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Friday 22 Sep 2017

मुक्तिबोध के पत्रों में जीवन और साहित्य

गजानन माधव मुक्तिबोध को समझने में उनका पत्र साहित्य उतना ही उपयोगी है जितना  उनका रचनात्मक साहित्य। मुक्तिबोध के पत्रों का संसार बड़ा था। उनके पत्रों में साहित्य के अलावा कला, संस्कृति, समाज, शिक्षा, राजनीति, आंदोलन और वैश्विक मुद्दों पर विमर्श के तमाम विषय विस्तार से मिलते हैं।

 नेमिचंद्र जैन उनके बड़े मित्र हुए, जिनसे उनके जीवन भर का साथ रहा। उनसे उनकी दृष्टि व विचारों के परिमार्जन और विस्तार में भी मदद मिली। मुक्तिबोध उन्हें अपना दूसरा हृदय कहते थे। मुक्तिबोध को समझने में नेमीचंद जैन को लिखे गए पत्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक पत्र में उन्हें मुक्तिबोध लिखते हैं- ''जैसा कि तुम जानते हो मैं एक विचित्र प्रकार का व्यक्ति हूँ। जिसे सदा ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता रहती है जिसकी प्यारी सलाहों और अंतरंग विवेचन में निहित प्रिय परामर्शों की संवेदना मुझमें उत्कट स्नेह और तीव्र कल्पना की गर्मी पैदा कर देती है। मैं निष्क्रिय और प्रकटत: उदासीन सा रहता हूँ, क्योंकि मेरी मानसिक स्थिति प्रबल संगठनात्मक आधार पर नहीं टिकी है, लेकिन दोस्त मैं तुमको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं यथार्थ अनुभूति के लिए लालायित रहता हूं। अनुभूति के बिना मैं मिट्टी के लौंदे सा चेतनाहीन रहता हूं।

मुक्तिबोध प्रगतिशील मूल्यों और जनवादी सरोकारों की स्थापना में लेखक संगठनों की भूमिका को तो रेखांकित करते ही थे साथ में सैद्धांतिक विश्लेषण की प्रक्रिया को आवश्यक समझते थे। प्रसंगवश इस क्रम में स्मरण आता है मुक्तिबोध द्वारा 10 दिसंबर 1942 को उज्जैन से वीरेंद्र कुमार जैन को लिखा पत्र, जिसमें उज्जैन की दो संस्थाओं 'प्रगतिशील लेखक संघ एवं 'मध्य भारत पुरोगामी हिंदी साहित्य समिति’ की जड़ता पर विचार करते हुए वे लिखते हैं कि ''ये दो वृहद संस्थाएँ समाज के शोषक वर्ग से निकलकर निर्माणशील युवकों के हाथों आए... यदि न आ सकें तो शीघ्र ही अखिल मध्य भारतीय सम्मेलन इस वर्ष बुलाया जाय, यह उसकी मनीषा है, जिससे हम मुक्त और स्वच्छ रूप से कला, साहित्य, समाज, इतिहास आदि पर निर्माणशील प्रेरणा और सौहाद्र्र के साथ विचारकों और पारस्परिकता का निर्माण करें। इस प्रकार मुक्त सांस्कृतिक वातावरण निर्माण हो।जाहिर सी बात है कि वर्तमान समय में जबकि देश में लेखक संगठनों और साहित्य परिषद व समितियों की स्थिति बहुत संतोषप्रद व सृजनोन्मुखी नहीं लगती तब मुक्तिबोध के पत्रों में दर्ज प्रेरणादायी ऐसे सुझाव व सम्मति प्रासंगिक है। चालीस के दशक में हिंदी साहित्य की दशा-दिशा प्रेमचंद के कारण प्रगतिशील और जनवादी चेतना के साथ स्वतंत्रता संघर्ष के प्रति उन्मुख थी। मध्यभारत में यह अलख 'कर्मवीर’ के माध्यम से माखनलाल चतुर्वेदी जगा रहे थे। इस काल में युवा मुक्तिबोध का समकालीन साहित्यिक परिदृश्य के संदर्भ में माखनलाल चतुर्वेदी को 5 अपै्रल 1943 में लिखा पत्र दृष्टव्य है- ''श्रद्धेय दादा, आपके पास हमारे यहां के नवयुवकों की रचनाएं भेज रहा हूं। आपके स्नेह जल से कई अंकुर वृक्ष हो गए हैं। संभवत: आप इनको भी वृक्ष बना दें, वृक्ष रूप में देख लें। मध्यभारत की साहित्यिक तरुणाई के विकसन का श्रेय कर्मवीर को प्राप्त है, जिसमें मैं सालों तक पनपा। आपको मैंने लेखक परिषद के अवसर पर पत्र लिखा था, आपने कर्मवीर में उसका हार्दिक समर्थन कर अपने स्नेहमय व्यक्तित्व का एक बार फिर से परिचय दिया। समय और स्थान की अनेक बाधाओं के कारण आपसे मिलने का अवसर बहुत दिनों से प्राप्त नहीं हुआ। फिर भी यह याद करके कि खण्डवा में अपना 'एक भारतीय आत्मा’ पड़ा हुआ है, मन में सुख रहता है।“ इस पत्र से यह स्पष्ट होता है कि मुक्तिबोध अपने लेखन के साथ-साथ नई पीढ़ी को लेकर चल रहे थे और वरिष्ठ से कनिष्ठ के मध्य सेतु का कार्य कर रहे थे।

मुक्तिबोध साथियों और युवा साहित्यकारों के प्रति सदैव सहयोग की भावना रखते थे। युवा कवि जगदीश को 15 अगस्त 1946 को लिखा पत्र मुक्तिबोध की इस भावना को दर्शाता है साथ ही इस पत्र में यह भी खुलासा होता है कि मुक्तिबोध कैसे तब निराला के जैसे ही अपने समकालीन बड़े साहित्यकारों/संपादकों के बीच उपेक्षित रहे। इस पत्र का एक अंश देखें- '' प्रिय जगदीश, तुम्हारे लेख के बारे में और अन्य प्रयत्नशील लेखकों के विषय में उदासीनता सब जगह है, यहाँ भी है। दूसरे रहा मेरा व्यक्तिगत सवाल कि मैं कहाँ तक अपने साथी लेखकों के लिए लड़ सकता हूँ। यह तो तुम देख ही रहे हो कि मैं असफल हूँ। मेरा व्यक्तिगत प्रभाव यदि है तो लेखक की हैसियत से हो सकता है। सम्पादकीय विभाग से मेरा सम्बन्ध नहीं-सा है। दूसरी भी अन्य बाधाएँ हैं। मुख्य बाधा सम्पादकों की उदासीनता ही समझिए। मेरी चीजें अब भी नहीं छपती हैं और उनके अनुरूप चीजें लिखकर रूपया कमाना नहीं चाहता।“आज जबकि लेखन को एक बड़ा तथाकथित साहित्यकार वर्ग पूंजी अर्जन का माध्यम समझता है और साहित्य के नाम पर खेमेबाजी व बाजार की नब्ज के अनुरूप टकसाली साहित्य रचने को ही सबसे बड़ा लेखक धर्म मानता है, उपर्युक्त पत्र में मुक्तिबोध बड़े प्रासंगिक नजर आते हैं जिन्होंने विपरीत स्थितियों में भी लेखन के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। मुक्तिबोध को अपने जीवन संघर्ष में रोजगार खासकर लेक्चरर की नौकरी की अधिक फिक्र रहती थी। उनकी यह चिन्ता नेमिचंद्र जैन, श्रीकांत वर्मा और नामवर सिंह को लिखे पत्रों में व्यक्त होती रही है। विष्णुचंद्र शर्मा को 02 अप्रैल 1957 को लिखे पत्र में इसे देखा जा सकता है जिसमें वे कहते हैं- ''भाई मेरे, देर के लिए क्षमा करें। चार कविताएं भेज रहा हूं। इससे ज्यादा छोटी तो मिलना मुश्किल है। जो कविताएं पसंद न आएं, उन्हें आप वापस जरूर करेंगे। त्रिलोचन जी और नामवर जी को मेरा हार्दिक नमस्ते कहें। आपके पत्र में 'विवेक’ स्तंभ के अंतर्गत मुझपर छोटी सी टिप्पणी देखी। धन्यवाद। अगर नागरी प्रचारणी सभा में मुझे जगह मिल सकती हो तो क्यों नहीं मुझे दिलवा देते। यह पत्र 'नया खून’ एक स्वतंत्र वामपक्षीय साप्ताहिक है, जिसमें मैं आजकल काम कर रहा हूं। वैसे, अध्ययन-अध्यापन की इच्छा है। हिंदी में नागपुर विश्वविद्यालय से सेकेण्ड क्लास एम.ए. हूं। आपको इसलिए बता दिया कि कोई जगह, खास तौर पर लेक्चरर की, नजर आए तो आप ध्यान रख सकें।“

इस पत्र से जाहिर है कि एक साहित्यकार का जीवन तब कितना मुश्किल होता है जब रोजगार की अनिश्चितताओं के बीच वह लेखन के साथ साहित्य का पर्यवेक्षण करता है और समकालीनों से संवाद भी करता है-मुक्तिबोध ने यह निरंतर किया।

1956 में श्रीकांत वर्मा को लिखा मुक्तिबोध का एक पत्र बताता है कि वे जीवन में आर्थिक सुरक्षा के लिए काफी जूझते रहे, लेकिन वे अपने आत्मसम्मान के प्रति भी सजग रहे। वे लिखते हैं '' प्यारे भाई, ऐसी ही चिट्ठियों से बहुत बल मिलता है। मैं जानता हूँ कि आपको मेरी गहरी चिंता है। इतना स्नेह पाकर मैं अभेद्य हो जाता हूँ। लड़ाई लड़ लूंगा। जरा अच्छे ढंग से लडूँ। यही इच्छा है। इसीलिए अपमानजनक शर्तों पर भोपाल जाना उचित न समझा”। एक अन्य पत्र में श्रीकांत वर्मा को मुक्तिबोध लिखते हैं कि ''दोस्तों में बड़ा आदमी कोई नहीं, बड़ों की चाटुकारिता होती नहीं, उनके लिए मेहनत की जाती है। किंतु इस मेहनत ने अब तक कोई मुआवजा नहीं दिया। अब छिछियाने की मेरी उम्र भी नहीं रही, सिर्फ  एक महत्वाकांक्षा है- लेक्चररी मिल जाए, जरा अच्छे ढंग की। मारा-मारा न फिरूँ। बाल-बच्चेदार आदमी होने के अलावा मेरे माता-पिता भी हैं और मुख्तसर कर्ज लदा है। इसको कैसे अदा करूँ इसी धुन में लगा रहता हूँ। पठानों से कर्ज लेते-लेते जब हिंदुओं से लेने लगा तो पाया कि वे पठानों से भी बुरे होते हैं। बड़े हरामी, बड़े पाजी, कुछ न पूछो। आपने बड़ी व्यक्तिगत बातें की इसीलिए मैं इतनी बातें कह गया, तैश में। नहीं तो कहने की कोई बात नहीं थी, यह भी जो बड़ा निजी मामला है। अपने लोगों से ही कहा जा सकता हैं।“ इस पत्र से पता चलता है कि उनकी आर्थिक-सामाजिक-मानसिक स्थिति कितनी विकट थी। मुक्तिबोध के इस निजी संघर्ष में सूदखोरों की निम्न आय वर्ग के लोगों के प्रति कठोर व निर्मम प्रवृत्ति भी उजागर होती है।

 साहित्यिक अभिव्यक्ति पर नेमिचंद्र जैन को जून 1957 में लिखा पत्र उल्लेखनीय है- ''यह आवश्यक नहीं है कि कवि का पद अनिवार्य रूप से विचारक के पद से बड़ा ही हो। मेरा तो खयाल है कि आज हिंदी को जितनी अधिक आवश्यकता विचारक की है, उतनी कवि की नहीं। प्रकृति और वेदना से जो व्यक्ति कवि होकर परिस्थितिवश विचारक हो जाता है, उसकी यह यात्रा जो उसने काव्य से लेकर विचार तक की है, अत्यंत महत्वपूर्ण और मूल्यवान है और उसकी अभिव्यक्ति आवश्यक है।“ मुक्तिबोध का यह चिंतक व्यक्तित्व विश्व साहित्य-संस्कृति व कला के प्रति भी जिज्ञासु रहा। पोलैण्ड की युवा विदुषी आग्नेष्का से जब उनका संवाद हुआ तो उन्होंने 09 दिसंबर 1963 के पत्र में लिखा- ''आप पोलैण्ड जाएंगी। मेरा एक सुझाव मानेंगी? वहाँ के कला के संबंध में साहित्य (और कविता) के सम्बन्ध में माक्र्सवादियों और अ-माक्र्सवादियों द्वारा जो चिंतन हुआ है, जो विवाद उठे हैं जो विचार विनिमय हुआ है, जो निष्कर्ष निकाले गए हैं, और जो नीति अपनायी गयी है, जो दृष्टियाँ स्थापित की गई हैं उनको हिंदी में समग्र और अविकल रूप से आप अवश्य-अवश्य लायें, जिससे कि हम लोगों का, हिंदी का कल्याण हो। यदि आप उन विचारकों और साहित्यिकों के लेख और प्रबंध हिंदी में अनुवादित कर सकें, करने का कष्ट करें तो उनके हाथों एक प्रभावशाली कार्य होगा और हिन्दी के हम जो लोग हैं वह कह सकेंगे कि हमारी विचारधारा में कहीं भी (तथाकथित) रेजीमेण्टेशन नहीं है। हम लोगों के हाथ मजबूत होंगे।“ यहां मुक्तिबोध की वैश्विक दृष्टि के विस्तार का पता चलता है। मुक्तिबोध के पत्रों में कविता के प्रति शास्त्रीय और व्यवहारिक दोनों ही बातें होतीं। 'भाव प्रसंग’ पर विचार करते हुए प्रमोद वर्मा को उन्होंने 9 जनवरी 1958 को लिखा - ''परिस्थिति के भीतर जो जीवन प्रसंग उपस्थित होते हैं उनका एक पक्ष है आत्मपक्ष और दूसरा है बाह्य पक्ष। आत्म पक्ष में बाह्य पक्ष के प्रति संवेदनाएँ, प्रतिक्रियाएँ, दु:ख, रवैया, दृष्टि आदि। उदाहरण के लिए प्रेमिका के सामने प्रेमी की उपस्थिति (यदि कवि एक प्रेमी है तो) जो भाव प्रसंग है वह साक्षात और मूर्त है, जिसमें प्रेमिका को देखकर प्रेमी के मन में उमडऩे वाली विविध भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ आदि उत्थित हुई।“ नामवर सिंह को 1958 में लिखा उनका एक पत्र उल्लेखनीय है - '' प्रिय नामवर, 'कवि’ में आपने मेरे संबंध में जो कुछ लिखा उसके लिए मैं किन शब्दों में धन्यवाद दूँ। औपचारिक पत्र लिखने का मुझे बिल्कुल अभ्यास नहीं है। दिल की कहूँ तो यह कि अगर आप मेरे समीप होते तो गले लगा लेता, इसलिए नहीं कि तारीफ  हुई, वरन इसलिए कि एक सुदूर अजाने कोने में एक समानशील समधर्मा मिला। .... काश प्रगतिशील आंदोलन हम जैसे लोगों को थोड़ा समझ पाता। पिछले बारह वर्ष के एक पूरे तय समय में उसने काव्य मर्मज्ञता के क्षेत्र में जरा सी भी समझ, सहानुभूति और सहिष्णुता का, परिचय दिया होता तो उसकी वैसी गत न होती जैसी आज है।“ नए कवियों के प्रति उनकी भावना सहयोगी की थी। तब के नवोदित तरुण कवि विनोद कुमार शुक्ल पर श्रीकांत वर्मा को 02 मई 1960 को लिखे पत्र में वे लिखते हैं, ''बन्धुवर, आपके पास मैं श्री विनोद कुमार शुक्ला की कविताएं प्रकाशनार्थ भेज रहा हूं। उनकी कविताएं मुझे पसंद हैं। लेकिन चूंकि मैं दैनन्दिन प्रकाशित होनेवाली काव्य धाराओं से पूर्णत: परिचित नहीं रहता, इसलिए चाहता हूं कि आप उन्हें स्क्रूटनाइज कर लें, कहीं उनमें उधार ली हुई गूंजें और अनायास आगमित छायाएं तो नहीं हैं! मेरे खयाल से श्री विनोदकुमार मेधावी तरुण हैं और उनमें एक विशेष काव्य प्रतिभा है। फिर भी हीरे को गढऩा होगा, चोटें जरूरी हैं। इसीलिए, मैं आपसे एक बार पढ़वा लेना चाहता हूं। यदि पसंद आयीं तो आप अवश्य प्रकाशित कीजियेगा।“ सत्तावन साल पहले जिस विनोद कुमार शुक्ल की प्रतिभा का आकलन मुक्तिबोध ने किया था, वह आज विनोद कुमार शुक्ल की 'साधारण शब्दों में असाधारण कविताओं’ के रूप में हम साक्षात अनुभव कर पा रहे हैं। मुक्तिबोध के पत्रों के अध्ययन और विश्लेषण से यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है कि उनमें संवादोन्मुखता का गुण तो था, पर आसानी से नहीं खुलते थे। लेकिन जब किसी से खुल जाते तो आत्मीय संवाद का सूत्र सहज जोड़ लेते और उसे निभाते भी। उनके व्यवहार और विचार की दृढ़ता उनके पत्रों में उभरती है। वे अपने काव्य या कथा साहित्य में भले ही उलझन भरी स्थितियों में नजर आते हों, अपने पत्रों में बहुत सहज संवाद शैली के साथ-साथ प्रभावी सम्प्रेषण युक्त भाषा का उपयोग करते हैं। उनके पत्र 'साहित्य विमर्श’ एवं 'सांस्कृतिक सरोकारों’ का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं साथ ही उनमें मध्यवर्गीय जीवन संघर्ष की मुखर अभिव्यक्ति है। उनके पत्रों का जितनी सूक्ष्मता से अध्ययन करते हैं उतने ही वह, हमें आमजन के साहित्यकार लगते हैं - जिनके जीवन सरोकार माक्र्सवादी चेतना के चलते निरंतर वैश्विक और समाजोन्मुखी होते गए थे।