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Sunday 19 Nov 2017

\'आत्म\' और \'बाह्य\' के संघर्ष का स्वप्नदर्शी कवि

बीसवीं सदी की हिंदी कविता को जिन बड़े कवियों ने अपनी रचनाशीलता से साहित्यिक गरिमा के शिखर बिंदु दिए हैं, उनमें गजानन माधव मुक्तिबोध अग्रगण्य हैं। उनकी कविता के रचनात्मक मूल्य कवि के यथार्थ-बोध, प्रतिभा और वैचारिक चेतना के प्रतिफल हैं। मुक्तिबोध ने कठिन जीवन संघर्ष में रहते हुए काव्य रचना की थी, अत: उनके काव्य जगत को 'संघर्ष’ से अलग कर नहीं देखा जा सकता। उनके आत्म और बाह्य के संघर्ष से उपजा जीवन सत्य ही रचनाओं में अभिव्यक्त होकर जीवन की बेहतरी के अपार सपने देखता है। उनका कवि गहरे आत्ममंथन द्वारा मध्यवर्गीय व्यक्तिवाद से मुक्त होकर अपने समय के यथार्थ से साक्षात्कार करता है। अपने विषम बाह्य से वे फंतासियों के जरिए जूझते-टकराते हैं। जहाँ बीती सदी के उत्तराद्र्ध में राजनैतिक-सामाजिक मूल्यों के विघटन और विद्रूपों के बीच खड़ा संवेदनशील मनुष्य है। इस प्रक्रिया में आधुनिक युग के व्यापक सत्य की काव्यात्मक सर्जना उनके काव्य का निकष बनी है। मुक्तिबोध के भीतर बैठा कवि प्रखर बुद्धिजीवी, चिंतक, विचारक और दार्शनिक भी है, जिसे अपने समय का यथार्थ बैचेन करता था।
अपनी कविता की निराली प्रकृति, उन्हें अन्य कवियों से सर्वथा पृथक और विशिष्ट बनाती है। अपने अभावजन्य संघर्षों भरे जीवन काल में जीवित रहते, मुक्तिबोध के काव्य का ठीक मूल्यांकन तो क्या, कविताओं का एक संकलन भी प्रकाशित नहीं हो पाया था। यद्यपि दो-ढाई सौ कविताएँ उन्होंने लिखी। मृत्यु के कई वर्षों बाद उनका समूचा साहित्य 'मुक्तिबोध रचनावली’ के छह खंडों में प्रकाशित हुआ। वे हिंदी के उन कवियों में भी प्रमुख हैं, जिनकी कविता के स्वर ने हर युवा मन को संबोधन और संबल दिया है- जिसका अपने समय की अँधेरी खामियों से नैतिक विरोध है। उनकी कविता में सारी युगीन राजनीतिक-सामाजिक सच्चाइयों के बीच कवि के रूप में एक बेचैन युवा मन मौजूद है। एम.ए. के पाठ्यक्रम में जब पहली मुलाकात मुक्तिबोध से हुई, तब वे युवा चेतना में आकार ले रही कविता की समझ और संस्कार में सर्वाधिक प्रभावित करने वाले और प्रिय कवि लगे थे। कविता की लोकप्रियता का संबंध वस्तुत: उसकी स्वीकारता से है यानी प्रचलित भावबोध को छूने वाली कविता प्रिय या शीघ्र प्रिय बन जाती है। पर मुक्तिबोध हमारे समय और मन के उन अँधेरे कोनों को छूना और उनसे मुक्त कराना भी चाहते हैं- जिनमें रहने की हमारी आदत हो गई है। और जिनसे मुक्त होने में खासी दिक्कतें पेश आती हैं! मुक्तिबोध की कविता उस आइने की तरह है जिसमें हमारा असली चेहरा दिखायी देता है। कबीर की तरह अभूतपूर्व कहने-लिखने वाले हर कवि के साथ यही बरताव हुआ। क्योंकि, उनके विरोधी काव्य-मूल्यों हमारे आड़े आए! अत: ऐसे कवि की कविता को कठिन, जटिल और दुर्बोध के खांचे में डालकर पाठकों से अलगाना सबसे सरल उपाय है। कवि मुक्तिबोध पर अपनी राय देने वालों ने यही ढिंढोरा पीटा। जन्मशताब्दी वर्ष के अनुकूल अवसर पर बीसवीं सदी के इस बड़े हिंदी कवि की 'कविता’ पर ही नहीं, उनकी वैचारिकता और रचना के अन्य आयामों पर भी पुनर्विचार होना जरूरी है।
आधुनिक हिन्दी कविता छायावाद के पश्चात् जिस पथ पर निरंतर अग्रसर रही है, मुक्तिबोध से उसका प्रस्थान माना जा सकता है। छायावाद के पश्चात् हिंदी कविता अपने समय-बोध को काव्य-रचना के लिए अनेक नव्य परिवर्तनों को अंगीकार कर रही थी। इसीलिए छायावादोत्तर काल में कविता के कई प्रारूप चल पड़े थे। प्रगतिवादी कविता, प्रयोगवादी कविता और फिर उसकी ही सहजात नई कविता, जो उससे पृथक भी नहीं मानी जाती। उसके बाद नामों के शोर और आक्षेपों के बावजूद नई कविता का प्रवर्तन होता आ रहा है। प्रगतिशील और प्रयोगशील कवियों ने हालाँकि नए-नए प्रयोग किए, परंतु उनकी कविताएँ छायावाद की आधारभूत संवेदनाओं से पूर्णत: अपने आपको अलग भी नहीं कर सकी। कविता के आलोचक भी यह मानते हैं कि मुक्तिबोध पहले ऐसे कवि हैं, जिनकी कविता में प्राय: 'छायावादोत्तर नई भावभूमि’ की विशिष्टताओं के दर्शन होते हैं। वस्तुत: कलात्मकता की शर्त पर रचना की यथार्थवादी भूमिका और सामाजिकता को आत्मसात करते हुए, नई कविता के अग्रणी कवि मुक्तिबोध ही माने जा सकते हैं। उनकी कविता की बनावट के सूत्र उनके काव्य संबंधी विचारों में भी खोजे जा सकते हैं। मुक्तिबोध ने काव्य की रचना प्रक्रिया के लिए बुद्धि, भावना, कल्पना आदि को महत्ता देते हुए उनका प्रभाव संगठन और रचना प्रक्रिया के बदलावों को कवि के आतंरिक उद्देश्यों से जोड़कर देखा है। इसीलिए मुक्तिबोध की कविता गेय काव्य परंपरा से सर्वथा भिन्न है। यद्यपि मुक्तिबोध ने सन् 1935 (छायावाद युग में) कविता लिखना प्रारंभ किया था, पर उन्हें पहचान तब मिली, जब हिंदी कविता में प्रयोगवाद का प्रवर्तन माना जा रहा था। अज्ञेय द्वारा संपादित पहले तार सप्तक (सन् 1943) में संकलित सात कवियों में से एक मुक्तिबोध भी थे। अपने वक्तव्य में उन्होंने लिखा था- ''मेरे बाल-मन की पहली भूख सौन्दर्य थी और दूसरी विश्व मानव का सुख-दुख- इन दोनों का संघर्ष साहित्यिक जीवन की पहली उलझन थी। इसका स्पष्ट वैज्ञानिक समाधान मुझे किसी से नहीं मिला। परिणाम था कि इन अनेक आंतरिक द्वंद्वों के कारण एक ही काव्य विषय नहीं रह सका।“(तार सप्तक,पृ. 21) इसलिए उनकी रचनाएँ कलात्मक संतुलन के साथ जीवन के विरोधाभासों के विरुद्ध मनुष्य के जीने का भरोसा दिलाती हैं। साहित्य में अपने बचपन की पहली भूख सौन्दर्य को पाकर ही वे विश्व मानव के सुख-दुख की ओर आकृष्ट हुए। यद्यपि कार्ल माक्र्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का गहरा असर उनके साहित्य पर है। वे अपने समय के यथार्थ को उस नजरिए से देखते भी हैं। पर इतने भर से उन्हें माक्र्सवादी नहीं कहा जा सकता। माक्र्सवाद से प्रभावित होते हुए, उनकी कविता उसकी प्रचारक नहीं बनती। इतना अवश्य है कि मुक्तिबोध के काव्य का मूल स्वर शोषण और अराजकता के प्रति विद्रोह और मानवता की कामना है। पर वे कला के संतुलन से जरा भी नहीं डगमगाते। उनके इस यत्न से कविता का बिल्कुल नया शिल्प सामने आया, जो पूर्व प्रचलित कविता के प्रारूपों से सर्वथा भिन्न और सृजन की अनेक चिंताओं से रू-ब-रू हुआ। अपने जनधर्मी सरोकारों के चलते मुक्तिबोध अपनी कविता में सर्वाधिक विचारशील कवि हैं। अपने बाह्य की प्रतिक्रिया में उनके भीतर से जन्मी कविता, आत्म से उठकर नए मनुष्य को संबोधित है। नई कविता में 'लघुमानव’ की प्रतिष्ठा को उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया गया था। मुक्तिबोध के काव्य में व्यक्ति है पर अहंनिष्ठ व्यक्तिवाद नहीं है और न पलायनवाद। मुक्तिबोध के व्यक्ति में एक विद्रोही और संघर्षशील मानव का स्वर है। 'काव्य की रचना प्रक्रिया’ नामक निबंध में मुक्तिबोध ने लिखा है- ''होता यह है कि नये कवि को अपनी वास्तविक अभिव्यक्ति पाने के लिए, यानी अपने आभ्यांतरिक वास्तव से साक्षात्कार के लिए, अनेकानेक काव्य प्रयोग करते हुए एक लंबा समय गुजार देना पड़ता है। इन विविध रूप बहुमार्गनुसारी प्रयोगों के अनवरत क्रम की अंतिम परिणति होती है अपनी मूलभूत आभ्यंतर वास्तविकता के संवेदनात्मक साक्षात्कार में। दूसरे शब्दों में, कवि जीवन की प्रथम स्तरीय उपलब्धि उस अंत:प्रकृति से साक्षात्कार है, जो अपना कुछ विशेष कहना चाहती है, जिसके पास कुछ विशेष कहने के लिए है। इस आत्मचेतना के प्रत्यक्ष संवेदनात्मक ज्ञान के बिना, कोई कवि मौलिक नहीं हो सकता।“('नई कविता का आत्मसंघर्ष’ से, मुक्तिबोध रचनावली-5, सं.-नेमिचंद्र जैन, पृ. 212) आत्म साक्षात्कार की घनीभूत पीड़ा में वे अपने मन के कोने-कोने मंी झाँकते हैं। मुक्तिबोध स्वयं काव्य में आत्मसंघर्ष को महत्त्वपूर्ण मानते हैं और रचना प्रक्रिया को एक स्वायत्त प्रक्रिया। जाहिर है उनके यहाँ आत्मसंघर्ष, बाह्य के आभ्यांतरीकरण के फलस्वरूप होता है। मुक्तिबोध ने माना है ''चूंकि कवि का आभ्यंतर वास्तव बाह्य का आभ्यांतरीकृत रूप ही है, इसीलिए कवि को अपने वास्तविक जीवन में रचना-बाह्य काव्यानुभव जीना पड़ता है। कवि केवल रचना प्रक्रिया में पड़कर ही कवि नहीं होता, वरन् उसे वास्तविक जीवन में अपनी आत्म समृद्धि को प्राप्त करना पड़ता है और मनुष्यता के प्रधान लक्ष्यों से एकाकार होने की क्षमता को विकसित करना पड़ता है। यही कारण है कि काव्य केवल एक सीमित शिक्षा और संस्कार नहीं है, वरन् एक व्यापक भावनात्मक और बौद्धिक परिष्करण (कल्चर) है- वह कल्चर, वह परिष्कृति, जो वास्तविक जीवन में प्राप्त करनी पड़ती है।“(वही, पृ. 216) वे बाह्य के आभ्यांतरीकरण को मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया मानते हुए इसके सतत आत्म संस्कार को आवश्यक मानते हैं। उनके ही अनुभव और आलोचनात्मक विवेक को दृष्टिगत करते शब्द 'ज्ञान’ और 'संवेदना’ और उनकी परस्पर अनिवार्यता, उनके काव्य को समझने की बेहद जरूरी कड़ी है। इसीलिए उन्होंने लिखा भी है-''जगत जीवन के संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना में समायी हुई मार्मिक आलोचना-दृष्टि के बिना कवि-कर्म अधूरा है।“(वही) यही कारण है कि उनकी कविता में निरी भावुकता नहीं, जनमुक्ति और जनसंघर्ष का सशक्त पक्ष हैं। उनका समूचा काव्य इसका प्रमाण है कि आत्म और बाह्य के पारस्परिक संघर्ष और साहचर्य से प्रगतिशील जीवन मूल्यों की विशिष्ट अभिव्यक्ति संभव है।
हिंदी कवियों में मुक्तिबोध ने फंतासी (फैंटेसी) का सर्वाधिक प्रयोग किया है। इस शिल्प का सहारा कवि ने अंतर और बाह्य जगत को समेटने के लिए लिया है। कहीं मिथकीय तत्वों का प्रयोग भी हुआ है। अंतर्विरोधों और आंतरिक द्वंद्व को अभिव्यक्ति देने के लिए, उन्होंने प्राय: कविताएँ इसी शिल्प में लिखीं हैं। गहन चिंतन, वैचारिकता और बौद्धिकता के कारण उनके प्रतीक और बिम्ब प्राय: दुरूह और जटिल मान लिए गये हैं। शायद इसीलिए उनकी कविताएँ गंभीर आग्रह की अपेक्षा रखती हैं। उनके बिम्ब भी भयावाह होते हैं। रात के अंधेरे में बरगद, बियाबानों में तेज सनसनाती हवाएँ, घुग्घु की डरावनी मनहूस आवाज, चमगादड़, सूने खंडहर, महल एवं बावड़ी आदि वातावरण को और भी भयावाह बनाते हैं। डरावनेपन का प्रतीक कहीं पीपल है तो कहीं मध्यवर्गीय बौद्धिक चेतना का प्रतीक ब्रह्यराक्षस। पूर्ण मनोयोग से पढ़ते हुए, पाठक को इनसे तादात्म बना लेने में तनिक भी असुविधा नहीं होती। उनकी कविता में प्रचलित यथार्थवादी शिल्प से अलग एक नया प्रयोग लेकर आती हैं। उनमें एक जरूरी तत्त्व कवि की राजनीतिक चेतना है। इस प्रसंग में आलोचक नंदकिशोर नवल का यह कथन उल्लेखनीय है- ''यह जरूर है कि उनकी राजनीति नागार्जुन वाली रोजमर्रा की राजनीति न होकर वस्तुत: मानव नियति का पर्याय है। उन्होंने हिंदी में फैंटेसी की शैली में लंबी कविताएँ लिखकर कविता में जैसे एक नई विधा को जन्म दिया।“(आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास, पृ. 384) उनकी अनेक कविताएं राजनीतिक आशय से संबद्ध हैं पर उनकी प्रकृति सर्वथा अलग है। मुक्तिबोध प्रथमत: अपने युग के सत्य का अन्वेषण करने वाले कवि थे। एक अकेली लंबी कविता 'अंधेरे में’ को लिख कर ही, वे सभी को विचारने के लिए बहुत कुछ छोड़ गये हैं। आज के बाजारवादी युग में मुक्तिबोध का 'सच’ कतिपय भयावह रूप में मौजूद है। चौतरफा पतन और नैतिकता लोप गंभीर चिंता का विषय हैं। आश्चर्य नहीं कि मुक्तिबोध की कविता में, हम अपने आस-पास का यथार्थ अनुभव करें और आज के आम आदमी को संघर्षरत पाएँ। क्रूर व्यवस्था से लडऩे वाला मुक्तिबोध का काव्य नायक जैसे फिर अंधेरे का अन्वेषी, संघर्षशील और अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने संकल्पित खड़ा जान पड़ता है-''अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे/उठाने ही होंगे।/तोडऩे होंगे ही मठ और गढ़ सब।/पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार/तब कहीं देखने मिलेंगी हमको/नीली झील की लहरीली थाहें/जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता/अरुण कमल एक”(अंधेरे में) अपनी सर्वाधिक प्रसिद्ध कविता में जिस परम अभिव्यक्ति की खोज वे करते हैं, वह मध्यवर्ग का अपने संघर्षशील आत्मचेतस मन का चाहा गया व्यक्तित्व-रूपांतरण है। अपने समय के विषम यथार्थ से जूझता कवि मन फैंटेसी के जरिए 'यथार्थ’ से साक्षात्कार करता है- इसीलिए काव्यशिल्प जटिल प्रतीत होता है। अपनी एक और ख्यात लंबी कविता 'ब्रह्मराक्षस’ में मध्यवर्गीय व्यक्तिवाद से मुक्ति का प्रश्न रखते हैं। इस कविता में प्रतीकों और बिंबों के जरिए लंबे शिल्प के विधान की उल्लेखनीय सफलता के साथ, कवि मध्यवर्गीय द्वंद्व को ही रेखांकित करता है-''पिस गया वह भीतरी/और बाहरी दो कठिन पाटों के बीच,/ऐसी ट्रेजेडी है नीच!!” (ब्रह्मराक्षस) इस कविता में मध्यवर्गीय संस्कारों और विवेक की निरंतर चलने वाली कशमकश को ही अनेक स्तरों पर उद्घाटित किया गया है। मध्यवर्ग को विवेक आगे बढऩे के लिए जागृत करता है, तो संस्कार उसे पीछे की तरफ खींचते हैं। कवि को गहरा दु:ख है कि सत्यान्वेषी ब्रह्मराक्षस आत्म और ब्रह्म के संघर्षों में पिसकर दुखांत को प्राप्त हुआ। कवि शोधी ब्रह्मराक्षस के 'मरे पक्षी-सा विदा’ हो जाने से व्यथित है। उसकी सोई हुई 'अनजानी ज्योति’ को पुन: प्रकाशित करने के निमित्त ही कवि ब्रह्मराक्षस का शिष्य बनना चाहता है। उसके अधूरे कार्य को पूरा करना चाहता है। यहाँ कवि की संघर्ष में आस्था की अभिव्यक्ति ही फैंटसी के अद्भुत रूप में हुई है। उनकी कविता का शिल्प अगर जटिल माना जाता है तो यह समकालीन समय की भी जटिलता है। और इसी अर्थ में वे कठिन समय को पहचानने वाले कवि हैं। एक उल्लेख उनकी भाषा को लेकर भी। प्राय: उनके आलोचक मानते हैं कि मुक्तिबोध की काव्य-भाषा अनगढ़ है। ऐसा होने के अनेक कारण हैं। उन्होंने कविता में भाषा के अभिजात्य के विरुद्ध नयी भाषा सृजित की। मुक्तिबोध अगर कहीं कठिन कवि प्रतीत होते हैं तो सिर्फ भाषा के कारण नहीं, जितना अपनी कविता के खुरदुरे शिल्प, स्थापत्य और उससे अधिक उन 'मूल्यों’ के कारण जिन्हें हमारा मध्यवर्गीय मन सहज स्वीकार करने को तैयार नहीं होता। फैंटेसी उनके यहाँ रूप है, जिससे मुक्तिबोध अपनी काव्यभाषा को समृद्ध करते हैं। कहना यही है कि उन्होंने भाषा और कला के लिए कविता को नया मुकाम दिया। यदि वे काव्य शिल्प के सर्वमान्य आविष्कारक हैं, तो भाषा का नया मुहावरा खोजने के भी। मुक्तिबोध ने अपने सभी यत्नों से अपनी लेखकीय चिंता, सर्जनात्मकता और प्रतिबद्धता का परिचय दिया। काव्य के विषय ही नहीं भाषा और शिल्प भी उनके संघर्ष को रूपायित करते हैं। उन्होंने अपने युग के तमाम काव्य-रूपों को परखा और प्रतिफलित करते हुए, उसकी सीमाएँ भी निर्धारित की। उन्हें चुनौती देकर अपनी सृजनात्मक विशिष्टता को चरितार्थ भी किया। कहानियाँ और आलोचना लिखने का उनका अलग रचनात्मक फलक है। नयी कहानी के उस दौर में कहानी के तमाम नएपन के बीच फंतासीजनित यथार्थ की प्रतीकात्मक-रूपक कथाएं मुक्तिबोध को सर्वथा अलग कहानीकार के रूप में उपस्थित करती हैं। इसी तरह मौलिक विचार-दृष्टि के कारण उनकी आलोचना भी आलोचक की गरिमा का मान देती है। नई कविता का इतिहास उनके बिना अधूरा ही रहेगा, वे वहाँ शीर्षस्थ हैं। उनका काव्य जगत और उसके मूल्य मानव संघर्ष की अपराजेयता के पक्षधर हैं। अत: वे कवि के रूप में कभी अप्रसांगिक भी नहीं होंगे।