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Monday 24 Jul 2017

सामाजिक संत्रास का कवि

मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बाहें फैलाये !!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटती
मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ 1
आधुनिक हिन्दी काव्य-साहित्य के इतिहास में निराला के बाद मुक्तिबोध एक ऐसे कवि के रूप में सदैव याद किए जाएंगे जिनका जीवन ही उनकी कविता होती है। मुक्तिबोध के काव्य का निर्माण चेतना को झकझोर देनेवाले अन्त: संघर्ष, उनके अभिशप्त युग तथा व्यक्तित्व के संधान से उपजा है। वस्तुत: उनकी कविताओं का पेचीदापन इसी संघर्ष के उपज है। अपने युग को अर्थ और वाणी देने के कार्य को उनका काव्य चुनौती के रूप में स्वीकार करता है। उनकी प्रतिबद्धता वैश्विक स्तर पर श्रमशीलमानव के प्रति ही रही है।
मुक्तिबोध की काव्य-संवेदना का विकास नई कविता की विकास यात्रा के साथ जुड़ा हुआ है। मुक्तिबोध का युग द्वन्द्व-युग था। जहां एक ओर कुछ कवि देह-राग को अपनी कविता में संजो रहे थे तो कुछ कविता को राजनैतिक धरातल पर उतारकर उससे हंसिया-हथोड़े व लाल फौज का प्रचार कर रहे थे। ऐसे समय मुक्तिबोध ने साहित्य की दुनिया में यह कहते हुए प्रवेश किया कि मेरे बाल-मन की पहली भूख सौंदर्य की थी और दूसरी विश्वमानव के सुख-दुख की। इन दोनों का संघर्ष मेरे साहित्यिक जीवन की पहली उलझन थी। शायद इसलिए मुक्तिबोध ने तारसप्तक की कविताओं के लिए कहा- मेरी ये कविताएँ अपना पथ ढूंढने वाले बेचैन मन की ही अभिव्यक्ति है। पथ खोजने की इस बेचैनी ने ही उन्हें राहों का अन्वेषी बना दिया।
मुक्तिबोध अपने युग को बड़ी बारीकी से पहचानते थे। नई कविता के जन्म और विकास के वे एकांत-साक्षी रहे तथा अपने कई लेखों में उन्होंने नई कविता के इस ऐतिहासिक संदर्भ को नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र में प्रस्तुत भी किया है। समष्टिगत जीवन के प्रति लगाव होने के कारण मुक्तिबोध की काव्य-संवेदना में दो प्रकार की प्रतिक्रियाएँ परिलक्षित होती हैं। एक तो यह कि अभिजात्य वर्ग या पूंजीवादी समाज की स्वार्थलिप्सा के कारण उनके मन में उसके प्रति घृणा भर गई और दूसरी जगत के विषम व्यापारों, कठोर जीवन संघर्ष एवं विद्रोह की असफलता के कारण उनमें एकाकीपन की भी प्रवृत्ति आ गई। इसलिए वे अंतर्दर्शन कविता में लिखते हैं- मैं अपने में ही जब खोया तो अपने से ही कुछ पाया।
निज का उदासीन विश्लेषण आँखों में आँसू भर लाया
जिस गहरे असंतोष की ज्वाला की चर्चा मुक्तिबोध ने तारसप्तक में की है वही असंतोष चाँद का मुंह टेढ़ा है की कविताओं में पूरी तरह उभरकर आया है। अंतर केवल इतना है कि अब उसमें क्षोभ कम और आत्मविश्वास अधिक है। उनके व्यक्तित्व में भी ऐसी अदम्यता है जो उन्हें निरंतर तराशती रहती है। विपरीत परिस्थितियों से टकराकर उनका मन टूटता नहीं और न ही कोई समझौता करता है। उनमें एक दृढ़ संकल्प की भावना सदैव बनी रही। मुक्तिबोध के आस्थावादी स्वर का उत्तम प्रमाण है उनकी कविता मेरे अंतर। इसमें व्यक्त भावों के आधार पर डॉ रामविलास शर्मा मुक्तिबोध को संशयग्रस्त ईश्वरवादी मानकर लिखते हैं- मुक्तिबोध के मन में कहीं यह संस्कार था कि ईश्वर है और इस संस्कार से वह लड़ते थे। उसने ईश्वर का संहार किया पर निज ईश्वर पर स्नेह किया। किन्तु रामविलास शर्मा के विचारों से सभी आलोचक सहमत नहीं हैं। वस्तुत: इसे कवि का मानवतावादी दर्शन भी कहा जा सकता है। ओढ़ी हुई पीड़ा, करुणा आदि मुक्तिबोध को सतह की चीजें लगती हैं जो उनके हृदय पर भार ही छोड़ती हैं। कवि इन बनावटी चीजों से मुक्त होना चाहता है। नए अर्थ को प्राप्त करने की चाह ही मुक्तिबोध की काव्य-संवेदना को निरंतर प्रवाह देती हुई अभिव्यक्ति के खतरे उठाने तक ले जाती है।
देशकाल के परिप्रेक्ष्य में क्षण की महत्ता के ज्ञान ने व्यक्ति को तुच्छ ही नहीं नगण्य भी सिद्ध कर दिया है। मुक्तिबोध ने नूतन अहं कविता में व्यक्ति की इसी नगण्यता और क्षुद्रता को अभिव्यक्त किया है। यह अहं अपूर्ण है। इसकी अपूर्णता के कारण ही आज का व्यक्ति न तो पूरी तरह घृणा कर पाता है न प्रेम, न वह किसी पर अपना रोष ही उतार सकता है। यह व्यक्तित्व की अपूर्णता है। उनकी कवि निष्ठा का स्त्रोत सामान्य जन की कर्मठता और श्रमशीलता में हैं। सर्वहारा वर्ग की आत्मा का दर्द उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। विशाल श्रमशीलता की जीवंत मूर्तियों के चेहरे पर झुलसी हुई आत्मा की अनगिन लकीरें, मुझे जकड़ लेती हैं अपने में, अपना-सा जानकर। श्रमशील मानव समाज का यह चित्रण मुक्तिबोध को सहज ही निराला और प्रेमचंद की मानवतावादी धारा की ओर ले जाता है। मुक्तिबोध उच्च वर्ग से जुड़े हुए विद्वानों, कवियों, आलोचकों आदि की हैसियत आँकने से नहीं चूकते। अपनी प्रसिद्ध कविता अंधेरे में इन लोगों को रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध कहा जो नपुंसक भोगशिरा-जालों में उलझे हैं और जो बौद्धिक वर्ग है जिससे यह आशा की जाती है कि वह मानव के सुख-दुख को समझेगा, वह भी क्रीतदास है। मुक्तिबोध की एक छोटी सी कविता भूल-गलती इसी अवसरवादी, सुविधाभोगी वर्ग को बेनकाब करती है। कवि ने इस अवसरवादिता को बहुत अच्छी तरह पहचाना। वे लिखते हैं- आज शिक्षित मध्यम वर्ग में जो भयानक अवसरवाद छाया हुआ है, आत्मस्वातंत्र्र्य के नाम पर जो स्व हित, स्वार्थ, स्व कल्याण की जो भाग-दौड़ मची हुई है, मारो-खाओ, हाथ मत आओ का जो सिद्धान्त सक्रिय हो उठा है उसके कारण कवियों का ध्यान केवल निज मन पर ही केन्द्रित हो जाता है। भविष्य के प्रति आस्थावान तथा समर्पित यह कवि अपनी पुस्तक नई कविता का आत्म-संघर्ष तथा अन्य निबंध में आज के कवियों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि उसे वास्तविक जीवन में अपनी कायरता, साहसहीनता, अकर्मण्यता त्यागकर समाज में फैले अवसरवाद से मोर्चा लेते हुए मानवीय समस्याओं से दुखाभिभूत और करुणासम्पन्न होकर वास्तविक मानवीय जीवन मूल्यों और आदर्शों के मार्ग पर चलना ही होगा। हो सकता है कि इस स्थिति में वह मर जाए और उसके नाम से रोनेवाला भी कोई न हो। लेकिन कुछ लोगों को इस तरह जमीन में गडऩा होगा ही। वह युग परिवर्तन करने का श्रेय भागी होगा, भले ही उसे श्रेय मिले न मिले। अशोक वाजपेयी के अनुसार- मुक्तिबोध मनुष्य के सम्पूर्ण हालत के कवि थे। उन्होंने मानवीय अन्त:करण को पक्षाघात-ग्रस्त देखा, पर यह नहीं माना कि वह मर चुका है। बल्कि पूरी गहराई के साथ उन्होंने उम्मीद की और विश्वास किया कि वह होश में लाया जा सकता है।
ब्रह्मराक्षस कविता की चर्चा के बिना यह संदर्भ अधूरा ही रहेगा जो मुक्तिबोध की सृजनात्मकता को एक सर्वथा नए कथ्य और शिल्प से जोड़ती है। कविता मानवीय इतिहास की एक दुर्दमनीय प्रवृत्ति अन्वीक्षा का प्रतीकीकरण है। मुक्तिबोध अतीत और भविष्य के बीच की सार्थक कड़ी बनना चाहते हैं क्योंकि वे यह जानते थे कि व्यक्तिवादिता का प्रखर आग्रह इतिहास की उपलब्धियों को तिरस्कृत करता है और इस प्रकार से वर्तमान को अतीत की परंपरा से छिन्न-भिन्न करके देखा जाता है। अतीत से विच्छिन्न होकर वर्तमान सार्थक भविष्य को प्राप्त नहीं हो सकता। ब्रह्मराक्षस में एक अहमग्रस्त व्यक्तित्व की आंतरिक अव्यवस्था का ही चित्रण नहीं मिलता अपितु परित्यक्त सूनी बावड़ी के भीतरी ठंडे अंधेरे में बसी जल की गहराइयों तथा उसमें डूबी सीढिय़ों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के एक विशिष्ट पक्ष के अंतिम रूप की ओर भी ध्यान किया जाता है। जिस प्रकार बावड़ी के पुराने घिरे पानी में अंदर ही अंदर अजीब कुलबुलाहट होती है वैसे ही अतीत की जड़ हुई एक विशिष्ट परंपरा आज के भी सामाजिक जीवन में खलबली मचाती रहती है। निस्संदेह कवि इन सारी स्थितियों से जूझना चाहते हैं तभी तो वे निश्चय करते हैं- अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे, तोडऩे होंगे ही मठ और गढ़ सब, पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार, तब कहीं देखने मिलेंगी बाँहें, जिनमें कि प्रतिपल काँपता रहता,् अरुण कमल एक। यह अरुण कमल मानव सौंदर्य के पूर्ण विकास, पूर्ण आदर्शों और संभावनाओं का प्रतीक है। शब्दों को नया अर्थ देने के लिए निरंतर परिश्रम और संघर्ष करना पड़ता है तब कहीं जाकर समर्थ कवि अर्थ के इस अरुण कमल को प्राप्त कर पाता है। जो कवि जिंदगी के दलदल में फँसकर विवेक के ज्वलंत सरसिज को तोड़ लाने में समर्थ है उसे जीवन से विमुख आत्मग्रस्त नहीं माना जा सकता। यह तो उनकी सक्रियता है, कर्मण्यता है, जीवन में संघर्षरत रहने का प्रमाण है। संघर्ष में विश्वास करने वाले कवि मुक्तिबोध की काव्य-संवेदना में नव-निर्माण की आकांक्षा है, विश्वास भी है। अत: उनकी काव्य-संवेदना में परिलक्षित अंतर्विरोध भी एक सृजनात्मक धरातल पर आधारित प्रतीत होते हैं। अंतर्विरोधों की यह सृजनात्मकता ही मुक्तिबोध की कवि-संवेदना को अनुभूति की नई तराश प्रदान करती है और उसका संबंध जन-मन से जोड़ देती है। उनकी कविताएं उनके आत्मबोध और बाह्य वस्तु जगत के यथार्थ बोध की टकराहट की ऐसी परिणति है जिनमें एक सघन मानवीय पीड़ा और मानवीय नियति को लेकर चलने वाला मर्मांतक तनाव आदि से अंत तक विद्यमान है। उनकी संवेदना के मूल में व्यक्ति, न होकर मानव है। केंद्रीय कथ्य मध्यमवर्गीय व्यक्ति के आदर्श और यथार्थ में होने वाला संघर्ष ही है।