Monthly Magzine
Monday 24 Jul 2017

मुक्तिबोध की कविताओं के महासागर

मुक्तिबोध की कविताओं में नदी, तालाब, कुआँ, बावड़ी, झील, झरना, सागर और महासागर अक्सर आते हैं और कुछ विशेष अर्थ लिये हुए आते हैं। मुक्तिबोध पानी के बिंबों, प्रतीकों और रूपकों के जरिये अपने समय के उस यथार्थ को सामने लाते हैं, जो पानी की भांति जीवंत, गतिशील, गंभीर और व्यापक है। वे अपनी कविताओं में पानी के विभिन्न रूपों से एक इतिहास-सा रचते प्रतीत होते हैं, जो केवल विगत का नहीं, बल्कि आगत और अनागत का भी इतिहास है; जिसमें अतीत के सबक, वर्तमान के अनुभव और भविष्य के स्वप्न शामिल हैं।

पहले उनकी तीन आरंभिक कविताओं को देखें। एक कविता है 'क्षिप्रा-धारा’, जिसमें वाचक कहता है -''मेरी अंत:क्षिप्रा-धारा, जिसका प्रवाह युगों-युगों से जारी है, अपने कूल-किनारे बदल रही है। उसमें असंख्य लहरें उठ रही हैं, अन्य असंख्य धाराएँ आकर मिल रही हैं। वह असंख्य स्रोतों से मिलकर, भरकर, महान बनकर, प्रबलतर होकर, विशाल और सुंदर होकर बह रही है। मेरी यह आत्मा-धारा पहले प्रासादों के सुंदर श्यामल मैदानों में बहती थी, पर आज अपना मार्ग बदलकर, अपना जीवन-कार्य बदलकर, गरीबों के प्यासे खेतों से होकर बह रही है।“

इस कविता में मुक्तिबोध वर्तमान के गतिशील तथा परिवर्तनशील यथार्थ को देखते-दिखाते हुए उसकी भावी दिशा बताने के साथ-साथ अपनी वर्गीय पक्षधरता और वैचारिक प्रतिबद्धता भी स्पष्ट कर देते हैं। दूसरी कविता है 'जीवन-यात्रा’, जिसमें वाचक अपनी कल्पना से प्रेरणा और सहारा पाकर अपनी भावी जीवन-यात्रा के बारे में सोचता है, तो पाता है कि वह कहीं विराम लेकर ठहरा हुआ नहीं, बल्कि नित्य निरंतर चलने वाला यात्री है। गति में ही उसकी संस्कृति है। नित्य नवीन जीवन में ही उसकी उन्नति है। उसे मानव-जीवन में एक अंतर्धारा चलती दिखायी देती है, जो अंधी नहीं है, किंतु बौद्धिक सीमाओं को लाँघ जाती है, कृत्रिम बंधनों को तोड़ डालती है और स्वयं नित्य नवीन होती रहती है। उसकी अपनी अंतर्धारा उसे महासागरों के उस स्वप्न तक ले जाती है, जिसमें कुछ महासागरों के आगे जाने पर उसे शांत शून्य में एक द्वीप मिलता है, जहाँ के भोले लोग अपनी नौकाएँ लेकर महासागर में निकल पड़ते हैं। वे उत्ताल तरंगों से अड़ते हैं, लहरों से लड़ते हैं, उनमें से कुछ डूब भी जाते हैं, पर जीवन भर रुकते नहीं हैं। यह देखकर वह स्वयं से कहता है- ''तू जीवन की गति को पहचान और अपने व्यक्तित्व को उसमें अनायास बहने दे। तब तू समझेगा कि सहज जीवन में होते चलते विविध प्रकार के आत्मदान या आत्मत्याग में ही आत्मप्रीति है, जिसके जरिये तू उस उषाकाल में पहुँचेगा, जिसमें अतीत डूब चला होगा और भविष्य की आहट सुनायी दे रही होगी।“

इनमें से पहली कविता आसानी से समझ में आ जाती है, लेकिन दूसरी कविता को समझने में मुश्किल होती है, क्योंकि उसे पढ़ते हुए अनायास कुछ प्रश्न उठने लगते हैं। जैसे, ये महासागर क्या हैं? उनसे आगे जाने पर शांत शून्य में मिलने वाला द्वीप क्या है? और, वह उषाकाल क्या है, जिसमें अतीत डूब चला होगा और भविष्य की आहट सुनायी दे रही होगी?

एक और कविता है 'यह क्षण’, जिसमें वाचक अपने भीतर उतरता है, तो पाता है कि मन में पीड़ा है। अंतर में भयानक संघर्ष है। तूफानों वाली रातें हैं, जिनमें दावाग्नि की भयानक ज्वालाएँ उठ रही हैं। हृदय के अंधकूप में अंधेरे का ही मंथन हो रहा है। मूल प्रकृति का सघन उद्वेलन फूट पडऩा चाहता है। अपनी मर्जी, खुदगर्जी, सहसा उत्तेजित अपनेपन और जबर्दस्त आत्म-लोभ की सीमाएँ उसे रोक रही हैं। लेकिन इन सीमाओं का उसका उल्लंघन भी उत्कट है। वह अपनी शक्ति सँभालकर, जरा स्वस्थ और शांत होकर आगे बढ़ता है, तो देखता है कि घनी रात है और सामने एक महासिंधु, जिसका वक्षस्थल अपने भीतर की आग से क्षुब्ध है। महासिंधु के अतल धरातल पर मृदुल उर्मियाँ भयानक हो उठी हैं। चंचल लहरें आज प्राणघातिनी बन गयी हैं। महासिंधु का अव्यक्त, गूढ़, काला अंतस्तल हिल उठा है। उसके भीतर आग है और बाहर भयानक तूफान। लेकिन वह अपने भीतर के सर्जक से कहता है- ''हे निर्भय सर्जक, आत्म-क्षोभ में तुम वहाँ कूद पड़ो, जहाँ सिंधु का आलोडऩ है। तुम अपनी शक्ति संभालकर, शांत और स्वस्थ होकर सोचो कि संसार में स्वार्थ भरा उत्पीडऩ क्यों है। तुम ललकारों को सुनो, महासिंधु के घोर क्षोभ में आत्म-विसर्जन कर दो, और फिर अंत:सागर की गहराई में से नयी शक्ति लेकर उठो। खल-बल को अपने बल से नित्य नियंत्रित करो। तभी तुम्हारे अंतर्देश में करुणा के तट पर नये राज्य की स्थापना होगी।“

इस कविता को पढ़ते हुए भी कई प्रश्न उठते हैं। जैसे, यह महासिंधु क्या है? उसका अव्यक्त, गूढ़, काला अंतस्तल क्या है? निर्भय सर्जक के अंतर्देश में करुणा के तट पर स्थापित होने वाला नया राज्य क्या है? यह कविता एक सर्जक को संबोधित या आत्म-संबोधित है। वह एक निर्भय सर्जक है, जो संसार की वर्तमान व्यवस्था से क्षुब्ध है, क्योंकि वह स्वार्थ भरे उत्पीडऩ की व्यवस्था है। वह इसकी जगह एक ऐसी व्यवस्था चाहता है, जो स्वार्थ पर नहीं, मानवीय करुणा पर आधारित हो। यह उसका भविष्य-स्वप्न है। समस्या यह है कि यह स्वप्न साकार कैसे हो। वह संसार को एक घोर क्षुब्ध महासिंधु के रूप में देखता है, जिसमें क्रांतिकारी आलोडऩ हो रहा है। इस महासिंधु का अब तक का इतिहास यह रहा है कि वह सतह पर कुछ और तथा भीतर से कुछ और होने की वास्तविकता को छिपाता आया है। सतह पर उसकी मृदुल उर्मियाँ और चंचल लहरें ही दिखती हैं, जो भली लगती हैं, लेकिन उसका गूढ़ काला अंतस्तल स्थिर और अव्यक्त ही रहता है। मगर यह क्रांति-काल है, जिसमें महासिंधु की मृदुल उर्मियाँ भयानक हो उठी हैं, उसकी चंचल लहरें प्राणघातिनी हो गयी हैं, उसका गूढ़ काला अंतस्तल हिल उठा है, उसके भीतर आग है और बाहर तूफान। ऐसी स्थिति में सर्जक को लगता है कि उसे निर्भीक होना चाहिए, आत्म-क्षोभ में वहाँ कूद पडऩा चाहिए, जहाँ सिंधु का आलोडऩ है। उसे अपनी शक्ति सँभालकर, शांत और स्वस्थ होकर सोचना चाहिए कि संसार में स्वार्थ भरा उत्पीडऩ क्यों है। उसे महासिंधु के घोर क्षोभ में आत्म-विसर्जन कर देना चाहिए, और फिर अंत:सागर की गहराई में से नयी शक्ति पाकर खल-बल को अपने बल से नित्य नियंत्रित करना चाहिए। तभी उसके अंतर्देश में करुणा के तट पर नये राज्य की स्थापना होगी। लेकिन आत्म-विसर्जन आसान नहीं है। अहं उसमें बाधक है। अहं अपने-आप में बुरा नहीं है। बुरा है वह पुराना अहं, जो छोटे-छोटे स्वार्थों से पैदा होता है और छोटी-छोटी जयों-पराजयों पर टिका होता है। उसकी जगह एक नया क्रांतिकारी अहं चाहिए। 'नूतन अहं’ कविता में दोनों तरह के अहं का अंतर इन शब्दों में स्पष्ट होता है:

''क्या तुम इतना अखंड प्रेम करते हो कि घृणा कर सको? क्या तुम्हारे अंतर में इतनी ग्लानि है कि जिससे तुम मरने और मारने के लिए तत्पर रह सको? क्या तुम्हारे जीवन और स्वप्नों पर ऐसी गहरी उदासी छायी है, जो तुम्हारी आत्मा के तन पर एकाकीपन का लौह वस्त्र पहना दे? क्या तुम्हारे पास वह स्नेह-कोष है, जो मन को सदा करुणा से गीला रखता है? और, क्या वह रोष भी है, जो चिर-विरोध के वातावरण में भी आत्मा में गरमी, सहज भव्यता और मधुर आत्मविश्वास बनाये रखता है? नहीं, अभी तो तुम अपने लघु स्वार्थों में और अपने लघुतम संसार की लघु-लघु जयों-पराजयों में पड़े हुए हो। देखो, अपनी दयनीय दशा को देखो, जिसमें तुम्हारा अहंभाव ऐसे अड़ा खड़ा है, जैसे घूरे पर धृष्ट और उन्मत्त कुकुरमुत्ता!”

मुक्तिबोध की कविता के महासागरों के वास्तविक अर्थ तक पहुँचने के लिए यह देखना आवश्यक है कि क्रांति की उनकी समझ क्या है। मुक्तिबोध 'एक देश में क्रांति’ की जगह 'अखिल विश्व में क्रांति’ का स्वप्न देखते हैं। वे यह मानते हैं कि जिस तरह पूँजीवाद एक विश्व-व्यवस्था है, उसी तरह समाजवाद भी एक विश्व-व्यवस्था ही है। अत: समाजवादी क्रांति किसी एक देश या कुछ देशों का नहीं, सारी दुनिया का मामला है। वे भारत में होने वाली क्रांति का स्वप्न एक वैश्विक या भूमंडलीय क्रांति के रूप में देखते हैं।

'भूमंडलीय’ शब्द बाद में आया है, लेकिन भूमंडलीय यथार्थ, भूमंडलीय यथार्थवाद और भूमंडलीय क्रांति की अवधारणाएँ किंचित् भिन्न शब्दों में मुक्तिबोध की कविताओं में पहले से ही मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, उनकी एक कविता है 'जन-जन का चेहरा एक’। इस कविता का वाचक देखता है कि दुनिया के शासक वर्ग तथा उसके चाकर मध्यवर्ग के चेहरे चाहे जितने भिन्न हों, जनगण का चेहरा सर्वत्र एक ही है। एशिया हो या यूरोप या अमरीका, वहाँ के किसी भी देश का कोई प्रांत हो या पुर, सर्वत्र जन-जन का चेहरा एक है। हर जगह की गलियों की धूप एक-सी है। कष्ट, दुख और संताप से लोगों के चेहरों पर पड़ी झुर्रियाँ एक-सी हैं और संघर्ष के लिए जोश और ताकत से बँधी हुई उनकी मुट्ठियाँ भी एक-सी हैं। उनके संघर्ष का लक्ष्य भी एक ही है। वह लक्ष्य है लाल क्रांति, क्योंकि जिस तरह सर्वत्र शोषक-उत्पीड़क शासक वर्ग के रूप में जन-शत्रु एक है, उसी तरह लाल किरणों से अंधकार को चीरता जन-जन का क्रांति रूपी मित्र भी एक ही है। चूँकि जन-जन के सिर पर शोषण का अतिघोर खड्ग एक है, इसलिए उसके विरुद्ध दुनिया के हर हिस्से में जारी जन-युद्ध का घोष भी एक है। और क्रांति से, उसमें होने वाली विजय से और उसके बाद किये जाने वाले नव-निर्माण से मिलने वाला सबका जीवन-संतोष भी एक है। इसीलिए वह कहता है- ''एशिया के, यूरोप के, अमरीका के भिन्न-भिन्न वास-स्थान; भौगोलिक, ऐतिहासिक बंधनों के बावजूद, सभी ओर हिंदुस्तान, सभी ओर हिंदुस्तान।“

यह क्रांति भौगोलिक ही नहीं, ऐतिहासिक भी है। 'दमकती दामिनी’ कविता का वाचक उसे युग-क्रांति कहता है और स्वयं को क्रांति-युग का कवि, जिसका हृदय रात-दिन युग-क्रांति के विक्षोभ से जलता रहता है। उसके मन का कूप विह्वल वक्ष का सागर बन गया है, इसलिए वह मृत्यु की श्यामल घाटियों में भी चेतना-झंकार का मुखर युग-कल्प देख रहा है। युग-क्रांति की संपूर्ण सर्जन-शक्ति का संकल्प उसका कवि-संकल्प बनकर लहरा रहा है। वह अपने मन को लोक-मन से जोड़ता है और लोक-मन की प्राकृतिक अनिवार सर्जन-शक्ति में विश्वास करता है। अत: वह किसी एक देश की नहीं, मानव-देश की बात करता है; किसी एक मार्ग की नहीं, मानव-मार्ग की बात करता है।

इसी तरह 'अपने कवि से’ कविता का वाचक विराट् वैश्विक स्वप्न देखने वाला यथार्थवादी होने के साथ-साथ आदर्शवादी भी है। उसके स्वप्न यथार्थ की ठोस जमीन पर खड़े किये गये आदर्श के भव्य भवन हैं। मसलन, उसका एक स्वप्न बंगाल के अकाल के भीषण दृश्यों वाले वर्तमान से शुरू होता है और पूरे देश तथा दुनिया के यथार्थ तक फैलता हुआ भविष्य के उस आदर्श-लोक में जा पहुँचता है, जहाँ जन-प्राण के आग्नेय धनुष पर प्रतिशोध के दुर्वार आकुल तर्क का तीर चढ़ा हुआ है। बलिदान, हत्या, रक्त और भारी संघर्ष की एक तस्वीर मानव-प्राण में अविराम शब्दित दुंदुभि बजा रही है। भारतीय यथार्थ से शुरू हुआ स्वप्न नूतन विश्व की उद्भावना के स्वप्न में बदल जाता है। वहाँ जाकर जिंदगी की कठिन और लंबी कहानी, जो द्रोह की, विक्षोभ की, उद्योग की, उन्माद की, आदर्श के आक्रोश की-सी कहानी है, मानव-मुक्ति की इतिहास-गाथा बन जाती है।

'जब प्रश्नचिह्न बौखला उठे’ कविता में मुक्तिबोध कहते हैं कि जन-जन की कल्याणमयी करुणाओं तथा सहजोत्सर्गमयी आत्मा ने क्रांति का पथ प्रशस्त कर दिया है। हिंदुस्तानी सपने निखर उठे हैं। धरती की बाँहों में सूरज का लाल चेहरा डोलने लगा है और उसकी मेधा की ज्वालाएँ ऐसी फैली हैं कि घास भरे जंगलों, पहाड़ों और बंजरों वाली बूढ़ी दुनिया में आग लग गयी है। उस विश्वजित् दावाग्नि को भड़काने वाले नौजवान इतिहास बनाने वाला अपना सिर ऊंचा करके चलने लगे हैं और जन-जन के साथ पृथ्वी की गति से घूमने लगे हैं। कष्ट भरे जीवन के विस्तारों में तरुणों की प्रतिभाशाली आत्मा ऐसे बह रही है, जैसे दावाग्नि-लगे जंगल के बीच जलते कूलों वाली एक जवान सरिता बह रही हो। वहाँ अंगारों की धाराओं जैसे जो मानव-युग के भारतीय झरने बह रहे हैं, वे संपूर्ण मानवता की पीडि़त छवियाँ लेकर जन-जन के पुत्रों के हृदय में मचल रहे हैं। झरने भारतीय हैं, किंतु उनमें मानो संपूर्ण पृथ्वी की बाँहें लहरा रही हैं और उन झरनों में बिंबित रवि-रंजित नभ को पृथ्वी अपनी इन बाँहों में कसकर चूम रही है। मानव-भविष्य का विजयाकांक्षी आसमान इन झरनों में अपने संघर्षी वर्तमान में घूम रहा है।

'सूखे कठोर नंगे पहाड़’ कविता में मुक्तिबोध समुद्र को 'महाकाल’ या इतिहास के रूप में देखते हैं। इस कविता में वर्तमान के भीषण यथार्थ के साथ-साथ क्रांति की प्रक्रिया और उसके बाद के नये संसार का अपना भविष्य-स्वप्न उन्होंने बड़े विस्तार से दिखाया है। यह कविता एक महास्वप्न है, जिसमें मानो काल-मूर्ति, क्रांति-शक्ति, जन-युग ही स्वयं जन-क्रांति-रूप महाशक्ति को संबोधित करता है। वह उसे वर्तमान यथार्थ के सूखे, कठोर, नंगे पहाड़ दिखाता है, जो जन-विरोधी विचारों, मान्यताओं, परंपराओं आदि के पहाड़ हैं। ये पहाड़ बंजर, अनुर्वर और निरर्थक ही नहीं, अनर्थकारी भी हैं, इसलिए उन्हें उखाड़ फेंकना जरूरी है। इसलिए वह अपने उद्बोधन में कहता है- ''तू इन सूखे कठोर नंगे पहाड़ों को भूमि से उखाड़ दे। ये युग-युग की गहरी जड़ीभूत परतों के काले विभ्राट हैं। तू इन्हें अपने सबल कंधों पर उठाकर ले जा और काले अथाह सागर में डुबो दे, क्योंकि इनकी गहरी काली छाया के घेरे में मानवीय सभ्यताओं पर धुँधली अँधियाली छायी रहती है और अंतर्मन पर विकास की सहज साँस को रोकने वाले धूल के मटमैले भार जमते रहते हैं। ये पहाड़ मानव जीवन को बाधित करने वाले अहं-गर्भ, अज्ञान-प्राण, शोषण-प्रसन्न स्याह जिन्न हैं। युग-युग की संचित 'संस्कृति’ के सड़े रूप हैं। ये आसमान में अपना उद्धत, अखंड, उद्दंड, विजड़ और खल्वाट सिर उठाये तथा काले पत्थर का दुष्ट और धृष्ट कठोर सीना ताने खड़े हैं। ये वर्षा लेकर आने वाली हवाओं को रोकते हैं, जो इनसे टकराकर वापस चली जाती हैं। इसलिए तू इन शिला-वक्ष शैतानों को गिरफ्तार कर ले और कंधों पर उठाकर समुद्र में डुबोने के लिए ले चल।“

समुद्र तक पहुँचने का मार्ग अचीन्हा और तिलिस्मी है, इसलिए वह कहता है- ''अपने कंधे पर सूखे कठोर नंगे पहाड़ों के बोझ को सँभाले हुए तू बिना रुके इस तिलिस्मी देश को जल्दी से पार कर ले और गहरे सागर के तट पर इस तरह जा खड़ा हो कि तेरा संकल्प-प्राण इतना ऊँचा, इतना विराट हो जाये कि आसमान छू ले। और अब अपने बाहुदंड से कंधे पर रखे सूखे कठोर नंगे पहाड़ों के बोझ को उठाकर जल्दी से समुद्र में फेंक दे। उन्हें डुबोने के बाद तू उसी महाकाल सागर में कूदकर नहा ले, उसकी गहन गंभीर शक्ति के प्राण और नयी सृष्टि के गान प्राप्त कर ले, और वहाँ से तुरंत चल दे।“

वहाँ से चलकर उसे एक नूतन महासृष्टि तक पहुँचना है, जिसका भविष्य-स्वप्न मुक्तिबोध ने इस कविता में नेति-नेति की शैली में दिखाया है- ''तेरी उस नयी सृष्टि में वे सूखे कठोर नंगे पहाड़ नहीं होंगे, जिनके प्रस्तरी प्राण और घोर मस्तिष्क-कोष के काले विवरांधकार में वीभत्स काले जादूगर तांत्रिक बैठे रहते थे। मानवता के शोषण-प्रवीण और दमनशील शासनकर्ता नहीं होंगे। जन-क्रांति-विरोधी प्रतिक्रांति का मूल केंद्र कुबेरों का सोने के गंजे सिर वाला सुमेरु नहीं होगा। शोषण की व्यवस्था के आँख, कान, नाक, मुँह, हाथ, पैर और दिमाग की तरह काम करने वाले स्वार्थ-शास्त्र की प्रखर बुद्धि वाले और कंचन की मिट्टी का चिकना चोगा पहनकर अपनी स्निग्ध मुस्कान से छलने वाले लंबोदर बुद्धिजीवी नहीं होगे। युगों से खड़े भीषणतम अभिशापों के पहाड़ नहीं होंगे। शोषक दल के स्वार्थों के औचित्य-स्थापनाशील तर्क नहीं होंगे। असंख्य लोक-विरोधी झूठे भावों के ध्वनिविस्तारक केंद्र नहीं होंगे। मायावी तांत्रिक के खँडहरों, बरगदों, पीपलों और भुतहे शब्दों वाले शक्ति-दुर्ग नहीं होंगे। मनुष्यों को श्वान, स्यार, चमगादड़ आदि बनाकर बंद रखने वाले कैदखाने नहीं होंगे। शोषण के लिए आवश्यक तिलिस्मी सत्ताएँ नहीं होंगी।“

जिस दुनिया में यह सब नहीं होगा, वह दुनिया कितनी बेहतर और सुंदर होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है। लेकिन इसकी विराट कल्पना के लिए मुक्तिबोध की-सी विशाल विश्व-दृष्टि अपेक्षित है, जो भविष्य का ऐसा बड़ा और व्यापक स्वप्न देख सके। मुक्तिबोध भूमंडलीय यथार्थ के महासागर तक जाकर संपूर्ण मानवता के वैश्विक इतिहास का पता लगाते हैं। इस दृष्टि से उनकी दो कविताएँ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं- 'चकमक की चिंगारियाँ’ और 'एक स्वप्न-कथा’।

'चकमक की चिंगारियाँ’ में वाचक स्वयं को एक गड्ढे में गिरा पाता है, जिसके अंधेरे में लाल-पीले चमकते नक्शे, इतिहास-भूगोल और दर्शन के बहुतेरे पृष्ठ तथा उन पर लिखी हुई पंक्तियों में से समूची क्षुब्ध पृथ्वी के अनेकों क्रुद्ध और गहरे समुद्र दिखायी पड़ते हैं। अचानक आसमानी फासलों में से गुजरता चाँद उस अँधेरे गड्ढे पर एक नीला लिफाफा फेंकता है, जिसमें लिखा संदेश है-''अपनी मुक्ति के रास्ते अकेले में नहीं मिलते। अकेले में तो तुम्हारे अपने व्यक्तित्व के विभिन्न स्तर भी आपस में नहीं जुड़ सकते। उनको जोडऩे के लिए जन-संग-ऊष्मा आवश्यक है। इसलिए जन से तुम प्रेरणा के स्रोत लो, सक्रिय वेदना की ज्योति लो और सब तरह की सहायता लो। तुम्हारी मुक्ति उनके प्रेम से होगी और तद्गत लक्ष्य में से ही तुम्हारे हृदय के नेत्र जागेंगे, उनके जीवन-लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्रिया में ही तुम्हारे अपने गुण उभरकर ऊपर आयेंगे और विकसित होते जायेंगे।“

चाँद से प्राप्त इस संदेश के अनुसार वाचक अपनी मुक्ति का प्रयास करता है, तो अंधेरा गड्ढा बदलने लगता है, अनेक प्रकार के रंग, गंध और सौंदर्य वहां दिखने लगते हैं और कहीं से एक घनी आवाज आती है- ''तुम अकेले नहीं हो। तुम्हारे इस तम-विवर के तट पर विविध देशों से मनस्वी आत्माएं और प्रतिभाएँ पुन: अवतार लेकर पधारी हैं।“ वाचक देखता है कि उसके अकेले स्याह कु_र में कोई बैठा टाइप कर रहा है और टाइपराइटर में से नीली-लाल चिनगारियाँ निकल रही हैं, जिनमें लुमुंबा है, अल्जीरिया है, लाओस है, क्यूबा है। शब्द तेजी से टाइप हो रहे हैं और उन्हें कोई आसमानी हाथ मुद्रित कर रहा है। बाहर बिजलियों की चमचमाहट में एक चपल रिमझिम अँधेरी आत्म-संवादी हवाओं से दमकते प्रश्न करती है- ''मेरे मित्र, कुहरिल गत युगों के अपरिभाषित सिंधु में डूबी जो मानव-पुण्यों की धारा है, मैं उसी के क्षुब्ध काले बादलों को साथ लायी हूँ। लेकिन इनसे मानव-पुण्यों की वर्षा तभी होगी, जब तुम यह तय करोगे कि तुम किस ओर हो। सुनहले ऊध्र्व-आसन के निपीड़क पक्ष में? या कहीं उससे लुटी-टूटी अँधेरी निम्न-कक्षा के पक्ष में? तुम्हारा मन कहाँ है और तुम कहाँ हो? मनुष्य के हृदय में प्राकृतिक रूप से मौजूद मूल मानव-न्याय-संवेदन क्या कभी बहुत बेचैन और व्याकुल होकर तुम्हें उस धारा के तट पर ले गया था? क्या वहाँ उसने तुम्हारे मन और आत्मा को श्वेत चकमक के घने टुकड़े समझकर आपस में तेजी से तड़ातड़ रगड़कर आग पैदा की थी? क्या उस आग के हर अंगार में से एक जीवन-स्वप्न चमका था और ज्ञान तड़पा था?”

इस कविता में महासागर का एक नया और व्यापक वैश्विक रूप सामने आता है। मुक्तिबोध का जीवन-स्वप्न वैश्विक यथार्थ के ज्ञान से निर्मित है और उसका आधार है मनुष्य के हृदय में प्राकृतिक रूप से मौजूद मूल मानव-न्याय-संवेदन, जो उन्हें न्याय के पक्ष में और अन्याय के विरुद्ध खड़ा करता है। इस मूल मानवीय पक्षधरता और प्रतिबद्धता के साथ कविता का वाचक अपने जीवन-स्वप्न में आगे बढ़ता है और उस इतिहास में उतरता है, जिसमें फिरंगी पुर्तगाली, ओलंदेज या अंग्रेज दरियाई लुटेरों के लिए तूफानी समुंदर के बीच बनाये गये रोशनीघर की अँधेरी मीनार है, मीनार के अंदर चक्करदार सीढिय़ाँ हैं और उन सीढिय़ों पर चढ़ते-उतरते वह देखता है कि अनेकों मंजिलों के तंग घेरों में रक्तरंजित इतिहासों की भयानकताएँ मौजूद हैं। लेकिन प्रशोषण-सभ्यता की दुष्टता के भव्य देशों की गरीब जनता उसे अद्यतन ज्ञान, सूचनाएँ और शास्त्र दे जाती है, जिनसे उसका मन सुविकसित हो जाता है। उसके हाथ आ जाते हैं विगत क्षुब्ध सदियों के विविध भाषाओं के और विभिन्न देशों के गं्रथ, पुस्तकें, पत्र और अखबार, जिनमें मगन होकर वह जगत-संवेदनों के भविष्य के सही नक्शे बनाता है।

उसे मालूम है कि अनगिन सागरों के क्षुब्ध कूलों और पहाड़ों-जंगलों में मुक्तिकामी लोक-सेनाएँ शत्रु-मूलों पर भयानक वार कर रही हैं। उनका अग्नि-क्षोभी धुआँ उसके स्याह बालों में उलझता है और चेहरे पर लहरता है। उसे मालूम है कि कैसे विश्व-घटनात्मक सघन वातावरण में विचारों और भावों का कब और कहाँ क्या काम है। वह भारत में है, पर उसे मालूम है कि वह सभी देशों, हवाओं और सागरों पर अनदिखा उड़ता हुआ स्वर है।

'एक स्वप्न-कथा’ का वाचक भी इतिहास के स्याह समुंदर तक जा पहुँचता है। इस समुंदर तक वह पहले भी आ चुका है। वह इसमें पुर्तगीज, ओलंदेज, अंग्रेज आदि विदेशी लुटेरों द्वारा बनाये गये रोशनीघर की सीढिय़ाँ चढ़-उतर चुका है। लेकिन तब वह इसे पूरी तरह समझ नहीं पाया था। इस बार यहाँ आकर वह अपने अतीत और वर्तमान पर विचार करता है, तो स्वयं को एक जय और एक पराजय के बीच की स्थिति में पाता है।

वाचक नयी कविता का प्रगतिशील कवि है। उसने आधुनिक विदेशी साहित्य के अनुसार स्वयं को इतना ढाल लिया है कि उसके अपने विचारों को ही वह विदेशों से लौटा हुआ अपना ऐसा बेटा लगता है, जो पहचान में नहीं आता। उसके विचार उससे कहते हैं- ''तुम हमारे पुत्र हो, लेकिन विदेशों से लौटकर तुम अपने ही घर में इस तरह नये हो गये हो कि अब पहचान में ही नहीं आते! इतने अधिक मौलिक हो गये हो कि असल नहीं लगते।“ और वह सोचता है- ''मेरे ही विचार मुझे इस तरह देखते हैं कि मानो मैं अजीब हूँ। मैं उन्हें कष्टों में, दुख की खोहों में छोड़ कहीं दूर निकल गया। अपने ही आंतरिक आरोहों-अवरोहों में बहता रहा। इसी घपले में उनके कष्ट और दुख दूर करने का निर्णायक क्षण टल गया। दुनिया में और कुछ तो बदला नहीं, मैं ही क्यों इस तरह बदल गया?” नकली नवीनता के कारण ही ऐसा हुआ है, यह सोचकर वह कहता है- ''इसीलिए मेरी ये कविताएँ भयानक हिडिंबा हैं, वास्तव की विस्फारित प्रतिमाएँ हैं, विकृताकृति-बिंबा हैं।“

इस प्रकार वह नये कवि के रूप में तो विजयी हो चुका है, किंतु प्रगतिशील कवि के रूप में पराजित हो गया है। इस निजी जय और पराजय के साथ-साथ वह भारतीय जन की जय और पराजय को भी देखता है। भारत की स्वाधीनता जन की एक विजय-सी है, तो उसके बाद भारत में समाजवादी क्रांति का न हो पाना जन की एक पराजय-सा है। दोनों तरह की पराजय का कारण वह इतिहास में खोजना चाहता है, जो मानो उसके सामने फैला हुआ एक विशाल रहस्यमय स्याह समुंदर है। उस समुंदर में अथाह जल है और उठती-गिरती विक्षुब्ध लहरें हैं। 

वाचक दिन-रात उस रहस्यमय स्याह समुंदर में अवगाहन करता है, किंतु उसे समझ नहीं पाता है। हाँ, जब-तब उसके मन में प्रकाश-सा कुछ कौंधता है और अनेक प्रकार के विचार स्फुरित होते हैं, जिन्हें वह अपनी स्फूर्तियाँ कहता है। उसकी ये स्फूर्तियाँ अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँची हैं, इसलिए अनगढ़ मूर्तियों जैसी हैं, जो स्याह समुंदर की लहरों में नंगी नहाती हैं। वाचक को वे कांतिमान पत्थरों जैसी लगती हैं, जिनसे ज्ञान के प्रकाश की किरणें आती तो हैं, पर वे लगातार अपने कोण बदलती रहती हैं, इसलिए रोज उनका एक नया पहलू सामने आता है और वह कुछ समझ नहीं पाता है। 

यह देखकर उसकी स्फूर्तियों के मुख तमतमा उठते हैं और वह पुन: अपने प्रयास में जुट जाता है। स्याह समुंदर की काली लहरों को अंजलि में भरकर वह देखना चाहता है कि वे क्या हैं? कहाँ से आयी हैं? किस तरह निकली हैं? उनका उद्गम क्या है? स्रोत क्या है? उनका इतिहास क्या है? काले समुंदर की व्याख्या क्या है? उसका भाष्य क्या है? वह इन प्रश्नों के उत्तर पाना चाहता है, लेकिन समुंदर के अथाह पानी में से कुछ मानवीय आकृतियाँ उभरती हैं, जिन्हें देखकर उसे लगता है कि हो सकता है, इस अथाह सागर की थाहों में कई महाद्वीप डूबे हों। हो सकता है, इसमें अतीत की कई सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ डूबी पड़ी हों। इस प्रकार वह इतिहास के जरिये अपने आज के स्थानीय यथार्थ को अब तक के समूचे भूमंडलीय यथार्थ से जोड़कर समझने का प्रयास करता है।

तभी उसका ध्यान जाता है सागर के ऊपर उड़ती असंख्य अपार्थिव पक्षिणियों की ओर, जो अनवरत गा रही हैं, चीख रही हैं, जमाने-जमाने की गहरी शिकायतें कर रही हैं। वे सूरे, आयतें, खूँरेज किस्से और उनसे निकले नतीजे सुना रही हैं। ये अपार्थिव पक्षिणियाँ दुनिया भर की अनैतिहासिक भाववादी विचारधाराएँ हैं, जो इतिहास पर छायी हुई हैं, जबकि प्रगतिशील वाचक ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टि से विश्व-इतिहास को देखता है। वह जानता है कि ये पक्षिणियाँ मानव सभ्यता और संस्कृति के इतिहास की व्याख्या नहीं कर सकतीं, क्योंकि ये अपार्थिव हैं, हवाई हैं। वे वाचक के मन की बात जानकर मानो उसे चुनौती देते हुए कहती हैं। सहस्रों वर्षों से यह सागर यों ही उफनता आया है। यह शाश्वत और सनातन है। तुम ऐसा नहीं मानते, तो स्वयं इसका भाष्य करो। इसकी व्याख्या करो। चाहो तो तुम इसमें डूब मरो और मरकर इसके अतल-निरीक्षण को पूर्ण करो। 

वाचक को याद आता है कि उसके एक ज्ञानी पूर्वज ने किसी रात नदी का पानी काटकर, मंत्र पढ़ते हुए, गहन जल-धारा में गोता लगाया था और अँधेरे जल के तल में पहुँचकर, इधर-उधर खोजकर एक स्निग्ध, गोल-गोल, मनोहर, तेजस्वी शिलाखंड तमोमय जल में से निकालकर उसे देव बनाया था और उसकी पूजा की थी। वह सोचता है- ''उसी तरह संभव है कि मैं भी स्याह समुंदर में गोता लगाऊँ और उसके अतल-तले पड़ा हुआ कोई किरणीला दीप्त पत्थर मुझे भी मिल जाये। ऐसा पत्थर, जो युगानुयुग से आज तक भी स्याह समुंदर के विरुद्ध अपनी आभा की महत्त्वपूर्ण सत्ता का प्रतिनिधित्व करता हो। संभव है कि वह पत्थर मेरा ही नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड की केंद्र-क्रियाओं का तेजस्वी अंश हो। संभव है, उसमें से सभी कुछ दिखता हो, जैसे दूर-दूर देशों में क्या हुआ, क्यों हुआ, किस तरह हुआ, कहाँ हुआ!”

इतने में कोई उसके कानों में कहता है- ''जैसी ज्ञान-मणि तुम पाना चाहते हो, वह बैठे-बिठाये नहीं, मरने से मिलती है। जीवन के जंगल में, अनुभव के नये-नये पहाड़ों के ढालों पर, वेदना के झरने के पहली बार देखे जल-तल में आत्मा मिलती है। सो भी सदा और सर्वत्र नहीं, कभी-कभी और कहीं-कहीं। ज्ञान-मणि राह चलते कहीं पड़ी हुई नहीं मिलती है।“

वाचक सोचता है- ''हाय रे! मेरे ही विचार मेरा अनादर और तिरस्कार करते हैं! मुझ पर अविश्वास करते हैं! क्रोध से तमतमाया उनका चेहरा देखकर मुझे लगता है कि कोई युग-व्यापी बहस छिडऩे वाली है, बेहद जद्दोजहद होने वाली है, बहुत बड़ा परिवर्तन होने वाला है। वातावरण सघन होने ही वाला है और उसके सैकड़ों अंधकारपूर्ण क्षण मुझसे इतनी महान अपेक्षा करते हैं कि मेरे ही अंत:स्थित संवेदन मुझ पर ही झूमकर, कड़ककर, गरजकर बरस पड़ते हैं। उनका वार मुझ पर ही होता है। उनकी बिजली का प्रहार मुझ पर ही होता है, जो मेरा अब तक सोचा-समझा सब कुछ तहस-नहस कर देता है और बहुत बहस करता है।“

वाचक के भीतर स्फुरित होने वाले उसके विचार उस पर व्यंग्य-बाण चलाते हुए उससे कहते हैं- ''तुम क्या हो? और तुम्हारी आत्मा! वाह, उसका क्या कहना! उसका सौंदर्य तो अनिर्वचनीय है! उसके प्राण तो प्रस्तरीय हैं!”उसके विचार उस पर ठहाका मारकर हँसते हैं, लेकिन उसके भीतर सोयी हुई अग्नियों को कुरेदकर जिला देते हैं, उसे गला-घुलाकर दुनिया की किसी दवाई में मिला देते हैं। उसे लगता है कि उनके बोल पत्थरों की बारिश हैं, बहुत पुराने किसी अन-चुकाये कर्ज की खतरनाक नालिश हैं, लेकिन फिर भी वे उसे रास्ता बताते हैं, रिआयत देते हैं, मुरव्वत बरतते हैं! 

वाचक अपने ही विचारों से जूझता है और जूझने का संदर्भ होता है क्षितिज के कोने पर गरजते किसी बवंडर का। संभावित वैश्विक क्रांति का। और उसके विचारों के उस द्वंद्व का साक्षी बनता है अखिल ब्रह्मांड, जिसमें चमचमाता मंगल ग्रह है, पृथ्वी का रत्न-विवर है, उसमें से निकलती हुई एक बलवती जल-धारा है, जो ज्ञान के नये-नये मणि-समूह बहाये लिये जा रही है। जिस तरह ज्ञान के रत्नों की तीव्र दीप्ति लहरों में आग लगा देती है, उसी तरह स्फूर्तिमय भाषा-प्रवाह में भिन्न-भिन्न मर्म-केंद्र जगमगा उठते हैं, जिनमें होते हैं सत्य-वचन, स्वप्नद्रष्टा कवियों के तेजस्वी उद्धरण, संभावी युद्धों के भव्य-क्षण-आलोडऩ और उनके विराट् चित्र, जिनमें भविष्य के संघर्ष और विश्व-क्रांति के दृश्य जगमगा उठते हैं। और जब ऐसा होता है, दुनिया का अँधेरा रोता है। आगामी देवों का ठहाका सुनायी देता है। काले समुंदर की अँधेरी सतह थरथरा उठती है। यदि मन में चलती बहस को बंद करने की कोशिश की जाये, तो मन का दरवाजा करकरा उठता है, विरोध में धड्ड से खुल जाता है और उसका धड़ाका अँधेरी रातों में सुदूर तक गूंजता है। 

वाचक के अपने ही विचार उसे बताते हैं कि भूमंडलीय यथार्थवादी होने के लिए भूमंडलीय यथार्थ को स्वानुभव से स्वायत्त करना आवश्यक है। लेकिन इतिहास के स्याह समुंदर के तट पर बैठकर उसे स्वायत्त नहीं किया जा सकता। उसमें स्वयं उतरना होगा। यह बताते हुए वे उसे उस भयानक समुंदर के बीचोंबीच फेंक देते हैं। वह अपना वर्तमान, भूत और भविष्य त्यागकर, पृथ्वी-रहित और आकाश-रहित होकर, अकेला ही उस भयानक समुद्र की लहरों पर जा गिरता है, जो चिकनी और चमकदार तो हैं, पर काले संगमूसा-सी कठोर भी हैं। उन पर गिरकर वह छटपटाता है। उसके माथे पर लगी चोट से रक्त बहने लगता है। लहरों में जाकर उसका रक्त लाल रेशों की तरह तैरने-सा लगता है। इतने में उसे खयाल आता है कि समुद्र के अतल-तले जो लुप्त महाद्वीप हैं, उनमें पहाड़ भी होंगे ही और उसे उन पहाड़ों की जल-खोहों तक जाना ही होगा। वह उन खोहों तक पहुँच भी जाता है, किंतु अचानक उसे एक कमल-नाल मिल जाती है, जिसके सहारे वह जल-खोहों से ऊपर उठ आता है, लहरों के ऊपर चढ़ आता है और देखता है कि सामने एक काला सहस्रदल कमल उपस्थित है, जिसका रक्त लाल नहीं, काला है।

वाचक की प्रगतिशील चेतना के अनुसार इतिहास के समुंदर से तो क्रांति का लाल सहस्रदल उत्पन्न होना चाहिए। फिर यह काला सहस्रदल क्यों? इसका रक्त काला क्यों? वह समझ जाता है कि यह कोई भ्रामक चीज है। शायद पूँजीवादी दृष्टि से लिखे गये इतिहास का भ्रामक निष्कर्ष है यह स्याह समुंदर पर खिला हुआ काला सहस्रदल। वह सोचता है कि यदि मैं इस कमल की नाल के साथ-साथ चलकर नीचे जल-खोह तक पहुँचूँ, तो संभव है कि मुझे सागर का मूल सत्य मिल जाये। हो सकता है, वहाँ जाकर मैं किसी दुर्घटना में मारा जाऊँ या किसी बूढ़ी विकराल ह्वेल के पंजर (वृद्ध पूँजीवाद के जाल) में फंस जाऊँ, फिर भी मैं अंधी जल-खोहों में जाऊँगा और वहाँ का सर्वेक्षण करूँगा। 

अचानक उसे खयाल आता है कि संगमूसा-सी भयानक लहरों के कई मील नीचे, सागर के तिमिर-तले, एक बृहद् और भव्य नगर है, जहाँ उसे जाना है। इसके लिए उसे पानी की निराकार-तमाकार सतहों से समझौता करना है, अनंत काल तक या मृत्युपर्यंत उसे भयानक लहरों से मित्रता रखते हुए तैरते रहना है। लेकिन इतने में वह देखता है कि सागर की सतह थरथरा उठी है, तर्कों की बहती हुई पंक्तियों जैसी दल पर दल लहरें दाँत पीसती-सी दिखायी पड़ रही हैं, और वे दौड़ती हुई जिस सीमा पर जाकर खो-सी जाती हैं, वहीं एक पीली, भूरी-सी और गीली-सी धुंध फैली है, मानो वह मद्धम उजाले का मटमैला बादली परदा हो और उसके प्रसार पर दिक्काल दृश्यों के जुलूस चल पड़े हों। 

कई मील मोटी जल-परतों के नीचे के विचित्र दृश्य देखकर वाचक स्तब्ध रह जाता है। उन दृश्यों में फुसफुसे पहाड़ों-सी पुरुष-आकृतियाँ हैं, भुसभुसे टीलों-सी नारी-प्रकृतियाँ हैं, जिनके अलग-अलग तरह के चेहरे अजीब हैं। उन्हें जानना मुश्किल है, पर उनमें से कई चेहरे जाने-पहचाने-से लगते हैं। वहाँ डूबे हुए शहर के सैकड़ों कमरों में गहरी हलचलें हैं, जिनकी कुछ झाइयाँ सिहरती-सी ऊपर आती हैं और साफ-साफ दिखती हैं। अकस्मात् उसे ज्ञात होता है कि अकेला वही नहीं, अन्य अनेक जन भी दुखों के द्रोहपूर्ण और दीप्तिमान ज्ञानात्मक शिखरों पर चढ़कर उन विराट् दृश्यों को देख रहे हैं और उन शिखरों जैसा ही एक भयानक आकार का देव अनंत चिंता से ग्रस्त होकर उन दृश्यों का विदारक समीक्षण-सर्वेक्षण कर रहा है। वह पूँजीवादी दृष्टि से लिखे गये पुराने इतिहास के ऊपर खड़ा क्रांतिकारी दृष्टि से लिखा गया नया विश्व-इतिहास है। 

वाचक पूँजीवादी दृष्टि से लिखे गये इतिहास की इस हकीकत को जानकर उस स्याह समुंदर की ऊँची तरंगों में उठता-गिरता दूर तक नजर फेंकता है, तो देखता है कि क्रांतिकारी दृष्टि से लिखे गये विश्व-इतिहास का वह पर्वताकार देव समुंदर की थाहों में पैर टिकाकर उठ खड़ा हुआ है। वह इतना ऊँचा है कि समुंदर का पानी सिर्फ उसके घुटनों तक है और पर्वत-सा उसका मुखमंडल आसमान छू रहा है। उसके कंधों पर असंख्य ग्रह-नक्षत्र चमक रहे हैं और एक ओर कंदील-सा चाँद भी लटक रहा है। सभी ओर मद्धम प्रकाश-रहस्य फैला है। 

वाचक के एक ज्ञानी पूर्वज ने अँधेरे जल के तल में पहुँचकर एक तेजस्वी शिलाखंड खोजा था, उसे देव बनाया था और उसकी पूजा की थी। उस पूर्वज ने उसे विश्व की व्यवस्था के सारे रहस्य बता सकने वाला ईश्वर माना था। वाचक ने यह भूमंडलीय इतिहास देव खोजा है, जिसका स्याह चट्टानी चेहरा नाजुक और सख्त है, पर धुँधला-सा है। भूमंडलीय इतिहास देव उसे वर्तमान विश्व-व्यवस्था का रहस्य बताता है- ''कितनी ही गर्वमयी सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ डूब गयीं। शोषण की अतिमात्रा, स्वार्थों की सुख-यात्रा, जब-जब संपन्न हुई, आत्मा से अर्थ गया और सभ्यता मर गयी। भीतर की मोरियाँ अकस्मात् खुल गयीं। जल की मलिन सतह ऊँची होती गयी और अंदर के सूराख से, अपने उस पाप से, शहर के सब टॉवर डूब गये, सब मीनारें डूब गयीं। उनके ऊपर लहराता हुआ यह काला समुंदर ही रह गया।“

ग्लानि उत्पन्न करने वाले इतिहास के उस सागर में वाचक को भयानक थरथराहट महसूस होती है और उसे गश आ जाता है। विलक्षण-से स्पर्शों की अपरिचित पीड़ा में उसका परिप्रेक्ष्य गहरा जाता है और उसमें अँधेरा ही अँधेरा नजर आता है। उसी अँधेरे में उसे कोई व्यक्ति, शायद क्रांतिकारी चेतना जगाने वाला जन, हाथ में एक रहस्यमय लालटेन लिये, नंगे पाँव, लगातार तेज चलता हुआ और उसे ढूँढ़ता हुआ नजर आता है, जिसे देख उसकी भीतरी ग्रंथियाँ और बाहरी समस्याएँ चीख-चीख उठती हैं। अकस्मात् वह देखता है कि काले समुंदर के बीच एक चट्टान पर एक टूटा-फूटा बुर्ज खड़ा है, जो सूनी हवाओं को लगातार सूँघ रहा है। दरअसल वह एक रोशनी की मीनार (रोशनीघर) है, जिसमें रोशनी नहीं है। मीनार खूब ऊँची है, पर वीरान है। वह समझ जाता है कि यह मीनार पुर्तगीज, ओलंदेज आदि फिरंगी लुटेरों ने बनायी थी। तब उस पर चढ़कर रात में चलने वाले जहाजों के लिए रोशनी की जाती थी, पर अब अँधेरा उस पर चढ़कर न जाने क्या गाता रहता है। वह अँधेरा वाचक को डराता है। लेकिन वह समझ जाता है कि ''हो न हो, इस काले सागर का सुदूर-स्थित पश्चिम-किनारे से जरूर कुछ नाता है। इसीलिए हमारे पास सुख नहीं आता है।“ 

इस प्रकार वह भारतीय यथार्थ को वैश्विक यथार्थ से जोड़कर मानो पूँजीवादी भूमंडलीकरण वाली वैश्विक व्यवस्था को जान लेता है। तभी अकस्मात् उसे समुद्री अँधेरे में जगमगाते अनगिनत तारों के उपनिवेश-सा विभिन्न प्रकार के दीपों की अनगिनत पाँतों का रहस्य-दृश्य अपनी ओर तैरता आता-सा दिखायी देता है। वह एक समुद्री जहाज है, जो चारों ओर के घने अँधेरे में दूर-दूर तक सर्च-लाइट फेंककर उछलती लहरों पर कुछ ढूँढ़ता-सा लगता है। वाचक को लगता है कि मानो उसने स्याह समुंदर का रहस्य जान लिया है और इसीलिए वह उसमें डूब जाने के बजाय उसकी लहरों पर एक ल_े-सा उठ-गिर रहा है। अचानक जहाज की सर्च-लाइट की रोशनी की एक चमकती चादर-सी उसके सब अंगों पर फैल जाती है। वह समझ जाता है कि वह जहाज क्षोभ और विद्रोह से भरे संगठित विरोध का साहसी समाज है। भीतर और बाहर के, अर्थात् स्थानीय और भूमंडलीय व्यवस्था के, पूरे दलिद्दर से मुक्ति की तलाश में वह आगामी कल नहीं, बल्कि आया हुआ आज है।

मुक्तिबोध के इस महान मुक्ति-स्वप्न को देखने, जानने और समझने के लिए उनकी कविता के महासागरों तक पहुँचना, उनमें उतरना, उनमें अवगाहन करना जरूरी है।