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Saturday 18 Nov 2017

वैज्ञानिक दृष्टि क्या होती है

डॉ. व्रजकुमार पांडेय
समता कॉलोनी,  
हाजीपुर (वैशाली)
मो. 9934982306
कभी-कभी ऐसा अनुभव होता है कि हमारा देश विडम्बनाओं का देश है। मैं विज्ञान के छात्रों, शिक्षकों, यहां तक कि बड़े-बड़े डॉक्टरोंं और वैज्ञानिकों को देखता हूँ जो प्रकृति से लड़ते-जूझते हैं और अपने आविष्कारों से लोगों को चकित कर देते हैं। यहाँ तक कि आज जो दुनिया है वह विज्ञान और प्रौद्योगिकी की देन है। लोगों को जिन्दा रखने का ज्ञान प्राप्त करने के अलावा विज्ञान ने क्या-क्या नहीं खोज लिया है। कम्यूटर, इंटरनेट और सूचना के बारे में जो अभी तक की उपलब्धियां विज्ञान की हंै, ऐसा कहा जाने लगा है कि मनुष्य की बुद्धि अब तक जितनी सोचती रही है, उससेकई गुना अधिक कम्प्यूटर सोचने लगा है। कम्प्यूटर के बारे में कहा जा रहा है कि वह बिना ड्राइवर के किसी व्यक्ति को उसके गन्तव्य तक पहुँचा सकता है। केवल उसको निर्देश की जरूरत है। विज्ञान की इन सारी उपलब्धियों के बीच हम यह देखते हैं कि विज्ञान के अध्येता, विज्ञान के शिक्षक व्यवहार में अपने को ईश्वर के शरणागत कर देते हैं। पूजा, पाठ, तंत्र-मंत्र, मंदिर-मस्जिद, साधु योगी में अटूट आस्था प्रकट करते हैं। हमारे देश में दर्शन की दो कोटियां हैं। दार्शनिक दो भागों में विभक्त हैं। एक को भौतिकवादी कहते हैं तो दूसरे को भाववादी।
भौतिकवादी यह मानते हैं कि पदार्थ, प्रकृति और अस्तित्व पहले है तथा आत्मा, विचार और चेतना उसके बाद। इसके विपरीत भाववादी यह मानते हैं कि आत्मा, विचार और चेतना पहले है तथा पदार्थ, प्रकृति और अस्तित्व उसके बाद और उसी से उत्पन्न। भौतिकवाद का मूल विचार है कि अस्तित्व प्राथमिक है और वही चेतना को निर्धारित करता है। भाववादी मानते हैं कि ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण किया है जबकि भौतिकवादी मानते हैं कि ईश्वर को मनुष्य ने बनाया है।
इस संदर्भ में मेरे दिमाग में यह विचार बार-बार कौंधता है कि वैज्ञानिकों को तो भौतिकवादी होना चाहिए। और जब मैं विज्ञान पढऩे पढ़ानेवालों को ईश्वर, भगवान, पैगम्बर के शरणागत होते देखता हूँ तो मेरे मन में यह विचार दृढ़ होने लगता है कि विज्ञान पढऩे-पढ़ानेवालों की दृष्टि वैज्ञानिक होनी चाहिए। लेकिन हमारे देश में ऐसा देखने को मिलता नहीं है। फिर सवाल है कि वैज्ञानिक दृष्टि है क्या? संभव है इस समझ से असलियत का पता चले।
ऐसी उलझनों के बीच अचानक एक दिन पी एन हक्सर द्वारा लिखित एक लेख की याद आयी। अपनी किताबों और पत्रिकाओं को छान मारा। लेकिन अचानक दिख गया। हक्सर ने साफ-साफ  शब्दों में समझाया था कि वैज्ञानिक समझ और दृष्टि क्या होती है। वे लिखते हैं -
‘‘हमारे देश में विज्ञान और तकनीकी की मजबूत नींव डाली जा चुकी है। इस नींव को डालने में जवाहरलाल नेहरू की महत्वपूर्ण भूमिका थी। नेहरूजी ने ही देश के विकास को तकनीक और विज्ञान से जोड़ा था। वर्ष1958 के मार्च माह में नेहरूजी ने संसद में विज्ञान नीति संबंधी प्रस्ताव पेश किया था। इस प्रस्ताव में उन्होंने स्पष्ट घोषणा की थी कि ‘‘विज्ञान की हमारे देश के नागरिकों के उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका है। विज्ञान की हमारे जीवन, हमारे नजरिये, हमारे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में और उनसे जुड़े संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिका है।’’ विज्ञान को हम सिर्फ  प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रख सकते। निरक्षरता और अंधविश्वास आज भी हमें जकड़े हुए है। इनसे मुक्ति पाने में विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही हम विकास के पथ पर द्रुत गति से बढ़ सकते हैं। विज्ञान का अर्थ क्या है? और वैज्ञानिक नजरिये का अर्थ क्या है? विज्ञान और तकनीक के माध्यम से हम भौतिक विकास करते हैं और इस विकास के जो नतीजे होते हैं उनके न्यायोचित वितरण में भी विज्ञान की भूमिका होती है।
आधुनिक विज्ञान के तीन महत्वपूर्ण पहलू हैं - साधारण सिद्धांत, उन सिद्धांतों पर आधारित योजनाएं और उन योजनाओं से उत्पन्न नतीजे। नेहरूजी कहा करते थे कि विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका खोज है, अनुसंधान है। अनुसंधान के द्वारा ही हम उन कमियों को पहचानते हैं जिनकी वजह से हम विकास के रास्ते पर नहीं बढ़ पाए हैं।
विज्ञान के सहारे ही हम उस वातावरण से मुक्ति पा सकते हैं जिसने धर्म के आधार पर हमारे विकास के रास्ते को रोककर रखा है। जब यूरोप में गैलिलियो, न्यूटन, केप्लर आदि वैज्ञानिक प्रकृति में छुपे हुए महान रहस्यों को उद्घाटित कर रहे थे और उसके सहारे जब उन्होंने इंसान के लिए अनेक नए रास्ते सुझाए उस समय हमारे देश के बुद्धिजीवी मनु, वेद आदि के रहस्यों में उलझे हुए थे। इसके कारण हमारा सामाजिक व्यवहार भी प्रभावित हुआ। हमारे बुद्धिजीवियों ने अपना समय गैर-वैज्ञानिक गतिविधियों में बिताया और हम कर्मकाण्ड में इतने अधिक उलझ गए कि देश की बुनियादी समस्याओं को समझ नहीं पाए। हमारी इस प्रवृत्ति के कारण हमारी सामाजिक चेतना का विकास नहीं हो सका।
इस तरह की प्रवृत्ति से मुक्ति दिलाने में हमारे कुछ महान पुरुषों ने प्रमुख भूमिका अदा की है। इनमें राजा राममोहन राय, विवेकानंद और गांधी भी शामिल हैं। नई राष्ट्रीयता, नया विज्ञान और तकनीक और इनके सहारे देश की समस्याओं का निदान एवं समाधान उस समय तक संभव नहीं है जब तक हम अपने अतीत को त्यागकर भविष्य की तरफ  न देखें। इन सारी उलझनों के मद्देनजर नेहरूजी      कहा करते थे कि हम विज्ञान के अस्तित्व से इंकार नहीं कर सकते, क्योंकि वह आधुनिक विश्व का सबसे बड़ा फैक्टर है। नेहरूजी मानते थे कि भौतिक धरातल पर प्रगति करने के लिए हमें पंचवर्षीय योजनाओं का क्रियान्वयन करना पड़ेगा। इसके लिए आवश्यक है कि हम धर्म, जाति, भाषा व क्षेत्रवाद के कारण होने वाले संघर्ष और तनाव से मुक्ति पाएं।
यह उस समय ही संभव हो सकता है जब हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाएं। विज्ञान की विशेषता यह है कि उसकी छत्रछाया में हम एक समान उद्देश्य की प्राप्ति में अपनी शक्ति लगा देते हैं और फिर उसी के आधार पर हम प्रगति के रास्ते पर चलते हैं। नेहरूजी बुनियादी रूप से एक वैज्ञानिक थे और उन्होंने अपनी इस प्रतिबद्धता के द्वारा देश को प्रगति के रास्ते पर बढऩे की प्रेरणा दी। नेहरूजी का कहना था कि हम जितना ज्यादा प्रकृति को समझने का प्रयास करते हैं उतने ही हम अंधविश्वास के चंगुल से मुक्त होते हैं। एक समय ऐसा था जब कृषि, भोजन, कपड़े, सामाजिक रिश्ते सब धर्म से संचालित होते थे। परंतु धीरे-धीरे इससे मुक्ति मिली और ये वैज्ञानिक नजरिए से संचालित होते हैं, यही आज के विश्व की सबसे महान सफलता है।
विज्ञान के दोनों पहलुओं ने, चाहे आप विशुद्ध विज्ञान से प्रभावित हों या प्रयुक्त विज्ञान की महिमा के गीत गाते हों, आप पर, आपके चिन्तन तथा विचारों पर इतनी तेज छाप छोड़ी है कि आज मनुष्य-जीवन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं बचा है जिसे किसी वैज्ञानिक नियम के अधीन (कम-से-कम सिद्धान्त:) नहीं माना जाता हो।
इसका प्रमाण है कि, ‘विज्ञान’, ‘वैज्ञानिक विधियों’ आदि अनेक शब्दों तथा उक्तियों का धड़ल्ले से रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने लगा है। लेकिन सबसे हास्यास्पद बात है कि इन शब्दों और उक्तियों का इस्तेमाल प्राय: गलत अर्थों में ही होता है। अगर गैर वैज्ञानिक किस्म के लोग यह भूल करते तो शायद उतनी परेशानी नहीं होती। मगर दिक्कत यह है कि वैज्ञानिक लोग भी इनका गलत ही इस्तेमाल करते हैं। अधिकांश साइंसदाँ जो कि अपने क्षेत्र में काफी आलोचनात्मक और खोजी अभिरुचि रखते हैं, चिन्तन के दूसरे क्षेत्रों में वैज्ञानिक रुख नहीं अपना पाते। फिजिक्स के क्षेत्र में काम करने वाले या इसी प्रकार के दूसरे क्षेत्रों के वैज्ञानिक अपने विषय में सही रुचि का प्रदर्शन करते हैं; किन्तु जब वे सामाजिक सुविधाएँ, व्यक्तिगत स्वतंत्रता आदि समस्याओं पर विचार प्रकट करते हैं तो उनके आचरण में जमीन-आसमान का अन्तर आ जाता है।
विज्ञान मानव-जाति के सांस्कृतिक इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, इस विषय में अब दो राय नहीं। अत: इसके सही अर्थ को गैर-वैज्ञानिकों को भी हृदयंगम करना जरूरी है। वैज्ञानिक रुख और वैज्ञानिक विधियाँ केवल वैज्ञानिकों की ही बपौती नहीं हैं। साइंस ने आदर्शों के कुछ फूल उगाये हैं। इन्हीं फूलों को होशियारी से पिरोने से वैज्ञानिक अभिरुचि की एक माला तैयार होती है।
तो, पहला बिन्दु है-वस्तुगत दृष्टि। विज्ञान के अनुसार दृष्टि, व्यष्टिगत नहीं अपितु वस्तुगत होनी चाहिए। इसके मुताबिक जो बात वैज्ञानिक सत्य है, उस तक पहुँच या उसकी परीक्षणीयत, केवल चन्द सुविधा-सम्पन्न लोगों तक ही नहीं होती बल्कि उसकी जाँच वे सभी लोग कर सकते हैं जो कि प्रेक्षण के लिए, प्रयोग के लिए या तथ्यों के सांख्यिक विवेचन के लिए तत्पर हों। वैज्ञानिक तथ्यों का संज्ञानात्मक महत्व है। इनका भावनात्मक, सौंदर्यबोधी या प्रेरणात्मक तत्वों से स्पष्ट मतभेद है। यह मतभेद विज्ञान की वस्तुगत दृष्टि के कारण है। यही दृष्टि  कलात्मक, साहित्यिक, नैतिक एवं धार्मिक मूल्य तथा विश्वदृष्टिकोण से स्पष्टतया अलग कर देती है, क्योंकि इनका भावात्मक, सौंदर्यबोधी या प्रेरणात्मक सम्बन्ध संज्ञानात्मक की अपेक्षा अधिक प्रखर है।
दूसरा बिन्दु है-‘‘सत्य के निकट तक पहुँचना या संदिग्धता को न्यूनतम राशि तक ला देना।’’ जैसे-जैसे नापने वाले यंत्रों का विकास होता है, उनकी बनावट में प्रगति होती है। वैज्ञानिक नियतांकों के मान अधिक-से-अधिक सही होते जाते हैं तथा जिन तथ्यों के विषय से संदिग्धता रहती है, उसे न्यूनतम बनाने की चेष्टा होती है।
तीसरा बिन्दु है - सहज सरलता। जटिल रहस्यों को भेदकर सर्वसामान्य की समझदारी तक ला देना, यह विज्ञान का मुख्य कर्तव्य है।
चौथा बिन्दु है-विश्वसनीयता। केवल सूचनाओं को एकत्र कर दें या अपने तर्कों को ज्यादा सबल तरीके से रख दें, इससे वैज्ञानिकता नहीं आती; बल्कि सही और सम्बद्ध समझदारी के जरिये - व्यवस्था की रोशनी में व्याख्या द्वारा तथ्यों की प्रतिष्ठा करें, इससे विश्वास की नयी भूमि निर्मित होती है।
और पाँचवा बिन्दु है-प्रगति। विज्ञान का खोजी हमेशा नये नियमों, नये तथ्यों की तलाश में रहता है जो अतीत की अपेक्षा ज्यादा सरलता से सारी बातों को स्पष्ट कर सकें। इस प्रक्रिया में नवीन की जितनी निर्मिति होती है, पुरातन का उतना ही प्रभूत संहार। और चरैवेति, चरैवेति का शंखनाद गूंजता रहता है। विज्ञान के दर्शन में विश्वदृष्टिकोण की इमारत का एक बरामदा बनता रहता है, तो दूसरा टूटता रहता है, इस इंतजार में कि नयी योजना के सीमेंट से नये तथ्यों के पत्थरों को जोडक़र ज्यादा उपयोगी चबूतरा तैयार हो सके। अविराम तोडफ़ोड़ और उसके बाद नयी बनावट का सिलसिला जारी रहता है। प्रगति का पथ निरन्तर प्रशस्त होता रहता है।
विज्ञान के ये सलोने बिन्दु हैं। इनकी आधारशिला पर वैज्ञानिक रुख की प्राण-प्रतिष्ठा होती है।
जहाँ विज्ञान के ये लाक्षणिक गुण-धर्म हैं, वहाँ इसके खिलाफ तीन मजबूत शक्तियाँ भी हैं-पूर्वाग्रह, हठधर्मिता तथा स्वार्थ। हमारे देश में एक बड़ी प्रचलित धारणा है कि सवर्ण लोग ही ज्यादा बुद्धिमान तथा मेधावी होते हैं। अत: उनके द्वारा ही प्रगति सम्भव है, गैर सवर्णों द्वारा नहीं। यह एक सार्वदेशिक पूर्वाग्रह है। इसी तरह पृथ्वी का चपटी होना, इस पूर्वाग्रह ने काफी लम्बे अरसे तक संसार में दूरगामी यात्रा से लोगों को विरत रखा। फिर एशिया के विभिन्न मुल्कों में, मुख्यत: भारत में मृत शरीर की चीरफाड़ ठीक नहीं है, इस हठधर्मिता ने हमको जीव-विज्ञान के क्षेत्र में उन्नति नहीं करने दिया तथा पिछड़ेपन से जकड़ दिया। हिन्दुओं में जाति-बहिष्कार के भय ने सैकड़ों वर्षों तक लोगों को समुद्र-यात्रा से दूर रखा।
जहाँ तक हमारे देश का प्रश्न है, हमारा बुद्धिजीवी वातावरण ‘‘अंतिम लक्ष्य, मोक्ष,’’ तथा इसकी प्राप्ति के लिए ‘‘तपश्चर्या जनित अनुशासन’’ के घटाटोप से भयंकर रूप से आक्रान्त रहा है। इस कारण वैज्ञानिक दृष्टि के लिए हमारी भूमि ऊसर-सी रही। किन्तु इसी के साथ हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय चिन्तन-प्रणाली समृद्धि में अद्वितीय थी। चाहे फलित या गणित ज्योतिष हो, रसायन हो, आरोग्य-विद्या हो या गणित। हमारे यहां आरंभिक उन्नति अत्यंत उच्चस्तर की हुई। फिर भी वैज्ञानिक संस्कृति का हमारे यहाँ विकास नहीं हो सका। इसका मुख्य कारण है हमारे यहाँ नैतिक तथा धार्मिक विश्व दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा। विश्व की ठोस बातों के बारे में ज्ञान की अपेक्षा इस जीवन के बाद की जानकारी के लिए जीवन लगा देने की ईप्सा। जहाँ यूरोप के ‘अज्ञानी’ केवल तीन आयामों के भीतर अपनी मेघा लगाकर विश्व के ठोस धरातल की जानकारी कर रहे थे वहाँ हम ब्रह्मांड गुरू की मेधा लेकर इस विश्व से परे, इस जीवन से परे, किसी कल्पनालोक के अनन्त आयामों की खोज में सतत सचेष्ट रहे। विश्व की कठोर भूमि की तकलीफों का निराकरण यहाँ की दवा से हो, यह हमारे लिए गौण तथा निकृष्ठ माना गया-हम इससे दूर की अत्यन्त उज्ज्वल मानवता के वलक्ष दर्शन की आकांक्षा में अपनी आत्मा तथा परमात्मा का सायुज्य सम्बन्ध कराते रहे। अत: कठोर सत्य से दूर होते गये। सांसारिक बातों से विरत होते गये। ‘‘ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या’’ की तरंग से आप्लावित होते रहे। फिर वैज्ञानिक संस्कृति को सम्बल मिलता, तो कहाँ से? मतवाद और हठधर्मिता के शाद्वल में ठोस की अनुभूति होती तो कहाँ से?
यहाँ विभिन्न कर्मेन्द्रियों द्वारा सत्य की जानकारी को प्रश्रय नहींदिया गया। उपनिषदों ने परा तथा अपरा विद्या के बीच भेद किया। अपरा के क्षेत्र में सभी प्रकार के विज्ञान आते थे। इसे निम्नतर विद्या समझा गया। इस भेद ने अकेले भारत की जितनी क्षति की; वैज्ञानिक उन्नति के मार्ग में उतनी और किसी एक कारण ने नहीं की।
यूरोप में सत्रहवीं शताब्दी के अन्त होते-होते आधुनिक विज्ञान तथा वैज्ञानिक रुख की मजबूत नींव पड़ चुकी थी। धीरे-धीरे इसने अपने डैने फैलाये और आज सारे संसार में इसका डंका बजने लगा है। इसके सामाजिक विकास का सबसे बड़ा श्रेय माक्र्स, एंगेल्स, लेनिन प्रभृति आचार्यों को है, जिन्होंने वैज्ञानिक रुख की विश्व-परम्परा की नींव डाली। जिस समाजवाद की उन्होंने परिभाषा की, उसे वैज्ञानिक समाजवाद कहा। इसके सारे स्तम्भों, उदाहरणों तथा आदर्शों को वैज्ञानिक परिवेश से लिया। डार्विन ने जाति-वर्ग के विकास के आधार पर मानव-जाति की सभ्यता के इतिहास का निर्माण किया तथा विशुद्ध ठोस तत्वों से रचित विश्व का भूतवादी दृष्टिकोण दिया। विश्व से पलायन और माया के आडम्बर से दूर इसी संसार में मानवता का किस तरह कल्याण हो सकता है, उसकी दवा की प्रणाली का आविष्कार किया।
आज विश्व के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग प्रकार की शासन-व्यवस्थाएँ हैं। 1917 में अक्टूबर क्रान्ति से उपजी समाजवादी व्यवस्था मतवाद, स्वार्थ, पूर्वाग्रह से मुक्त थी। वहाँ मनुष्य स्वयं से मुक्त था। वहाँ मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता बना था। लेकिन कुछ कमजोरियों के कारण वह व्यवस्था खत्म हो गई। आज के वैज्ञानिक युग में भी लोग अनेक प्रकार से, पलायन के मायावादी जाल में फंसकर, छटपटा रहे हैं। वहाँ शासनतंत्र के प्रतिष्ठाता विश्व के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बिल्कुल खिलाफ  हैं। वैज्ञानिक भी मुख्य रूप से उनके ही चाकर हैं-अन्य मानवशास्त्रियों की तो बात दूर रहे। किन्तु जनता का नसीब हमेशा खोटा ही रहे, इस अवधारणा से मुक्ति की आवश्यकता है। यह हमारे वैज्ञानिक रुख से हो सकेगा। इस मार्ग में हमारे सामाजिक नेताओं और साहित्यिकारों को वैज्ञानिक रुख अपनाना ही होगा अन्यथा उनकी कृतियां पुरातन की दासी बनी रहेंगी। वे संकीर्ण मतवादिता से विमुख नहीं हो सकेंगी, अत: विकास का वाहन बनने में अक्षम रहेंगी।