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Saturday 27 May 2017

उस बेवफा को अपना बनाने से फायदा फुर्सत के गम से खुद को सताने से फायदा

दरवेश  भारती
संपादक: गज़़ल के बहाने
डी-38, निहाल विहार
नांगलोई, नयी दिल्ली-110041
मो. 09268798930
उस बेवफा को अपना बनाने  से फायदा
फुर्सत के गम से खुद को सताने से फायदा

चाहा  बहुत  न  राजे-महब्बत खुले  कभी
खुल  ही  गया है जब तो छुपाने  से फायदा

आईन का मिटा दिया जिसने हर एक लफ्ज़
आईना उस बशर को  दिखाने  से फायदा

नीलाम  जिसने कर  दिया  अपने ज़मीर को
ऐसे  बशर को  कुछ  भी सुनाने से फायदा

दरकार कुछ न था जिन्हें दरकार है सब आज
ऐसों  को  कोई  ओह्दा  दिलाने  से  फायदा

हमने  जिसे था  टूट  के  चाहा  हयात  में
अब उस  फरेबदेह  को  मनाने  से  फायदा

सच-झूठ  से  उरूज  की  मंजि़ल जो पा गये
दरवेश  उनके  ऐब  गिनाने  से  फायदा

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दौरे-खिजाँ हो या  कभी  दौरे-बहार  हो
इन्सां वही है  इनसे  न जो  दरकिनार हो

गुजरेगी उसपे क्या जो दगा दे वही उसे
जिसके लिए दिल उसका बहुत बेकरार हो

चाहत वही है, दिल में बसा जो वो बस गया
क्या फर्क,  बा-सिंगार हो वो  बे-सिंगार हो

बाला-ए-ताक रख दे जो आईने-मुल्क ही
इतना जूनून भी तो न सर पर सवार हो

ढाते हैं साद:लौहों  पे  जो नित नये सितम
उनका भी नाम मुलजिमों में तो शुमार हो

कब तक अवाम खाएं हुकूमत के ये फरेब
हो वो कमाल कोई न इनका शिकार हो

हो  बन्दिशे-खयाल  से  जेबा  तेरा  कलाम
दरवेश बोलता हुआ ये शाहकार हो गज़़ल हो                                    
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मिले हैं जिससे वही निकला दिल का काला है
यहाँ कहाँ कोई ईमां पे चलने वाला है

जवान रुत  में भी किरदार जिसका आला है
दिलो-दिमाज में उसके  ही तो  उजाला  है

बताया जिसको भी अपनी उदासियों का सबब
उसी, उसी  ने  सरे-आम  इसे उछाला है

करे  है  याद समन्दर को जिन्दगी के लिए
ये  तशन:काम बशर भी बहुत निराला है

न छीन ले कोई रंजो-अलम जो उसने दिये
हजार खुशियों की कीमत पे इनको पाला है

ये कैसा दौर है आया कि जिसमें हर मासूम
सियासी साजिशों का बन रहा निवाला है

न  डाले  फिर  कोई  दहशत  में  इसको ऐ दरवेश
धडक़ते  दिल  को  किसी  तौर  अब  सँभाला है