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Friday 22 Sep 2017

मुक्तिबोध के स्मरण का अर्थ

मुक्तिबोध का नाम लेते ही हमारे सामने नई कविता के प्रवर्तन से जुड़ी समस्या प्रस्तुत हो जाती है। मुक्तिबोध की कविताएं 'तार सप्तक’ में प्रकाशित की गई है, जिसके (तार सप्तक के) कवियों को प्रयोगवाद के प्रवर्तकों के नाम से जाना जाता है। आगे चलकर प्रयोगवाद के बाद काव्य शास्त्र की उपलब्धियों का वृहत उपयोग नई कविता ने किया। पारंपरिक रचना मूल्यों को कविता ने ध्वस्त किया, क्योंकि उन पर आधारित पूर्ववर्ती काव्य का नायक पूंजीवादी शहर और उसकी परिस्थितियों में जीवनयापन कर रहा था। नए परिवेश में रहते हुए यह काव्य-नायक गांव की पुरुष प्रधान व्यवस्था, जाति-पांति पर आधारित सामाजिक संबंधों तथा उनके द्वारा सामाजिक व्यवहारों का निर्वाह नहीं कर पा रहा था। शहर में नई शैली स्थापित हो गई थी, जिसमें पारस्परिक सामंजस्य मैत्री और लोकमंगल की भावना के लिए कोई स्थान नहीं था। हिन्दी की नई कविता ने इस रुग्ण प्रक्रिया को प्रतिबिम्बित किया। यह कविता नई समस्याओं की ओर समाज का ध्यान दिलाना चाहती थी। गजानन माधव मुक्तिबोध 'तार सप्तक के एकमात्र कवि थे जिसने नए काव्य-शास्त्र के निर्माण की आवश्यकता को तीव्रता के साथ अनुभव किया था।

मुक्तिबोध की कविताओं में वह मानसिक समस्या निरुपित हुई, जिससे हमारा बुद्धिजीवी वर्ग जूझ रहा था। नए समाज के नियमों के अनुरूप जीने में वह असफल हो रहा था। कवि इस प्रश्न पर गहराई से विचार करता है किस तरह इन नियमों को, पारंपरिक नैतिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाए बिना न्यायसंगत तथा प्रभावशाली बनाया जा सकता है। परंपराओं की अवहेलना का परिणाम परम्पराओं की पूर्ण अनुपस्थिति के रूप में सामने आना ही था। विश्व के प्रति मुक्तिबोध की दृष्टि भौतिकवादी सिद्धांतों तथा अवधारणाओं से मेल खाती है। उनकी कविता में मनुष्य व संसार की सत्ताएं अलग-अलग हैं लेकिन उनके बीच निश्चित संबंध रहता है। समाज में अब भी सदियों पुरानी प्रथाएं तथा संस्कार प्रचलित हंै। नए का अभ्यस्त होने में समय लगता है। पुराने की मृत्यु व नए जीवन की विषय वस्तु मुक्तिबोध की सभी कृतियों में विद्यमान रहती है। वे सामाजिक सरोकारों के कवि थे। उन्होंने झूठ का निर्ममता के साथ पर्दाफाश किया। प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने की भावना तथा उनके सक्रिय विरोध की विषय वस्तु उनके कृतित्व में अत्यंत गंभीर व महत्वपूर्ण हो गई है। असत्य की जीत की घातकाता व अभिप्राय उनकी कविता 'भूल गलती में मार्मिक अभिव्यक्ति पाता है।

भूल गलती

आज बैठी है जिरह बख्तर पहनकर

तख्त पर दिल के।

चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक

आंखें चिलकती है नुकीले तेज पत्थर-सी

खड़ी हैं सिर झुकाए

सब कतारें

बेजुबां बेबस सलाम में

अनगिनत खंभों व मेहराबों में

दरबारे आम में।

असत्य की जीत ऐसी भ्रांति के परिणामस्वरूप होती है जो शासक वर्ग के पक्षधरों को ही नहीं बल्कि जनता के बहुत बड़े हिस्से को अपने में कैद रखती है। भ्रांति फैलाने का काम सच्चाई पर पर्दा डालने वाले सामाजिक जनोत्तेजक ही नहीं करते, उसके लिए बुद्धिजीवी व कलाकर्मी भी जिम्मेवार हैं। भ्रांतियों के समाज से न केवल सत्य को बाहर धकेल दिया जाता है वरन् उनके साथ ईमान को तिरस्कार का पात्र बनाया जाता है, क्योंकि असत्य ईमान एक साथ नहीं रह सकते।

झलकते लाल लम्बे दाग

बहते खून के

वह कैद कर लाया गया ईमान।

ऐसे युग में जिन्दगी एक तरह का दमघोटूं सपना बनकर रह जाती है। लेकिन ऐसा होते हुए भी कहीं न कहीं सच्ची संस्कृति के सर्जक मानवतावादी आदर्शों को धोखा दिए बिना निष्कलंक रहकर अपनी साधना में जुटे रहे हैं। ये साहसी संस्कृतिकर्मी अपनी संस्कृति व उसकी परंपराओं को नष्ट होने से बचाने में लगे रहते हैं। मुक्तिबोध की कविता में वे लोग रोमानी आशाओं, आलोकित सत्य व सद् के योद्धा के रूप में प्रतिष्टित हैं :-

कहीं पर खो गया

बेमालूम दरों के इलाके में

सच्चाई के सुनहरे तेज अक्सों के धुंधलके में

मुहैया कर रहा लश्कर

हमारी हार का बदला चुकाने आएगा

संकल्प धर्मा चेतना का रक्त प्लावित स्वर...

चांद की प्रशंसा में सैकड़ों कविताएं लिखी गई हैं। सुन्दरता के  सम्मान के रूप में पारम्परिक कविता में चांद का बहुत उल्लेख हुआ है। हमारे मिथकों में ऐसा उल्लेख है कि नया चांद अमृतमय होता है। वह पूर्ण होता है। जब उसकी कलाएं घटने लगती हैं तो उसमें से अमृत बाहर छलकता है और चांद खाली हो जाता है। कृष्ण पक्ष में उसकी इस दशा का कारण होता है। चांद जब पूरा होता है तब पूरी प्रकृति में उज्जवलता और प्रसन्नता छाई होती है। मुक्तिबोध के काव्य संकलन का नाम 'चांद का मुंह टेढ़ा हैÓ काफी विवादास्पद रहा है। कवि ने उसमें पुराने मिथक की पैरोडी की थी।

मुक्तिबोध की लम्बी कविताएं अकारण लम्बी नहीं है। उनके विस्तार के पीछे इतिहास और संस्कृति, मनस्तत्व और दर्शन तथा सबसे अधिक मनुष्य की पहचान अर्थात उसके संघर्ष की पहचान का लम्बा सिलसिला है। तार सप्तक के कवि-वक्तव्य में माना है कि मानसिक द्वन्द्व उनके व्यक्तित्व में बद्धमूल रहा है और सब मिलाकर उनकी कविता में अपना पथ खोजने वाले बेचैन मन की ही अभिव्यक्ति बन पड़ी है। एक साहित्यिक की डायरी में मुक्तिबोध ने अपनी काव्य-रचना प्रक्रि या का विश्लेषण करते हुए लिखा है-

''यथार्थ के तत्व परस्पर गुम्फित बनकर जो यथार्थ प्रस्तुत होता है, वह भी ऐसा ही गतिशील है और उसके तत्व भी परस्पर गुम्फित हैं। यही कारण है कि छोटी कविताएं लिख नहीं पाता और जो छोटी होती हैं वे वस्तुत: छोटी न होकर अधूरी होती हैं।

सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न भयावहता का अनुभव मुक्तिबोध ने किया था। उनकी लेखकीय स्वतंत्रता की आवाज अपनी तरह की अकेली आवाज थी। संदर्भगत संघर्षों में डूबे रहने या जूझते रहने की परम्परा ही आज नई पीढ़ी को विद्रोह की भूमिका देती है। मुक्तिबोध अपने संघर्षों और अन्तद्र्वन्द्वों को 'ब्रह्म राक्षस की भांति पागल प्रतीकों में कह रहे होते हैं तो कभी दिमागी गुहांधकार का- 'औरांग उटांग देखते हैं। स्वप्न के भीतर स्वप्न और विचारधारा के भीतर एक और विचारधारा देखते हैं। अपने भीतर छिपे औरांग उटांग की सच्चाई को कवि महसूस करता है। भोगे हुए जीवन को ही वह शब्द देता है, यही सच्चाई के प्रति उसकी प्रतिबद्धता है। कवि अपने आसपास एक छल का अनुभव करता है-

विराट झूठ के अनन्त छन्द सी

भयावनी अशांत पीत धुंध सी सदा अगेय

गोपनीय द्वन्द्व सी असंग जो अमूर्त स्वप्त लालसा

प्रवेग में उड़े सुतीक्ष्ण वाण पर

अलक्ष्य भार-सी वृथा

जगा रही विरुप चित्रहार का

सधे हुए निजत्व की अभद्र रौद्र हार-सी

सचमुच स्वप्न के रक्त से गीत नहीं उगते। कवि हार की रौद्रता को या विराट झूठ से उपजी विद्रूपता को देखता है, जो अगेय है, जो सहा जाता है गाया नहीं जाता।

कविता मुक्तिबोध के लिए एक विस्तृत चिन्ता-क्रम है- एक असमान प्रक्रिया है। उनका लेखन मनोरंजन नहीं है। आत्मतोष की चीज नहीं है, केवल आनंदानुभूति का साधन भी नहीं है, बल्कि वह संवेदनशील व्यक्ति की चेतना को बेचैन करने वाला और जनवादी संघर्षों को गति और शक्ति देने वाला साहित्य है।

अपनी काव्य-यात्रा में मुक्तिबोध ने जो चिन्तन किया उसकी गद्यात्मक अभिव्यक्ति ने समीक्षा का रूप ले लिया। उनकी समीक्षाएं एक रचनाकार की समीक्षाएं हैं, यही कारण है कि उनमें साहित्य संबंधी सिद्धांतों और प्रश्नों का जड़ीभूत शास्त्रीय विवेचन-विश्लेषण नहीं है। समीक्षा में संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना पर उन्होंने विशेष जोर दिया है। उन्होंने सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार की समीक्षाएं लिखी है। उनके आलोचनात्मक निबंध संग्रह आत्म संघर्ष तथा अन्य निबंध में तेरह निबंध हैं जिनमें से अधिकांश सैद्धांतिक विषयों पर हैं, जैसे काव्य की रचना प्रक्रिया, सौन्दर्य प्रतीति और सामाजिक दृष्टि नवीन समीक्षा का आधार, समीक्षा की समस्याएं, साहित्य और जिज्ञासा आदि। इस संग्रह में अनेक निबंध ऐसे हैं जिनमें नई काव्य-प्रवृत्तियों के संदर्भ में कुछ मौलिक प्रश्न उठाए गए हैं और उनका सैद्धांतिक विवेचन किया गया है। व्यावहारिक समीक्षा की दृष्टि से 'शमशेर मेरी दृष्टि में, 'सुमित्रानंदन पंत : एक विश्लेषण आदि उल्लेखनीय है। उनकी व्यावहारिक समीक्षा का मेरूदंड तो उनका ग्रंथ कामायनी एक पुनर्विचार ही है, जिसमें फेन्टेसी की दृष्टि से कामायनी पर विचार किया गया है। साहित्य संबंधी ऐसे बुनियादी प्रश्न उन्होंने 'एक साहित्यिक की डायरी में उठाए हैं जिन पर सामान्यत: ध्यान नहीं जाता।

नई कविता के निर्विकल्पक सौन्दर्य सिद्धांत, व्यक्ति स्वातंत्र्य के सिद्धांत, लघु मानव के सिद्धांत और तथाकथित आधुनिक भाव-बोध का उन्होंने आवेशपूर्ण खण्डन किया है। यह आवेश प्रगतिवाद की देन है। मुक्तिबोध ने काव्य की सृजन-प्रक्रिया का एक रचनाकार की हैसियत से विवेचन करने की कोशिश की है उनके अनुसार कला के तीन क्षण होते हैं- पहला है जीवन का उत्कृष्ट अनुभव, दूसरा है इस अनुभव का अपने कसकते-दुखते हुए मूलों से पृथक हो जाना और एक ऐसी फैन्टेसी का रूप धारण कर लेना मानो व फैन्टेसी अपनी आंखों के सामने ही खड़ी हो। तीसरा और अंतिम क्षण है इस फैन्टेसी के शब्द-बद्ध होने की प्रक्रिया का आरंभ और उस प्रक्रिया का पूर्णता तक पहुंचना।

भारतीय इतिहास पर भी मुक्तिबोध ने पुस्तक लिखी थी। उनकी पुस्तक ''भारतीय इतिहास और संस्कृति पर काफी विवाद हुआ था। विचारात्मक गद्य के साथ ही उन्होंने रचनात्मक गद्य के क्षेत्र में कहानियां लिखकर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। 'ब्रम्ह राक्षस शीर्षक से उनकी एक प्रसिद्ध कविता है और इसी शीर्षक से उनकी एक कहानी भी है जिसमें प्रेतात्मा की अभिव्यक्ति हुई है। 'विपात्र कहानी में व्यवस्था पर प्रहार किया गया है। मुक्तिबोध की कहानियां तीव्र सामाजिक सरोकार की रचनाएं है। उनमें लेखक दैनिक जीवनानुभव का चित्रण करता है। फैन्टेसी मुक्तिबोध को बहुत प्रिय रही। 'समझौता कहानी में फैन्टेसीपूर्ण घटना आई है, जिसमें मनुष्य को भालू में रूपान्तरित होता हुआ चित्रित किया गया है। इसे पढ़कर फ्रेंज काफ्का की कहानी 'मेटामारफॉसिस की याद आती है।

कवि, निबंधकार, आलोचक, डायरी लेखक, इतिहासकार और कहानीकार के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले मुक्तिबोध के स्मरण का अर्थ है एक अपूरणीय क्षति के अनुभव से गुजरना। साथ ही समझना कि जीवन सत्य की तलाश उनकी सबसे बड़ी चिंता थी जिसे शांत करने के लिए वे माक्र्सवाद, अस्तित्ववाद और रहस्यवाद के मार्गों के यात्री बने। लेख को अधिक विस्तृत न करते हुए दोनों का केवल एक-एक उदाहरण देना चाहता हूं। रहस्यवाद का उदाहरण 'चांद का मुंह टेढ़ा है के पृष्ठ 146 पर इस प्रकार है :-

हमें था चाहिए दिन-रात

अनुभव दीप्तिमान, बह्म की संवेदना का

भव्य अनुशासन

कि उससे एक गहरा फलसफा

तैयार हो जाए,

कि पूरा सत्य

जीवन के विविध उलझे प्रसंगों में

सहज ही दौड़ता जाए।

मुक्तिबोध का अस्तित्ववाद कीर्केगार्द के अस्तित्वाद के अधिक निकट है। एक छोटा उदाहरण-

शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है

शेष सब अवास्तव, यथार्थ मिथ्या है, भ्रम है,

सत्य केवल एक है जो कि-

दु:खों का क्रम है।