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Saturday 27 May 2017

स्वाभिमान


अंजली मुखर्जी
 मकान नं. 11,
विवेकानंद नगर, पेंशनबाड़ा, के पास, रायपुर (छ.ग.)
मो. 9977826282
डॉ.पीयुष गुप्ता, आंखें बन्द करके, कमरे में लेटे हुए थे। बस, दो साल और फिर वे सेवा-निवृत्त हो जायेंगे। उफ् ! देखते देखते, कितने साल गुजऱ गये। अचानक बीती घटनाएं उनके मानस-पटल पर, चलचित्र की तरह अंकित होने लगी।
    आठ साल का पीयुष और 6 साल की उसकी बहन पीयुषा। माता-पिता दोनों ही शहर के नामी वकील बिहार के मुजफ्फरपुर में उनका सुंदर सा घर। घर के चारों ओर, आम और लीची के बड़े बड़े पेड़। चार लोगों का छोटा और सुखी परिवार। दोनों बच्चे शहर के अंग्रेजी माध्यम शाला में पढ़ते थे। माता-पिता की अनुपस्थिति में, धरमू दादा के पास रहकर, अपना गृह कार्य पूरा करते, कहानी सुनते खेलते और खाना खाकर सो जाते। सुबह, माता-पिता का स्नेह भरा स्पर्श ही उन्हें उठाता, शाला जाने के लिये तैयार किया जाता। मां स्वयं अपने हाथों से उनका टिफिन तैयार करती और पिताजी दोनों बच्चों को कार से, शाला तक पहुंचा आते। शाम को छुट्टी होने पर, धरमु दादा ही उन्हें शाला से घर लाते फिर रात को सोने तक दादा ही उनके साथ रहते।
उन दिनों मुजफ्फरपुर में भूकंप बहुत आते थे। पीयुष के मानस पटल पर वह दर्दनाक दृश्य फिर से अंकित होने लगा। रविवार शाम का समय था। मां ने संध्या पूजा कर, शंख बजाया और प्रसाद देने के लिये पीयुषा, पिताजी और उसे आवाज दी। ठीक उसी समय, पीयुष के किसी मित्र ने पुकारा, पीयुष जल्दी आ। देख क्या हो रहा है? पीयुष बाहर भागा। पिताजी, पीयुषा और धरमू दादा, सीढिय़ों से उपर चढ़ रहे थे और मां नीचे उतर रही थी। ठीक उसी समय भूकंप का एक जबरदस्त झटका आया और पूरी सीढिय़ां, भरभरा कर नीचे गिर पड़ी। जब तक पीयुष अंदर आता, सब कुछ समाप्त हो चुका था। शायद मित्र के रूप में विधाता ने आकर, उसे बचा लिया था। क्या पीयुष कभी उस दृश्य को विस्मृत कर सकता है? एक ही साथ, मां, पिताजी बहन और धरमू दादा उसे छोडक़र चले गये। कितना भयंकर था वह दृश्य, जब मलबे के नीचे से चारों की लाश निकाली गई थी।
पीयुष के उसी मित्र के परिवार ने, उसे पनाह दी। उस परिवार के एहसान तले वह अभी तक दबा है। सेन परिवार का एक ही बेटा था मयंक। पीयुष और मयंक ने एक साथ ही लिखाई-पढ़ाई की। दोनों ही मित्रों ने चिकित्सा के पेशे को अपनाया। आज मयंक के माता-पिता इस दुनिया में नहीं है और बरसों पहले मयंक सपरिवार, शिकागो में बस गया है। लाख समझाने के बावजूद पीयुष ने विवाह नहीं किया। उसके मन में एक डर समाया हुआ था कि, यदि मैंने विवाह किया और मेरे सामने ही बीबी-बच्चे मुझसे बिछुड़ गये तब यह गम मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा, पागल हो जाऊंगा।
आखिर उसकी सेवानिवृत्ति का दिन भी आ गया। इतने दिनों तक तो एक सफल चिकित्सक का जीवन जीया पीयुष ने, पर अब सेवानिवृत्ति के बाद अकेले वह कैसे काटेगा, अपना समय। हालांकि पीयुष ने अपना सारा जीवन लोगों की सेवा के लिये ही अर्पित कर दिया है। आज भी वह गरीबों का मसीहा माना जाता है तथा अत्यंत ही लोकप्रिय चिकित्सक है। डॉ. पीयुष गुप्ता के पास इलाज के लिये आने वाले रोगियों का आधा रोग तो यूं ही खत्म हो जाता था। इतने प्रसिद्ध और व्यस्त रहने के बाावजूद, पीयुष के दिल का खालीपन उसे बचैन करते रहता था।
इधर मयंक ने भी, कई बार उसे, फेसबुक पर कहा कि चाहे तो वह अभी भी विवाह कर अपना घर बसा सकता है। किसी विधवा या परित्यक्ता का जीवन उद्धार कर सकता है। पीयुष के कुछ चिकित्सक मित्रों ने आपस में सलाह मशविरा कर समाचार पत्रों में उसके विवाह का इश्तहार दे दिया।
शहर की ही एक निम्न मध्यम वर्गीय महिला थी, तारा। एक साल पहले ही तारा के पति का देहांत हुआ था कोई बाल-बच्चे न होने के कारण वह बिल्कुल अकेली रहती थी। इश्तहार पर नजऱ पड़ते ही, तारा ने सोचा, इतने प्रसिद्ध चिकित्सक से अगर मेरी शादी हो जावे तो मेरा तो भाग्य ही खुल जावेगा अत: कुछ लोभवश, वह स्वयं डॉ. साहब से मिलने चली गई। डॉ. पीयुष ने ज्यादा खोजबीन करना उचित नहीं समझा और तारा को ही जीवन साथी के रूप में चुन लिया। यह विवाह तो केवल ढलती उम्र में एक साथी की चाहत थी। डॉ. पीयुष ने बड़ी ही सादगी से विवाह सम्पन्न करवाया। कुछ चिकित्सक मित्र ही इस विवाह के साक्षी बने। मयंक को भी पीयुष ने अपने विवाह की सूचना दे दी।
शादी के दो दिन पश्चात पीयुष ने सोचा, मुझे अपनी नव-वधू को कुछ उपहार तो देना ही चाहिये, अत: तारा को लेकर पीयुष, शहर के एक प्रसिद्ध आभूषणों की दुकान में गये और तारा से कहा अपने लिये हीरे का एक सेट पसंद कर लो। तारा एक अत्यंत साधारण परिवार की महिला थी। इसके पूर्व उसने, आभूषणों की इतनी बड़ी दुकान में कभी प्रवेश नहीं किया था, अत: भौंचक्क खड़ी रही। डॉ. पीयुष ने ही, हीरे का एक सुन्दर सेट पसंद किया और दुकानदार से कहा, इसे पैक करके, बिल बना दीजिये।
यह क्या ? मैंने तो एक ही सेट लिया है, आपने दो सेट का बिल कैसे बिना दिया? दुकान वाले ने बड़ी ही शालीनता के साथ जवाब दिया, डॉ.साहब एक सेट मैडम के पर्स में है। डॉ. पीयुष को काटो तो खून नहीं उसने तारा से कुछ भी नहीं कहा, तारा भी सिर झुकाए खडी़ रही। अत्यंत शर्मिन्दगी के साथ, डॉ. पीयुष ने कहा, देखिये मेरे पास पूरा कैश तो नहीं है कुछ पैसे कम है और मैं अपनी चेक बुक और ए.टी.एम. कार्ड घर पर ही छोड़ आया हूं। मेरी पत्नी यहीं है, दोनों सेट भी यहीं है, मैं घर जा रहा हूं ड्राइवर के साथ चेक भिजवा देता हूँ। दुकानदार ने कहा, डॉ.साहब, आप परेशान क्यूं हो रहे हैं? इस शहर में आपको कौन नहीं जानता? अभी आप दोनों ही घर जायें और जब मर्जी गहनों का भुगतान कर दीजियेगा।
डॉ. पीयुष तो शर्म से गड़े जा रहे थे। उन्होंने तो जैसे कुछ सुना ही नहीं, और सीधे बाहर निकल गये। ड्राइवर से कहा, जल्दी घर चलो। घर आकर, उन्होंने चेक काटा, लिफाफे में बंद किया और ड्राइवर से कहा, यह लिफाफा दुकान में दे देना। मेम साहब, दुकान में ही हंै, उन्हें ले आना। ड्राइवर दुकान गया, लिफाफा दिया, मेम साहब एक कोने में खड़ी सुबक रही थी, ड्राइवर ने कहा, मेम साहब घर चलिये।
घर आकर देखा, डॉ. साहब का कमरा अंदर से बंद है। काफी आवाज देने के बाद भी दरवाजा नहीं खुला। तारा ने रो-रोकर कहा, डॉ. साहब मुझसे बड़ी भूल हो गई। मुझे माफ कर दें और कृपया दरवाजा खोल दें, पर दरवाजा कौन खोलता? बचपन से चोट खाया इंसान, इतनी बड़ी चोट को सह नहीं पाया और उसने फांसी लगाकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। पुलिस आई दरवाजा तोड़ा गया और तारा के हाथ लगा वह पत्र, जिसे मृत्यु पूर्व डॉ. पीयुष ने अत्यंत बोझिल मन से लिखा था.....
प्रिय तारा,
मैंने तुमसे जिन्दगी चाही थी, तुममें एक जीवन साथी की कल्पना की थी, ताकि अपने कठिन जीवन काल के शेष दिन, मैं और तुम एक दूसरे के सुख दुख के सहभागी बनें। तुम्हारे आज के इस कृत्य ने मेरे जीवन की उज्जवल छवि को धूमिल कर दिया है, शायद इस आत्मग्लानि से मैं तुम्हें अब वह सम्मान नहीं दे पाऊँ जो तुम्हें देना चाहता था। वैसे भी, वास्तव में तुम्हें जो चाहिये वह सब कुछ तुम्हारे लिये छोड़े जा रहा हूं। तुम्हारी पूरी उम्र भर के लिये शायद पर्याप्त हो, अर्थात, धन, ऐश्वर्य, संपत्ति। अब तुम्हें न तो मेरी आवश्यकता है न ही मुझे तुम्हारी।
मैं जा रहा हूँ। तुम्हें सच्चा प्रेम करने वाला अभागा -पीयुष।