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Thursday 20 Jul 2017

अपनी आजादी

मलय
शिव कुटीर, टेलीग्राफ
गेट नं. 4
कमला नेहरू नगर,
 जबलपुर (म.प्र.)


अपनी आजादी

अधूरी आजादी के
अंधेपन में
छटपटाते हैं गांव के गांव
इस नेतागिरी के अंधड़ में
धूल से बिखरकर
हवा के झकझोरों से
परेशान रहते हैं लोग
अतडिय़ों को
भूख की आग सूखाती है
फिर भी किरण
कुदाली चलती है
जैसे खुद का ही गड्डा खोदती है?
चेतना चीत्कार करने के सिवा
बार-बार कांपती रहती है
धंसी हुई आंखों के
लोग
उजाले की पहचान में
भटकते रहते हैं
घास के तिनकों की तरह
उड़ते बिखरते हुए बहते हैं
ये अपने प्रतिरोध की बाढ़
कैसे हो पाएंगे
पूरी उम्र में भी इस तरह
कहां तक, कब तक रहे आएंगे?
सवाल है
अपनी आजदी को
लाने तत्पर हैं!
पर लोकतंत्र बहरा हो गया है
कुछ सुनता या गुनता नहीं है

फिकर क्यों करूंगा

कैसे भुलूं ये गाथाएँ
जमीन ने
जड़ों से रस देकर
हरा किया होगा
कठिन शीत ने
स्वयं अकडक़र और
ग्रीष्म ने जलते रहकर
मुझे बड़ा किया
सीटी के सुराख से
शब्दों को खींचकर ढाला
और ओंठों से उछालकर
भाषा के मैदान में खड़ा कर दिया
या यह कहूं
कागज पर गेंद सा छोडक़र
सबको सम्हालने बुलाया
मेरे विश्वास की अंगुली पकडक़र
गति देकर दौड़ाया
वाणी को नदी बना दिया
और हमेशा बहते रहने के
अमृत में बदल दिया
इस तरह
कविता में दौडऩा
दौड़ते रहने को सौंप दिया
सवाल बार बार कौंधते हैं
समय की चाक से रेखते हैं
इस नदी से
कितनी नहरें खिंची
और फसल लहलहाई
कितनी बाल्टियां भरीं
प्यास बुझाई इसी से
कुछ नहीं तो
किनारे की जमीन
अपना जल स्तर सम्हाल पाई है
आज तक
पूरी तरह नदी होकर
बह रही है
हम समझें तो कुछ कह रही हैं
हम आदमी नहीं रहते

हवा पेड़ों से प्यार करके
लिपटकर गाती है
पानी अपनी पुकार में लहरकर
किनारों को बार-बार चूमता है
हरी दूब
प्यार से बुलाती है
दिन की खुली धूप में
आसमान खुल खुल कर
झांकता है

भरी रात में
तारे आंखों से
टुकुर-टुकुर देखते रहते हैं
लेकिन हम कैसे आदमी हैं
करोड़-करोड़ जिन्दगियां
जहालत में जीती हैं
और हम खुशी-खुशी
यहां तक कि दूसरों को दुख देकर
खुश होना चाहते हैं
पशुता से,
जुनून की जबरदस्ती में
किसान जिन्दगियां
तबाह हो जाती हैं

उन्हें परेशानियां
दांत किटकिटाकर
निगलती जाती हैं
हममें कुछ ऐसे भी हैं

जो स्वार्थ के पानी से भरी कटोरी को
पार नहीं करते
कहो तो हर समय
अपने ही दांत दिखा देते हैं
और शिकारी की तरह तैयार हो
अपनी चपेट में ले लेते हैं
यह क्या है कब तक रहेगा?
हम आदमी होकर भी
आदमी नहीं रहते।