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Saturday 18 Nov 2017

अपेक्षाएं प्रश्नों से

अपेक्षाएं प्रश्नों से

तेरे राज में हम
पानी को तरस रहे हैं
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

अगले पड़ाव पर भी
हम सब मत रच रहे हैं
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

भावों में मरुभूमि है
जीवन रस से दूर है
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

कलुषित सा जीवन भी
महक से बहुत दूर है
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

विपदाएं हैं जीवन में
संकट चहुं ओर हैं
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

न पथ है न संगी
हरियाली का अभाव है
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

अटका है नभ का जल
अविरल धार का अभाव है
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

जीवन अन्तमय सा है
निरन्तरता की दशा दुर्लभ है
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

पानी मांग रहा हूं
गुड़ का भी अभाव है
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

बीज भी बन्धक हैं
खेतों का पथ अवरुद्ध है
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

बुआनी हो न पाई
उपज भी अब अलोप है
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

तपन तो कण्ठ तक है
लबालब का परिदृश्य है
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

डालों के संधि स्थल पर
तलवारें लटक गई हैं
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

दिये के तेल का आर्त स्वर
शांत है अभावों के संग
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

दाम न था कटि में
भूखा संज्ञाहीन हो गया
फिर ये नेता क्यूं चहक रहे हैं।

(प्रेमन, बी-201, सर्वधर्म, कोलार रोड
भोपाल-462042, फोन- 0755-2493840)