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Saturday 18 Nov 2017

एक प्रतिबद्ध शायर के शेरों की चमक

याकूब राही उर्दू साहित्य के एक ऐसे प्रतिबद्ध शायर हैं- जो न तरक्की-पसंदी की रेवड़ में शामिल हुए और न आधुनिकता (जदीदियत) के शोर में गुम। बी.ए. पास करने के बाद, वर्ष1966 में अपने गाँव से मायानगरी मुँबई में बसने आए राही साहब ने शायद ही कभी फिल्मी गीत लिखने जैसा स्वप्न मन में पाला हो। मुशायरेबाज़ शायरी से उन्होंने हमेशा परहेज़ किया। बरसों-बरस मुँबई में रहने के बावजूद, न याकूब राही मास मीडिया के हाथों का खिलौना बने और न ही कभी उन्होंने उत्तर-आधुनिक उर्दू शायरों की फेहरिस्त में अपना नाम चस्पा करने की कोशिश की।

अभी पिछले महीने 10 जून 2017 को शायर याकूब राही ने अपनी आयु के पचहत्तरवें यानी हीरक जयंती वर्ष में प्रवेश किया है। लेकिन, 10 जून 2018 को बहुत धूमधाम से उनकी हीरक जयंती का जश्न मने, ऐसा उन्होंने सोचा भी नहीं होगा। प्रदर्शन-प्रियता उनके मिज़ाज में ही नहीं। शायर याकूब राही के नज़दीक जीवन नाम है निरंतर संघर्ष का, इं$िकलाबी परिवर्तन का, सामाजिक, आर्थिक और साँस्कृतिक असमानताओं को समाप्त कर इंसान को इंसान समझने का। जि़न्दगी के मोर्चे पर वे अंतिम क्षण तक लडऩे के हिमायती हैं। उनका यह शेर इसी सोच की तस्दीक करता है-

ये लाज़मी नहीं कि सभी तीर हों $खता,

फेंकी है अपने हाथ से तूने कमान क्यों?

       शायरी याकूब राही के लिए क्राँतिकारी संघर्ष के साथ एक जि़न्दा और निरंतर चलने वाले 'कमिटमेन्ट'.... एक अविरल 'मिशन' का हिस्सा भी है। राही अपने 'मिशन' के तहत, शब्द-दर-शब्द अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को प्रकट करते चलते हैं। उनको उन लोगों की पहचान है, जो 'यूज़ एंड थ्रो' सिद्धांत के अंतर्गत जीते रहते हैं। उनका यह विद्रोही शेर शायद इसी बात की पुष्टि करता है-

जब कत्ल करने निकले हो तुम मेरी रूह को,

फिर मैं तुम्हारे हाथ की तलवार क्यों बनूँ!

याकूब साहब का जीवन-संघर्ष बहुत लंबा और अनथक रहा। 10 जून, 1943 को राही कोंकण क्षेत्र के गाँव साई (जि़ला रायगढ़, महाराष्ट्र) के एक निम्न मध्यम-वर्गीय मुस्लिम परिवार में जन्मे। डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर महाविद्यालय, महाड से बी.ए. की डिग्री प्राप्त करने के बाद, वर्ष1966 में याकूब मुँबई इसलिए आ गए कि कोई काम-धंधा कर सकें। एम.ए. और बी.एड की डिग्रियाँ राही ने छोटी-मोटी नौकरियाँ करते हुए मुँबई में ही हासिल कीं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1970 में डॉ. आली ज़ाफरी के निर्देशन में याकूब राही ने 'उर्दू नज़्म-आज़ादी के बाद' विषय ले कर पीएचडी के लिए अपना नाम दर्ज करवाया। लेकिन, जब उन्हें पीएचडी की डिग्री कारोबारी और पेशावराना ज़रूरत लगी, तो उन्होंने पीएचडी करने का विचार ही त्याग दिया। याकूब राही को न माँगे का उजाला पसंद है, न शोहरत के बाज़ारी साधन। वे प्राय: वही कहते और करते हैं, जो उन्होंने $खुद देखा, महसूस किया और सच समझा। आज धर्म और संस्कृति के नाम पर देश भर में फासिस्ट ताकतें जगह-जगह अपना सिर उठा रही हैं, चीन्ह-चीन्ह कर दरवाज़ों पर दस्तकें दे रही हैं, अपने-अपने मा$िफया के बल पर अपनी-अपनी सियासी और समाजी पकड़ मज़बूत कर रही हैं, ऐसे नाजुक हालात में याकूब राही जैसे प्रतिबद्ध शायर, अपने 'कमिटमेन्ट' से कैसे किनाराकशी कर सकते हैं? डरे-सहमे अंतिम आदमी की बेचारगी देख कर राही बेसा$ख्ता कह उठते हैं-

सारी दुनिया खुली नुमाइश है/सब्रे-बेबस की आज़माइश है।

आए तो इंक़िलाब क्यों आए/कोई संघर्ष है न कोशिश है!

प्रतिबद्ध शायर होने के बावजूद, याकूब राही अदब को कला व सौन्दर्य की कसौटी पर भी पूरा उतरने के हामी हैं। वे गज़ल और नज़्म दोनों के मामले में मिजाज़न संक्षिप्ततावादी (इख्तेसार-पसंद) हैं। उनकी गज़लें तीन, चार, अधिक से अधिक पाँच शेरों से आगे नहीं जातीं। तूल कलामी को ले कर अक्सर वे मोईन अहसन जज़्बी का एक मतला सुनाया करते हैं-

यहाँ है तूल कलामी-ए-नस्र का सिक्का,

यहाँ मेरे सुखन-ए-मुख्तसर की कीमत क्या?

       बीती बीसवीं सदी को याद करते हुए याकूब राही कहते हैं- 'इसी सदी में भारत नवनिर्माण के हसीन ख्वाबों के साथ आज़ाद भी हुआ और अब धीरे-धीरे पाश-पाश ख्वाबों की खलिश बन कर एक बार फिर अनोखी आर्थिक गुलामी, राजनैतिक माफ़ियागर्दी , मज़हबी और साँस्कृतिक फासिज़्म के शिकंजों में जकड़ता ही जा रहा है। मेरी शायरी इसी भारत के घायल, लेकिन, संवेदनशील हृदय की आवाज़ है!'

 'भूले-बिसरे शायर' स्तंभ के अंतर्गत याकूब राही जैसे खरे और सच्चे शायर की गज़लों और नज़्मों को एक साथ पढऩा उन्हें हीरक जयंती वर्ष में सम्मिलित रूप से बधाई और शुभकामना देने जैसा होगा। याकूब राही जैसे विरल शायर आज हमारी जीवित धरोहर भी हैं!