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Saturday 18 Nov 2017

काम के बाद-1, 2

काम के बाद-1
काम के बाद
छुट्टी में
बर्फ हो जाता है
मन।
सर्दी में आफिस
अंधेरा औंधा रहा हो
बेमौसम फूलों पर।
शहर की दीवारों पर
थपेड़े मारती हवा
चेहरा जर्द
पथरा गए हैं पैर।
सुबह सुबह कोहरे में
ठोकरे खा रहा हूं।
सर्दी में ऑफिस
कोई निर्णायक समय
तय करना होता है
आप बाहर जा रहे हैं
या लौट रहे हैं
सोचो जब अंधेरा परछाई हो जाता है।
कारण बुनते हैं राग और तराने
जैसे असुरक्षित बच्चे
क्या हम एक कोट में अस्तर लगा सकते हैं
बेफिक्री से
सहनशीलता के कफन से
छनी तराशी हुई
पहचान बना सकते हैं।

काम के बाद -2
उन्हीं सड़कों पर
अवरोध उठा लिए गए हैं
जैसे
चार चार जीवन जी लिए हों साथ-साथ
हवा ने कब्रगाह पर लिखे नाम
पोंछ दिए हैं
धूल में छिप गए हैं रास्ते
लेकिन भावनाएं अनुभव
कहानियां नाम और प्रार्थनाएँ
जंगली आग की तरह
धधकते हैं दिल में
रामनामी जमते पाखंडी
पारिवारिक दुश्मन हो गए हैं
दूसरी सड़क
दूसरा धर्म।
पर
हमें
सच्चा आत्मोत्सर्ग चाहिए
भीड़ मां नहीं हो सकती
पुतले विश्वास अर्जित नहीं कर सकते
महत्वपूर्ण सवाल बलाएताक
महत्वहीन सवाल बनाए रखना चाहते हैं
राजा भी दुधारी तलवार रखते थे
पर शब्दों की नहीं
हे ईश्वर
हमें दुधारे शब्दों से बचा।

(अनुवाद- रजनीकांत शर्मा
26 बंजारा हिल्स, मीनाक्षी चौक, होशंगाबाद-461001 (म.प्र.), मो. 9977196471)