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Tuesday 23 Jan 2018

ज़ेहन में राह की तस्वीर उभर जाती है

 
 
                (1)
ज़ेहन में राह की तस्वीर उभर जाती है
जब मिरी पांव के छालों पे नज़र जाती है!!
 
जाने क्या सहर है अन्दाज़े  बयां में उसके
उसकी हर बात मेरे दिल में उतर जाती है!!
 
आईना मुझको हक़ीकत न दिखा रहने दे
मेरी सूरत मेरी तस्वीर से डर जाती है!!
 
जब गुजरती है ये पुरवा मिरे बागीचे से 
आम के बौर की खुशबू सी बिखर जाती है!!
 
ये अना भूख के खंजर से ज़रूरी तो नहीं
गर्दिशे वक़्त से घबरा के भी मर जाती है!!
 
उसकी तदबीर से मिस्दा$क मेरा क्या होगा
उसकी तदबीर से त$कदीर संवर जाती है!! 
 
               (2)
फिर गये राहे वफा तुम भूल क्या
झोंक दी आंखों में उसने धूल क्या!!
 
मुख्तसर है ही जो मिस्ले ज़िंदगी
उस फसाने को भी देगा तूल क्या!!
 
बाद मेरे उनकी गलियों के तमाम
हो गये पत्थर अचानक फूल क्या!!
 
मिल गये हैं खार ज़ारो की जगह 
आपको राहे वफा में फूल क्या!!
 
रोटियां जिनकी जरूरत है उन्हें
बांटने निकले हो तुम त्रिशूल क्या!!
 
मरसिये जैसी हमारे ये गक़ाल
हो गई मिस्दाक फिर मकबूल क्या!!
 
              (3)
मैं अपने कारवां से बदगुमां हूं
मगर अफसोस मीरे कारवां हूं!!
 
मैं सुन सकता हूं कह सकता नहीं कुछ
तुम्हें कैसे पता मैं बेजुबां हूं!!
 
खबर फूलों को क्या कांटों को भी है
मैं सदियों से वकारे गुलसितां हूं!!
 
कभी फुरसत मिले तुमको तो पढऩा
मैं अपने आप में इक दास्तां हूं!!
 
मुझे तुम देखना चाहो तो देखो
मैं पोशीदा नहीं बिलकुल अयां हूं!!
 
परेशां खुद कई सालों से हूं मैं
पता चलता नहीं के मैं कहां हूं!!