाख़ाएं सभी राज्यों में गठित की गयीं, मगर एकजुटता का वह नया प्रयास बिखर गया क्योंकि वामपंथ का एक हिस्सा उन दिनों उस कांग्रेस के साथ हो लिया जो इज़ारेदार पूंजीपतियों को अकूत $फायदा पहुंचाने और उन्हें संकट की स्थिति से उबारने के लिए अवाम पर नित नये अत्याचार कर रही थी और एकदलीय तानाशाही की ओर बढ़ रही थी।

                1974 में फिर एक कोशिश भीष्म साहनी के नेतृत्व में की गयी, कनाट प्लेस के बाहरी सर्किल पर जो बैरकें थीं उन्हीं में से एक बैरक में भीष्म जी के आमंत्रण पर वामपंथी लेखक जमा हुए, उसमें एक घोषणापत्र जैसे किसी मसौदे का पाठ हुआ और उस पर बहस हुई। उसमें ज्य़ादातर लेखकों ने ज़ोर दिया कि इज़ारेदार पूंजीपतिवर्ग की हिमायती इंदिरा कांग्रेस लगातार अवाम पर और लेखकों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले कर रही है उसकी आलोचना की जानी चाहिए। भीष्म जी बड़ी परेशानी में पड़ गये। उन्होंने अपने सौम्य व्यक्तित्व और अपनी दृढ़ आस्था के सहारे किसी तरह लेखकों को आश्वस्त किया कि पटना सम्मेलन में वह दस्तावेज़ लेखकों के सामने रखा जायेगा तब उनके विचार उसमें शामिल कर लिये जायेंगे। दरअसल, यह पूरी प्रक्रिया एक नये संगठन के गठन के लिए सीपीआई और कांग्रेस के संयुक्त मोर्चे की पहल पर शुरू हुई थी और भीष्म जी को इसके लिए एक मोहरा बनाया गया था। 1974 मेें नया संगठन बना जिसका नाम रखा गया, ‘नेशनल फेडरेशन औफ प्रोग्रेसिव राइटर्स’ जिसमें वे ही लेखक बुलाये गये जो सीपीआइ और कांग्रेस के सदस्य या हिमायती थे। बाक़ी वाम विचारधारा के अपार लेखक समुदाय को छेंक दिया गया। यही वह संगठन है जिसके महासचिव बनाये गये भीष्म साहनी और इसी संगठन ने इंदिरा कांग्रेस द्वारा लगाये कुख्यात आपातकाल का समर्थन कर दिया। ग़लत राजनीतिक लाइन अपनाने वाले उन दिनों के डांगेपंथी नेतृत्व के असर में बुरे फंसे भीष्म जी को लेखकों के कोप और आलोचना का ज़हर पीना पड़ा। बाद में उन्होंने संगठन का भार राजीव सक्सेना को सौंप कर स्वतंत्र लेखन में अपना समय लगाया।

                भीष्म जी अपने सौम्य व्यक्तित्व और मृदुभाषिता की वजह से सबके प्यारे थे। उनकी नजऱ में कोई लेखक बड़ा छोटा नहीं था। वे सबसे समान रूप से मोहब्बत करते थे। 1989 में स$फदर हाश्मी की शहादत के बाद जब ‘सहमत’ को एक ट्रस्ट के रूप में स्थापित किया गया, तो भीष्म जी को उसका अध्यक्ष बनाया गया। जनवादी लेखक संघ का आ$िफस 8 विठ्ठलभाई पटेल हाउस में था, और उसी के पिछवाड़े के हिस्से में ‘सहमत’ का आ$िफस बनाया गया। जनवादी लेखक संघ का केंद्रीय सचिव होने के नाते मैं रोज़ाना वहां होता था, इसलिए भीष्म जी से मुलाक़ातें भी अक्सर होने लगीं। उनके ‘तमस’ टीवी सीरियल को लेकर जब आर एस एस के गुंडों ने दूरदर्शन केंद्र पर वहशी हमला बोला तो हमने जलेस के तत्वावधान में एक ऐतिहासिक आयोजन ‘तमस’ पर किया जिसमें भीष्म जी समेत लगभग सभी सीरियल कलाकार आये और सबने अपने विचार रखे।                                                     पारिवारिक स्तर पर भीष्म जी की बेटी कल्पना साहनी और दामाद रोमी खोसला मेरे अज़ीज़ दोस्त हो गये। पीपुल्स डेमोक्रेसी नामक साप्ताहिक पत्र में काम करने वाले कामरेड राजन की पहल और विवान सुंदरम, गीता कपूर, जी पी देशपांडे, रोमी खोसला व कल्पना साहनी, इंदिरा चंद्रशेखर आदि कई मित्रों की एक टीम के प्रयास से अंग्रेज़ी में एक कला पत्रिका, छ्वशह्वह्म्ठ्ठड्डद्य शद्घ ्रह्म्ह्लह्य & ढ्ढस्रद्गड्डह्य प्रकाशित करने की शुरुआत हुई तो मुझे भी उस टीम में एसोसियेट एडीटर बनाया गया। उसकी एडिटिंग का काम देखने मैं सप्ताह में कल्पना और रोमी के घर जहां रोमी का आ$िफस भी था उसमें जाता था जहां से उसकी एडिटिंग होती थी। यह सिलसिला काफ़ी दिन चलता रहा। बाद में जनवादी लेखक संघ की पत्रिका, नया पथ की जि़म्मेदारी मुझे संभालनी पड़ी तो वह सिलसिला टूट गया। इस तरह भीष्म जी से भी दोस्ती की प्रगाढ़ता बढ़ती रही। उन्होंने मुझे एफ्रोएशियन राइटर्स एसोसियेशन की एक कान्फ्रेंस में भी हिस्सेदारी का निमंत्रण दिया था और मैं गया था। उनके संपादन में निकले, अंग्रेज़ी पत्रिका रुशह्लह्वह्य के वे अंक मेरे पास शायद कहीं आज भी होंगे जो उन्होंने मुझे स्नेहपूर्वक दिये थे।

                भीष्म जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व थे। मैं उनकी कहानी-कला का बहुत पहले से प्रशंसक था जब उनसे मेरी कोई जान पहचान भी नहीं थी। इसकी मुख्य वजह थी, उनकी यथार्थवादी रचनाशीलता जिसे माक्र्स के सहयोगी एंगेल्स ने कथासाहित्य के लिए अपरिहार्य माना था। ‘नयी कहानी’ के दौर में जहां आधुनिकतावादी विश्वदृष्टि से कुछ कहानीकार अकेलापन, ऊब, संत्रास आदि को एक $फार्मूले के तौर पर इस्तेमाल करके यथार्थ गढ़ रहे थे, वहां भीष्म साहनी भारत के सामाजिक जीवन की जीती जागती सच्चाइयां अपनी कहानी में यथार्थवादी तरीक़े से रच रहे थे। 1970 के दशक में भी शोषित जनगण के नाम पर ‘गढ़ा हुआ यथार्थ’ रचने वाले खूब थे, हमारे एक मित्र तो ‘जनवादी कहानी’ जैसी श्रेणी को ही विज्ञापित करने में बड़ी मेहनत कर रहे थे और उन्होंने बाक़ायदा उसके रचने का $फार्मूला भी खोज लिया था। ‘नयी कहानी’, ‘अकहानी’ आदि की तजऱ् पर उन दिनों इस तरह के कई कहानी आंदोलन उछाले गये थे, ‘समांतर कहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘जनवादी कहानी’ वग़ैरह वग़ैरह। मगर भीष्म जी ने अपनी परिपक्व जीवनदृष्टि और यथार्थवादी शैली में अपना रचनाकर्म जारी रखा, वे इन बरसाती आंदोलनों से लगभग अप्रभावित ही रहे। कहानी आंदोलनों के वे बरसाती नाले गुमनामी के गड्ढे में विलुप्त हो गये, भीष्म जी प्रेमचंद की आलोचनात्मक यथार्थवादी परंपरा के विकास में अपना अप्रतिम योगदान करने वाले रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गये और हमेशा याद किये जायेंगे।

                यों तो उनकी बहुत सी कहानियां चर्चित और पाठकों के मन को छूने वाली रचनाओं के रूप में जानी जाती हैं, मगर उनकी ‘चीफ़  की दावत’ हिंदी कथा-साहित्य में एक ख़ास जगह हासिल कर चुकी है। किसी भी साहित्य में ऐसी रचनाएं ही स्थायी महत्व की हो पाती हैं जो अपने समय और समाज का संश्लिष्ट प्रतिबिंब होती हैं, जिनमें रचनाकार अपनी विश्वदृष्टि से यथार्थ की गहरी पहचान करते हुए अपने समाज में उभरे किसी नये पहलू की पुनर्रचना करता है। जिस तरह चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी, ‘उसने कहा था’ हिंदी में यथार्थवादी परंपरा की बीज कहानी बन कर कालजयी रचना बन गयी और आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, अपनी सार्वभौमिक अर्थवत्ता लिए हुए उसका आज का पाठ प्रस्तुत किया जा सकता है, उसी तरह भीष्म जी की यह कहानी उनके समय में जितनी अर्थवान थी, उतनी ही आज भी अर्थ की नयी परतें खोलती है। ऐसा लगता है जैसे वह आज यानी बिल्कुल आज की सच्चाई बयान कर रही हो।

                याद करें, पिछली सदी का पचासोत्तरी समय, जब आज़ाद भारत में एक नया माहौल पैदा हुआ था, उस माहौल की व्याख्या कवि, कलाकार, रचनाकार और राजनीतिज्ञ अपने-अपने तरीके़ से कर रहे थे। सामाजिक विकास को समझने के लिए जो बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ वैज्ञानिक विश्वदृष्टि रखते थे, वे अपने-अपने विश्लेषण में मतभेद रखते हुए भी एक बिंदु पर सहमत थे कि जिस आज़ादी की कल्पना उन्होंने की थी, वह आज़ादी यह नहीं थी। फैज़़ ने अपनी तरह से इस बात को कहा, साहिर लुधियानवी ने अपनी तरह से, गिरिजाकुमार माथुर ने अपनी तरह से। 1943 में तार सप्तक के समय आज़ादी के बाद के भारत को ले कर भारतभूषण अग्रवाल की एक कविता में मध्यवर्ग के बीच यही शंका जतायी गयी थी कि ‘पथ कौन सा है’, किधर जायें? लेकिन आज़ादी के बाद यह शंका नहीं रही, यह स्पष्ट हो गया कि नये सत्ताधारी वर्गों ने जो पथ चुना वह ‘महाजन जिस ओर जायें’ वाला रास्ता, यानी महाजनी सभ्यता का रास्ता ही था। पूंजीवादी समाज के निर्माण की कोशिशों से समाज के भीतर भी पूंजीवादी चेतना का विकास तेज़ी से हुआ, पुराने नैतिक मूल्य ध्वस्त होने लगे और उभरते मध्यवर्ग ने जल्दी-जल्दी धनवान होने के सारे हथकंडे अपनाने शुरू कर दिये।

                हमारे नये कहानीकारों ने मध्यवर्ग के सपनों, उनकी नयी आशाओं, आकांक्षाओं और इसी अंधी दौड़ में ध्वस्त होते मानवीय मूल्यों की तस्वीर बहुत ही कलात्मक तरीके़ से पेश की। यही तस्वीर राजेंद्र यादव की कहानी, ‘टूटना’ में चित्रित होती है जिसमें कथानायक किशोर के जीवन का उद्देश्य सिर्फ़ धन कमाना और प्रमोशन की सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ते हुए किसी कंपनी के शिखर पर पहुंचना है। किशोर कहता है कि ‘सारा खेल रुपये का है, और अब रुपया कमाना है’, उसके बाद वाचक बताता है कि ‘उसने निश्चय किया और भूत की तरह रुपये के पीछे लग गया.. भूल गया, कहीं कोई लीना है, कहीं कोई दीक्षित साहब हैं और कहीं कोई अतीत है। एक नौकरी पर पांव टिकाकर दूसरी का सौदा होता रहा - पहला तल्ला, दूसरा तल्ला और एक दिन लिफ़्ट उसे दसवें तल्ले के इस चैम्बर में ले आयी जिसके दरवाज़े पर लिखा था, ‘जनरल मैनेजर’।(टूटना और अन्य कहानियां, पृ.१७३)। अमरकांत की कहानी, ‘डिप्टी कलक्टरी’ भी निम्नमध्यवर्ग के इसी तरह के सपनों का चित्रण करती है, उनकी कहानी में शकलदीप अपने बेटे के लिए इसी तरह का सपना देखते हैं, ‘एक दिन उन्होंने सबेरे ही सबको सुनाकर ज़ोर से कहा, ‘नारायण की मां, मैंने आज सपना देखा है कि नारायण बाबू डिप्टी-कलक्टर हो गये’। निम्नमध्यवर्ग के अपने वर्ग से उठकर उच्चवर्ग में परिवर्तित हो जाने के सपनों का यथार्थवादी चित्रण उस समय के कई कहानीकारों ने किया। कमलेश्वर ने भी इसी बोध को ‘खोयी हुई दिशाएं’ कहा था जिसकी वजह से इन कथाकारों के प्रोटागनिस्ट बेगानेपन के शिकार दिखाये जाते थे।

                भीष्म साहनी जानते थे कि पूंजीवाद मनुष्य को भी पण्य वस्तु बना देता है। वह उसी तरह स्पद्र्धा का शिकार होता है जैसे पूंजीवादी व्यवस्था में अन्य उत्पाद होते हैं। जिस तरह हर माल उपयोगिता के आधार पर मूल्यवत्ता हासिल करता है, उसी तरह मनुष्य भी। ‘चीफ़  की दावत’ कहानी का प्रोटागनिस्ट शामनाथ एक अमेरिकन बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करता है, अपने अमेरिकन बॉस को अपने घर पर दावत के लिए इसी मक़सद से बुलाता है कि वह अन्य कर्मचारियों से स्पद्र्धा मेंं आगे की वस्तु हो जाये। इसी मानसिकता के कारण शामनाथ और उसकी पत्नी दोनों ही बूढ़ी मां को भी पण्य वस्तु की तरह ही देखते हैं। भीष्म जी ने बड़े ही कलात्मक तरीके़ से शामनाथ की नजऱ में मां को $फर्नीचर आदि $फालतू सामान के क्रम में ही शामिल करते हुए दिखाया है :

कुर्सियां, मेज़, तिपाइयंा, नैपकिन, फूल, सब बरामदे में पहुंच गये। ड्रिंक का इंतज़ाम बैठक में कर दिया गया। अब घर का फ़ालतू सामान अलमारियों के पीछे और पलंगों के नीचे छिपाया जाने लगा। तभी शामनाथ के सामने सहसा एक अड़चन खड़ी हो गयी, मां का क्या होगा?

यहां पूंजीवादी समय में बेटा मां को ‘$फालतू सामान’ में तब्दील कर देता है, जिस तरह इस्मत चुग़ताई की मशहूर कहानी ‘लिहाफ’ में नवाब साहब अपनी बेगम को ‘साज़ो-सामान’ से ज्य़ादा तरजीह नहीं देते। इस्मत चुग़ताई ने लिखा, ‘उनके यहां तो बस तालिब इल्म रहते थे। नौजवान, गोरे-गोरे, पतली कमरों के लडक़े, जिनका ख़र्च वे खुद बर्दाश्त करते थे। मगर बेगम जान से शादी करके तो वे उन्हें कुल साज़ो-सामान के साथ ही घर में रखकर भूल गये।’ समाजी हक़ीक़त को अपनी पैनी नजऱ से ये कहानीकार इसीलिए देख पाये क्योंकि इनके पास एक यथार्थवादी नज़रिया था। भीष्म जी शामनाथ के माध्यम से उभरते मध्यवर्ग में पनपती इस तरह की पतनशीलता बारीक़ी से देख रहे थे। अब ‘मातृदेवो भव’ वाला मंत्र ग़ायब हो चुका था। अब तो ‘सर्वे गुणा कांचनमाश्रयंति’ का नया मंत्र दिमाग़ में अपनी जड़ें जमा रहा था। भारत के शासकवर्गों में पतनशील सामंती मूल्य भी अपनी जडं़े जमाये हुए हैं। शामनाथ मां के प्रति एक ओर पूंजीवादी मानसिकता से पेश आ रहा है, वहीं मनुस्मृति के अनुसार बूढ़ी मां को भी पराधीनता का शिकार बनाये हुए है। मनुस्म्ृति में लिखा गया था कि

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।

रक्षन्ति स्थविरे पुत्र, न स्त्री स्वातन्त्र्यम अर्हति ।।  9/3

शामनाथ जिस कंपनी में काम कर रहा है वह अमेरिकन कंपनी है जो भारत से मुना$फा कमा कर विदेश ले जा रही है। भारत का नवोदित मध्यवर्ग उसमें काम करके उसी तरह ‘सुखसाज’ महसूस कर रहा है जिस तरह भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपनी मशहूर रचना, भारत दुर्दशा में दर्ज किया था कि ‘अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी / पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी।।’ आज के इस नवोदित मध्यवर्ग को यह भी चिंता अब नहीं है कि यहां के सस्ते कच्चे माल और सस्ते मज़दूरों की मेहनत से माल तैयार हो कर ऊंचे दामों पर बिकता है और वह अतिरिक्त मूल्य यानी मुना$फा विदेश चला जाता है। इसमें इस वर्ग को कोई ‘ख्वारी’ नजऱ नहीं आती। लोग भूल गये हैं कि इन विदेशी कंपनियों से आज़ादी हासिल करने के लिए शहीदों ने कुर्बानियां दी थीं, उन्हीं की सेवा में सुखसाज की तलाश आज़ाद भारत के नवोदित मध्यवर्ग में क्यों विकसित हो रही है? पूंजीवादी-सामंती सत्ताधारी वर्गों ने साम्राज्यवादी पूंजी से भी समझौता कर लिया, उसके साथ साझा करने का नाम ही ‘कामनवेल्थ’ था, अब तो वह अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के अधीन ‘ग्लोबलाइज़ेशन’ में समाहित हो गया। भीष्म जी की कहानी में शामनाथ ऐसी ही कंपनी में प्रमोशन के लिए अपने बॉस को, दावत दे कर, उसे खुश करने की जुगत कर रहा है।

                कहानी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रारंभ में जिस मां को शामनाथ $फालतू सामान की श्रेणी में रख रहा था, चीफ़  के आग्रह पर उसी मां के द्वारा गाये गये लोकगीत से माहौल खुशगवार हो जाता है और शामनाथ को अपने प्रमोशन में इस खुशी का योगदान दिखायी देने लगता है। उसकी नजऱ में वह लोकगीत भी एक ‘माल’ है। प्रमोशन के अपने अवसर को और अधिक मज़बूत करने के इरादे से ही वह मां को, वृद्धावस्था में भी, पंजाबी घरों की प्रचलित दस्तकारी से, चीफ़  के लिए एक ‘फुलकारी’ बना देने के लिए मजबूर करता है। और मां जो हर भारतीय मां की तरह ही है अपने पुत्र के लिए सब कुछ करने को आखिऱ तैयार हो ही जाती है :

मां के चेहरे का रंग बदलने लगा, धीरे-धीरे उनका झुर्रियों-भरा मुंह खिलने लगा, आंखों में हल्की-हल्की चमक आने लगी। ‘तो तेरी तरक्क़़ी होगी बेटा?’ ‘तरक्क़़ी यूं ही हो जायेगी? साहब को खुश रखूंगा, तो कुछ करेगा, वरना उसकी खि़दमत करने वाले और थोड़े हैं? ‘तो मैं बना दूंगी, बेटा, जैसे बन पड़ेगा, बना दूंगी।’

और तब शामनाथ भी अपनी मां को इसी लालच में लाड़ दुलार दर्शाने लगता है। कहानी जहां एक ओर शामनाथ के माध्यम से नवोदित बुर्जुआ पीढ़ी में पनप रही मूल्यहीनता और अवसरवादिता का एक ‘क्रिटीक’ पेश करती है वहीं भारतीय मां के वत्सला रूप का उसी तरह चित्र रचती है जिस तरह निस्सीम एजै़कियल ने अपनी मशहूर अंग्रेज़ी कविता, 'हृद्बद्दद्धह्ल शद्घ ह्लद्धद्ग स्ष्शह्म्श्चद्बशठ्ठ' में किया है जिसमें बिच्छू के डंक से बेहाल मां इस बात पर संतोष व्यक्त करती है कि कम से कम, उसके बच्चों को उस बिच्छू ने डंक नहीं मारा। भीष्म जी की कहानी में भी मां अपने बेटे शामनाथ को उस मानसिक पीड़ा से बचाने की कोशिश करती है जो उसे प्रमोशन न मिलने पर हो सकती है। इसीलिए वह बुढ़ापे की कमज़ोर नजऱ के होते हुए भी अंतत: ‘फुलकारी’ बनाने को राज़ी हो जाती है। शामनाथ की नजऱ में मां के द्वारा पेश किया गया ‘लोकगीत’ और पंजाब की वह ‘लोककला’ एक कमोडिटी से अधिक कुछ भी मूल्य नहीं रखती जिसे वह अपने बॉस को भेंट के रूप में दे कर प्रमोशन हासिल कर सकता है।

                यह कहानी जितनी 1950 के बाद के दशक में प्रासंगिक थी, उससे कहीं ज्य़ादा आज का यथार्थ पेश करती है। 1991 के बाद से अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के साथ समझौता करके हमारे शासकवर्गों ने भूमंडलीकरण और उदारीकरण के नाम से विदेशी पूंजी की उदार घुसपैठ और भारत के बाज़ार में उससे उत्पादित माल की उदारतापूर्वक बिक्री का जो मौक़ा दिया, उससे भारत के सत्ताधारी वर्गों को तो अपार धनदौलत कमाने का अवसर मिला ही, मध्यवर्ग का भी बेतहाशा फैलाव हो गया। अब हर घर में कोई न कोई शामनाथ किसी न किसी बहुराष्ट्रीय विदेशी कंपनी के चीफ़  को दावत पर बुला रहा है। एफ़ डी आई की भागीदारी के प्रतिशत को हर सरकार बढ़ा कर भारत को लूटने की पूरी छूट और जनता के खून पसीने से निर्मित पब्लिक सेक्टर बेच डालने की मुहिम चला रही है। पहलेे कांग्रेस ने यह सिलसिला शुरू किया, फिर उसी को भाजपा ने एनडीए शासन के पहले दौर में बेरोक टोक जारी रखा, और 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने लंबे-चौड़े वायदे करके पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया, सत्ता हासिल करने के तुरंत बाद गऱीब जनता को भूल कर खुल्लमखुल्ला कारपोरेट जगत और विदेशी कंपनियों को हर तरह से मालामाल करने के क़दम उठाने शुरू कर दिये। पब्लिक सेक्टर बेच डालने की मुहिम शुरू है, हर रोज़ किसान-मज़दूर विरोधी क़ानून पारित कराने की ताबड़तोड़ कोशिश हो रही है जिससे धनकुबेरों को ज्य़ादा से ज्य़ादा $फायदा पहुंचाया जा सके। किसानों की ज़मीन ज़बरन हड़प कर कारपोरेट घरानों को देने की चाल चली जा रही है, भूमिहीन किसानों को सौ दिन रोजग़ार देने वाली योजना में भारी कटौती कर दी गयी है, मज़दूरों की छंटनी और तालाबंदी आसान बनाने के लिए ‘श्रम सुधारों’ की मांग शोषकवर्गों की ओर से हर रोज़ हो रही है, मोदी सरकार इसलिए मज़दूर यूनियनों के प्रतिरोध के बावजूद श्रम क़ानूनों में संशोधन करने पर आमादा है जिससे पूंजीपति मज़दूरों की छंटनी और तालाबंदी आसानी से कर सकें ।

                भीष्म साहनी की जन्मशती हम आज जब 2015 में मना रहे हैं, तब देख रहे हैं कि किस तरह मुना$फा कमाने वाले सभी पब्लिक सेक्टर उद्यमों में से का$फी कुछ के शेयर देशीविदेशी पूंजीपतियों को बेच बेच कर भारत को तबाह करने की तैयारी हो रही है। नरेंद्र मोदी अपना सारा समय अंबानी, अडानी और दूसरे देशी कारपोरेट स्वामियों को लगातार साम्राज्यवादी देशों में अपने साथ ले जाकर वहां के हर कारपोरेट चीफ़ को दावत देने में लगा रहे हैं और कह रहे हैं कि भारत आओ, ‘मेक इन इंडिया’ यानी भारत के संसाधनों और श्रमिकवर्ग के सस्ते श्रम का दोहन करो, मुना$फा कमाओ, शामनाथ की मां की ही तरह आज भारत की धरती का हाल है, वह एक ‘माल’ में तब्दील की जा रही है।

                हमारे मध्यवर्गीय शामनाथों को यह जगतगति व्यापती ही नहीं, वे अपने अपने विदेशी ची$फों को खुश करने में लगे हैं, मुक्तिबोध के शब्दों में, ‘बौद्धिकवर्ग है क्रीत दास’। उसे इन तमाम मसलों से कुछ भी लेनादेना नहीं, हर शामनाथ अपने प्रमोशन की जुगाड़ में है, जिसके लिए सारे नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दी जा सकती है। ऐसे शामनाथ इस समय तो हर जगह देखे जा सकते हैं, ऐसे स्वायत्त कार्यस्थलों पर भी जहां कुछ समय तक नैतिकमूल्यों की परवाह होती रही थी, जैसे विश्वविद्यालय, और शिक्षण केंद्र व अन्य स्वायत्त संस्थाएं आदि, अब वहां भी चापलूसी की विद्या में निपुण सुधीजन शामनाथ की तरह पतनशीलता का शिकार हो चुके हैं। इस तरह भीष्म जी की कहानी आज का सच भी अपनी पूरी कलात्मकता के साथ बयान करती दिखायी देती है।

                भीष्म जी की रचनाशीलता का रेन्ज बहुत बड़ा है। देश और काल दोनों के हिसाब से भी और सामाजिक तबक़ों के यथार्थ के हिसाब से भी। उनके भीतर का रचनाकार या कलाकार एक सैलानी की तरह है जो अपनी खुली आंखों से जग और समाज का कोना-कोना देखता चलता है और उसी में से कोई कोना विश्वसनीय यथार्थ की तरह अपनी मनचाही विधा में ढाल देता है। एक कहानी की शुरुआत ही इस सत्य को कहती है: ‘घुमक्कड़ी के दिनों में मुझे खुद मालूम न होता कि कब किस घाट जा लगूंगा। कभी भूमध्य सागर के तट पर भूली-बिसरी किसी सभ्यता के खंडहर देख रहा होता, तो कभी यूरोप के किसी नगर की जनाकीर्ण सडक़ों पर घूम रहा होता।’(‘ओ हरामज़ादे’) उनकी कई कहानियों में इसी तरह के सैलानी कथानायक हैं जैसे ‘ओ हरामज़ादे’ और ‘वांङ्चू’। इनमें ऐसे उखड़े हुए लोग हैं जो अपने-अपने देश को बहुत प्यार करते हैं मगर उससे दूर रहने को अभिशप्त हैं। इन दोनों कहानियों के कथानायकों का आत्मनिर्वासन खुद उनका अपना चुनाव है, मगर भारत-विभाजन की त्रासदी झेलने वाले लाखों विस्थापितों को दर्द तो साम्राज्यवाद की सेवा में लगी सांप्रदायिकता की ज़ेहनियत ने दिया था। और उस दर्द के चितेरे भी भीष्म जी थे। यह ज़ेहनियत किस तरह खंूख्वार हो सकती है, इसका चित्रण उनकी मशहूर कहानी, ‘अमृतसर आ गया है’ में बहुत ही संश्लिष्ट तरीक़े से हुआ है और भारत-विभाजन की त्रासदी से उत्पन्न विस्थापन का दर्द पूरी भयावहता के साथ तमस में देखा जा सकता है।

विश्वव्यापी ‘स्पेस’ की ही तरह उनका रचनाकार अतीत के किसी भी काल में प्रवेश कर जाता है और उसमें अतीत की वर्तमानता पिरो देता है जिसे अंग्रेज़ी में ‘प्रेज़ेन्टनैस ऑफ द पास्ट’ कहते हैं। काल के इस रेन्ज को छूने के लिए उन्होंने नाटक विधा का उपयोग किया, ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ और ‘हानूश’ बीते हुए समय को वर्तमान में छू लेने की कोशिश के ही परिणाम हैं।

देश और काल को अतिक्रमित करने की क्षमता यथार्थवादी तरीके से अपने समय व समाज को आधुनिक कथा-साहित्य में रचने से आती है, प्रेमचंद ने यही किया था, भीष्म जी ने भी उसी प्रविधि से हमारे कथासाहित्य को आगे बढ़ाया। पूंजीवादी विकास का जो रास्ता हमारे यहां के शोषक शासक वर्गों ने अख़्ितयार किया उससे भारतीय समाज के विभिन्न हिस्सों में आये बदलावों को पूरी कलात्मक क्षमता के साथ भीष्म जी ने रचा। जहां मध्यवर्ग में आये बदलाव की तस्वीर हमें ‘चीफ़  की दावत’ जैसी कहानियों में मिलती है वहीं,‘गंगो का जाया’, कहानी में भीष्म जी दिल्ली में मज़दूरवर्ग की हालत का जीता-जागता चित्र पेश करते हैं। ठीक यह चित्रण भी बिल्कुल आज का लगता है। दिल्ली में पूंजीवादी विकास किस तरह देशभर से गऱीबों को खींच-खींच कर ला रहा है और उन्हें दिहाड़ी मज़दूर बना रहा है, जो ठेकेदारों के रहमो करम पर जिं़दा रहते हैं। इसका अद्भुत चित्रण इस कहानी में है। अर्थ की अनेक परतें समेटे यह कहानी भी भारत के पूंजीवादी विकास में होने वाले मूल्यपतन की तस्वीर पेश करती है जो आज का और एकदम आज का जीता-जागता यथार्थ तो लगती ही है, 2014 में सत्ता में आयी मौजूदा भाजपा सरकार के द्वारा श्रमक़ानूनों में किये जा रहे मज़दूरविरोधी संशोधनों से यह कहानी भविष्य के यथार्थ की पूर्वछाया भी पेश करती है, वह दिन दूर नहीं जब बदले हुए क़ानूनों के तहत किसी भी मज़दूर या कर्मचारी और यहां तक सफे़दपोश शामनाथों को भी नौकरी से आसानी से हटाया जा सकेगा, उक्त कहानी की गर्भवती गंगो और सडक़ पर दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले घीसू की तरह।

भीष्म जी मुक्तिबोध की तरह ही सांकेतिक रूप में मध्यवर्ग को यह संदेश देते हैं कि ऐसे संकट काल में ‘तय करो किस ओर हो तुम’:

सुनहले ऊ़़़ध्र्व आसन के

निपीडक़ पक्ष में अथवा

कहीं उससे लुटी-टूटी

अंधेरी निम्नकथा में तुम्हारा मन

कहां हो तुम?   

(मुक्तिबोध रचनावली, खंड-2, पृ. 237)

भीष्म जी नयी कहानी के दौर से ले कर बीसवीं सदी के अंत तक रचनारत रहे। इस लंबी अवधि में कई तरह के बदलाव कहानी के शिल्प आदि में आये, उन बदलावों का थोड़ा बहुत ही असर उनकी अपनी कहानीकला पर आया होगा, ‘झूमर’, ‘लीला नंदलाल की’, ‘माता-विमाता’, ‘चील’ आदि कुछ कहानियां हैं जिनमें कुछ असर दिखायी देते हैं, अन्यथा वे अपने आलोचनात्मक यथार्थवादी शिल्प के माध्यम से ही रचना करते रहे और उसी का विकास अपने तरीके़ से किया। सौम्य व्यक्तित्व के साथ अपनी अडिग प्रतिबद्धता लिए इस रचनाकार को हमारा समाज हमेशा याद रखेगा क्योंकि वह इस दुनिया के विशाल शोषित जनगण के साथ था, उनका अपना रचनाकार, कलाकार।