Monthly Magzine
Monday 16 Oct 2017

 

ठा.लक्ष्मण सिंह चौहान (जन्म 1894-मृत्यु 1953) का यह नाटक 1924 में प्रताप प्रेस, कानपुर से प्रकाशित हुआ है। श्री कांतिकुमार जैन के सौजन्य से यह हमें प्राप्त हुआ है। इस नाटक में अंग्रेजों की फूट डालो व राज करो की कुटिल नीति का अचूक वर्णन नाटककार ने किया है। कांतिकुमार जी ने दैनिक देशबन्धु में 11 जून को प्रकाशित एक लेख में इसे हिन्दी का पहला राजनीतिक नाटक कहा है। उनके मुताबिक इस नाटक में मंदिर-मस्जिद विवाद का हल भी है, जो 1924 में ही लक्ष्मण सिंह जी ने सुझा दिया था। इसी लेख में श्री चौहान द्वारा लिखे गए एक अन्य नाटक एक ही समाधि में का भी जिक्र है, जिसका मुख्य पात्र रहमत, रामचन्दरजी की अयोध्या में पैदा होना बड़े गर्व की बात मानता है। स्वतंत्रता की 70 वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में यह नाटक पाठकों के लिए प्रस्तुत है। -संपादक

  • निवेदन
    आज हम हिन्दी संसार के सामने प्रताप पत्र पुष्प की प्रथम पुस्तक एक छोटे किंतु मौलिक नाटक के रूप में रख रहे हैं। हिन्दी साहित्य में मौलिक नाटकों का अभाव है। हम मौलिक कृतियों के अभाव में अपने नाट्य साहित्य में इस भारी कमी का अनुभव करते हैं। यह नाटक उस असहयोग आंदोलन का एक जीता-जागता चित्र है, जिसने देश के राजनैतिक जीवन में एकदम युगांतर उत्पन्न कर दिया। नौकरशाही ने खुशामदी लोगों से मिल कर क्रिमिनल ला आदि दमनकारी कानूनों के कैसे-कैसे जाल रचे थे, वीर और साहसी देशभक्तों द्वारा ये जाल किस निर्भीकता के साथ तोड़े गए थे, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के हृदय में महात्मा गांधी की कैसी विलक्षण धाक जम रही थी, इन सब बातों का वर्णन इस नाटक में विशद और मार्मिक भाषा में किया गया है। नाटक के सुयोग्य लेखक ठाकुर लक्ष्मण सिंह (बीए, एलएलबी) मध्यप्रदेश प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के मंत्री हैं। वे सिद्धहस्त लेखक हैं। जब वे पढ़ते थे, तभी, उन्होंने कुली-प्रथा नाम का प्रसिद्ध नाटक लिखा था, जो प्रताप में छपा था और पुस्तकाकार निकलने पर जिसे सरकार ने जब्त कर लिया था। इस नाटक की भाषा शैली इतनी हृदयग्राही और सरल है कि साधारण पढ़े-लिखे लोग भी इसे भली-भांति समझ सकेेंगे। पुस्तक को एक बार आरंभ से लेकर अंत तक पढ़ लेने से देश की वर्तमान दशा और युगांतकारी असहयोग आंदोलन का रूप चित्र की तरह हृदय पर खिंच जाता है। अन्य प्रांतीय भाषाओं से अनुवादित नाटकों को रंगमंच पर खेलने में बड़ी असुविधा होती है। यदि यह नाटक इस कमी की कुछ भी पूर्ति कर सका तो हम इस परिश्रम को सफल समझेंगे।   -सुरेन्द्र शर्मा, मुद्रक तथा प्रकाशक, प्रताप प्रेस, कानपुर (प्रताप पत्र-पुष्प की प्रथम पुस्तक)

     

     

     -------------------------------------------------------------------------------------------------------------

     

    नाटक के पात्र
    (पुरुष)
    श्रीधर- सरकारी मिनिस्टर (मंत्री)
    रामानुज- श्रीरामनगर जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री
    गोपाल- श्रीधर का नौकर
    ओझा जी- एक ज्योतिषी
    सर हेनरी कुक- गवर्नर
    अहमद- 15 वर्ष का असहयोगी मुसलमान बालक
    राय आनंदीप्रसाद- जमींदार और आनरेरी मजिस्ट्रेट
    मोहन- कांग्रेस कमेटी का स्वयंसेवक
    सुम्मन- राय साहब का छोटा लड़का
    जेलर, वार्डर, पुलिस के सिपाही तथा यूरोपियन अफसर, पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट, कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ता आदि।
    (स्त्री)
    शशि- श्रीधर की पत्नी
    उर्मिला- शशि की सखी, रायसाहब की भान्जी तथा रामानुज की प्रेमिका
    मामी- रायसाहब आनंदी प्रसाद की स्त्री तथा
    उर्मिला की मामी
    प्रथम दृश्य
    (श्रीधर अपने कमरे में एक ऐसी कुर्सी पर बैठा है, जिसका पुरानापन मालिक की गरीबी सूचित करता है। कुर्सी के सामने टेबल है। उस पर कुछ पुस्तकें रखी हैं, जिन पर धूल जमी है, एक फटा हुआ ब्लाटिंग पेपर भी पड़ा है; गंदी सी दवात और एक कलम भी है, जिसकी निब बहुत घिसी हुई है। पास ही एक आलमारी है, जिसके दरवाजे के शीशे टूट गये हैं, अतएव बिना दरवाज़ा खोले ही पुस्तकें निकालीं और रखी जा सकती हैं। आलमारी का दरवाज़ा बन्द है और उसमें जो पुस्तकें रखी हैं वे जमी हुई नहीं दिखतीं। कुछ दाहिनी ओर झुकी हैं , कुछ बाईं ओर झुकी हैं और कुछ बीच ही में एक-दूसरे के सहारे खड़ी हैं। कमरे में दाहिनी ओर खूंटियों पर श्रीधर के कपड़े टंगे हैं,- कोट, कमीज़ , फेल्ट कैप दो-तीन कालर और चार नेकटाइयां। नीचे कोने में फुल-बूट, बूट और फुल स्लीपर रखे हैं। ये कपड़े और जूते खूब कीमती, साफ और सुथरे हैं। उन पर गर्व की एक झलक मालूम होती है, मानो वे कमरे की गरीबी के भाव को दूर करने का प्रयत्न कर रहे हों। श्रीधर बाहर के दरवाजे की ओर पीठ कर के बैठा है और उसका मुंह है दाहिने दरवाजे की ओर, जहां परदा हटाए श्रीधर की पत्नी शशि खड़ी है। उसके चेहरे से मालूम होता है कि बातें कुछ तीखी सी हो रही हैं। श्रीधर कुछ लापरवाह किन्तु उदास है।)
    शशि (झुंझलाकर)-आखिर यह हालत कब तक रहेगी? तुम्हारे इम्तिहान का रिज़ल्ट अभी तक नहीं आया और न जाने कब आये। आज कल करते-करते तो न जाने कितने दिन बीत गए! और नतीजा भी न जाने क्या हो!
    श्रीधर (गम्भीरता से)-अब नतीजा क्या मेरे हाथ में है? (हँसते हुए) भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन', समझी?
    शशि- मैं श्रीकृष्ण की बात तो नहीं समझी, पर रोज़-रोज़ जो कुछ घर में होता है वह मैं ही समझती हूँ। तुम तो इस कमरे में बैठे रहते हो, बहुत हुआ तो बाहर चले गए।
    श्रीधर (हँसने का प्रयत्न करके)-मैं जानता हूँ। मेरी बजाय तूने वकालत का इम्तिहान दिया होता तो ज़्यादा अच्छा होता।
    शशि (चिढ़कर)-बड़े भैया की बातें सुनते तो यह हँसी नहीं सूझती। (उदासी से) घर में पैसे-पैसे की इतनी तंगी है।
    श्रीधर-तंगी तो ऐसी नहीं है कि इतनी उदासी के स्वर में बोला जावे। उद्गारों का यह अपव्यय अच्छा नहीं! बड़े घर की बेटी हो, इसलिए तुम्हें यहां पर ज़रूरत से ज़्यादा तंगी मालूम होती होगी।
    शशि-बड़ा घर और छोटा घर तो मैं नहीं कहती, पर रिजल्ट आने के बाद भी वकालत शुरू करने में बहुत दिन लगेंगे। तब तक के लिए कहीं नौकरी ही कर लो तो अच्छा हो। कहीं तलाश कर देखो न?
    श्रीधर-फिर वही बात कही? अभी नौकरी तलाश करने में कितनी अड़चन कितनी शर्म है, यह मैं बता चुका हूँ। पर तू विश्वास रख, मैंने धन कमाने का निश्चय कर लिया है, ईमानदारी से, और बेईमानी से भी।
    शशि-परमात्मा तुम्हें बेईमानी से बचावे! पर निश्चय करके बैठे रहने से क्या होता है ?
    श्रीधर-(गम्भीरता से)-क्या तू सोचती है, मुझे चिंता नहीं है? मैं स्वयं व्याकुल हूं। मैं महत्वाकांक्षी हूं और वह महत्वाकांक्षा मेरी व्याकुलता को और भी बढ़ा रही है। उसमें तू शान्ति देने की अपेक्षा अशान्ति ही उत्पन्न करती है।
    शशि (परदे के पीछे हटती हुई)-वे रामानुज आ रहे हैं।
    (रामानुज भीतर आता है। वह श्रीधर का सहपाठी और बचपन से मित्र है। उसके प्रवेश करने के ढंग से और चेहरे से मालूम होता है कि श्रीधर से उसकी बहुत घनिष्ठता है। परन्तु शशि बड़े घर की लड़की होने के कारण रामानुज से थोड़ा परदा करती है।)
    रामानुज (प्रवेश करते ही)-क्यों भाई, कोई खबर?
    श्रीधर (मुड़कर)-आओ। अभी तक तो कोई खबर नहीं। बैठो। (पास एक कुर्सी खिसका देता है)
    रामानुज (कुर्सी पर बैठकर)- मैं तो इसी आशा से आया था। विचित्र दशा है। उत्सुकता का कोई कारण नहीं फिर भी उत्सुकता बनी ही है।
    श्रीधर-क्यों उत्सुकता क्यों न हो ?
    रामानुज-महात्मा गांधी ने असहयोग की आवाज़ उठाई है। मुझे उनकी एक-एक बात जंच गई। मैं तुमसे पहले भी कहा करता था वकालत कैसे निभेगी। उसमें बहुत बेईमानी करनी पड़ती है।
    श्रीधर-मैंने तो निश्चय लिया है, मैं वकालत करूंगा। गरीबी में देशभक्ति नहीं होता।
    रामानुज-तुम्हारी इच्छा! मुझे तो दिखता है कि गांधी जी का आंदोलन बढ़ेगा। कांग्रेस असहयोग का प्रस्ताव अवश्य स्वीकार कर लेगी।
    श्रीधर-मुझे तो आशा नहीं। कांग्रेस के अधिकांश नेता वकील हैं। (मुस्कुरा कर) वे असहयोग का प्रस्ताव पास होने देंगे ?
    रामानुज-अकेले नेता क्या करेंगे? जनता तो महात्मा गांधी के पक्ष में है।
    श्रीधर (टाल कर)-पर, यह बतलाओ, खाने कमाने का क्या प्रबंध करोगे? कुछ सम्पत्ति तो है नहीं।
    रामानुज (तुच्छता की हँसी से)- जो बी.ए. और एल.एल.बी. तक पढ़ा हो, क्या वह खाने के लिए कमा नहीं सकेगा? पर यह कहो, जब एल.एल.बी. के खाने कमाने की बात कही जाती है तब बंगले और मोटर पर दृष्टि रहती है।
    (बाहर से आवाज़ आती है) बाबू जी, तार!
    (रामानुज और श्रीधर दौड़ कर दरवाजे पर जाते हैं। श्रीधर तार लेकर फाड़ता है और पढ़ता है)
    श्रीधर (प्रसन्नता से)- ''बधाई तुम और रामानुज पास, मैं भी-हरीश।"
    (श्रीधर तार की रसीद पर कलम उठा कर हस्ताक्षर कर देता है और तार वाले को एक चवन्नी देता है। तार वाला अभिवादन करके चला जाता है।)
    श्रीधर-रामानुज, ज़रा ठहरो, घर में खबर कर आऊं।
    (श्रीधर घर के अंदर जाता है। रामानुज सफलता पर अत्यन्त प्रसन्न है। इतने में मोहल्ले का एक आदमी गोपाल आता है)
    गोपाल-क्यों भैया, तार कैसा है? सब कुशल तो है?
    रामानुज-श्रीधर और हम, दोनों वकालत पास हो गए।
    गोपाल-चलो भैया बड़ी तकदीर। क्यों भैया, अब श्रीधर भैया छोटे साहब तो हो सकते हैं?
    रामानुज-हाँ।
    गोपाल-और निसपिट्टर?
    रामानुज (कुतूहल-पूर्वक)-अरे इन्स्पेक्टर तो छोटे साहब से छोटा होता है।
    गोपाल (कुछ उदासी से)- और बड़े साहब भी नहीं हो सकते। वे तो अंग्रेज़ ही होते हैं और श्रीधर भैया उतने गोरे भी तो नहीं हैं।
    रामानुज-हां।
    गोपाल (संतोष से)-चलो, छोटे साहब भी कुछ बुरे नहीं। मेरी तो बहुत दिन से साध थी कि श्रीधर भैया छोटे साहब बनें और मैं उनका चपरासी बनूं।
    रामानुज-तुम चपरासी बनना क्यों चाहते हो ?
    गोपाल (बुद्धिमानी प्रकट करते हुए)-जो मज़ा चपरासी बनने में है वह मज़ा बड़े साहब बनने में भी नहीं है।
    रामानुज-सो कैसे?
    गोपाल-दौरे के मुकाम पर साहब तो धीरे से कह देंगेे, गोपाल नाश्ते के लिए हलुआ बनेगा। फिर सच्चा हुकुम छूटेगा गोपाल का (ज़ोर से और, हुकूमत के स्वर से) 'कोटवार, जाओ मुकद्दम से कहो, एक सेर सूजी, दो सेर शक्कर और चार सेर घी फौरन हाज़िर करो। फिर देखो, कोटवार (चौकीदार ) कैसा भागा हुआ जाता है और मुकद्दम फौरन सब सामान लेकर हाज़िर होता है।'
    रामानुज-गोपाल तुम हलुआ बनाना जानते हो ? उसमें घी, शक्कर और सूजी तीनों, बराबर बराबर रहते हैं?
    गोपाल-हाँ, साहब, घर में बराबर रहते हैं। घर में चाहे घी चौथाई ही रहे, पर दौरे में तो घी चौगुना ही रहता है।
    रामानुज (आश्चर्य से)-क्यों भला?
    गोपाल-सुनो, मैंने तो आंखों से देखा है। खेरिया गांव की बात है। पुलिस के निसपिट्टर साहब अपने एक दोस्त के साथ जांच करने को आए। आते ही उन्होंने साथ के पुलिस वाले जवान को हुकुम दिया कि हलुआ तैयार कराओ। पुलिसवाले ने हलुवे के सामान का हुकुम मुकद्दम को दिया।
    रामानुज- यह 'मुकद्दम' कौन?
    गोपाल- मुकद्दम कौन, मालगुज़ार (ज़मींदार) होगा या सरकारी मुकद्दम रहता है न?
    रामानुज-हां, फिर?
    गोपाल- मुकद्दम ने आधा सेर सूजी, सेर भर घी और सेर भर शक्कर ला दी। यह देख निसपिट्टर साहब बड़े बिगड़े, गाली देकर बोले, 'घी बहुत कम है, और लावो।' पुलिसवाला भी घूंसा उठा कर आगे बढ़ा, बोला ''क्या हम लोग बार-बार यहां आते हैं। कंजूस कहीं का। सीधा सामान भी नहीं दिया जाता।" बेचारा मुकद्दम गया और एक सेर घी और ले आया। उस सब का हलुआ बना।
    रामानुज- और, खाने वाले कितने थे?
    गोपाल- निसपिट्टर, उनके दोस्त और तीसरा पुलिस वाला।
    रामानुज- उन्होंने सब खा लिया ?
    गोपाल- सब कहां से खाते। जब हलुआ परोसा गया तो कटोरे में नीचे हलुवे का गोला रह गया और सारा कटोरा घी से भर गया।
    रामानुज- फिर, उन्होंने खाया कैसे ?
    गोपाल- घी जमीन पर उड़ेल दिया और हलुआ खा लिया। भैया, क्या-क्या सुनाऊं दौरे की नवाबी।
    रामानुज- तो तुम भी इसी नवाबी के लिए चपरासी बनना चाहते हो।
    (श्रीधर आता है। साथ में उसकी पत्नी भी आती है। पर गहनों की आवाज़ बंद हो जाने से मालूम होता है, वह दरवाजे के अंदर परदे के पीछे रुक गई है)
    गोपाल (श्रीधर को देख कर प्रसन्नता से)- क्यों, भैया पास हो गए! राम जी भली करी।
    श्रीधर-हां, गोपाल। (रामानुज से) रामानुज, आज तुम यहीं भोजन करोगे। घर में तो कोई है नहीं।
    रामानुज-मां, अभी तक मामा के ही घर है।
    श्रीधर (मुस्कुराते हुए)-और, श्रीमती जी हैं हरीश के घर। (परदा हिलता है)
    रामानुज (परदे की ओर देखते हुए)-तुम्हें ऐसा कहने का कोई अधिकार नहीं।
    श्रीधर-पर, उस साले ने अपनी ही ओर से बधाई भेजी। ज़रा अपने नाम के साथ उर्मी और जोड़ देता तो क्या बिगड़ जाता।
    रामानुज (हँस कर)- वह अपनी बहन को परदे में रखना चाहता है।
    श्रीधर (गोपाल के सामने मज़ाक न बढऩे देने की इच्छा से)- गोपाल, तू भीतर जा, बुलाया है। (गोपाल भीतर जाता है। श्रीधर उसी आनंदी भाव में रामानुज से कहता है) पर, विवाह कब होगा?
    रामानुज-वाह, लगन भी लग चुकी। पूछते हो, कब होगा।
    श्रीधर- हरीश बड़ा अच्छा है। वह तो बहुत करके इलाहाबाद में ही वकालत करेगा।
    रामानुज (गंभीरता से)-संभव है!
    (बाहर से आवाज़ आती है) बाबू जी, तार।
    श्रीधर (दौड़ कर)- 'कांग्रेचुलेशन्स' होंगे (दरवाज़े पर तार वाले से तार लेकर लिफाफा फाड़ता है और उत्सुकता से मन में पढ़ता है। उसकी प्रसन्नता एकदम उतर जाती है।)
    रामानुज (चिन्तित होकर)-कहां से आया ?
    (श्रीधर रामानुज को तार देता है। रामानुज तार पढ़ता है और श्रीधर तार की रसीद पर दस्तखत करके तार वाले को देता है। तार वाला जाता है।)
    रामानुज- भाई, खबर तो बुरी है। पर बाबू जी तो सदा बीमार ही रहते हैं। 'सीरियस इलनेस' तो उनका मामूली रोग है। तालुकेदार ठहरे। छोटी सी बीमारी भी उनके लिए 'सीरियस' (भारी) हो जाती है।
    श्रीधर-संभव है। मैं चाहता हूँ, ऐसा ही हो।
    रामानुज-उन्होंने शशि को और तुम्हें बुलाया है। उनके घर में भी तो कोई नहीं है, न लड़का, न भाई. तुम्हीं अकेले जमाई (दामाद) हो। तुम्हें ज़रूर जाना चाहिए।
    (श्रीधर भीतर जाने लगता है)
    रामानुज (श्रीधर को रोक कर)- पर सुनो, अभी शशि 'रिज़ल्ट' (परीक्षा-फल) सुनकर प्रसन्न है। उसे यह खबर मत सुनाना। व्यर्थ रंग में भंग होगा। जब जाने लगो, तब कह देना।
    श्रीधर (उदासी से)- नहीं अभी नहीं कहूँगा। यही कहूँगा कि बाबू जी ने हम दोनों को बुलाया है-शायद हमारे नतीजे का तार पाकर।
    रामानुज (उठते हुए)-ठीक है। मैं ज़रा बाहर हो आता हूँ।
    श्रीधर- पर, जल्दी आना तुम्हें भोजन यहीं करना है।
    रामानुज (जाते हुए)-ज़रूर (रामानुज जाता है। श्रीधर कमरे में अकेला रह जाता है। पहले वह परदे वाले दरवाजे की ओर जाता है, पर फिर लौट आता है और खिड़की के पास कुर्सी खींच कर उसके हत्थे पर बैठ जाता है और स्वगत कहने लगता है)
    श्रीधर-बाबू जी सीरियसली बीमार हैं। रामानुज कहता है, उनका कोई है नहीं, न बेटा और न भाई। मैं ही अकेला जमाई हूँ। सीरियसली बीमार हैं। (लापरवाही से) अच्छे हो जावेंगे (गंभीरता से) और अच्छे न हुए तो? बड़ा ज़बरदस्त धक्का लगेगा। वे शशि को बहुत प्यार करते हैं। बड़ा जबरदस्त धक्का (सिर हिलाते हुए चुप हो जाता है। धीरे-धीरे उसकी उदासी मिटती जाती है और वह प्रसन्न होकर कहता है) और मैं एकदम गरीबी से तालुकेदारी पर जा पहुंचूंगा। (मुस्कुरा कर मानो नशे में हो) बड़ा ज़बरदस्त धक्का! कहावत सच है, सौभाग्य अकेला नहीं आता।
    (पटाक्षेप)
    दृश्य दूसरा
    (पहले दृश्य को कई महीने बीत गए हैं। कलकत्ते में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी का असहयोग प्रस्ताव बहुमत से पास हो गया, और फिर नागपुर की कांग्रेस में दुहराया भी जा चुका है। साधारण परिस्थिति यह है कि अनेक नेताओं और राष्ट्रीय भाव रखने वाले लोगों ने जो कौंसिलों के लिए खड़े हुए थे, अपनी उम्मीदवारी वापिस ले ली है। विशेष परिस्थिति यह है कि श्रीधर के श्वसुर का देहान्त हो गया है और श्रीधर ही, कोई दूसरा आदमी घर में न होने के कारण, उनकी बड़ी भारी ज़मींदारी का कर्ता बना है। श्रीधर अपनी ससुराल में ही रहता है। श्रीधर ने कर्ता हो जाने के बाद यह प्रकट किया कि इतनी बड़ी ज़मींदारी के प्रबंध के लिए कर्ता के नाम के साथ प्रतिष्ठा की आवश्यकता है। इसलिए वह कौंसिल के लिए उम्मीदवार खड़ा हुआ और ज़मींदारी के वोटरों पर दबाव होने के कारण बिना विरोध के चुन भी लिया गया। कौंसिल के कार्य के लिए श्रीधर ने प्रान्त की राजधानी में एक बढिय़ा बंगला ले रखा है और उस पर सामने ही तख्ती लगी है:)
    श्रीधर लाल, बी.ए., एल.एल.बी., एम.एल.सी.
    (श्रीधर अपने बंगले के बाहरी कमरे में बैठा है। कमरे की सजावट श्रीधर के ऐश्वर्य की साक्षी देती है; मखमली गद्देदार कुर्सियाँ, चमकता हुआ बढिय़ा महोगनी का टेबल और नीचे रेशमी कालीन, एक कोने में पैर से धोंका जाने वाला एक हारमोनियम और उसके पास की घूमने वाली कुर्सी, दाहिनी ओर की आलमारी में राजनीति और सरकार से संबंध रखने वाली सुनहरे अक्षरों से चमकती हुई जिल्ददार पुस्तकें, और टेबल की बाईं ओर एक छोटे टेबल पर रेमिंगटन टाइपराइटर; उसी के पास कुर्सी पर बैठा हुआ श्रीधर कुछ टाइप कर रहा है। पास की कुर्सी पर बैठी हुई शशि तस्वीरों का अलबम देख रही है, बीच-बीच में श्रीधर से बातें भी करती जाती हैं।)
    शशि- तुम 'एमेलसी' क्या हो गए, टाइपिस बन गए हो, दिन भर खटखटाहट (हँसती है।) फिर वह टाइपिस क्यों नौकर कर रखा है?
    श्रीधर (टाइप करना रोक कर)- महत्व के कागज़ात हैं, इसलिए मैं ही टाइप कर रहा हूँ।
    शशि- ऐसा क्या है इन में?
    श्रीधर- बता ही दूँ ? मैं 'मिनिस्टर' होने जा रहा हूँ।
    शशि- 'मिनिस्टर' क्या ?
    श्रीधर- मंत्री।
    शशि- जैसे रामानुज हैं?
    श्रीधर- तू भी किससे तुलना करने बैठी! रामानुज है तुच्छ जिला कांग्रेस कमेटी का मंत्री, और मैं होने वाला हूँ गवर्नर।
    शशि-(बीच ही में)- गवर्नर कि मिस्टर?
    श्रीधर-(बीच में रोके जाने से चिढ़कर)- खैर, मिस्टर नहीं मिनिस्टर, गवर्नर और मिनिस्टर में कोई बहुत फर्क नहीं है। मैं तुझे मिनिस्टर और एक कांग्रेस कमेटी के मंत्री के बीच का फर्क दिखाना चाहता था। रामानुज को मिलते हैं, सौ रुपट्टी, वह भी जमनालाल बजाज की कृपा से; और मुझे मिलने लगेंगे चार हज़ार रुपये माहवार! प्रान्त की करोड़ों जनता के भाग्य-विधाताओं में से मैं भी एक रहूँगा।
    शशि (विस्मय से)-बड़े ठाठ हैं!
    श्रीधर (अधिक उत्साह से)-तू समझ नहीं सकती, मेरा गौरव कितना बढ़ जावेगा। ज़रा कल्पना तो कर! गवर्नर साहब मुझसे बिना पूछे कोई काम नहीं करेंगे। कमिश्नर और डिप्टी कमिश्नर मुझे झुककर सलाम करेंगे। शशि, ज़रा सोच उस दिन को कि बड़े भैया की बेवकूफी में आकर और तेरी ज़िद्द पर वह 50 रुपए की मास्टरी कर लेता, तो आज मिनिस्टर बनने का मौका आता? और यह मोटर! यह बंगला! यह शान! शशि?
    शशि- पर हिन्दी के राष्ट्रीय-पत्र तो कौंसिल की मेम्बरी को बहुत बुरा बताते हैं।
    श्रीधर (आश्चर्य से)- तुम हिन्दी अखबारों को कहाँ से पा जाती हो।
    शशि-वाह! तुम्हें नहीं मालूम? मैं बाज़ार से खरीदवा मंगाती हूँ।
    श्रीधर (शान्त भाव से)- तुम अंग्रेज़ी सीखो, तब हमारे पास जो लीडर और पायोनियर, आते हैं, उन्हें पढऩा।
    (श्रीधर घंटी बजाता है)
    शशि- क्यों, क्या चाहिए ?
    (नौकर आकर सलाम करता है)
    श्रीधर- मोटर तैयार करवाओ।
    नौकर- बहुत अच्छा, हुजूर (नौकर जाता है)
    श्रीधर- नौ बजने वाले हैं, मुझे गवर्नर साहब ने मिलने को बुलाया है।
    शशि (हँसी से)- गवर्नर साहब से कैसे मिला करते हो?
    श्रीधर (हँसकर)-अभी ठहर, मैं विज़िटिंग सूट पहन आऊं।
    (श्रीधर दरवाजे का परदा हटा कर भीतर जाता है। शशि कमरे में अकेली रह जाती है। वह कोने में रखे हुए हारमोनियम के पास जाकर उसे बजाती है और धीरे-धीरे गाने लगती है।)
    गायन
    अजी विजयी प्रिय आओ, लगाओ गले, व्यथा मिटाओ, आनंद रंग छाओ।
    स्वागतोत्सुका, यह चकोरिका, खड़ी निकल युग चुका, अड़ी नयन पुतलिका, चन्द्र आओ।।
    मूर्ति वीरता, विजय मद-रता, छिपी किधर झट बता, छली न कर निठुरता, शीघ्र आओ।।
    (श्रीधर बहुत बढिय़ा पतलून, वेस्टकोट, खुले कालर का कोट पहिने और नेकटाई लगाए हुए हाथ में हैट लेकर आता है और अंग्रेजी में कहता है:)
    श्रीधर-हुजूर, अंदर आऊँ?
    (शशि चौंक कर पीछे देखती है और हँसती है)
    श्रीधर- हमारे गवर्नर साहब इस तरह बेवक्त गाना बजाना नहीं करते।
    शशि (समझ कर)-आहा ! आइए, मिनिस्टर साहब। मैं तो भूल ही गई थी।
    श्रीधर-वे स्त्रीलिंग में भी नहीं बोलते। खैर, देखो हम लोग इस तरह मिला करते हैं। गवर्नर बड़ी खुशी से हाथ मिलाते हैं और हम इस प्रकार झुक कर (सलाम करने का नाट्य करता है) सलाम करते हैं।
    शशि-ओहो, आदर, भक्ति और कृतज्ञता की साक्षात् मूर्ति!
    नौकर (दरवाजे के पास बाहर से ही कहता है)-मोटर तैयार है, हुजूर।
    श्रीधर-अच्छा, अब मैं जाता हूँ। (श्रीधर जाता है, दूसरे दरवाजे से गोपाल आता है।)
    गोपाल-बहूजी, ओझाजी आए हैं। आए तो बहुत देर से हैं, पर भैया जी थे, इसलिए मैंने पिछवाड़े ही बैठा रखा था। यहाँ ले आऊँ? (गोपाल जाने लगता है)
    शशि-ज़रा ठहरो तो। तुमने उनसे कुछ बातें तो की होंगी!
    गोपाल-क्यों नहीं? सब कर डालीं। तुम भी कर लो। मन को संतोष हो जावे बड़े नामी ओझा हैं। उनके तो जोगनी सधी है। किसी के घर थोड़े ही जाते हैं। बड़े मनाने से यहाँ आए हैं।
    शशि (प्रसन्नता और उत्सुकता से)-क्या! बातें क्या हुईं?
    गोपाल-बहूजी, कहता तो हूँ मैंने सारी बातें पूछ लीं। पूछा कि हमारी बहूजी को लड़का कब होगा? बड़ी देर तक पत्रा खोलकर हिसाब लगाते रहे, कभी सिर हिलावें, कभी प्रसन्न हों, फिर आँख मींच ली, फिर गणना करने लगे। एक बार तो पत्रा (पटकने का नाट्य करके) पटक दिया।
    शशि (अधीरता से)-आखिर जवाब क्या दिया?
    गोपाल (गर्व से)-जवाब क्या होता! मैंने साफ कह दिया था, कुछ भी हो, लड़का तो होना ही चाहिए। बोले, जोग तो आ सकता है, पर है कठिन जोग। कहते थे, शनि आड़े आ गया है।
    शशि (चिंता से)-फिर?
    गोपाल-फिर क्या? मैंने कहा महाराज जोगनी लगाओ, शनि को निकाल बाहर करो, लड़का तो होना ही चाहिए। बोले, होगा (शशि की चिंता दूर होती मालूम होती है) पर, साधना में खर्च बहुत लगेगा।
    शशि (उत्साह के साथ)-खर्च तो देख लिया जावेगा।
    गोपाल- और बहू जी, मैंने महाराज से यह भी पूछा। महाराज बड़े विद्वान हैं, उनके कंठ में सरस्वती बिराजती है।
    शशि-क्या पूछा ?
    गोपाल-पूछा, हमारे भैया छोटे साहब कब होंगे?
    शशि (हँस कर)-छोटे साहब! अरे, तुम्हें नहीं मालूम है, तुम्हारे भैया तो 'मिनिस्टर' होने वाले हैं।
    गोपाल (अनुत्साहित स्वर में)-'मिनिस्टर' कौन सा ओहदा होता है बहू जी?
    शशि-जानती तो मैं भी अच्छी तरह नहीं। तुम्हारे भैया कहते थे, हम लोग नहीं समझ सकते। तुम्हारे बड़े साहब और कमिश्नर भी उनको सलाम करेंगे।
    गोपाल (अत्यंत प्रसन्नता से)-तब तो बड़े साहब का चपरासी हमको सलाम किया करेगा।
    शशि-इसके बारे में भी ओझा जी कुछ कहते हैं।
    गोपाल-बोले, छोटे साहब तो नहीं, बहुत बड़े ओहदे पर जाने वाले हैं। (सिर हिला कर) पर...।
    शशि-पर, क्या ?
    गोपाल-पर, बिस्तर अपनी जगह से हट गया है।
    शशि (हँसकर)-बिस्तर का ओहदे से क्या संबंध ?
    गोपाल- समझा तो मैं भी नहीं था। पर होगा कोई ग्रह (सोच कर) वह बिस्तर वार का?
    शशि- बिरस्पती!
    गोपाल- हां, वही, मुझे सुद्ध नाम नहीं आता। पर, ओझा जी कहते थे, सीधा हो जावेगा। भेंट-पूजा में वह ताकत है जो टेढ़े ग्रहों को भी सीधे कर देती है।
    (बाहर से एक गाड़ी रुकने की आवाज़ आती है)
    शशि-देखो तो कोई आया है।
    गोपाल- (खिड़की में से झांक कर)-हरीश बाबू की बहिन हैं।
    शशि- अच्छा, तुम जाओ। ओझा जी को अभी दक्षिणा देकर बिदा कर दो, फिर शाम को बुलाना। तब पूजा-पाठ की बातें तय कर लूँगी।
    (गोपाल जाता है। उर्मिला बरांडे में आती मालूम होती है)
    शशि-आओ, इस कमरे में, उर्मिला! (शशि दरवाजे के पास जाकर एक हाथ से परदा हटाकर थामती है। उर्मिला भीतर आती है। वह अभी 16 वर्ष की होगी किन्तु अपनी उम्र से ज़रा बड़ी मालूम होती है। हल्के नीले रंग की रेशमी साड़ी पहिनी है। उसके नीचे कमीज़ कुछ गुलाबी है जो साड़ी के भीतर से बैंजनी सा दिखता है। पैर के मोज़े तो दिखाई नहीं देते परन्तु ऊंची एड़ी के पालिशदार बूट अवश्य चमक रहे हैं। हाथ में एक लपेटा हुआ कागज़ है। कमरे में घुसते ही उर्मिला की साड़ी परदे से अटक जाने के कारण सिर से खिसक कर पीठ पर गिर गई, मानो किसी नाटक का सुंदर दृश्य खुल गया। कितना मोहक केशकलाप! घुंघराले और लहरियों वाले बाल! शायद इसीलिए उसका नाम उर्मिला है। जो मांग है वह भी टेढ़ी। भौंहों ने तो स्वभावत: चढ़ कर उतरने का नाम ही नहीं लिया, ऊपर ज़रा झुक कर पतली रेखा में अदृश्य हो गई हैं। रंग में सांवली झलक है; आँखों में संसार भर की चंचलता और हठीलापन, ओठों का कोना एक तरफ कुछ चढ़ा हुआ रहता है जिससे उन पर सदा-मुस्कुराहट दिखती है और शरारत भी।)
    शशि-आज कैसी कृपा हुई! क्या रास्ता भूल गई!
    (शशि बैठने को कुर्सी बढ़ाती है)
    उर्मिला-रास्ता तो नहीं भूली।
    शशि-कहां से आ रही हो?
    उर्मिला-स्कूल से, 'नान-को-आपरेशन' करके आ रही हूँ।
    शशि- क्या? इंट्रेस अधूरा रह जावेगा!
    उर्मिला- पर मैं तो पूरी हो जाऊंगी।
    शशि- भैया क्या कहते हैं?
    उर्मिला- चिढ़ते हैं, कुढ़ते हैं, पर यहां तो (सिर हिलाकर निश्चय का संकेत करती है। उर्मिला का माना प्रत्येक अंग बोलता है।)
    शशि-(अविश्वास के साथ)-करती हो नान को-ऑपरेशन, और यह विदेशी साड़ी पहिन कर उर्मिला बनी हो, उर्वशी।
    उर्मिला-यह भेष घर जाकर उतरने ही वाला है। सोचा चलूं, आप लोगों से मिल आऊं, नहीं तो खादी पहनने पर कम्पाउंड में घुसना मुश्किल होगा।
    शशि-(कुछ हतप्रभ होकर) उर्मिला, ऐसा क्यों कहती हो?
    उर्मिला (बड़े प्रेम से)-हँसी में कहा था, भौजी बुरा लग गया?
    शशि- क्या वे कौंसिल के मेम्बर हो गए, इसलिए तुम समझती हो, तुमसे संबंध टूट जावेगा।
    उर्मिला- नहीं भौजी (बात बदलने की इच्छा से अलबम उठाकर खोलती है और पूछती है) यह फोटो किसका है?
    (शशि अब भी उदास है)
    शशि-पता नहीं, किसका है? शायद गवर्नर का है।
    उर्मिला-(दूसरा चित्र खोलकर) यह किसका है?
    शशि- देखूं? शायद यही गवर्नर का है। मालूम नहीं, ये सब अंग्रेज एक से लगते हैं। गवर्नर और कलेक्टर और बादशाह में कोई फर्क नहीं।
    उर्मिला-अजी, हर अंग्रेज गवर्नर और बादशाह है।
    (उर्मिला हँसती है, शशि भी हँसने लगती है।)
    शशि- इधर लाओ, इनमें कुछ तस्वीरें ऐसी भी हैं जिन को तुम पहचानती हो। (शशि अलबम लेकर कुछ तस्वीरें इधर-उधर पलट कर एक तस्वीर दिखाती है। उर्मिला उसकी ओर देखकर कुछ लज्जित होती है परन्तु फिर उसी को देखती रह जाती है।)
    शशि- पहिचानती हो ?
    उर्मिला-थो......ड़ा। भैया और ये, यहां पर साथ-साथ पढ़ा करते थे। पारसाल की तो बात है। श्रीधर भैया के साथ कभी-कभी हमारे घर भी आया करते थे।
    शशि (शरारत से शशि की नकल करके)-थो...ड़ा जानती हो, बहुत तो नहीं?
    उर्मिला- थोड़े और बहुत का अंतर तो मुझे नहीं मालूम, पर, हां, जानती अवश्य हूँ। अब ये कहाँ, क्या करते हैं? सुनती हूँ, वकालत तो पास हो गये हैं।
    शशि-इन्होंने वकालत शुरू ही नहीं की। (उर्मिला प्रसन्न होती है) आज कल श्रीरामनगर में जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री हैं। उर्मिला, तुम भी (''भी" पर ज़ोर देती हुई) 'नान-कोऑपरेट' हो गई हो।
    उर्मिला- जी हां, ('जी' पर ज़ोर देती है)
    शशि- छिपाती क्यों हो, मुझे तो सब मालूम है।
    उर्मिला (हँसती हुई)- क्या?
    शशि- इसीलिए तो तुम 'नान-कोऑपरेटर' बनी हो।
    उर्मिला (हँसी के स्वर में)-तब तो तुम्हें सब कुछ मालूम है!
    शशि- और यह भी मालूम है कि तुम रामानुज को बहुत प्यार करती हो।
    उर्मिला (हँसी के स्वर में)- बिलकुल ठीक! थोड़ी सी कसर और रह गई!
    शशि- और, वे भी तुम्हें प्यार करते हैं।
    उर्मिला-शाबास, बड़ी नई बात कही। अजी, उर्मिला जिसको प्यार करे फिर वह पत्थर भी हो तो महादेव बन के उसके पीछे जंगल- जंगल घूम सकता है।
    शशि- परन्तु, रामायण कुछ और ही कथा कहती है।
    उर्मिला- क्या?
    शशि- रामानुज उर्मिला के पीछे जंगल-जंगल नहीं घूमे थे, वे तो उसे महलों में छोड़ कर भाई के पीछे जंगल-जंगल घूमे।
    उर्मिला- उर्मिला की अनुमति से।
    शशि-यह तुम जानो।
    उर्मिला-क्यों, यह बात रामायण नहीं कहती?
    शशि-पर उर्मिला, वे बहुत नाराज़ हैं।
    उर्मिला-यह भी रामायण में लिखा है?
    शशि-नहीं, हँसी नहीं, मैं सच कहती हूँ।
    उर्मिला- मैं मानती हूँ, नाराज़ तो प्यार का लक्षण है।
    शशि- कहते थे, पास होने पर केवल हरीश ने बधाई दी, उर्मिला ने नहीं दी।
    उर्मिला- उर्मिला इन तुच्छ बातों पर प्रसन्न नहीं होती। उर्मिला की बधाई बहुत कीमती है।
    शशि- उर्मिला किसे बधाई देती है?
    (उर्मिला अपने हाथ का कागज़ शशि को देती है। शशि मन में पढ़ती है।)
    शशि-(प्रसन्न होकर,) उर्मि, ज़रा गा भी दो। आओ, मैं हारमोनियम बजाऊंगी।
    (दोनों हारमोनियम के पास जाती हैं। शशि हारमोनियम बजाती है और उर्मिला गाती है।)
    गायन
    उन्हें है बधाई, बधाई, बधाई।
    जिन्होंने है माता स्वतंत्रा बनाई।।
    बजी रण भेरी, बजी,
    सजी सब सेना सजी,
    भीति मरने की तजी,
    कराहे मत हे घायल वीर, धीर रख, हो जा स्वस्थ शरीर, नहीं निर्बल के लिए लड़़ाई। बधाई... उन्हें है-
    किन्तु वह बोला, युद्ध,
    ठना है आत्मिक युद्ध,
    पाशविक शक्ति विरुद्ध;
    लडूंगा बिना किए मैं वार, मार सह यह तन दूंगा वार,
    यही वीरों की एक बड़ाई। बधाई... उन्हें है-
    युद्ध के बीचों बीच,
    खून से भू को सींच,
    सो गया आंखें मीच,
    हो गया शांति सहित बलिदान, जान दे जीवन किया महान
    जगत में नूतन, शक्ति जगाई, बधाई... उन्हें है-
    मार ले भाई मार,
    फले यह तेरा वार,
    इसी से हो उद्धार,
    मृत्यु बन जाय मुक्ति का द्वार, प्यार ही करे क्रूरता छार,
    हार में अद्भुत विजय समाई। बधाई.....उन्हें है-
    शशि-उर्मिला तुम बड़ी क्रूर हो। तुम्हारी बधाई पाने के लिए किसी को मरना पड़ता है।
    उर्मिला-नहीं, मेरी बधाई पाने के लिए किसी को स्वर्ग जाना पड़ता है।
    शशि-तो क्या रामानुज का वकालत का बहिष्कार करना काफी नहीं है?
    उर्मिला- मैं देखती हूँ, वकालत तो बहुतों ने छोड़ दी, परन्तु उनमें फिर भी कसर है। वकालत में काफी कमाई न होने के कारण भी कुछ लोगों ने वकालत का बहिष्कार किया है और राष्ट्र सेवा में भरती होकर भी वे सच्चे हृदय से राष्ट्र सेवा नहीं करना चाहते।
    शशि-यह बात ठीक है। कई लोग तो केवल मान पाने के लिए ही असहयोगी बने हैं।
    उर्मिला-हाँ, यह भी है।
    शशि-असहयोग और कौंसिलों के बारे में उनकी और रामानुज की अकसर बातें हुआ करती थीं। पर, रामानुज तो कौंसिल के मेम्बर हो ही नहीं सकते थे।
    उर्मिला-क्यों नहीं ?
    शशि-वे इतने धनवान नहीं हैं।
    उर्मिला (चिढ़कर किन्तु हँसते हुए)- तो क्या हुआ, क्या वे किसी धनवान के जमाई नहीं बन सकते थे?
    (शशि उदास हो जाती है और उर्मिला अधिक दृढ़ता से कहती हैै।)
    पर, तुम्हें मालूम है, इस साल कौंसिल में कैसे-कैसे आदमी गए हैं ?
    शशि (उदासी से)-मुझे नहीं मालूम।
    उर्मिला- चमार और मेहतर भी। तुमने तो अखबारों में पढ़ा होगा।
    शशि (नितांत हतप्रभ होकर)- हाँ पढ़ा तो है।
    (बाहर मोटर रुकने की आवाज़ सुनाई देती है)
    उर्मिला (खिड़की से झांक कर)- श्रीधर भैया आए हैं।
    शशि- अच्छा, मैं भीतर जाती हूँ। (उठती है)
    उर्मिला (हाथ पकड़कर)-बैठो भी। साथ में और कोई नहीं है। तुम्हारा परदा और यह हिचक अभी तक नहीं गई। कई बार श्रीधर भैया शिकायत कर चुके हैं।
    (श्रीधर कमरे में आता है। उर्मिला और शशि-खड़ी हो जाती हैं।)
    श्रीधर (प्रसन्नता से)-बैठो, उर्मिला, बैठो।
    (वे दोनों बैठ जाती हैं। श्रीधर भी कागजात टेबल पर पटक कर कुर्सी पर बैठ जाता है। वह अत्यंत प्रसन्न है। उसकी आंखें, मुख, अंग- अंग उमग रहा है)
    श्रीधर (हँसते हुए)-यह पगली कब से आई है?
    उर्मिला-अभी थोड़ी ही देर हुई है। आप कहां गए थे?
    श्रीधर- कुक (गवर्नर का संक्षिप्त नाम) ने बुलवाया था।
    उर्मिला (हँसी को दबाकर, गंभीरता से)- भैया, ब्राह्मण होकर ऐसी बातें न किया करो। आपको कुक से क्या काम? और कुक आपको बुलायेगा कि खुद आपके पास आवेगा। मान लो, आप कुक के पास गए भी तो मोटर पर चढ़ कर?
    श्रीधर (ज़ोर से हँसकर)-पागल! पूरी पागल!
    शशि (कुछ न समझ कर)-यह कुक कौन हैं?
    उर्मिला- 'कुक' कहते हैं खानसामा को।
    शशि (आश्चर्य से)-वे मुसलमान लोग, जो साहब लोगों की रोटी बनाते हैं?
    उर्मिला- वही।
    शशि (श्रीधर की ओर देखकर)- पर, कह तो गये थे कि गवर्नर के यहाँ जाता हूँ।
    श्रीधर-यह उर्मिला तो पागल है। मैं गवर्नर के ही पास गया था। उनका नाम है सर हेनरी कुक।
    उर्मिला (शरारत से)- अब समझी! पर भैया, गवर्नर का नाम तो आदर के साथ लेना चाहिए।
    शशि (प्रसन्न होकर और उत्सुकता से)- हां, मैं तो भूल गई थी। क्या हुआ?
    श्रीधर- मैं होम मेंबर बना दिया गया।
    (उर्मिला शरारत से मुस्कुराती है।)
    शशि- यह होम मेंबर क्या होता है?
    उर्मिला- 'होम' अंग्रेज़ी में कहते हैं घर को, और मेंबर तो तुम जानती ही हो, आदमी। होम: मेंबर का मतलब हुआ, घर का आदमी, रिश्तेदार।
    शशि (कुंठित होकर)-गवर्नर के रिश्तेदार!
    (उर्मिला और श्रीधर जोर से हँस पड़ते हैं। यह देख शशि को क्रोध आ जाता है) मुझे यह हँसी अच्छी नहीं लगती, तुम लोग, अंग्रेजी पढ़ कर अपने को न जाने क्या समझ लेते हो! मैं जाती हूँ (शशि जाने लगती है।)
    उर्मिला- आखिर सुन भी लो, ये क्या होकर आए हैं। (शशि बैठ जाती है) हाँ, भैया, बताओ।
    श्रीधर (शशि की ओर देख कर)- तुम ज़रा सी बात में चिढ़ जाती हो। जहां चार जन बैठते हैं हँसी मज़ाक होता ही है! (शशि चुप रहती है)
    उर्मिला- भैया, उपदेश बन्द करो। यह बताओ, तुम क्या होकर आए हो?
    श्रीधर- क्या कहूँ, सब मज़ा किरकिरा हो गया। शुभ सम्वाद को सुनकर आज शशि से प्रसन्नता की पौर्णिमा प्रकट होनी चाहिए थी परन्तु वहां ग्रहण लग रहा है।
    उर्मिला- ग्रहण है, पर पौर्णिमा भी है। आप ही तो राहू बने, और ग्रहण का दोष देते हैं शशि को।
    शशि- उर्मिला, चुप नहीं रहोगी!
    उर्मिला-हां, भैया, हम दोनों चुप बैठते हैं, कहो।
    (अब भी श्रीधर की खिन्नता दूर नहीं हुई है।)
    श्रीधर- आज गवर्नर ने मुझे होम मेंबर बनाया है। अगले सोमवार को गज़ट में यह बात प्रकाशित हो जायेगी।
    उर्मिला- यह तो आप पहिले ही कह चुके हैं। होम मेंबर का मतलब समझाइए।
    श्रीधर- तू ही क्यों नहीं समझा देती।
    उर्मिला- मैं समझाऊंगी तो भौजी और शायद आप भी नाराज़ हो जावेंगे।
    श्रीधर- कह तो।
    उर्मिला-(शशि की ओर देख कर)-नई सुधार योजना में होम मेंबर एक मंत्री होता है। मंत्री चुनने का सब देशों में नियम यह है कि प्रजा के ही प्रतिनिधि मंत्री चुना करते हैं। परन्तु यहां पर मंत्री सरकार द्वारा नियुक्त किए गए हैं। उन्हें 4000 रुपए तक मासिक वेतन मिलता है।
    शशि (प्रसन्न होकर)- तो इन्हें भी 4000 रुपए महीना मिला करेगा?
    उर्मिला- भौजी तो 'मिनिस्टरी' का मूल्य रुपयों में ही लगता है।
    श्रीधर-यह स्त्री हैं, यह क्या जाने 'मिनिस्टरी' के पूरे महत्व को।
    उर्मिला- माडरेट लोग भी तो 4000 रुपए मासिक पर बहुत प्रसन्न हुए हैं!
    शशि (गर्व से)-क्यों, मैं महत्व क्यों नहीं समझती? पूरा नहीं जानती तो क्या हुआ? इतना तो जानती हूं कि अब कमिश्नर और कलेक्टर इन्हें झुक कर सलाम करेंगे और गवर्नर इनसे बिना पूछे कोई काम नहीं करेंगे। (श्रीधर की ओर देख कर) क्यों ठीक है न?
    (श्रीधर उर्मिला की मुस्कुराहट देख कर चुप रह जाता है।)
    उर्मिला- बिलकुल ठीक! और भौजी, गवर्नर साहब जो कुछ करना चाहेंगे उसमें इन्हें (श्रीधर की ओर दिखा कर) 'हाँ' कहना पड़ेगा, और ये जो कुछ करेंगे वह गवर्नर से बिना पूछे नहीं कर सकेंगे।
    शशि- इस में क्या खराबी है?
    उर्मिजा- खराबी कुछ नहीं। गवर्नर साहब चाहेंगे कि महात्मा गांधी कैद कर दिए जांवे तो इन्हें कहना पड़ेगा, 'जी हाँ।'
    (श्रीधर चुप बैठा रहता है)
    शशि-'हाँ' क्यों कहना पड़ेगा? कोई जबरदस्ती है?
    उर्मिला- जबरदस्ती तो नहीं है, पर मासिक 4000 रुपए तो है!
    शशि-भला गांधी को, जिनको सब पूजते हैं, कोई कैद करने की सलाह देगा?
    (उर्मिला उत्तर में मुस्कुराती हुई श्रीधर की ओर उंगली दिखाती है)
    शशि (उत्तेजित होकर)- उर्मिला, तुम्हारे साहस की सीमा है! तुम क्या इनको नीच समझती हो?
    (श्रीधर अत्यन्त चिंतित दिखता है)
    उर्मिला- नीच क्यों, अपने राजनीतिक विरोधी को कैद करने की सलाह देना क्या नीचता है?
    शशि-महात्मा गांधी को कैद करने की सलाह देना तो नीचता है। मुझे विश्वास है, ये तो कभी भी, उसके लिए 'हाँÓ नहीं कहेंगे।
    उर्मिला- तब मालूम है, इसका परिणाम क्या होगा?
    शशि- क्या होगा?
    उर्मिला-गवर्नर साहब इनसे नाराज हो जावेंगे। वे इन्हें मिनिस्टरी या होम-मेंबरी से हटा सकते हैं। तब इनका 4000 रूपए महीना मारा जाता है, और यदि ये महात्मा गांधी को कैद नहीं करते तो इनके सुधार नष्ट होते हैं और सुधार नष्ट हुए कि ये 4000 रुपए छिने। इसलिए गांधीजी को कैद करना ही होगा।
    शशि (श्रीधर से)-क्यों जी, क्या उर्मिला सच कहती हैं?
    श्रीधर (मानो चौंक कर)-उर्मिला माडरेटों को 'नीच' समझती हैं।
    उर्मिला-हाँ, भैया, करीब-करीब। उनमें कुछ अवश्य अच्छे हैं।
    श्रीधर-इसी तरह असहयोगियों में भी अनेक स्वार्थी हैं।
    उर्मिला-पर, भैया, बातें हो रही थीं मिनिस्टरी की। असहयोगियों के ऐब ढूँढने से मिनिस्टरी थोड़े ही अच्छी हुई जाती है।
    श्रीधर (कुछ उत्साह सा दिखाकर)-नहीं, उर्मिला, मैं तुझे विश्वास दिलाता हूँ , माडरेट नीच नहीं हैं जैसा तू समझती है। हम तो लोक-सेवा के उद्देश्य से और सुधारों को उपयोगी समझ कर उनसे देश को लाभ पहुँचाने के लिए कौंसिल में गए हैं।
    उर्मिला-केवल यही भाव महात्मा गांधी को कैद करवाने के लिए काफी है।
    श्रीधर (उत्सुकता से)-कैसे?
    उर्मिला-जब आप सुधारों को उपयोगी मानते हैं तो जो लोग सुधारों में बाधा पहुँचावेंगे उन्हें आप जेल भेजेंगे। महात्मा गांधी सुधारों के सब से बड़े बाधक हैं। इसलिए उनको कैद कर देना आपको उचित मालूम होगा।
    (श्रीधर निरुत्तर सा दिखता है)
    शशि-जाने भी दो इस विषय को, मैं तो थक गई।
    श्रीधर (शशि की इस मौके की सहायता से प्रसन्न होकर)- अच्छा, उर्मिला, इस संबंध में हम लोग फिर कभी बातचीत करेंगे। यह न समझना कि श्रीधर तुझ पगली से हार गया।
    उर्मिला-भैया, हारी तो मैं हूं, क्योंकि आपसे यही आश्वासन ले सकी कि आप हारे नहीं, किन्तु यह न कहला सकी कि आप कौंसिल छोड़ देंगे / (शशि से) अच्छा, भौजी, जाती हूँ। भौजी, क्षमा करना, मैं यहाँ आती हूँ तो तुम्हें थोड़ा बहुत चिढ़ा ही जाती हूँ।
    शशि-नहीं, उर्मिला, मुझे कुछ बुरा थोड़े ही लगता है। अब बताओ, कब आवोगी?
    उर्मिला-जब चाहो, अच्छा, बन्दे!
    (उर्मिला अभिवादन करके जाती है। श्रीधर और शशि भी बरामदे तक साथ पहुँचाने आते हैं।)
    (पटाक्षेप)
    तीसरा दृश्य
    (प्रात:काल का समय है। श्रीरामनगर में गंगा के घाट पर रामानुज नित्य नियम के अनुसार स्नान करके खादी की धोती पहिने संध्या करके अभी उठा है। आसन और लोटा आचमनी इत्यादि नीचे रखे हैं। वह कभी गंगा के किनारे पर खड़ी हुई मस्जिद की ओर देखता है, कभी खिन्न मालूम होता है, कभी प्रसन्न, मानो मन में ही कुछ बोलता है, फिर ज़ोर से कहता है, मानो गंगा को सुना कर-)
    गंगा, तू यदि चाहती तो इस मस्जिद को कल ही उखाड़ कर बहा देती। परन्तु तूने वैसा न करके इस मस्जिद के आसपास अनंत क्रीड़ाएं करके इसको प्रसन्न ही किया है, और इससे उठने वाली सदाओं की प्रतिध्वनि उसी तत्परता से दी है जिस प्रकार तूने 'हर हर महादेव' को प्रतिध्वनित क्रिया है। तेरे लिए हर-हर महादेव और अल्ला हो अकबर एक हैं परन्तु मैं जानता हूं, इन्हीं दोनों का जय-घोष करने वालों ने एक-दूसरे के गले काटकर खून की नदियां बहाई हैं। औरंगजेब उस दिन अत्यंत प्रसन्न हुआ होगा जिस दिन उसने काशी विश्वनाथ का मंदिर तोड़ उसके पत्थरों से मस्जिद बनवाई थी। औरंगजेब की उस प्रसन्नता की कीमत मुसलमान और साथ में हिन्दू भी आज तक अपनी गुलामी से चुका रहे हैं। गंगा क्या ही अच्छा होता यदि तू अपनी बाढ़ से इस मंदिर और मस्जिद दोनों को सदा के लिए नष्ट कर देती।
    (वह थोड़ी देर के लिए चुप हो जाता है फिर सिर हिलाता हैं मानो सोचता है कि यह असंभव है। फिर जोर से कहता है :-)
    या मंदिर के पत्थरों से बनी हुई मस्जिद हिन्दू-मुसलमानों की एकता का स्वरूप धारण कर ले और हिन्दू-मुसलमान सुनें, मंदिर के घंटे से मस्जिद गँूजती रहती है और मस्जिद की सदा से मंदिर गूँजता है। हिन्दू-मुसलमान इसको सुनें और इसके मतलब को समझें।
    (नेपथ्य में हर-हर महादेव का शोर होता है। कई लोग स्नान के घाट पर आते हैं जिससे युवक का ध्यान भंग हो जाता है। सब 'वंदेमातरम्' कह के रामानुज का अभिवादन करते हैं। उनमें से एक बातें शुरू करने के इरादे से कहता है)
    एक- कहिए, आज तो आपको स्नान करके लौटने में देरी हो गई।
    रामानुज- यों ही समय सुहावना था, इसलिए रुक गया। जाने की तैयारी में ही था।
    दूसरा- अब तो हम लोग आ गए, जाने नहीं देंगे। समय सुहावना है, गायन होना चाहिए।
    रामानुज- अच्छी बात है, पर क्या गाया जावे?
    तीसरा- वही गांधी का गुणगान।
    रामानुज- ठीक होने दो।
    (रामानुज गाता है, साथ में अन्य सब तालियां बजाकर गाते हैं।)
    गांधी ने हमको प्रीति सिखाई।
    प्रीति सिखाई भीति भगाई, नूतन स्फूर्ति जगाई।।
    प्रीति वही जिसमें न घृणा हो, हो न स्वार्थ निठुराई।।
    प्राणिमात्र पर पूर्ण दया हो, जन के सब जन भाई।।
    शांत तथा निभ्रांत क्रांति की, विजयी रीति दिखाई।।
    जिसकी गाथा बुद्घदेव, जिन वर, ईसा ने गाई।।
    बोलो, महात्मा गांधी की जय।।
    (ऊपर की सीढिय़ों पर से आवाज़ आती है-)
    वंदे मातरम्! अल्ला हो अकबर!
    (ऊपर की ओर देखकर सब लोग एक साथ चिल्ला उठते हैं) अल्ला हो अकबर!
    ऊपर एक 15 वर्ष का बालक खड़ा हुआ मुस्कुरा रहा है। वह खादी का कुर्ता, खादी का पाजामा और खादी की तुर्की टोपी पहने है। उसका पाजामा खून से सना है और अंदर से अभी भी खून बहता मालूम होता है। उसके साथ दो युवक और हैं। उस बालक ने आनंद और उत्सुकता से पूछा-)
    मैं भी आऊं?
    (रामानुज आदि सब दौड़कर उसके पास पहुंच गए)
    रामानुज (प्रेम से)- अहमद, तुम तो जेल में थे? यह खून कैसा?
    अहमद- मुझे 25 बेंत मारे हैं।
    एक- नंगा करके और टिकटी पर बांधकर?
    अहमद (मुस्कुराते हुए)- हां।
    दूसरा- (घृणा के साथ)- और वहां पर न्यायमूर्ति मैजिस्ट्रेट बड़ी गंभीरता से खड़ा देखता होगा?
    अहमद- जी हां।
    तीसरा- ये लोग पढ़े-लिखे प्रतिष्ठित और सभ्य हैं!
    चौथा- क्यों भाई, कुसूर क्या था?
    अहमद- मैंने जेलर साहब के आने पर 'सरकार एक' नहीं कहा था।
    एक- तुम्हें तकली$फ तो हुई होगी। हर हर! तुम चिल्लाए होगे!
    अहमद- चिल्लाया ज़रूर था। पर चिल्लाया था (ज़ोर से) महात्मा गांधी की जय।
    सब लोग (चिल्ला उठते हैं)- महात्मा गांधी की जय।
    एक- इससे तो वे और भी चिढ़े होंगे।
    अहमद- चिढ़े जरूर थे, इसलिए मैजिस्ट्रेट साहब ने कैदी के हाथ से बेंत छीनकर खुद कस-कस कर मारना शुरू किया।
    दूसरा- और तुम?
    अहमद- मैं और भी ज़ोर से ''महात्मा गांधी की जय" कहता था, जब तक बेहोश न हो गया।
    रामानुज- पर तुम यहां कैसे आए?
    अहमद होश आने पर उन्होंने मुझे जेल के बाहर निकाल दिया और कहा, घर जाओ। मुझे पैदल जाने में तकलीफ होगी इसलिए तांगा भी मंगा दिया। मैंने कहा- मुझे जल्लाद की कृपा नहीं चाहिए।
    सब- शाबास!
    अहमद- मैं पैदल आ रहा था कि इनका (अपने साथियों को दिखाकर) तांगा मिला। इन्होंने कृपा कर अपने तांगे पर मुझे बैठा लिया। मैं उसी पर घर जा रहा था कि यहां महात्मा गांधी का जयकार सुना तो मुझसे रहा नहीं गया। और मैं इधर देखने को आ गया।
    रामानुज- अच्छा, चलो, अब हम सब तुम्हें उठाकर ले चलेंगे, तकलीफ नहीं होने देंगे।
    (सब मिलकर एक घेरा बनाते हैं और अहमद को इस ढंग से उठाते हैं जिससे उसे तकलीफ न हो)
    सब (उठाते समय)- अल्ला हो-अकबर! वंदे मातरम्।
    एक- भाई, इस तरह ले चलना है तो फिर पूरा जुलूस ही न निकले। गायन भी होता चले।
    (सब गाते हैं-)
    श्रीकृष्ण जन्मगृह से आज़ाद आ रहा है।
    सच्ची स्वतंत्रता का संवाद ला रहा है।।
    दा$गी न इस पे गोली तलवार भी न मारी।
    बस बेंत ही से पीटा पशुबल लगा के भारी।।
    जालिम को खौफ यह था मर जाएगा ये पूरा।
    तो हौसला, जुलूम का रह जाएगा अधूरा।।
    उसके हवस थी दिल में घायल तड़प के चीखे।
    यह भी हुई न पूरी यह गीत गा रहा है।।
    (पटाक्षेप)

    चौथा दृश्य
    (गवर्नर की कोठी के एक कमरे में गवर्नर और श्रीधर बैठे हैं।)
    गवर्नर- आपने श्रीरामनगर के सब समाचार सुन लिए। देखिए न, कानून और शांति भंग होने की वहां बहुत संभावना है। असहयोगियों की इस अराजकता को रोकने के लिए अब कड़ा उपाय करना चाहिए।
    श्रीधर (गंभीरता से)- उपाय तो अवश्य होना चाहिए, परन्तु यह देख लेना चाहिए कि क्या श्रीरामनगर की अवस्था वास्तव में भयंकर हो रही है।
    गवर्नर- भयंकर और किसे कहते हैं! वहां का कलेक्टर तार देता है कि असहयोगी लोग गंगा के घाटों पर 'अल्ला -हो-अकबर' चिल्लाते हैं। जिससे हिन्दुओं के पूजापाठ में विघ्न होता है। यदि यह रोका नहीं जाएगा तो पण्डे उपद्रव कर डालेंगे।
    श्रीधर- है तो वास्तव में भयंकर अवस्था! कलेक्टर साहब इसके लिए उपाय क्या बताते हैं?
    गवर्नर- वे चाहते हैं कि प्रधान असहयोगियों को जेल में बंद करने की आज्ञा दी जावे। और, यह करना पड़ेगा।
    श्रीधर (सिर हिलाकर)- कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा।
    गवर्नर- क्या आप उन्हें कैद करने के पक्ष में नहीं हैं?
    श्रीधर- नहीं, मैं खिलाफ नहीं हूं।
    गवर्नर- मुझे भी यही आशा थी। कलेक्टर का कहना है कि 124 अ- का मुकदमा चलाने की इजाज़त दी जावे, कम से कम कांग्रेस कमेटी के सेक्रेटरी रामानुज पर।
    (रामानुज का नाम सुनकर श्रीधर चौंक पड़ता है)
    गवर्नर- मेरी राय तो है कि कलेक्टर को अनुमति दे दी जावे।
    श्रीधर (चिंतित होकर)- पर उससे तो आंदोलन अधिक बढ़ेगा!
    गवर्नर (तुच्छता की हंसी हंसकर)- ब्रिटिश साम्राज्य के किस हिस्से में आंदोलन नहीं है? आयरलैंड, मिस्र, मेसोपोटेमियां, अज़रबैजान, ईराक, पैलेस्टाइन, अफ्रीका, हिन्दुस्तान, लंका, बर्मा, फिजी, सब जगह आंदोलन है, बलवा भी है, कहीं अधिक, कहीं कम। ऐसी अवस्था में शासन करना हमारे लिए तो स्वाभाविक हो गया है। हमारे विरुद्घ आंदोलन जितना बढ़ता है हमारी दृढ़ता भी उतनी ही बढ़ती है। ब्रिटिश जाति संसार भर की सबसे अधिक दृढ़ व निश्चयी जाति है, उसकी रगें लोहे की बनी हुई हैं।
    श्रीधर- मैं ब्रिटिश शक्ति का लोहा मानता हूं, किन्तु आंदोलन, आंदोलन ही है।
    गवर्नर- अजी, यह आंदोलन सन् सत्तावन के गदर से अधिक भयंकर नहीं हो सकता।
    श्रीधर- नहीं, वैसा तो हम भी नहीं होने देंगे। इसीलिए तो हम असहयोगियों का साथ नहीं देते।
    गवर्नर- यह मैं जानता हूं। परन्तु तटस्थ रहना भी एक प्रकार से सहायता पहुंचाना है।
    श्रीधर- हम तटस्थ तो नहीं है। हम तो सरकार के साथ हैं।
    गवर्नर- मैं मानता हूं कि आप सरकार के साथ हैं और सुधारों को पूर्णरूप से सफल बनाना चाहते हैं। परन्तु यह भी सच है कि जो लोग सुधारों के कट्टर शत्रु हैं उन्हें आप स्वच्छंद छोड़ देना चाहते हैं। ये दोनों कार्य एक साथ कैसे हो सकते हैं?
    श्रीधर- पहले भी मुझसे लोगों ने इस प्रकार कहा था पर मैंने सोचा था कि कोई बीच का मार्ग निकाल लेंगे।
    गवर्नर- बीच का मार्ग निकालने की बात सोचना वास्तव में दायित्वपूर्ण राजनीतिज्ञ के ही योग्य है। परन्तु देखिए न, असहयोगियों ने अपने बलवे के उपदेशों और कार्यों से अवस्था ऐसी कर दी है कि सरकार के लिए अपनी शक्ति दिखाने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं रहा है। आप लोगों को भी अपना अस्तित्व रखना हो तो सरकार का पूरा साथ देना चाहिए। असहयोगियों ने आप लोगों के प्रति इतनी घृणा उत्पन्न कर दी है कि जनता के बीच आप लोगों के लिए कोई स्थान ही नहीं।
    श्रीधर- यह बात ठीक है परन्तु फिर भी हमें समाज में तो हिन्दुस्तान के ही रहना है।
    गवर्नर- मैं आपकी कठिनाई का पूर्ण रूप से अनुभव करता हूं, और मुझे यह भी मालूम हुआ है कि यह रामानुज आपका मित्र है।
    श्रीधर (कुछ सहमकर)- हां, है तो ऐसा ही, मामूली। (कुछ देर चुप रहकर) पर राजनीति में कौन किसका मित्र! (फिर चुप रहकर) हम दोनों साथ-साथ पढ़ते थे (फिर चुप रहकर) इधर तो बहुत दिनों से नहीं मिले।
    गवर्नर (दृढ़ता से)- देखिए, छोटी-छोटी बातें तय करने में इतना समय लग जाता है। इतना वाद-विवाद होता है तो इस मंत्रित्व से क्या लाभ, और कार्य ही कैसे चलेगा?
    श्रीधर (मानो चौंककर)- वही तो, मैं तो कहने वाला था (चुप हो जाता है।)
    गवर्नर- देखिए, राज्य शासन की कठिनाइयां तो आप जानते ही हैं। निर्णय शीघ्र होने चाहिए।
    श्रीधर (किंकर्तव्यविमूढ़ भाव से)- जी हां, अच्छा, कुछ नहीं। पर हां, रामानुज पर 124 अ लागू भी हो सकती है कि नहीं?
    गवर्नर- उसके भाषण की रिपोर्ट मैंने एडवोकेट जनरल को भेज दी थी। उनकी राय है कि 124 अ लागू हो सकती है।
    श्रीधर (संतोष प्रकट करते हुए)- हां मेरा तात्पर्य यही था। आप अपना कानूनी पहलू मजबूत कर लीजिए, कहीं ऐसा न हो कि अदालत में जाकर सरकार ही फंस जावे, और उसकी हंसी उड़े।
    गवर्नर (हंसते हुए)- सरकार का कानूनी पहलू तो उसी दिन और सदा के लिए मजबूत हो गया जिस दिन 124 अ की रचना हुई। शब्दों का जाल इस खूबी से बुना गया है कि उसमें सारा विश्व फंस सकता है।
    श्रीधर- तब भी अदालत, अदालत ही है।
    गवर्नर- उसकी चिंता न कीजिए। असहयोगी लोग मुकदमे की पैरवी तो करते ही नहीं।
    श्रीधर- कीजिए जो कुछ करना हो, हमें क्या? हम तो सुधार सफल करना चाहते हैं। हमें तो किसी प्रकार स्वराज्य चाहिए।
    गवर्नर- आपकी इस राजभक्ति पूर्ण सम्मति और स्वराज्य की चाह पर धन्यवाद।
    (गवर्नर खड़े होकर श्रीधर से हाथ मिलाते हैं। श्रीधर भी खड़ा होकर हाथ मिलाता है। और जाने लगता है। वह कुछ उदास दीखता है)
    गवर्नर- ज़रा सुनिए (श्रीधर रुकता है) आज शाम को ही पार्टी है, आइएगा।
    श्रीधर- अवश्य।
    (श्रीधर जाता है)
    (पटाक्षेप)


    पांचवा दृश्य
    उर्मिला अपने मामा के घर श्रीरामनगर आई है। उसके मामा बाबू आनंदीप्रसाद पक्के सहयोगी हैं। बादशाह की पिछली वर्षगांठ पर उन्हें 'राय साहब' की उपाधि मिली है और उससे एक वर्ष पहले वे आनरेरी मजिस्ट्रेट बना दिए गए थे। घर में ज़मींदारी है और वे खुद वकालत करते हैं वे कौंसिल के लिए खड़े भी हुए थे परन्तु कुछ असहयोगियों ने एक नीच जाति के आदमी को उनके खिलाफ खड़ा करके उन्हें हरवा दिया। तब से वे असहयोगियों से बहुत चिढ़े हुए हैं। उर्मिला उनके घर खादी के कपड़े पहिनकर आई तो उनको बहुत बुरा लगा। उर्मिला में और उनमें असहयोग पर प्रतिदिन वाद-विवाद हुआ करता है। आनंदी प्रसाद जी का मकान सड़क पर है। उर्मिला बरांडे के कोने के कमरे में बैठी है। बाहर सड़क पर रामानुज तथा कुछ स्वयंसेवक खादी बेचने के लिए आए हैं। वे सब राय साहब आनंदी प्रसाद जी के मकान के सामने रुक जाते हैं।)
    रामानुज- क्यों, मोहन, रुक क्यों गए? भीतर चलो।
    मोहन- जानते तो हो, यह रायसाहब का मकान है।
    रामानुज- तो क्या हुआ? मकान में रहने वाले सब लोग तो राय साहब नहीं है। हमारा तो कर्तव्य है कि प्रत्येक घर में जाकर खादी का प्रचार करें।
    मोहन- भाई, मैं इनके घर में नहीं जाऊंगा। वे असहयोग के कट्टर शत्रु हैं।
    रामानुज- इसीलिए मैं अवश्य जाऊंगा। हमें तो अपने शत्रुओं को भी प्रेम से जीतना है।
    मोहन- जाकर तुम्हीं प्रेम करो, मैं आगे के मकान देखता हूं।
    रामानुज- अच्छी बात है, यहां विवाद से क्या लाभ? लाओ, ज़रा अच्छे-अच्छे कपड़े मुझे दे दो।
    (वे दोनों आपस में कपड़े छांटते हैं। उसके बाद रामानुज राय साहब के मकान के फाटक के अंदर जाता है और मोहन आगे के मकान की ओर बढ़ता है।)
    मोहन (रामानुज की ओर हंसते हुए)- बहुत अधिक प्रेम मत करने लगना।
    (रामानुज हंसते हुए सिर हिलाते-हिलाते भीतर जाता है।)
    रामानुज (सामने दरबान को खड़े देखकर)- राय साहब हैं?
    दरबान (आदर से प्रणाम करके)- कहीं बाहर गए हैं। आपको क्या काम है?
    रामानुज- खादी बेचने आए हैं। राय साहब नहीं तो उनके घर में और कोई खादी लेगा, पूछ तो आओ।
    दरबान (हंसते हुए)- महाराज, इहां कहां सज्जन कर बासा। हां, पर...
    रामानुज- पूछकर तो देखो। (दरबान जाता है)
    रामानुज (जोर से कहता है)- कहना, हाथ के कते सूत की हाथ की बुनी शुद्घ खादी है।
    (भीतर से आवाज़ आती है)- दरबान, हम खादी लेंगे, बरांडे में बुलवाओ।
    (रामानुज बरांडे में जाता है। परदा हटाकर एक युवती-उर्मिला-ड्योढ़ी पर आकर ठिठक जाती है। वह 'आइए' कहने ही वाली थी कि सिर्फ 'आ' कहकर उसके होंठ आश्चर्य से खुले रह जाते हैं। रामानुज उसकी ओर देखता है और विस्मित-सा खड़ा रह जाता है)
    दरबान- हुजूर, जाता हूं। ये चिट्ठी डालनी है।
    (दरबान जाता है रामानुज और उर्मिला कुछ समय तक निस्तब्ध खड़े रहते हैं।)
    रामानुज (सलज्ज मुस्कुराहट से)- खादी लीजिएगा।
    उर्मिला (मानो सुना ही न हो)- खादी!
    रामानुज- जी हां, सब प्रकार की हैं।
    उर्मिला (मुस्कुराकर)- इन सबकी कीमत क्या होगी!
    रामानुज- यों ही होगी करीब एक सौ रुपए!
    उर्मिला (आश्चर्य से)- यह एक सौ की!
    रामानुज- देखिए न, बेज़वाड़ा की भी है।
    (रामानुज आगे बढ़कर उर्मिला के हाथ में खादी की साड़ी देता है। उसे संभलवाने के प्रयत्न में उसका हाथ उर्मिला के हाथ से छू जाता है। दोनों कांप उठते हैं और दोनों के हाथ से साड़ी छूटकर नीचे गिर जाती है। दोनों उसे उठाने के लिए झुकते हैं। किन्तु रामानुज का हाथ शीघ्रता के कारण खादी पर न पड़ते उर्मिला के हाथ पर पड़ जाता है। दोनों एक-दूसरे की ओर देखते हैं और रामानुज के मुंह से दबे हुए स्वर में निकल पड़ता है, 'उर्मिला')
    उर्मिला (नीचे सिर किए हुए)- ओहो! मुझे पहिचानते हो।
    रामानुज- और तुम क्या भूल गईं?
    उर्मिला- मैंने तो आज जाना...
    (भीतर से किसी स्त्री की आवाज़ आती है 'उर्मी'!)
    उर्मिला (सावधान होकर और पीछे हटकर) हां, मामी यहां हूं। देखो, यह स्वदेशी खादी बिकने आई है, यहां।
    (उर्मिला की मामी आती है। वह बढिय़ा रेशमी साड़ी पहिने है। वह यह कहती हुई आती है)- तुझे खादी ही सूझती है।
    (किन्तु वह रामानुज को देखकर चुप हो जाती है। रामानुज उसे प्रणाम करता है)
    मामी (प्रणाम करके)-आप खादी बेचने आए हैं। बैठिए न। (कुर्सी की ओर इशारा करती है। रामानुज बैठता है) हमारे घर में तो कोई खादी नहीं पहिनता। इस उर्मिला को ही खादी का शौक है।
    रामानुज-आप देखिए तो महीन खादी भी है। (महीन खादी उसके हाथ में देकर) यह बेज़वाड़ा की है। कैसी अच्छी है! कोई कह नहीं सकता कि यह हाथ का सूत है।
    उर्मिला- मामी तुम खादी देखो, मैं रुपए लेकर आती हूं।
    (उर्मिला जाती है। ओट में होती हुई एक बार मुड़कर पीछे देखती है और वहां से कहती है) ''मामी को सब प्रकार की खादी दिखाइए" (और मुस्करा देती है।)
    रामानुज (उधर देखता है और अपनी मुस्कुराहट को रोकने का प्रयत्न करके कहता है)- और यह देखिए बुलंद शहर की कैसी बढिय़ा छपी है (मामी छपी हुई खादी लेकर देखती है। बाहर गाड़ी रुकने की आवाज़ सुनाई देती है और कोई भीतर आता हुआ मालूम होता है। राय साहब आते हैं। मामी खड़ी हो जाती है। रामानुज भी खड़ा होकर प्रणाम करता है। राय साहब वह सब दृश्य देखकर पहले तो कुछ रुष्ट मालूम होते हैं, परन्तु फिर सौम्य हो जाते हैं।)
    मामी (राय साहब को खादी दिखाकर)- ये खादी बेचने आए हैं।
    राय साहब (रामानुज की ओर देखकर और मानो कुछ याद करके)- आप तो यहां की कांग्रेस कमेटी के सेक्रेटरी हैं। आप रामानुज हैं न? मैं तो आपको अच्छी तरह जानता हूं। आपको मालूम होगा, जब आप स्कूल में पढ़ते थे तब मैंने आपको एक बार 'प्राइज़' दिया था।
    रामानुज- जी हां, लीजिए, कुछ खादी लीजिएगा? रायसाहब- (मामी की ओर हाथ करके) ये लोग देखेंगे। मुझे फुरसत नहीं है।
    (चलते चलते) पर आप कभी मुझसे मिलिएगा।
    रामानुज- ज़रूर मिलूंगा।
    (राय साहब जाते हैं। उर्मिला आती है)
    उर्मिला- मामी, कोई खादी पसंद आई?
    मामी- हां, अच्छी तो हैं।
    उर्मिला- तो फिर कुछ खरीद लूं?
    मामी- हां, खरीद लो।
    उर्मिला- मैं तो ये सब खरीदती हूं।
    (रामानुज से) इन सब की ठीक कीमत कितनी हुई।
    (रामानुज हिसाब लगाता है)
    मामी- सब?
    उर्मिला- हां, मामी, दो जोड़ी साडिय़ां तो भौजी को भेजूंगी और यह एक (दिखाकर) तुम्हें पहिनाऊंगी। पहिनना तो, मामा जी कुछ नहीं कहेंगे।
    रामानुज- सब की कीमत 89 रुपए होती है।
    उर्मिला- (अपनी जेब से नोट की गड्डी में से कुछ नोट निकालकर बाकी दे देती है)- ये लो 90 रुपए हैं।
    (रामानुज नोट लेकर गिनने लगता है)
    उर्मिला- (शीघ्रता से)- आप गिनिएगा पीछे। पहिले 11 आने वापस कर दीजिए। मामी, चलो, मामा जी बुला रहे थे।
    (रामानुज जेब से पैसे निकालकर 11 आने उर्मिला को देता है। उर्मिला हाथ में पैसे ले लेती है पर वे गिर जाते हैं। दरबान आता है)
    उर्मिला- दरबान, ये पैसे गिनकर और कपड़े लेकर अंदर आओ। (उर्मिला और मामी अंदर जाती हैं। दरबान पैसे गिनता है और बाद में कपड़े उठाकर अंदर जाता है और रामानुज बाहर के लिए रवाना होता है। उर्मिला लौटकर आती है परन्तु रामानुज को न पाकर दरवाजा बंद करने के बहाने किवाड़ पकड़कर केवल खड़ी रह जाती है फिर रामानुज के ओट में होते ही चली जाती है। रामानुज राय साहब के मकान से आगे बढ़ता है उसके चेहरे पर संजीवनी स्मृति सी मुस्करा रही है। वह कुछ आगे बढ़ा ही था कि एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर और चार सिपाहियों ने आकर उसे रोका)
    सब-इंस्पेक्टर (रामानुज को)- महाशय आपके नाम वारंट है। मैं आपको गिरफ्तार करता हूं।
    रामानुज- तैयार हूं।
    (सब इंस्पेक्टर रामानुज को वारंट देता है)
    सब इंस्पेक्टर- महाशय, माफ कीजिए, मैं मजबूर हूं। मुझे ड्यूटी करनी ही पड़ती है। आपको हथकड़ी लगाई जाएगी।
    रामानुज (प्रसन्नता से)- वाह, शौक से लगाइये। इसमें माफी की बात क्या है?
    (रामानुज हाथ आगे कर देता है। एक सिपाही रामानुज के हाथों में हथकड़ी भरता है। इतने में वहां पर आसपास से दर्शक इकट्ठे हो जाते हैं।
    सब इंस्पेक्टर (घबराकर एक सिपाही से)- रामअधीन, रस्सी से कस दो।
    (सिपाही रामअधीन रामानुज के हाथ पीठ वगैरह रस्सी से लपेट कर कसता है।)
    एक दर्शक- देखना, जादूगर है, फिर भी निकल जावेगा।
    (सब लोग हंस पड़ते हैं। सब-इंस्पेक्टर क्रोध से पीछे मुड़कर देखता है, परन्तु उसका चेहरा खिन्न और लज्जित है।)
    सब इंस्पेक्टर (लोगों से)- चलो, हटो, भीड़ मत करो।
    (एक यूरोपियन अफसर तांगे पर आता है)
    तांगे वाला (लोगों से)- हटो, हटो, ए हटना, बचना, भाई।
    (पर भीड़ नहीं हटती। वह यूरोपियन लोगों को कोड़े मारकर हटाते हुए रामानुज के पास आता है। उसके कोड़े मारते ही लोग चिल्ला उठते हैं ''महात्मा गांधी की जय।")
    यूरोपियन अफसर (अंग्रेजी में रामानुज से)- उम्मीद है, आपको कोई तकली$फ नहीं है।
    रामानुज (नम्रता से)- जी नहीं, धन्यवाद।
    (मोहन दौड़ता हुआ आ पहुंचता है। वह रामानुज के चरण छूना चाहता है। यूरोपियन अफसर और सिपाही उसे रामानुज के पास नहीं जाने देते, पर वह जबरदस्ती घुस पड़ता है और रामानुज के चरण छूने को नीचे झुकता है। परन्तु, रामानुज उसे बीच में ही थामकर गले से लगाता है। लोग चिल्ला उठते हैं ''महात्मा गांधी की जय।"
    ऊपर राय साहब के मकान की खिड़की खुलती है और उर्मिला झांकती है। एक साथ चिंता और प्रसन्नता! उत्सुकता तो उसे इतनी है कि मानो खिड़की में से कूद पड़ेगी। परन्तु वह, खिड़की से पीछे हटकर अंदर चली जाती है।)
    दर्शक (आग्रह के साथ रामानुज से)- ''महाराज, एक दो शब्द उपदेश के कहते जाइए।"
    (यूरोपियन अफसर सब-इंस्पेक्टर के कान में कुछ कहके चला जाता है।
    रामानुज (सब-इंस्पेक्टर से)- कहिए, जनाब मुझे बोलने की इजाजत है?
    सब-इंस्पेक्टर (घबराए हुए स्वर से)- कहिए, पर मैं... देखिए, समय बहुत थोड़... थोड़ा है।
    रामानुज- दोस्तो
    दर्शक- इस चबूतरे पर खड़े होकर कहिए।
    (सिपाही और रामानुज चबूतरे पर जाकर खड़े होते हैं)
    सब दर्शक- महात्मा गांधी की जय।
    रामानुज- दोस्तो, आप कुछ कहने का आग्रह करते हैं। सब-इंस्पेक्टर साहब फरमाते हैं कि समय बहुत थोड़ा है। मैं भी कहता हूं कि समय बहुत थोड़ा है, कर गुज़रिए जो कुछ करना है। सरकार समझती है कि वह अब मुझे जेल में भेज रही है। परन्तु मैं तो अपने को पहले से ही जेल का कैदी समझता था। यह सारा हिन्दुस्तान हम हिन्दुस्तानियों के लिए जेल है, जिसमें मैं भी उसी तरह कैद हूं जैसे मेरे भाई ये सब-इंस्पेक्टर,और मैं तो यहां तक कहूंगा कि सरकार के मिनिस्टर तक। मुझमें और इनमें फर्क इतना ही है कि जैसे जेल में दूसरे कैदियों से काम लेने के लिए और, हां, तंग करने के लिए भी कैदी वार्डर मुकर्रर किए जाते हैं और उन्हें खास तरह की वर्दी और खास सहूलियतें दी जाती हैं वैसे ही ये सरकारी वर्दी वाले नौकर और मिनिस्टर भी हमारे लिए कैदी वार्डर हैं। मैं अपने साथी कैदियों और इन कैदी वार्डरों से भी यह अंतिम प्रार्थना करूंगा कि भाई, कब तक, कब तक खुद कैद में रहोगे और सारे देश को कैद में रखोगे?
    (यूरोपियन अफसर कई सिपाही लेकर आता है। व्याख्यान बंद हो जाता है। उसी समय राय साहब का दरबान एक फूलों की माला लेकर आता है और रामानुज के गले में डालता है। सब लोग 'वंदे मातरम्' और 'अल्ला हो अकबर' चिल्ला उठते हैं। रामानुज की दृष्टि राय साहब के मकान पर पड़ती है। वहां खिड़की में उर्मिला खड़ी है। यूरोपियन अफसर रामानुज को तांगे में बैठाता है और पुलिस के सिपाही तांगे को घेर लेते हैं। तांगा आगे बढ़ता है रामानुज सबको 'वंदेमातरम्' कहता है। उसकी दृष्टि खिड़की की ओर भी है। शोर होता है 'वंदेमातरम्, रामानुज की जय, महात्मा गांधी की जय, मौलाना मुहम्मद अली शौकत अली की जय, अल्ला हो अकबर', सब लोग जाते हैं। उर्मिला अभी भी टकटकी लगाए खिड़की में खड़ी है।)
    (पटाक्षेप)

    छठवां दृश्य
    (राय साहब के मकान के बैठक खाने में, मामी और शशि मखमली गद्देदार सोफा पर टिकी हुई बातें कर रही हैं। कमरा बिलकुल यूरोपियन ढंग से सजा है। सामने दीवाल पर बादशाह पंचम जार्ज और महारानी मेरी का दिल्ली दरबार के समय का तैल चित्र टंगा है। ठीक उसके नीचे राय साहब का एनलाज्र्ड फोटो है जिसमें वे राय-साहबी का तमगा लगाए और सर्टिफिकेट हाथ में लिए खड़े हैं। इस फोटो के एक ओर आनरेरी मैजिस्ट्रेटी का सर्टिफिकेट शीशे में मढ़ा हुआ टंगा है, और दूसरी ओर रायसाहबी की सनद मढ़ी हुई लटक रही है। कमरे भर में बादशाही खानदान के लोगों की तस्वीरें और स्थानीय अंग्रेज अफसरों के फोटो हैं। यूरोपियन चित्रकारों के बनाए हुए चित्र भी हैं। कमरा तरह-तरह की मेजों और कुर्सियों से भरा है। नीचे कालीन बिछा है। दरवाजों पर बारीक जालीदार परदे दोनों ओर बंधे हैं, और नकली मोतियों तथा कांच की बारीक नलियों की चिकें पड़ी हुई हैं। मामी ने आज वे•ावाड़ा की महीन साड़ी पहिनी है, और शशि के शरीर पर एक रंगीन विलायती साड़ी है।)
    मामी- तो, यज्ञ का मुहुर्त कब है?
    शशि- कल सात बजे।
    मामी- मैं तो उस यज्ञ का नाम बार-बार भूल जाती हूं।
    शशि- पुत्रेष्ठि यज्ञ, त्रिपुर सुन्दरी के मंदिर में होगा।
    मामी- बहू, अच्छा हो, किसी तरह लड़का हो जावे। मेरा तो सुम्मन जब से गया...
    (मामी अपनी आंखों के आंसू पोंछती है)
    शशि (आश्चर्य से)- सुम्मन? कब?
    मामी- मैं पहले सुम्मन की कह रही थी।
    शशि (संतोष के साथ हंसकर)- वही तो मैंने सोचा सुम्मन को तो मैंने अभी आंगन में खेलते देखा है।
    मामी- उसी की याद में हमने इसका नाम भी सुम्मन रखा है। बहुत जप तप करने के बाद यह लड़का मिला है। (उद्वेग से) पर बहू, घर के आदमी भी बड़े हठी होते हैं, जप तप के लिए राजी ही नहीं होते।
    शशि- यही तो...
    मामी- मुझे तो दो साल तक घर के देवता मनाने पड़े, तब कहीं स्वर्ग के देवता मना पाई।
    शशि- घर-घर यही हाल है। मैं भी कब से उनके पीछे पड़ी हूं। बड़ी मुश्किल से राजी हुए।
    मामी (उत्सुकता से)- क्या कहते थे।
    शशि- कहते क्या? यही कि मुझे फुरसत नहीं, यहां का दौरा है, वहां जाना है; आज गवर्नर ने बुलाया है, कल फलानी जगह पार्टी है, यहां मानपत्र है, वहां भाषण हैं। कई करोड़ आदमियों का काम करना पड़ता है, कुछ थोड़ा है?
    मामी- सच है। उन्होंने तो कभी ज़मींदारी भी नहीं की। (शशि हतप्रभ हो जाती है) फिर यह करोड़ों की बादशाहत संभालना? बड़ा मुश्किल है। सुम्मन के चाचा को तो कमिश्नर ने कहा था, आपकी बड़ी भारी ज़मींदारी है, आप सब काम जानते हैं, कौंसिल में ज़रूर जाइए।
    शशि (खिन्न होकर)- फिर, क्यों नहीं गए?
    मामी- जाते कहां से, यह असहयोग बीच में कूद पड़ा न।
    शशि- तो क्या रायसाहब असहयोग के कारण कौंसिल में नहीं गए?
    मामी- और नहीं तो क्या? असहयोगियों ने इनके मुकाबले में एक नीच जाति के आदमी को खड़ा करके चुनवा दिया।
    शशि- ये असहयोगी बड़े झूठे हैं। कहते हैं, कौंसिलों का बहिष्कार करो और उधर उम्मीदवार भी खड़े करते जाते हैं। अब रायसाहब क्या कहते हैं?
    मामी- कहते हैं, और सच भी, कौंसिलों में जनता के सच्चे प्रतिनिधि नहीं हैं।
    शशि- क्या जो लोग कौंसिलों में गए हैं वे जनता के प्रतिनिधि नहीं हैं?
    मामी- हां, ये माडरेट जनता के प्रतिनिधि नहीं हैं और न हो सकते हैं। जनता के सच्चे प्रतिनिधि हैं, ज़मींदार, ताल्लुकेदार, वगैरह, सारे देहातों के लोग जिनकी रिआया है।
    शशि- यह बात ठीक है, अपने घर तो काफी ज़मींदारी है।
    मामी- ज़मींदारी को क्या करें, बहू एक लाल के बिना सब धन दौलत सूनी है।
    शशि- मैं भी उन्हें कहा करती हूं लाल के बिना 'मिनिस्टरी' में कुछ भी सुख नहीं।
    मामी- सच तो है।
    शशि- पर वे चिढ़ते हैं। मैं कहती हूं, सरकार के पास सब कुछ ताकत है। वह धन दौलत और 'मिनिस्टरी' तो देती है, लड़का भी दे सकती तो अच्छा होता।
    (दोनों हंसती हैं। एक नौकरानी लड़की आती है। उसके हाथ में अखबार है।)
    नौकरानी- हुजूर, यह अखबार आया है।
    (यह अखबार मामी को देती है। शशि मामी से अखबार लेकर खोलती है और इधर-उधर पढ़ती है।)
    मामी (लड़की से)- आज एक ही आया?
    लड़की- दूसरा, बीवी जी को दे आई हूं।
    शशि (अखबार में पढ़कर आश्चर्य से)- रामानुज गिरफ्तार!
    मामी- खबर आ गई? कल अपने मकान के ही पास तो पकड़े गए थे।
    शशि (मन में पढ़ती हुई)- हां, इसमें लिखा है और यह भी लिखा है कि गिरफ्तारी के समय राय साहब के घर से फूलों की माला भेजी गई थी जो श्री रामानुज को पहिनाई गई।
    मामी (शीघ्रता से)- क्या, देखूं तो। माला हमारे घर से?
    (शशि अखबार देती है और उंगली से वह वाक्य बताती है।)
    मामी (मन में पढ़कर)- झूठ बात! ये असहयोगी बड़े झूठे हैं। हमें बदनाम करने के लिए ऐसी बातें छापते हैं।
    शशि- होगा! ज़रा लाओ तो पूरा हाल तो पढ़ लूं।
    शशि (मामी से अखबार लेकर पढ़ती है)- 'श्रीयुत रामानुज- राय साहब दुर्गाप्रसाद के मकान में खादी बेचकर बाहर निकले ही थे कि पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने उन्हें वारंट दिखाया।'
    मामी (डर के)- यह भी छप गया? हे भगवान्! मैं पहले ही डरती थी। वे पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे! पर यह उर्मिला नहीं मानी, 90 रुपए की खादी खरीद ली।
    शशि (मुस्कुराते हुए)- उर्मिला ने खरीदी? उर्मिला कल से दिखाई नहीं दी, क्या करती है?
    मामी- कल से उसकी तबियत ठीक नहीं। सिर दुखता है, अपने कमरे में होगी। तुमने सब खबर पढ़ ली। लाओ, अखबार दो, तो मैं उन्हें यह दिखलाऊं।
    शशि- देती हूं, जरा...
    (शशि मन में शीघ्रतापूर्वक अखबार पढ़ती है)
    मामी (लड़की से)- जा, उर्मिला बीबी को तो बुला ला।
    (लड़की जाती है। शशि अखबार मामी को देती है।)
    मामी- बहू, बैठो, ज़रा मैं उन्हें अखबार दे आऊं।
    (पान दान आगे बढ़कर) लो, पान खाओ। उर्मिला आती ही होगी।
    (मामी जाती है। दूसरे दरवाजे से उर्मिला आती है। वह उदास है। उसके हाथ में एक अखबार है।)
    शशि- आओ, उर्मिला (ज़ोर देकर) बधाई!
    (उर्मिला सूखी मुस्कराहट से आकर बैठती है)
    उर्मिला (शून्यता से)- क्यों, किस बात की?
    शशि (व्यंग्य से)- बड़ी भोली।
    (उर्मिला सिर को इधर-उधर दबाती है)
    शशि- सिर बहुत दुखता है?
    उर्मिला- हां, थोड़ा-थोड़ा।
    शशि- मालूम होता है, हृदय का दर्द सिर में प्रकट होता है।
    उर्मिला (मुस्कुराकर)- यह तुम जानो।
    शशि- मिलन, विदा और पूजा, तीनों एक साथ! कहो है न बधाई का मौका?
    (उर्मिला सलज्ज भाव से चुप रहती है)
    शशि- वह तुम्हारी, कविता सार्थक हो गई। पर तुम उदास क्यों हो?
    उर्मिला (चैतन्य होकर)- नहीं तो।
    शशि- और, वह फूलों की माला भी मौके से मिल गई।
    (शशि प्रेम से उर्मिला के गले में हाथ डालकर उसे गले लगाती है। इससे उर्मिला के सिर का पल्ला खिसक जाता है और उसके जूड़े में लिपटी हुई आधी माला दिखाई देती है।)
    शशि- भेद खुल गया।
    उर्मिला (चकित भाव से)- क्या?
    शशि (उर्मिला के जूड़े से माला खींचकर और दिखाकर)- यही, मालूम होता है, जल्दी से खींचकर जितनी हाथ आई उतनी ही जोड़कर रामानुज के गले में डालने के लिए भिजवा दी गई थी।
    उर्मिला (आग्रह से)- भौजी, यह दे दो।
    शशि (हंसते हुए)- कबूल करो, तब दूंगी।
    उर्मिला (नीची निगाह से)- भला, इस तरह भी कबूल कराया जाता है। (दीन वाणी से) दे दो।
    (शशि माला देती है। उर्मिला उसे लेकर स्नेह से अपनी जेब में रखती है।)
    शशि- उर्मी, तुमने तो सौदा भी खूब किया।
    उर्मिला- मालूम होता है अखबार पढ़ लिया है। पर... भौजी...।
    शशि- क्या?
    उर्मिला- तुम्हें बुरा नहीं लगता?
    शशि- बुरा क्यों नहीं लगता, पर प्रेमी का संकट भी आनंददायी होता है। गिरफ्तारी की खबर एक क्षण बुरी लगी, परन्तु मैंने तो उसके विवरण में प्रेम-कहानी पढ़ी, और अब विरह विह्वल नायिका को अपने सामने प्रत्यक्ष देख रही हूं जिससे यह कौतूहल बढ़ गया है।
    उर्मिला- भौजी, इस कविता को छोड़ो। वे तो श्रीधर भैया के बड़े गहरे मित्र थे।
    शशि- क्यों नहीं (गंभीरता से) सचमुच रामानुज का गिरफ्तार होना बहुत बुरा हुआ। उन्हें आने दो।...
    उर्मिला- वे कब आवेंगे?
    शशि- क्या बजा है?
    उर्मिला- करीब बारह बज रहे होंगे।
    शशि- बस, इसी गाड़ी से आते होंगे। शायद उन्हें लेने के लिए गाड़ी गई है। मैं उनसे कहूंगी कि गवर्नर को कहकर रामानुज को छुड़वा दें। यह बहुत भद्दा काम हुआ। उर्मिला, सच कहती हूं (शर्म से सिर नीचा करके) तुम्हारे सामने मुझसे सिर ऊंचा नहीं किया जाता।
    उर्मिला- भौजी, तुमने सारा अखबार पढ़ा? उसमें सरकारी कम्यूनीक (विज्ञप्ति) पढ़ा?
    शशि- नहीं, अभी कहां पढ़ा?
    उर्मिला- लो, इसे पढ़ो तो।
    (उर्मिला शशि को अखबार देती है और कम्यूनीक (विज्ञप्ति) दिखाती है)
    शशि (पढ़कर)- गवर्नर ने गिरफ्तारी का हुक्म दिया है। मैं जरूर उनसे जोर दिलवाऊंगी।
    उर्मिला- पर, तुम इसका मतलब समझीं?
    शशि- क्या?
    उर्मिला (पढ़कर सुनाती है)- 'गवर्नर-इन-कौंसिल मंत्रियों की पूर्ण सहमति से यह आज्ञा देते हैं।Ó
    शशि- हां, इसका क्या मतलब?
    उर्मिला- श्रीधर भैया होम मेंबर हैं न?
    शशि- हां हैं तो, और गवर्नर उनकी बहुत मानते हैं। वे कहेंगे तो रामानुज जरूर छोड़ दिए जावेंगे।
    उर्मिला (चिढ़कर)- अब क्या खाक कहेंगे। कम्युनिक में तो लिखा है कि गवर्नर ने मंत्रियों की सलाह से गिरफ्तारी का हुक्म दिया है। इससे जाहिर है कि श्रीधर भैया ने इस गिरफ्तारी की सलाह दी थी।
    शशि (अविश्वास प्रकट करती हुई)- नहीं, यह कभी नहीं हो सकता। उनको आने दो, मैं पूछूंगी।
    (बाहर से किसी के आने की आवाज़ आती है। नौकर एक ट्रंक भीतर लाता है।)
    शशि- वे आ गए। यह उन्हीं का सामान है।
    उर्मिला- मालूम होता है, कई लोग आ रहे हैं। चलो, यहां से चलें।
    (दोनों उठकर जाती हैं।)
    (पटाक्षेप)


    सातवां दृश्य
    (रामानुज जेल की कोठरी में टहल रहा है। उसका मुकदमा अभी अदालत में दायर नहीं हुआ है। वह अपने ही कपड़े पहिने है। उसकी कोठरी अन्य कैदियों की कोठरी से अलग है। कमरे के सामने एक दरवाजा है जिसमें मोटे-मोटे सीखचें लगे हैं, और पीछे की दीवार में ऊपर एक झरोखा है। उसमें भी सींखचे लगे हैं। फर्श खुदा हुआ है। टहलते हुए रामानुज का हाथ जेब से टकरा गया और कुछ खन्न से बजा।
    रामानुज (जेब से नोट और पैसे निकालकर हंसते हुए)- अभी तक मुझे फुरसत नहीं मिली। जब से जेल में आया हूं मिलने वालों का तांता बंधा रहता है और जब मैं अकेला रहता हूं तो उस उर्मिला की याद में मस्त रहता हूं, रुपए लाने के लिए जाते समय दरवाजे के पास उसका मुस्कराना मैं कभी नहीं भुलूंगा। उस मुस्कुराहट की स्मृति मेरी सबसे मूल्यवान संपत्ति है जो इस जेल की कोठरी में भी मुझे बादशाह बना रही है। उर्मिला... (उसके हाथ से पैसे गिरते हैं।) हां तो मैंने हिसाब अभी तक नहीं किया। (पैसे उठाता है) हिसाब करके कांग्रेस कमेटी को रुपए लौटा दूं नहीं तो कोई मुफ्त में बदनाम कर देगा। (जेल का घंटा बजता है।)
    मोहन ने मानो चलते समय भविष्यवाणी कही थी- ''कहीं बहुत प्रेम मत करने लगना।" पर रामानुज की तकदीर में बहुत प्रेम कहां! दो धाराएं मिलने ही वाली थीं कि वह मामी का रेतीला टीला बीच में आ गया। अब आगे भी आशा नहीं। पर उसने रुपए देकर अलग होने की कितनी जल्दी मचाई? क्रूर! ऐसे लोग स्वभावत: क्रूर होते हैं। परन्तु वाह री! प्रेमी की अमर आशा! वह दरबान की माला, समझ बैठा हूं, उर्मिला ने ही भेजी होगी। अभी तक उसे हृदय से लगाए हूं (माला को ऊपर उठाकर चूमता है। फिर नोट गिनना शुरू करता है। गिनते-गिनते कहता है-)
    यह क्या? (एक पत्र निकलता है) पता नहीं किसके अक्षर हैं। (पत्र उलटकर आखिर में देखता है) उर्मिला! ईश्वर ये जेल में कैसे आया? (कुछ सोचकर) भूल से नोटों के साथ आ गया होगा। देखूं तो क्या लिखा है? (पत्र पढ़ता है) (यह तो मेरे ही लिए है।) उर्मिला भूल नहीं करती। (पत्र मन में पढ़ता है) वह बहुत प्रसन्न मालूम होता है। फिर दुबारा जोर से पढ़ता है।)
    प्रिय,
    जल्दी में हूं और वैसे भी समझ में नहीं आता कि तुम्हें क्या लिखूं। मुझे न जाने किस तरह विश्वास हो गया है कि तुम मेरे अन्तरतम की एक-एक प्रेरणा और भावना को जानते हो। फिर क्या लिखूं? खादी का धंधा अच्छा है, इसमें स्वार्थ भी है और परमार्थ भी। कभी-कभी इधर भी फेरी लगा दिया करना, पर रो•ा मत आना, नहीं तो मेरे पास खरीदने को दाम नहीं रहेंगे।
    -उर्मिला
    (वार्डर आता है।)
    वार्डर- महाराज आपसे कोई मिलने के लिए आया है।
    रामानुज- यहां पर?
    वार्डर- हां।
    रामानुज- यह तो नई बात है। वैसे तो मिलने के लिए मुझे सदा दफ्तर में जाना पड़ता है।
    वार्डर- आपके साथ का सभी व्यवहार नया है। वैसे तो हर एक मुजरिम की तलाशी लेकर कपड़ों को छोड़ उसका सब सामान जमा कर लिया जाता है। आपकी न तो तलाशी हुई, न चीजें ही रखाई गईं।
    रामानुज- मैं भी यही सोचता था। पर आज और नई बात कौन-सी हुई?
    वार्डर- कोई बड़े आदमी आए होंगे।
    (जेलर के साथ रायसाहब आनंदीप्रसाद आते हैं। वार्डर बिल्कुल सीधा खड़ा हो जाता है। रामानुज नोट वगैरह अपनी जेब में डालता है और रायसाहब को प्रणाम करता है।)
    राय साहब- भाई, अच्छी तरह तो हो। मुझे इस बात का दु:ख है कि मैं इससे पहले नहीं आ सका।
    जेलर (राय साहब से)- मुझे इजाज़त दीजिए। दफ्तर में काम है।
    राय साहब- जी हां, चलिए। मैं भी इनसे बातचीत करके आता हूं।
    (जेलर चलते समय वार्डर को आने का इशारा करता है। जेलर और वार्डर दोनों जाते हैं।)
    राय साहब (रामानुज से)- भाई, कोठरी तो बड़ी गंदी है। फर्श भी खुदा हुआ है। इसमें बड़ी तकलीफ होती होगी।
    रामानुज- जेल और तकलीफ का तो मामूली संयोग है।
    राय साहब- नहीं, मैं जेल कमेटी का मेम्बर हूं। मैं इस बात की डांट के शिकायत करूंगा। कोई आदमी यहां आता है तो क्या अपनी इज्जत गंवाने को आता है?
    रामानुज (हंसकर)- अजी रायसाहब, गुलामों की भी कहीं इज्जत हुआ करती है?
    राय साहब- नहीं, मैं इस बात को कभी नहीं सह सकता। हमारे युवक, माना कि, देशभक्ति के जोश में कुछ भला बुरा कर डालते हैं तो क्या उनके साथ ऐसा सलूक होना चाहिए? सचमुच यह सरकार शैतान है, महात्मा गांधी सच कहते हैं।
    रामानुज- राय साहब, यह आप क्या कहते हैं?
    राय साहब (बहुत नाराज होकर)- नहीं जी, मैं नहीं सह सकता इस बात को।
    रामानुज- अच्छा, यह तो बताइए, यहां आने का कष्ट कैसे उठाया?
    राय साहब- हां, मैंने आपसे उस दिन कहा था न कि कभी मिलिएगा। पर, अ$फसोस कि आप बीच में गिरफ्तार हो गए। मैं गिरफ्तारी के बाद कलेक्टर से मिला। वह बेचारा बड़ा ही नेक आदमी है। ऐसे भलेमानस अंग्रेजों में बहुत कम मिलते हैं।
    रामानुज- आपने व्यर्थ कष्ट उठाया। कलेक्टर क्या करता?
    राय साहब-कलेक्टर, आपकी गिरफ्तारी पर बहुत अफसोस जाहिर करके कहता था- ''मैं क्या करूं, विवश हूं।"
    रामानुज- यही तो मैं भी कहता था। वह बेचारा क्या कर सकता है।
    राय साहब- वह तो आपकी गिरफ्तारी के सख्त खिलाफ है। वह इस्ती$फा देने वाला था, पर ऊपर का दबाव पडऩे से रुक गया।
    रामानुज (गंभीरता से)- अच्छा!
    राय साहब- नहीं तो!
    रामानुज- तो फिर इस गिरफ्तारी में किसका हाथ है?
    (राय साहब धीरे से रामानुज के कान में कुछ कहते हैं।)
    रामानुज (चौंक कर)- नहीं, राय साहब, वे तो कांग्रेस कमेटी के प्रेसीडेंट हैं, कभी ऐसा नहीं करेंगे।
    राय साहब- आप अभी युवक हैं और श्रद्धालु हैं, आप क्या जानें?
    रामानुज- राय साहब, विश्वास नहीं होता।
    राय साहब- अच्छा, तो बताइये- आपकी तबियत हो न बताइए। सुनिए यह बात सच है कि नहीं, कि आप में और आपके सभापति में अनबन है, और वह है सिद्धांत की। यह अनबन दूर नहीं हो सकती। आपके सभापति नेता तो बने रहना चाहते हैं, परन्तु जोखिम नहीं उठाना चाहते। कहिए, सच है या नहीं?
    रामानुज- कहिए तो।
    राय साहब- मैं तो सब कुछ जानता हूं। आपकी कांग्रेस कमेटी के सभापति पक्के राजभक्त और जमींदार हैं। जब इस प्रांत में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तब कलेक्टर ने, जो यहां से चले गए हैं, उनके पिता को बुलाकर कहा कि अपने लड़के को असहयोग का नेता बनाकर कांग्रेस कमेटी का सभापति बनवा दो। आपके पद और प्रतिष्ठा को देखते हुए यह सरलतापूर्वक हो सकता है। आपका पुत्र सभापति की हैसियत से ऐसी चालें चलता रहेगा जिससे असहयोग का कुछ कार्य न हो पावे, पर नाम बना रहे और सरकार निश्चिंत रहे। इससे जनता में भी आपकी इज्जत बनी रहेगी। आपने भी धन और मोटरें देखकर उन्हें सभापति बना दिया। अब, कहिए, वे आपके कार्य में बाधक हुए हैं या नहीं।
    रामानुज- कहते, चलिए।
    राय साहब- अच्छा, सुनिए। आखिर को वह लड़का ही था, जोश में आकर सच्चा असहयोगी बनने लगा। उस समय उसकी गिरफ्तारी की चर्चा चली। आपको नहीं मालूम होगा, पर मैं जानता हूं कि उसे बचाने के लिए कितनी कोशिश करनी पड़ी। हम लोग सफल तो हुए, पर यह अफवाह उड़ ही गई कि उसने माफी मांग ली।
    रामानुज (आश्चर्य से)- क्या सचमुच मा$फी मांग ली थी?
    राय साहब- और नहीं तो क्या?
    रामानुज- राय साहब, तो हमारे देश का उद्धार कैसे होगा!
    राय साहब- कैसे होगा, यह तो परमात्मा ही जाने। परन्तु इस असहयोग में बड़े-बड़े भेद भरे पड़े हैं। बड़े-बड़े नेता, चुपचाप मा$फी मांगकर बच जाते हैं।
    रामानुज- राय साहब, ऐसा न कहिए। यदि यह सच भी हो तो दोष आंदोलन का नहीं, दोष हमारे ही भाइयों का है।
    राय साहब- बेशक। धोखेबाज लोग नेता बनकर सच्चे और निरपराध देशभक्तों को फंसा देते हैं। मैं जानता हूं, आप निरपराध हैं और विश्वासघात में फंसाये जाते हैं।
    रामानुज- उसकी चिन्ता न कीजिए। निरपराधों के कष्ट ही उद्धार का कारण हुआ करते हैं।
    राय साहब- यह तो मैं मानता हूं, पर आप ही सोचें, आप जेल जाएंगे तो बाहर कांग्रेस का कार्य कैसे चलेगा? भाई, हम लोग बूढ़े हो गए। अब हम अपने पुराने रंग-ढंग नहीं बदल सकते, पर इसका यह मतलब नहीं कि हम में देशभक्ति नहीं है और हम सच्चे देशभक्त को नहीं चाहते। हम किसी कारण से रायसाहबी नहीं छोड़ सकते, तो क्या हम दिल से कभी यह चाहेंगे कि कांग्रेस कमेटी नष्ट हो जावे? हम लोग ऊपर से चाहे जो कहते रहें, परन्तु हृदय से तो हम यही चाहते हैं कि महात्मा गांधी की जय हो।
    रामानुज (उत्साह से)- आपका आशीर्वाद ही चाहिए, विजय परमात्मा देगा।
    राय साहब- पर, आप क्यों व्यर्थ फंस रहे हैं?
    रामानुज- फंसने दीजिए; क्या उपाय है।
    राय साहब- उपाय? (प्रसन्नता से) मैं हर तरह तैयार हूं। सिर्फ थोड़ा-सा अफसोस जाहिर करना पड़ेगा।
    रामानुज (चिढ़कर) अफसोस! किस बात का अ$फसोस? मैंने कोई बुरा काम किया है?
    राय साहब- कहता कौन है कि आपने कोई बुरा कार्य किया है? परन्तु, मनुष्य से गलती हो ही जाती है। उदाहरणार्थ, देखिए, अहिंसा का सिद्धांत कितना नाजुक सिद्धांत है। तात्विक दृष्टि से देखा जावे तो सिवा महात्मा गांधी के उसे कोई दूसरा आदमी नहीं समझता। इसीलिए व्यवहार में आप भी देखते हैं कि कई असहयोगी बहुधा मन और वचन से अहिंसक नहीं होते।
    रामानुज- राय साहब!
    रायसाहब- ज़रा मेरी बात तो सुन लीजिए। आप ही देखिए, आप व्याख्यान देते हैं; लोग जोर से तालियां पीटते हैं और आप भी जोश में आ जाते हैं। जोश में कही हुई बात सदा तुली हुई नहीं रहती। उसका मर्यादा से हट जाना बहुत संभव रहता है।
    रामानुज- तर्क की दृष्टि से तो मैं स्वीकार करता हूं पर...।
    राय साहब- (बीच में ही)- हां, मैं भी यही कहता था। जोश और जवानी ऐसी ही चीज़ है। फिर आप जो भाषण देते हैं, उसकी अक्षरश: रिपोर्ट तो आपके पास नहीं रहती, कि रहती है?
    रामानुज- नहीं।
    रायसाहब- ऐसी हालत में आप निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते कि आपसे कोई गलती नहीं होती। और मनुष्य से गलती होना स्वाभाविक है। To err is human जो मनुष्य कहता है कि मैं कभी गलती नहीं करता, वह या तो झूठा है या खुद धोखे में है, या फिर देवता है।
    रामानुज- यह बात तो सच है। गलती आदमी से हो ही जाती है। परन्तु क्या मैं छूटने की गरज से इस साधारण मानवी स्वभाव के परिणाम के लिए अदालत में माफी मांगू?
    राय साहब- नहीं, अगर कोई गलती हुई हो तो कांग्रेस कार्य जारी रखने की गरज से, स्वार्थ से नहीं, उस पर खेद प्रकट करना कुछ बुरा नहीं, आवश्यक है। उससे कांग्रेस का नैतिक बल बढ़ेगा।
    रामानुज- पर रायसाहब, कहा तो यह जावेगा कि मैंने माफी मांगी।
    राय साहब- अजी, कहने को तो अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जो आप पर कई प्रकार के दोष लगाते हैं।
    रामानुज- पर मैं अपनी ओर से जानबूझ कर दोष लगाने का मौका नहीं दूंगा।
    राय साहब- मालूम होता है, आपने इस विषय पर अधिक विचार नहीं किया है।
    रामानुज- विचार की आवश्यकता ही क्या है?
    राय साहब- नहीं, बिना बिचारे कोई कार्य नहीं करना चाहिए। अब भी समय है। मुकदमा सात दिन तक शुरू नहीं होता है। जल्दी करने की आवश्यकता नहीं। हर एक काम सोच समझकर करना चाहिए।
    (घंटा बजता है।)
    राय साहब (घड़ी देखकर)- बहुत समय हो गया। अब मैं जाता हूं। फिर आकर मिलूंगा। खूब सोचिए। इस स्वार्थ से नहीं कि आप बदनाम हो जावेंगे किन्तु इस दृष्टि से कि आप कांग्रेस का कार्य कर सकेंगे और उसे एक कायर को-आपरेटर के हाथ में निश्चेष्ट पड़ी रहने से बचा सकेंगे।
    (जाने लगता है)
    रामानुज- आपने बड़ी कृपा की। बंदे।
    राय साहब- (जाते-जाते)- कुछ नहीं, कुछ नहीं। (दूर जाकर) कांग्रेस का ख्याल रखना।
    (पटाक्षेप)

    आठवां दृश्य 


    (उर्मिला अपने कमरे में बैठी है। वह आज चिंतित और उदास है। उसके पास 'आज' की पुरानी फाइल पड़ी है। वह कुछ गा रही है)
    सांवरिया मुझे छोड़ गए, हां।
    छोड़ गए, कुछ जोड़ गए, कुछ तोड़ गए, हां।।
    दरशन प्यारे नयन ये, दिया करें जल दान।
    कहीं पुण्य जग जाए तो, लौटें फिर यजमान।।
    चरण पखारूंगी, हृदय चढ़ा लूंगी।
    पुछूंगी, क्यों मुंह मोड़ गए, हां ।। सांवरिया...।।
    हृदय भी विपरीत भावों का विचित्र सम्मिश्रण है। उनके जाने पर हृदय से बधाई भी उठती है, और उनके जाने पर हृदय से रुलाई भी उठती है। किन्तु हम युद्घ-क्षेत्र में खड़े हैं। यहां कमजोरों की आवश्यकता नहीं। मुझे दृढ़ता ही धारण करनी होगी।
    (इतने में शशि आती है।)
    शशि (शीघ्रता और प्रसन्नता से)- उर्मिला, सब ठीक हो गया।
    उर्मिला (उत्सुकता से)- क्या?
    शशि- मैंने उनसे कहा कि तुम्हारे कौंसिल में रहते हुए भी रामानुज गिरफ्तार हो जावे, यह बुरी बात है।
    उर्मिला- फिर क्या हुआ? उन्होंने तो गिरफ्तारी का समर्थन किया होगा, या उसे रोकने में अपनी असमर्थता बताई होगी।
    शशि- बातें तो बहुत-सी हुईं, पर अंत में उन्हें वचन देना पड़ा कि वे रामानुज को छुड़वा देंगे।
    उर्मिला- और तुम्हें विश्वास हो गया?
    शशि- क्यों नहीं। अभी इधर ही आते होंगे। तुम खुद बातचीत करके जाने लेना।
    उर्मिला- समझ में नहीं आता कि एक बार गिरफ्तारी की सम्मति देकर अब वे कैसे छुड़ा सकते हैं।
    शशि- यह तो मैं नहीं जानती। कौंसिल का काम कौंसिल वाले ही जानें। पर मैंने तो वचन ले लिया है।
    उर्मिला- मैं जानती हूं। इस समय छुड़ा लाने का एक ही उपाय है और उसके लिए प्रयत्न करने में सरकार और श्रीधर भैया का स्वार्थ है।
    शशि- तो क्या मेरे कहने का उन पर जरा भी असर नहीं पड़ा?
    उर्मिला- नहीं, यह तो मैं नहीं कहती। परन्तु मैं सब समझ गई। (सिर हिलाती है)
    (श्रीधर आता है, वह कुछ हतप्रभ सा है और उसकी आंखें नीची हैं। उर्मिला और शशि खड़ी हो जाती हैं)
    उर्मिला- बंदे, भैया।
    श्रीधर- बैठो, बैठो।
    (श्रीधर एक कुर्सी पर बैठ जाता है और शशि और उर्मिला भी अपनी जगह बैठती हैं।)
    श्रीधर- क्या कर रही हो, उर्मिला।
    उर्मिला- यह 'आज' की फाइल पढ़ रही थी।
    शशि- हां, अब मैं समझी। डिफेन्स तैयार कर रही थीं।
    (श्रीधर उदासी के साथ मुस्कुराता है।)
    उर्मिला- मैंने वकालत थोड़े ही पास की है, और वकालत भी क्या भैया के खिलाफ करूंगी।
    श्रीधर (खिन्न भाव से)- क्यों, उर्मिला ऐसा क्यों कहती है?
    उर्मिला- भूल गई। अब तो आप रामानुज को छुड़ाने का प्रयत्न कर रहे हैं। सुनती हूं, वचन दे चुके हैं।
    श्रीधर (हंसकर)- मालूम होता है, इसने (शशि की ओर इशारा करके) सब कुछ कह दिया है।
    उर्मिला- पर, भैया, इसके पहले वचन दे आए हो गवर्नमेण्ट हाउस में। दोनों वचन कैसे निबाहोगे?
    श्रीधर- उर्मिला, तू मुझे अपने ढंग से काम करने दे। विश्वास रख, मैं सब मामला ठीक कर दूंगा। तू जानती है कि मैं रामानुज का बचपन का मित्र हूं। मेरा और उसका इतना घना संबंध है कि वह मुझे भाई साहब लिखा करता है।
    उर्मिला- पर, मैं यह भी जानती हूं कि आप सरकार के भी मित्र हैं।
    श्रीधर- ठीक है, पर तू धीरज तो रख।
    उर्मिला (मुस्कुराकर)- मैं उत्सुक ही कब थी?
    शशि- तुम लोग बातें करते रहो। मैं अभी आती हूं। मामी जी से कुछ काम है।
    (शशि उठकर जाती है परन्तु हाल के दरवाजे के पास जाकर फिर लौट आती है और कहती है)- मामा जी आ गए हैं।
    (शशि कमरे के दूसरे दरवाजे से चली जाती है।)
    श्रीधर- राय साहब? (उर्मिला से) अच्छा ठहरो, उर्मिला, मैं आता हूं।
    (श्रीधर हाल में जाता है। उसके चले जाने के बाद उर्मिला भी उठकर हाल के दरवाजे के पास जाकर खड़ी हो जाती है और परदे के पास कान लगाकर भीतर की बातें सुनती है। वह पहले मुस्कुराती है। फिर प्रसन्नतापूर्वक सिर हिलाती है, किन्तु उसकी प्रसन्नता धीरे-धीरे उदासी और भय में परिणत होती जाती है। वह दरवाजे से हटकर शीघ्रता से आकर अपनी कुर्सी पर बैठ जाती है और अखबार पढऩे लगती है। बाद में श्रीधर आता है और एक कुर्सी पर बैठता है।)
    उर्मिला- मामा, कहां गए थे?
    श्रीधर- मेरा वचन पूरा करने।
    उर्मिला (उत्सुकता से)- याने?
    श्रीधर- मैंने उन्हें रामानुज से मिलने भेजा था।
    उर्मिला- क्यों? यह राय साहब हैं , जेल में उनसे मिलने जावेंगे तो सरकार नाराज नहीं होवेगी?
    श्रीधर- जेल के मामलों में तो सरकार में हूं।
    उर्मिला- हां, मैं भूल गई थी। फिर क्या हुआ?
    श्रीधर- होना क्या? अभी प्रयत्न हो रहा है। आशा है, रामानुज छूट जावेगा।
    उर्मिला (प्रसन्नता दिखाकर)- सच? पर, कैसे?
    श्रीधर- मामूली सी बात है। किसी बात पर ज़रा अफसोस ज़ाहिर कर देना काफी है।
    उर्मिला- राज़ी हो गए?
    श्रीधर- कुछ, कुछ।
    उर्मिला- मुझे तो विश्वास नहीं होता।
    श्रीधर- पर, इस बात को तो तुम मानती हो कि रामानुज का छूटना जरूरी है।
    उर्मिला- क्यों, यह कैसे जाना?
    श्रीधर- उर्मिला, मैं जानता हूं। कॉलेज में मैं और रामानुज बड़े घनिष्ट मित्र थे। हमारा सुख-दुख आपस में छिपा नहीं था और मैं तो उसके सुख का सहायक और सलाहकार रहा हूं। (उर्मिला शरमाती है) उर्मिला, मुझसे नहीं छिपा है कि...
    उर्मिला (बीच ही में बात बदलने के इरादे से)- भैया, वह यज्ञ हुआ कि नहीं।
    श्रीधर (बनावटी क्रोध से डांटते हुए)- पागल, चुप रह। (उत्कंठा से) मैं गंभीरता से कहता हूं, मैं हृदय से चाहता हूं कि तुम दोनों का विवाह हो जावे। मैं इस संबंध में हरीश से बातें कर चुका हूं। वह इस संयोग से सर्वथा प्रसन्न है। पर, वह इस विषय को तुम्हारी इच्छा पर छोडऩा चाहता है।
    उर्मिला- भैया ने कहां की बातें छेड़ी। एक कैदी के साथ शादी की बातचीत!
    श्रीधर- पर उसे तो छुड़ाने का प्रयत्न हो रहा है।
    उर्मिला- मुझे तो आशा नहीं।
    श्रीधर- आशा तो करने से होती है।
    उर्मिला (दृढ़तापूर्वक)- पर मैं तो ऐसी आशा करना ही नहीं चाहती और यह शादी का प्रस्ताव सुनकर मुझे चिढ़ आती है।
    श्रीधर (शांत भाव से)- क्यों भला?
    उर्मिला (उत्तेजित होकर)- भैया, कौंसिल में जाकर बहुत चालाक हो गए हो। अभी थोड़ी देर पहले जब मेरे कमरे में आये थे। तब अवस्था यह थी कि आपको मेरे सामने नीची निगाह करके बातें करनी पड़ती थीं। इसलिए अब शादी की बात छेड़कर अवस्था बदल दी। मुझसे खुलकर बातें नहीं की जातीं। (श्रीधर जोर से हंसता है)
    उर्मिला (अधिक उत्तेजित होकर)- हंसते हो। अपनी नैतिक कमजोरी को मेरी स्वाभाविक लज्जा के सहारे विजयी बनाना चाहते हो।
    श्रीधर (गंभीरता से)- उर्मिला, 'मोटिव अटैच' मत कर। मैं हृदय से चाहता हूं कि रामानुज छूटे और मैं यह भी हृदय से चाहता हूं कि तुम दोनों का विवाह हो जावे।
    उर्मिला- भैया मैं तुमसे बहुत नाराज थी। तुम माडरेटों ने कौंसिलों में जाकर देशभक्तों को जेल में भेजना शुरू कर दिया न? अब गवर्नर साहब शान से लिखते हैं,Governor in council in full accorrdance with ministers इत्यादि!(गवर्नर और उसकी कौंसिल मंत्रियों की पूर्ण सहमति से) याद है वह दिन, जब इस संबंध में मेरी और आपकी बातें हुई थीं?
    श्रीधर (हतप्रभ होकर)- उर्मिला, अब तू ने पासा पलट दिया। (उर्मिला एकाएक हंस पड़ती है) क्षमा भी करेगी कि नहीं?
    (उर्मिला फिर गंभीर हो जाती है। शशि आती है।)
    शशि (हंस कर)- बड़ी गंभीर बातें हो रही हैं?
    श्रीधर- कुछ नहीं, उर्मिला नाराज़ है।
    शशि- क्यों?
    श्रीधर- मैंने इसे कहा कि मैं चाहता हूं कि रामानुज की और इसकी...
    उर्मिला- भैया, फिर वही बातें?
    शशि- शादी हो जावे; यह तो उर्मिला भी चाहती है।
    श्रीधर- और, यह रामानुुज भी चाहता है।
    उर्मिला- सरकारी कानून में तो यह बात मानी ही नहीं जाती कि कैदी की भी कोई इच्छा रहती है।
    श्रीधर- बस, उर्मिला के पास एक हथियार है। वह जब चाहती है तब सरकार को उठाकर मेरे सिर पर दे मारती है, फिर चाहे शादी की ही बातें क्यों न हो रही हों।
    शशि- पर, वह ठीक तो कहती है। कैदी का चाहना और न चाहना बराबर है।
    श्रीधर- पर, कैदी स्वतंत्र भी तो हो सकता है।
    शशि- (प्रसन्नता से) क्यों कुछ उम्मीद है?
    श्रीधर- उम्मीद क्यों नहीं। पर, अभी पूरा राजी नहीं हुआ है। ज़रा सा अफसोस ज़ाहिर करना है। अपने किसी भाषण के बारे में।
    शशि- बस?
    श्रीधर- बस।
    शशि- (उर्मिला की ओर देखकर हंसती हुई)- तो पूरा राज़ी कराना कोई बड़ी बात नहीं है। हमारी उर्मिला काफी है। अजी, पूरी खुशी के लिए ज़रा सा अफसोस जाहिर करने के लिए कौन नहीं पूरा राज़ी होगा।
    श्रीधर- (कृतज्ञ भाव से)- शशि तूने सारी कठिनाइयां दूर कर दीं।
    शशि- कैसे?
    श्रीधर- तेरा यही मतलब था न कि उर्मिला कह दे तो वह फौरन राज़ी हो जावे।
    शशि- यही।
    श्रीधर- पर एक कठिनाई है।
    शशि- यह कि ये दोनों जेल में कैसे मिलें?
    (उर्मिला प्रसन्न मालूम होती है)
    श्रीधर- नहीं, यह तो कोई कठिन बात नहीं है। जेल विभाग मेरे अधीन है। यह मेरे साथ वहां जा सकती है, और चाहे तो अकेले में घंटों बातें कर सकती है।
    शशि- सौभाग्य उर्मिला! (श्रीधर से) पर, कठिनाई क्या है?
    श्रीधर- यह कि रामानुज और यह शायद पहले कभी मिले नहीं हैं, इसलिए वहां अच्छी तरह बातचीत नहीं कर सकेंगे।
    शशि- मिले क्यों नहीं हैं?
    उर्मिला- भौजी, मैं आती हूं।
    (उर्मिला उठने लगती है)
    शशि (उर्मिला का हाथ पकड़कर)- वाह, आती हूं, बैठ भी।
    (उर्मिला को बैठना पड़ता है)
    श्रीधर (आश्चर्य से)- मिल चुके हैं?
    उर्मिला (प्रार्थना पूर्ण दृष्टि से)- भौजी?
    शशि (हंसकर)- कई बार।
    श्रीधर- सच कहो? (उर्मिला की ओर देखकर) उर्मिला, यह क्या कहती है?
    उर्मिला- सच तो है। आप लोग जब इलाहाबाद में पढ़ते थे तब घर पर कई बार आए गए हो।
    शशि- सिर्फ नेत्रों से ही नहीं मिले, बातचीत भी हुई।
    श्रीधर (अविश्वास स्वर में)- नहीं जी।
    शशि- हां, हां।
    श्रीधर- क्यों, उर्मिला?
    (नौकरानी का प्रवेश)
    नौकरानी- बाबूजी, आपको सरकार बुलाते हैं। कहते थे, जल्दी का काम है।
    श्रीधर (खड़ा होकर शशि और उर्मिला से)- अच्छा, ठहरो, आता हूं। उर्मिला को भागने मत देना।
    (श्रीधर और नौकरानी जाते हैं)
    उर्मिला (संतोष किन्तु निषेध से)- भौजी, तुम बड़ी खराब हो।
    शशि- क्यों?
    उर्मिला- भैया से इस बात को कहने की क्या आवश्यकता थी।
    (उर्मिला नाराज होकर दूर हट जाती है)
    शशि- नाराज मत हो। गलती से मुंह से निकल गया। फिर देखो, मैंने बताया? टालती ही रही कि नहीं?
    उर्मिला- सुझाती रहीं, टालती रहीं? पर, कब तक टालोगी। वे फिर आकर पूछेंगे तो क्या जवाब दोगी?
    शशि (सचिन्त भाव से)- मुझे तो कुछ नहीं सूझता। तुम जो बताओ, वह कह दूं। पर हो सच बात।
    उर्मिला (कुछ सोचकर प्रसन्नता से)- कह देना, कई बार देखा है, स्वप्न में (शरारत से) मिली भी हूं, बातचीत भी की है और... (शशि को नीचे झुककर चूमती है)
    (पटाक्षेप)

    नवां दृश्य
    (कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में मोहन और कुछ कार्यकर्ता बैठे हुए बातचीत कर रहे हैं। कमरे में नेताओं के चित्र टंगे हैं जिनके बीच में प्रमुख स्थान पर भारत माता का चित्र है। उसके दोनों ओर दो स्वराज्य झण्डे हैं। जिनमें स$फेद, हरे और लाल रंगों की पट्टियों के बीच चरखे की तस्वीर है। )
    एक- क्यों, भाई प्रेसीडेण्ट साहब आजकल कहां जा छिपे हैं?
    मोहन- वे अपनी ससुराल गए हैं। उन्हें तार भेजा गया है; बाद में जरूरी तार भी दिया गया; पर अभी तक नहीं आए।
    दूसरा- पर उन्हें एक जरूरी तार और दिया जिसका किसी को पता नहीं।
    मोहन- कैसा तार?
    दूसरा- उनके पिता सेठ जीतमल जी, रामानुज जी की गिरफ्तारी के बाद ही कलेक्टर से मिलने गए थे, और वहां से लौटते समय बंगले के पास जो बड़ा तार घर मिलता है, वहां अपनी गाड़ी रोक कर उन्होंने एक तार दिया जो मालूम होता है, बंगले से ही लिखकर लाए थे।
    मोहन- यह तुम्हें कैसे मालूम हुआ?
    दूसरा- मालूम क्या, मैं तो तार घर में मौजूद था। वे बाहर ही गाड़ी पर बैठे रहे और उनका नौकर तार लेकर अंदर गया। मैंने कौतूहलवश उस नौकर से तार लेकर पढ़ लिया।
    मोहन- क्या लिखा था?
    दूसरा- Proceed immediately to Jaipur my self coming there. (तुरंत जयपुर पहुंचो, मैं भी वहां पहुंचता हूं।)
    मोहन- खैर, जाने दो। अब हमें तो यह कोशिश करनी चाहिए कि कांग्रेस का कार्य बराबर चलता रहे।
    तीसरी- अजी, इसकी चिंता न कीजिए। कांग्रेस का कार्य तो गंगाजल के समान है जो चलता ही रहेगा। वह प्रवाह में बह कर केवल समुद्र की ही ओर नहीं जावेगा किन्तु भक्तों की कठौती में चढ़ कर हिमालय के शिखर पर पहुंचेगा और रामेश्वर तक की सैर करेगा।
    चौथा- यह तो मैं भी मानता हूं। पर मार्ग में बाधाएं बहुत हैं। आपने नहीं सुना होगा, प्रेसीडेंट साहब के पिता ही यह अ$फवाह उड़ा रहे हैं कि रामानुज माफी मांगने को तैयार है और उन्होंने राय साहब आनंदीप्रसाद को जेल में बुलवाया था; मिनिस्टर श्रीधर साहब उनके मित्र हैं, वे भी इसीलिए यहां आए हुए हैं।
    मोहन- यह असंभव है कि रामानुज माफी मांगे। मैं खुद उनसे मिला हूं। वे खूब प्रसन्न थे। उन्हें चिंता थी तो यही कि कांग्रेस का कार्य कैसे चलेगा। मैं उन्हें विश्वास दिला आया हूं कि कांग्रेस का कार्य अच्छी तरह चलेगा।
    सब- क्यों नहीं। हम सब तैयार हैं। रामानुज जी के गिरफ्तार हो जाने से तो जोश और भी बढ़ा है, और कार्य भी जोरों से होगा।
    एक- क्यों, भाई सुनते हैं, मंत्री जी के पास खादी के बिक्री के जितने रुपए पैसे गिरफ्तारी के वक्त थे वे पुलिस वालों ने छीन लिए।
    मोहन- नहीं, यह बात बिलकुल गलत है। वह सब रुपया मंत्री जी के पास ही था। जेल में जब मैं उनसे मिलने गया तो उन्होंने खादी का हिसाब करके बिक्री के कुल 109 रुपए दिए।
    (बाहर कुछ लोगों के आने का शोर सुनाई देता है। इतने में पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट, इंस्पेक्टर और कुछ सिपाही भीतर आते हैं। कमरे के अंदर बैठे हुए सब लोग खड़े हो जाते हैं।)
    पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट- इस दफ्तर की तलाशी ली जाती है। कौन है इसके चार्ज में?
    मोहन (आगे बढ़कर)- मैं हूं इस कमेटी का सेक्रेटरी।
    पु.सु.- अच्छा (राष्ट्रीय झंडे की ओर इशारा करके) यह क्या है?
    मोहन- यह हमारा राष्ट्रीय झंडा है।
    पु.सु. (गुस्से से देखते हुए)- नेशनल फ्लैग!
    सब-इंस्पेक्टर (घृणा से)- देखता क्या है, फाड़ डालो।
    (सब इंस्पेक्टर राष्ट्रीय झंडा फाडऩे के लिए आगे बढ़ता है, मोहन उसे रोकता है।)
    मोहन- मैं इसका विरोध करता हूं। आपको राष्ट्रीय झंडे का अपमान नहीं करना चाहिए।
    पु.सु.- हट जाओ (मोहन को धक्का देता है और सिपाहियों से कहता है, यह सब तस्वीरें फोड़ डालो। इस पर सब सिपाही डंडों से राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीरें फोड़ते हैं। एक झंडे को इंस्पेक्टर फाड़ता है और दूसरे को सुपरिन्टेडेन्ट खींचकर •ामीन पर फेंकता है। मोहन उसे बीच में ही पकड़कर ऊंचा उठाता है।)
    सब कांग्रेस कार्यकर्ता- बोलो, महात्मा गांधी की जय।
    इंस्पेक्टर- बोलो, बादशाह जार्ज पंचम की जय।
    (सब कांग्रेस वाले खिलखिला कर हंस पड़ते हैं।)
    पु.सु.- ये सब बदमाश हैं, इनको गिरफ्तार कर लो हथकड़ी भर दो।
    (सिपाही लोग हथकड़ी भरने की तैयारी करते हैं।)
    मोहन- वारंट तो दिखाइए।
    पु.सु.- हमारा हुक्म वारंट है।
    (सब कांग्रेस वाले चुपचाप खड़े रहते हैं और पुलिस वाले उन्हें हथकडिय़ां भरकर रस्सी से कस देते हैं।)
    पु.सु.- अब तलाशी लो।
    (तलाशी शुरू होती है। खादी के कपड़े फाड़े जाते हैं; दफ्तर के कागजात चीरकर फेंके जाते हैं और आलमारी का ताला तोड़ा जाता है। गिरफ्तार कांग्रेस वाले 'महात्मा गांधी की जय' चिल्लाते रहते हैं।)
    पु.सु.- इंस्पेक्टर साहब इनका मुंह बंद नहीं हो सकता?
    एक कांग्रेस वाला- 144 धारा के मुताबिक ताज़ेरात हिन्द में कोई मुस्का भी बनाया जाए तो अच्छा हो।
    पु.सु. (चिढ़कर)- वह भी होगा। तुम लोग जानवर का माफिक है। (सिपाहियों को कुछ कागज दिखाकर) अच्छा, ये कागज संभालो और इन सबको कोतवाली पर ले चलो।
    (सब लोग जाते हैं। रवाना होते समय सब गिरफ्तार लोग गाना गाते हैं।):-
    चल दिए माता के बंदे जेल, वंदेमातरम्।
    देश भक्तों की यही है गैल वंदेमातरम्।।
    है जहां गांधी गए बरसों तिलक भी थे जहां।
    हम भी वहां के कष्ट लेंगे झेल, वंदेमातरम्।।
    जानते हैं क्रूर है, खूंखार है सैयाद वह।
    जांच ले हरगिज न होंगे फेल, वंदेमातरम्।।
    एक को ले जाएगा तो सैकड़ों आगे बढ़ें।
    जेल जाने को समझते खेल, वंदेमातरम्।।
    देशभक्तों ने जिसे सींची है वह अपने खून से।
    लहराएगी फल जाएगी वह बेल वंदेमातरम्।।
    देखना हिन्दू मुसलमानों, न टूटे मित्रता।
    बोल दो, अल्ला हो अकबर, बोल, वंदेमातरम्।।
    (पटाक्षेप)


    दसवां दृश्य
    (जेल की एक साफ सुथरी कोठरी में रामानुज बैठा है। उसका दरवाजा और खिड़कियां खुली हुई हैं। कोठरी के आसपास बहुत बड़ा दालान है जो ऊंची दीवारों से घिरा हुआ है। दीवाल में एक ओर एक फाटक है जिसमें लोहे के मोटे सींखचे लगे हैं। वह बंद है, और बाहर की ओर एक वार्डर खड़ा है। कोठरी के अंदर पलंग, टेबल और कुर्सी भी हैं। परन्तु मालूम होता है, रामानुज ने उनका उपयोग नहीं किया। उसका बिस्तर ज़मीन पर लगा है और वह उस पर झुका हुआ कुछ लिख रहा है। दरवा•ो की ओर उसकी पीठ है। वह लिखने में इतना व्यस्त है कि फाटक का दरवाजा खुला और बंद भी किया गया और दो व्यक्ति भीतर आए परन्तु, उसे कुछ नहीं मालूम हुआ। वे दोनों थे श्रीधर और उर्मिला। उनके नज़ क पहुंचने पर रामानुज ने एकाएक सिर उठाकर देखा।)
    रामानुज (बैठे ही बैठे आश्चर्य और प्रसन्नता से)- श्रीधर! (खड़े होकर, श्रीधर के गले से चिपट जाता है और उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं) बहुत दिनों में मिले, भाई! (उर्मिला से, आंसू छिपाकर और पोंछकर) कितना परिवर्तन हो गया!
    उर्मिला- एक 'मिनिस्टर' और दूसरा कैदी।
    श्रीधर- हां भाई, क्षमा करना। तुम इन्हें जानते हो, हरीश की बहिन हैं, उर्मिला देवी। इन्हें मैं साथ लेता आया हूं।
    रामानुज (उर्मिला की ओर देखकर)- बड़ी कृपा हुई। (श्रीधर से) हां भाई, यह बताओ, हरीश कहां है? क्या कर रहा है? वह तो वकालत कर रहा है न?
    श्रीधर- खूब धड़ल्ले से।
    रामानुज- यह बताओ, भौजी कहां है। कोई बाल-बच्चा? मुझे तो तुम लोगों ने बिल्कुल ही भुला दिया।
    श्रीधर- सब अच्छी तरह हैं।
    रामानुज- भौजी, कभी मेरी भी याद करती है कि नहीं? गोपाल के क्या हाल हैं?
    श्रीधर- गोपाल हमारे साथ ही रहता है।
    रामानुज- भाई, भौजी को बहुत दिन से नहीं देखा, वे आजकल कहां हैं।
    श्रीधर- वह भी यहीं पर बनारस में आई हुई हैं।
    रामानुज- उन्हें भी साथ में क्यों नहीं ले आये? अब भी डेढ़ हाथ का घूंघट होता होगा? (हंसता है)
    श्रीधर- भाई, वह तुम्हारी गिरफ्तार पर मुझसे बहुत नाराज हुई। मैंने लाख समझाया कि मेरा कोई कुसूर नहीं, पर वह मुझे ही दोष दे रही है और जिद्द कर रही है कि तुम्हें किसी तरह छुड़ाया जावे। उर्मिला को भी उसी ने आग्रह करके भेजा है।
    रामानुज (हंसते हुए)- तुम दोनों मुझे छुड़ा लोगे!
    श्रीधर- हां, अगर तुम खुद मदद करो।
    रामानुज- भाई, मैं तो तुम्हारी आज्ञा मानने को तैयार हूं।
    श्रीधर- राय साहब की तुमसे बातचीत हो चुकी है न? वे मेरे ही कहने से तो यहां आए थे।
    रामानुज- अच्छा! उन्होंने बताया नहीं। राय साहब बड़े सज्जन हैं। वे तो मेरे पुराने हितचिंतक हैं।
    श्रीधर- हां, तो फिर तुमने क्या तय किया?
    रामानुज- मैं क्या तय करता? तय तो अदालत करेगी?
    श्रीधर- अदालत का फैसला तुम्हारे बयान पर अवलंबित है। अपने किसी भाषण की किसी बात पर अफसोस ज़ाहिर कर देना। मामूली सी बात है। क्यों, उर्मिला?
    उर्मिला (सरल भाव से)- बिलकुल!
    रामानुज (आश्चर्य से उर्मिला की ओर देखते हुए)- क्या तुम सोचते हो, सिर्फ अफसोस ज़ाहिर कर देने से मैं छूट जाऊंगा?
    श्रीधर- इसकी गारण्टी मैं देता हूं। तुम मेरा पद जानते ही हो।
    रामानुज- मैं जानता हूं। पर तुम सरकार नहीं हो।
    श्रीधर- मैंने खुद गवर्नर साहब से बातचीत कर ली है। यहां के कमिश्नर और कलेक्टर से भी सलाह हो चुकी है। राय साहब की भी यही राय है।
    रामानुज (हंसते हुए)- याने, तुम मुझे छुड़ाने के लिए सारा षडय़ंत्र रच चुके हो।
    श्रीधर (हंसते हुए)- अब जो कुछ समझो।
    रामानुज- पर देखना, कहीं अधिक न फंस जाऊं।
    श्रीधर- नहीं, यह कभी नहीं हो सकता।
    रामानुज (नि:श्वास छोड़ते हुए गंभीरता से)- तो फिर सबकी सलाह है कि मैं अफसोस ज़ाहिर कर दूं।
    श्रीधर- हां।
    रामानुज- फिर, उन्होंने गिरफ्तार ही क्यों किया था?
    श्रीधर (जरा कुंठित होकर)- भाई, तुम्हें क्या बताऊं? यह तो 'स्टेट सीक्रेट' है। भारत सरकार का बड़ा दबाव पड़ रहा था।
    रामानुज- भारत सरकार ने यह लिखा था कि रामानुज को गिरफ्तार कर लो?
    श्रीधर- अब तो तुम प्रश्न पूछने लगे। (उत्तेजित होकर) यह तो नहीं लिखा कि रामानुज को गिरफ्तार कर लो। (आग्रह के साथ) पर, जो कुछ हो चुका, वह तो हो चुका। अब यह सोचो कि करना क्या है।
    रामानुज- मुझे तो कुछ करना बाकी नहीं रहा। अब करना तो सरकार के हाथ में है।
    श्रीधर- सरकार तो चाहती है, तुम अफसोस ज़ाहिर कर दो।
    रामानुज (संतोष से हंसते हुए)- कहो, मैंने षडय़ंत्र शब्द का उपयोग ठीक ही किया था न?
    श्रीधर- रामानुज, इस तरह का इलज़ाम?
    रामानुज- दोस्ती के नाते क्या मुझे इतनी भी स्वतंत्रता नहीं?
    उर्मिला- पर दोस्त को मालूम होना चाहिए कि वह कैद में है।
    श्रीधर- तुम्हें पूर्ण स्वतंत्रता है। पर देखो, उर्मिला यहां खड़ी है, उसका तुम्हें लिहाज़ करना चाहिए। तुम मुझे चाहे जो इलज़ाम लगाओ पर असली प्रश्न यह है कि तुम जेल से छूटना चाहते हो या नहीं? तुम्हें छुड़ाने की हितचिंतना से हम यहां आए हैं।
    रामानुज- अपने छूटने और छुड़ाने के प्रश्न पर फिर विचार करेंगे। पहली बात तो यह है कि यदि तुम मेरे हितचिंतक थे तो मुझे छुड़ाने के लिए तुम्हें होममेंबर की हैसियत से जेल में नहीं आना चाहिए था, किन्तु एक कैदी की हैसियत से आना चाहिए था।
    श्रीधर- क्या मैं तुम्हारा हितचिंतक नहीं हूं? और क्या यह उर्मिला भी तुम्हारी हित-चितिंका नहीं है?
    रामानुज- इसका उत्तर तुम खुद सोच लो।
    श्रीधर- तुम्हें उर्मिला के सामने तो ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए।
    रामानुज- श्रीधर, तुम मुझे अच्छी तरह जानते हो, और मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूं। छिपाने की आवश्यकता नहीं। इसीलिए मैं (उर्मिला की ओर इशारा करके) इन्हें गवाह बनाकर तुमसे सा$फ-सा$फ बातें करना चाहता हूं।
    श्रीधर (कुछ डरकर, समझाते हुए)- भाई, बातें तो होती रहेंगी, पर कुछ अपने छूटने की तरकीब सोचो।
    रामानुज- फिर, वही बात। मैं तो इस छूटने और छुड़ाने को देशद्रोह मानता हूं।
    श्रीधर- तो क्या हम देशद्रोही हैं? क्या हमारे प्रयत्नों का यही बदला हमें मिलेगा?
    रामानुज- बदला परमात्मा देगा। परन्तु इसमें कोई शक नहीं कि (रामानुज चुप हो जाता है)
    श्रीधर- कहो, कहो।
    रामानुज- भाई, कहने का बुरा न मानना। जब तुम सुनना ही चाहते हो तो मैं तुम्हें सा$फ-सा$फ कह देना चाहता हूं कि मेरी राय में तुम देशद्रोही हो।
    (थोड़ी देर के लिए तीनों पर सन्नाटा छा जाता है)
    श्रीधर (मंद स्वर से)- रामानुज, क्या कहते हो!
    रामानुज- मैंने जो कुछ कहा, वह सोच समझकर कहा। और उसके लिए मेरे पास काफी प्रमाण हैं।
    श्रीधर (शून्य भाव से)- क्या?
    रामानुज- अच्छा, बैठो। मैं सब शुरू से सुनाता हूं।
    (तीनों बैठते हैं। श्रीधर बहुत चिंतित मालूम होता है।)
    रामानुज- सुनो। एल.एल.बी. के रिजल्ट का तार आने के बाद तुम जब अपने ससुर की बीमारी का तार पढ़कर खिड़की के पास खड़े हुए बोल रहे थे उस समय मैं वहीं से गुज़र रहा था। मैंने सब सुना है।
    श्रीधर (डरकर किन्तु अविचलितता दिखाते हुए)- क्या सुना? क्या मैंने कोई खराब बात कही थी?
    रामानुज- कुछ नहीं, सिर्फ यही कहा था कि सौभाग्य अकेला नहीं आता। तुम अपने सुसर की बीमारी पर प्रसन्न थे।
    श्रीधर (घृणा से)- झूठ, सफेद झूठ!
    रामानुज- मुझे ज़रा झूठ भी बोल लेने दो जिससे तुम्हारी सच्चाई और भी चमक उठे। बाद में तुमने अपने ससुर का इलाज जैसा करवाया उसका भी मुझे पता है।
    श्रीधर (उत्तेजित होकर)- रामानुज, झूठ की भी हद है?
    रामानुज- नहीं, वह और भी बड़ी है। तुम मरे हुए ससुर की गद्दी पर बैठ कर तालुकेदार बने, और कौंसिल में जाकर तुमने 'मिनिस्टरी' पर अपनी देश-भक्ति के सारे वादे न्योछावर कर दिए। अब एक दोस्त की हितचिंतना की नींव पर किसी दूसरी महत्वाकांक्षा का महल खड़ा करना चाहते हो।
    श्रीधर (प्रार्थना के स्वर में)- रामानुज, यह क्या कहता है?
    रामानुज- मैं ठीक कहता हूं। तुम्हारे षडय़ंत्र को मैं पहिचानता हूं।
    श्रीधर (गंभीरता से)- षडय़ंत्र?
    रामानुज- हां, षडय़ंत्र। अब तुम और राय साहब माडरेटों की आम नीति के अनुसार ऐसी चालें चल रहे हो जिससे असहयोग का सत्यानाश हो जावे। मैं अफसोस ज़ाहिर करूं, फिर उस पर सरकार शान से कम्युनिक (विज्ञप्ति) निकाले कि फलानी कांग्रेस कमेटी के सेक्रेटरी ने माफी मांग ली। परिणाम यह होगा कि कांग्रेस का नैतिक प्रभाव कम हो जावेगा। मालूम होता है, पशुबल काफी नहीं था, इसलिए भौतिक बल प्राप्त करने की भी चालें चली जा रही हैं। और तुम मित्रता की ओट में अपनी धर्मपत्नी पर अहसान करने के बहाने मेरा नैतिक अध:पतन करने के लिए यहां आए हो, और इस प्रकार राष्ट्रीयता का विध्वंस करके स्वयं ऊंचे चढऩा चाहते हो।
    श्रीधर- निन्दा करना असहयोगियों का स्वभाव हो गया है। मानो कोई दूसरा देशभक्त नहीं है।
    रामानुज- सब मनुष्य अपने को देशभक्त कह सकते हैं, परन्तु मनुष्य का हृदय तो उसके कार्यों से ही जाना जाता है।
    श्रीधर- उदाहरणार्थ, क्या माडरेटों के कार्य प्रशंसनीय नहीं हैं ? उन्होंने यूनिवर्सिटियां कायम की हैं। बड़ी-बड़ी संस्थाएं चला रहे हैं और कौंसिल में जाकर देश की सहायता कर रहे हैं।
    रामानुज- क्षमा करना। मैं तो इस प्रत्येक कार्य में उस जयचंद का हाथ देखता हूं। अफसोस कि हिन्दुस्तान में सैकड़ों लड़ाइयां हुईं, खून की नदियां बहीं, किन्तु उस जयचंद का खून हिन्दुस्तान की रगों के बाहर नहीं हुआ। वह आज भी विदेशी सत्ता की छत्रछाया में यूनिवर्सिटियां कायम करता है, कौंसिलर बनके उसके कानून का बल बढ़ाता है, और जलियांवाला में मरे हुए अपने ही भाइयों के रिश्तेदारों को मुआवज़ में दी जाने वाली आना पाई का हिसाब लगाता है।
    श्रीधर (क्रोध से)- रामानुज, बस बहुत हो चुका। (खड़ा होते हुए) मैं अब नहीं सुन सकता। मुझमें भी आत्मसम्मान है।
    रामानुज (रोते हुए, श्रीधर के पैर पकड़कर ऊपर देखते हुए)- अगर आत्मसम्मान है तो भाई, छोड़ मिनिस्टरी को छोड़, देश की गुलामी का साधन मत बन (रामानुज खड़ा हो जाता है)
    श्रीधर (विचलित किन्तु क्रुद्घ भाव से)- तुम देश के और अपने सत्यानाश पर तुले हो। दोनों का भला इसी में है कि तुम जेल में बंद रहो, जिससे बाहर बलवा न होने पावे और हिन्दुस्तान को रूस के समान मारकाट के दृश्य न देखने पड़ें। खैर, इस संबंध में तुमसे वाद-विवाद करना व्यर्थ है। सिर्फ, एक बात और कहनी रह गई है।
    रामानुज- क्या?
    श्रीधर- तुमने गलत जोश में आकर अपने जीवन के एक पहलू को बिल्कुल ही भुला दिया।
    रामानुज - कौन सा?
    श्रीधर (उर्मिला के सिर पर हाथ रखकर)- वह पहलू उर्मिला है।
    रामानुज- मेरे हृदय के कोमल भाग का तुम्हें पता है और मालूम होता है यह तीखा तीर इसीलिए लाए हो और उसे अमोघ मानकर सबके पीछे चलाने के लिए रख छोड़ा है।
    उर्मिला (प्रसन्नता से)- अब मेरे बोलने का समय आया। मैं अभी तक सोच रही थी कि मैं व्यर्थ ही आई।
    श्रीधर- मैं जानता था, तेरा आना व्यर्थ नहीं होगा।
    (जेलर आता है)
    जेलर (श्रीधर से)- हुजूर, कलेक्टर साहब आए हैं। आपसे दफ्तर में मिलना चाहते हैं।
    श्रीधर- अच्छा चलो। (चलते-चलते उर्मिला से इन्हें समझाना, मैं आता हूं।)
    (श्रीधर और जेलर जाते हैं, जब कमरे में उर्मिला और रामानुज दोनों रह गए (दोनों थोड़ी देर चुप रहते हैं।)
    रामानुज (गंभीरता से)- उर्मिला! (उर्मिला चौंक पड़ी) तुम क्या मुझे यह कहने आई हो कि मैं माफी मांग लूं?
    उर्मिला- नहीं, यह पूछने आई हूं कि तुम मुझे प्यार करते हो कि नहीं?
    रामानुज- पूछने की जरूरत भी है?
    उर्मिला- अगर तुम मुझे प्यार करते हो तो जेल आने में तुम्हें कुछ अ$फसोस जरूर होता।
    रामानुज- अ$फसोस बहुत है।
    उर्मिला- फिर छूटने का प्रयत्न क्यों नहीं करते। अ$फसोस ही तो ज़ाहिर करना है। तुम स्वतंत्र हो जाओगे, हमारा विवाह हो सकेगा, और हम सुखी होंगे।
    रामानुज- उर्मिला, मैं तुझे प्यार करता हूं, परन्तु तुझ से अधिक प्यार करता हूं मेरी और तेरी मातृभूमि को। उर्मिला और रामानुज का जीवन कुछ ही समय का है; उर्मिला और रामानुज का सुख और दुख केवल दो व्यक्तियों का, और क्षणिक है। परन्तु इस मातृभूमि का जीवन अनन्त है, और उसका सुख और दुख उसकी तीस करोड़ संतान का सुख और दुख है। यही नहीं, आज उसकी गुलामी सारे एशिया महाद्वीप और अफ्रीका की गुलामी का कारण हो रही है। सबसे बड़ा अनिष्ट तो यह हुआ है कि हिन्दुस्तान के गुलाम होने से ईसा, मुहम्मद और बुद्घ तीनों की आत्मा कैद में है। संसार से धर्म उठ गया है। तू हिन्दुस्तान को गुलामी में बांध रखने वाली कड़ी होगी, या उसको तोडऩे वाली हथौड़ी?
    उर्मिला- मैं इस मामले को इस दृष्टि से नहीं देखती। मेरी दृष्टि भिन्न है। मैं तुम्हें प्यार करती हूं और तुम्हारे बिना जीती नहीं रह सकती। मेरे लिए केवल तुम ही हो, तुमसे परे न देश है, न ईश्वर है।
    रामानुज- प्यार करती हो, मेरे शरीर को या मेरे आदर्श को?
    उर्मिला- इस प्रश्न का उत्तर देने की मुझे आवश्यकता नहीं। प्रश्न तो यह है कि तुम मुझे प्यार करते हो या नहीं?
    रामानुज- करता हूं।
    उर्मिला- तो जेल से छूटो।
    रामानुज- तेरा आग्रह सुनकर तो मुझे दु:ख ही हुआ, अब मैं तुझे प्यार करने का प्रायश्चित जेल में रहकर ही करूंगा। तुझे प्यार करने का मुझे अ$फसोस होगा। तुझसे दूर रहने का मुझे कष्ट होगा। मैं दोनों सहूंगा। तुम मुझसे मिलने को व्यर्थ आईं। मैं तुम्हें माया के रूप में नहीं देखना चाहता था। मैं तुम्हें शक्ति के रूप में देखता और प्यार करता था।
    उर्मिला, मैं फिर पूछता हूं, तू मेरे लिए कमजोरी साबित होगी या शक्ति?
    उर्मिला (प्रसन्न होकर)- शक्ति।
    रामानुज- सबूत?
    (उर्मिला अपनी जेब से कटार निकालकर दिखाती है, रामानुज आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लेता है)
    रामानुज- यह क्या?
    उर्मिला (हंसते हुए)- यह तुम्हारी कमजोरी का ईनाम देने के लिए लाई थी।
    रामानुज- तुमने कैसे जाना कि मैं कमजोर था?
    उर्मिला- मामा और श्रीधर भैया की बातों की भनक मेरे कान में पड़ी कि तुम माफी मांगने को कुछ कुछ राज़ी हो।
    रामानुज (अपनी दृढ़ता का विश्वास दिलाने वाले स्वर में)- सच?
    उर्मिला- मैं व्याकुल हो गई कि क्या जिसकी मैंने हृदय से पूजा की, वह देव नहीं, पशु निकला? तब मैंने सोचा कि जाकर परीक्षा लूंगी और यदि यह कच्चा निकला तो समझाऊंगी। फिर भी न संभला तो उसके खून से अपनी निराशा शांत करूंगी और प्रायश्चित में स्वयं मर जाऊंगी।
    रामानुज (प्रसन्नता से आगे बढ़कर)- तब तो तू माया नहीं, शक्ति है, बाधा नहीं, विजय है।
    (उर्मिला को चूमता है)
    उर्मिला- आज मेरे हृदय से सच्ची बधाई उठती है।
    रामानुज (अलग होकर)- पर उर्मिला, अब विवाह कब होगा?
    उर्मिला- वह तो हो गया। लगन लग चुकी थी, मुहर भी (अपनी होंठों पर हाथ रखकर और चूमकर) लग गई।
    रामानुज- जेल से लौटने के बाद?
    (श्रीधर आता है)
    श्रीधर- हां तो, मुझे जरा देरी लग गई।
    (चकित होकर) बड़े खुश मालूम होते हो। रामानुज राजी हो गया, क्यों उर्मिला?
    उर्मिला (हंसती हुई)- हां, भैया।
    श्रीधर- शाबास! यही सोचकर तो मैं तुझे यहां लाया था।
    उर्मिला- भैया, तुमने बड़ी कृपा की।
    श्रीधर- हां, तो क्या तय हुआ?
    उर्मिला (दृढ़ता से)- यही कि ये माफी हरगिज नहीं मांगेंगे।
    (श्रीधर अत्यंत उदास होकर रामानुज की ओर देखता है।)
    (रामानुज (उर्मिला का हाथ पकड़कर)- और यह कि उर्मिला और रामानुज का विवाह कैद से छूटने पर होगा।
    (श्रीधर निराशा और दु:ख से दोनों की ओर देखता है। उर्मिला और रामानुज प्रसन्नता से 'वंदेमातरम्Ó का गायन गाते हैं। इतने में पुलिस के सिपाही मोहन तथा उसके अन्य साथियों को गिरफ्तार करके लाते हैं। वे भी गाने में शामिल हो जाते हैं)
    वंदे मातरम्।
    सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्।
    शस्य श्यामलाम् मातरम् । वंदे...।।
    शुभ्र ज्योत्सना पुलकित यामिनीम्,
    फुल्ल कुसुमित द्रुम दल शोभिनीम्,
    सुहासिनीम्, सुमधुर भाषिणीम्,
    सुखदाम्, वरदाम् मातरम् । वंदे...।।
    त्रिंश कोटि कंठ कल कल निनाद कराले,
    द्वित्रिंश कोटि भुजै र्धृत खर कर वाले,
    के बोले मा तुमि अबले-
    बहुबल धारिणीम्, नमामि तारिणीम्
    रिपु दल वारिणीम् मातरम् । वंदे...।।
    (पटाक्षेप)