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Saturday 18 Nov 2017

फेस-बुक पर कविता

फेस-बुक पर कविता

कविता
अब पढ़ी नहीं
देखी जाती है

इसीलिए कविता भी जब-तब
अपने को आईने में निहारा करती है
जब खो जाती है
तो $खुद को ढूंढती है
कई-कई घंटे 'फेस -बुक में।'

संख्या पाने की कोशिश

कुछ साल पहले
हम बच्चे खेला करते थे
लोगों को छूने का इक खेल
सबसे अधिक लोगों को जिसने छुआ
वो विजयी हुआ

आज 'फेस-बुक' पर देख रहा हूं
वैसा ही इक खेल
अधिक से अधिक संख्या पाने की कोशिश में
न जाने कितने चेहरे हो रहे हैं नंगे
पर हम बच्चे तो नंगे नहीं होते थे?