Monthly Magzine
Wednesday 20 Sep 2017

गीतिका

रमेशचंद्र शर्मा ‘चन्द्र’
डी-4, मोहन कृपा
हाउसिंग सोसायटी
बैजलपुर, अहमदाबाद-380015

गीतिका
(1)
खुद बनाते मूर्ति खुद ही पूजते हैं
कैसे-कैसे खेल मन को सूझते हैं।
इन सयानों को कहें क्या? आप कहिये-
नाम लेकर धर्म का वे जूझते हैं।
सत्य शुभ की बात रुचती ही नहीं है
असत् को बिन सोचे-समझे पूजते हैं।
आज कोने में रखे हैं सीधे-सादे
दुष्ट लम्पट निडर होकर घूमते हैं।
प्रेम की जब से पढ़ी है वर्णमाला
हर दिशा में नाम उसके गूंजते हैं।
संवेदना का है नहीं मौसम यहां
घाव भर-भर फूटते, कब रुकते हैं?
साधु-संतों में न दिखती स्वधत्व है
रामनामी ओढ़ चादर घूमते हैं।
आदमी है अंश प्रभु का कैसे मानें?
रक्त जन का जबकि जन ही चूसते हैं।
(2)
भर गया है कितना पानी आंख में?
लिख गया कोई कहानी आंख में।
कामनाएं ज्वार-सी उठती रही
छोड़ जाती खारा पानी, आंख में
अब हटाना और भी मुश्किल हुआ
बस गई यादें पुरानी आंख में
क्या जवानी क्या बुढ़ापा विवश क्या?
नाम भर की है जवानी, आंख में
पढ़ सकें तो हृदय से पढ़ लीजिए
सीता मैया की कहानी, आंख में
दूर जाकर क्या करोगे? सोच लो!
प्यार की राजधानी आंख में
तैरना आता नहीं है, क्यों घुसे?
कितनी गहराई बिरानी आंख में।
कौन किसकी आंख में  है झांकता?
पीर कितनी है पुरानी आंख में।