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Saturday 18 Nov 2017

कठपुतलियों का खेल चल रहा है

निरंजन महावर
सेंट्रल एवेन्यू
चौबे कालोनी
रायपुर-492001

कठपुतली का खेल चल रहा है।
मैं रसिक, मैं भी दर्शकों के बीच बैठ गया हूं।
अजब खेल है यह
सब नाच रहे हैं-
राजा और रानी नाच रहे हैं
मंत्री संत्री नाच रहे हैं, दरबारी नाच रहे हैं
चोबदार फर्राश सब नाच रहे हैं।
मैं चकित हूं इस खेल को देखकर।
मंच के एक ओर खड़ी ढोलनों बजा रही है ढोलक।
नेपथ्य से किसी पक्षी की आवाज में कोई सुना रहा है
इस नाच की कथा।
तभी अचानक मुझे दिखाई पड़ते हैं कठपुतलियों से बंधे हुए सूत्र
अरे यह क्या चल रहा है
यह कैसा गोरखधंधा,
ये सब लोग आनंदित होकर
नहीं नाच रहे।
इन्हें नेपथ्य से कोई नचा रहा है।
मैं चुपके से उठकर जाता हूं, नेपथ्य में
इस गोरखधंधे के रहस्य जानने।
इन सब कठपुतलियों के सूत्र पर्दे के पीछे बैठे हुए लोगों के हाथों में हैं।
ये नचा रहे हैं सबको।
यहां तक कि राजा रानी को भी।
तभी एक सुरक्षाकर्मी की नजर मुझ पर पड़ गई
उसने मुझे दबोच लिया।
मेरी गर्दन पकडक़र उसने मुखिया के सामने मुझे पेश किया।
उसने बड़े रौब से पूछा-
कौन हो तुम? यहां कैसे घुस आये?
मैंने कहा- मैं नाटक का रसिक हूं
कठपुतली का खेल देख रहा था
कुतुहलवश यहां चला आया।
तभी मेरी नजर उनसे बंधे सूत्रों पर पड़ीं
अरे यह क्या! ये भी सब कठपुतलियां हैं!

इनके सूत्रधार कौन हैं
कहां बैठे हैं वे लोग?
यह तंत्र बड़ा जटिल है। सूत्र सब उलझे हुए हैं।
किसके सूत्र कहां कहां जुड़े हुए हैं
समझना मुश्किल है।
कठपुतलियां नाच रही हैं
खेल चल रहा हैं।
मैं रसिक चकित हूं।
कठपुतलियों का नाच देख रहा हूं।

मुखौटे

मेरे चारों तरफ मुखौटे फैले हुए हैं
मैं मुखौटों से घिरा हूं।
कुछ देवी-देवताओं के हैं
कुछ पौराणिक पात्रों के।
कुछ नाटकों के हैं
तो कुछ मांत्रिकों के।
कुछ दिव्य हैं
तो कुछ अभिशप्तजनों के।
यह दुनिया जादुई है
यहां सब देवी-देवता हैं
तो ब्रम्हा के पांचवें सिर से उत्पन्न दक्ष भी।
यहां भूत पिशाच और वैदिक भी हैं।
मुखौटे हैं मुखौटों का क्या
सब मिल जुलकर साथ-साथ रहते हैं।

कभी ये नाचने लगते हैं
कभी लगाते हैं ठहाके।
कभी ये चीत्कार करने लगते हैं
कभी भयंकर अट्टहास
मैं वर्षों से इन्हें देख रहा हूं।
इनमें कुछ भयावह हैं
और कुछ सौम्य।
कभी मैंने किसी मुखौटे को हटाकर देखा नहीं
कि उनके पीछे का यथार्थ क्या हैं।
आज जिज्ञासावश मैंने कुछ मुखौटों को हटाकर देखा
सबसे पहले हटाया एक सौम्य मुखौटे को
वह दृश्य देखकर मैं अवाक रह गया।
शहर जल रहे थे।
कुछ लोग नारे लगा रहे थे-
मारो काटो आग लगा दो
उत्तेजित भीड़ ने कुछ जीवित लोगों को
आग में झोंक दिया।
जलते हुए मनुष्यों की गंध मुखौटे के नथुनों में पहुंची
देखते ही देखते उस मुखौटे की
भावभंगिमा बदलने लगी।
उसके चेहरे की स्मित मुस्कान और सौम्यता गायब हो गई।
वह रामलीला के रावण की तरह अट्टहास करने लगा।
मैंने घबराकर उस मुखौटे को यथावत रख दिया।
फिर कुछ संयत होकर मैंने दूसरे सौम्य मुखौटे को हटाया।
वहां विशाल भीड़ जमा थी
उस भीड़ का आह्वान करने वाला नेता
चिल्ला चिल्लाकर कह रहा था।
धक्का मारो जोर से और तोड़ दो, इस ढांचे को।
इसके नीचे सुरंग है
जो सीधी इन्द्रप्रस्थ को जाती है।
हमें सुरंग में अश्वत्थामा मिलेंगे
वे हमें इस सुरंग के अंधकार से पार लगाएंगे।
लोग उतर गये उस सुरंग में
भयानक अंधकार में डूबे हुए लोगों की चीख पुकाकर
वहां आज भी सुनाई पड़ती है।

एक अन्य करुणामय मुखौटे के पीछे
अर्धनग्न कृषकाय भूखे लोगों की भीड़ जुटी थी
स्त्रियों के स्तनों में दूध नहीं था
बच्चे बिलख रहे थे
एक बहुमंजिले भवन के सामने से भीड़ को
हटाने के लिए गारद पहुंच गई थी।
पहले लगी धारा एक सौ चवालीस
फिर कफ्र्यू और फिर लाठियां बरसने लगी।
आंसू गैस भी छोड़ी गई भीड़ पर
भीड़ फिर भी डटी रही।
चिल्लाती रही, रोटी दो कपड़ा दो, मकान दो
यह देश हमारा भी है
हमारा भी हक है इसमें।
तभी तड़ा तड़ गोलियां चलने लगी
लाशें बिछ गई।
फिर शहर की किसी झोपड़पट्टी में आग लगी।
देखते ही देखते धुआं-धुआं हो गया शहर।
झोपड़पट्टी राख हो गई थी

नेता अधिकारी भवन निर्माता सब पहुंच गए थे वहां

अब वहां भव्य इमारतें खड़ी होंगी।
गंदी बस्ती के गंदे लोगों की सफाई हो गई
अभिजात लोग बसेंगे वहां।

एक मुखौटा रौद्र था
मैंने सोचा कि इसके पीछे के यथार्थ में भी झांक लें।
उसके पीछे खड़ा था एक अधेड़
उसके चेहरे पर एक स्थायी खिसियानी मुस्कान चिपक गई थी
मानो कि उसने प्लास्टिक सर्जरी कराई हो
एक अन्य मुखौटे के पीछे गिड़गिड़ाता हुआ एक चाटुकार था
मैंने पूछा कि तुम ऐसे क्यों हो?
कहा उसने- खुशामद में ही आमद हैं
तुम नीम की तरह कड़वे हो
अब तक क्या हासिल कर पाये हो तुम।
मुझे उस पर दया आ रही थी।
एक शिष्ट विनम्र मुखौटे के पीछे
धूर्त समागम चल रहा था
वे सब षड्यंत्रों में लिप्त थे।
योजनाएं बन रही थी।
वे अय्यार भी थे ठग भी
हत्यारे भी थे पिंडारी भी। मैंने सोचा बहुत हुआ।

इन मुखौटों के पीछे महाभारत के
सभी पात्र विद्यमान हैं।
हे कृष्णद्वैपायन व्यास
पुन: आओ और एक नये महाभारत की रचना करो।
जो आज हैं वह पहले कभी नहीं था
तुम्हारे काल में मुखौटे नहीं थे।
कोई छद्म नहीं था। सब कुछ प्रकट था।
अब सारा सत्य मुखौटों से ढका है।