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Wednesday 20 Sep 2017

याकूब राही की नज़्में

ये कैसे लोग हैं?

अपने लिए जीते हैं, अपने आप में गुम हैं

कोई जज़्बा, कोई ख्वाहिश

रगो-पै में उभर आए तो उसके सर्द होने तक

उसी की आग में जलते-जलाते हैं

सभी कुछ करते रहते हैं

मगर, बस अपनी खातिर, अपनी ही तस्कीन की $खातिर

ये कैसे लोग हैं?

बेशर्म लगते हैं, बड़े बेशर्म, बेगैरत

न जैसे आत्मा जि़न्दा

न ही परमात्मा जि़न्दा!

कुछ इस जीने के बारे में

कभी कोई दिन

अपने बारे में सोचो

कि तुम कौन हो? और क्यों जी रहे हो?

तो हर बार ऐसा लगेगा

कि तुम.......बेबसी को मुक़ददर समझने लगे हो

न म$कसद है कोई, न ही सरकशी की जसारत है कोई

न इमकाने-रौशन की खातिर

जिहादे-मुसलसल का जज़्बा ही कोई

वही रात-दिन घर से घर तक स$फर है

कि जीना भी जैसे यही मोतबर है

अगर जि़ंदगी

वाकई बस यही है- तो जीने पे थू......

ऐसे जीने पे थू......!

अब सोचता हूँ

ज़रूरी नहीं है

कि तुम

मेरी बस्ती जलाने को निकलो

तो मैं...

बुज़दिलों, मसलहत-कोश लोगों की सूरत

किसी और महफूज़-सी छत की उम्मीद में घर से भागूँ

कि मैं अपनी बस्ती जलाने उठे

हाथ ही काट देने की

अब सोचता हूँ!

आग

खुश्क जंगल में

लगी आग

कहाँ रोक सका कोई

कि तुम रोक सको?

कुछ इस जमूद के बारे में

लग रहा है

कि एक मुद्दत से

वक्त अपनी जगह पे ठहरा है

इन्क़िलाबो पे जैसे

पहरा है!

इम्कान

अपनी ताबीर के सहरा में

जले ख्वाबों की इस राख को तुम

राख का ढेर ही क्यों कहते हो?

बढ़के इस राख के सीने में उतरकर ढूँढो

इसका इम्कान है

तुम राख के इस ढेर में भी

चन्द चिंगारियाँ

रह-रह के दमकती देखो

और शायद तुमको

फिर से जीने का बहाना मिल जाए।

 

शब्दार्थ: 1. तस्कीन=इच्छा की तृप्ति 2. इमकाने-रौशन=उज्ज्वल भविष्य 3. मसलहत-कोश=कूटनीतिज्ञ 4. इम्कान=संभावना