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Monday 22 Oct 2018

प्रस्तावना

वह जीवन ही क्या जो सीधी-सरल राह पर चले! हर व्यक्ति की ज़िन्दगी में लगभग बिना अपवाद के न जाने कितने घेरदार-घुमावदार मोड़ आते हैं, न मालूम कितने उतार-चढ़ाव उसकी परीक्षा लेते हैं; फिर भी एक दौर, वह छोटा ही क्यों न हो, अवश्य आता है जब वह चारों तरफ से बेपरवाह होता है। तकलीफें और मुसीबतें उस पर हमलावर होती हैं, किन्तु वह हंसकर उनका इस्तकबाल करता है। उसका आत्मविश्वास कहता है कि ये दिन आसानी से गुज़र जाएंगे। यह दौर अमूमन व्यक्ति की तरुणाई के दिनों में होता है। उसकी आंखों में चमक होती है। उस चमक में सपने पलते हैं। हृदय में सपनों को हकीकत में बदलने की आशा और किसी हद तक ज़िद होती है। यह उसकी मासूमियत, निश्छलता, अल्हड़पन, खिलंदड़ेपन का दौर होता है। इन दिनों जो दोस्त बनते हैं वे उम्र भर के लिए और दुश्मनियां जल्द ही भुला दी जाती हैं। इस दौर की यादें बिल्कुल छायावादी कविता की मानिंद किताब में रखे सूखे फूल सी होती हैं। कभी अनायास किताब हाथ में आती है, पन्ने पलटते-पलटते सूखा फूल सामने आ जाता है और अतीत की स्मृतियां मन के दरवाजे पर दस्तक देने लगती हैं।

मेरे साथ पिछले दिनों कुछ ऐसा ही हुआ। मैं तीन दिन की यात्रा से लौटा था। थका हुआ था। यूं ही बैठे-बैठे झपकी लग गई थी कि फोन की घंटी ने मुझे उठा दिया। दूसरी तरफ युवा पत्रकार-लेखक समीर दीवान थे। अपने पिता बसंत दीवान पर एक स्मृति ग्रंथ प्रकाशित कर रहे हैं, आप उनके मित्र थे; उस दिन घर आए थे तो उनके संस्मरण सुना रहे थे; क्या आप उन पर एक स्मृति लेख लिख सकेंगे? न करने का सवाल ही नहीं था। फिर मुझे दुबारा नींद न आई। बसंत दीवान के बारे में सोचते-सोचते मैं उसे बीते वक्त में पहुंच गया, जब उनके साथ पहली भेंट हुई थी। देशबन्धु का नाम तब नई दुनिया हुआ करता था। इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया की आंशिक भागीदारी में बाबूजी ने 1959 में रायपुर से अखबार का प्रकाशन प्रारंभ किया था। वह एक अलग कथा है। अखबार का दफ्तर सदर बाजार में बूढ़ातालाब और श्याम टॉकीज तक जाने वाली एक ढलुवां सड़क पर था। संपादकीय विभाग के लगभग सभी साथी, उम्र में बड़े या छोटे, लिखने-पढऩे वाले प्राणी थे, कवि, कहानीकार गीतकार, गायक आदि। रायपुर तब मध्यप्रदेश का पांचवा बड़ा शहर होकर भी एक मझोले आकार का नगर था। 1964 में विश्वविद्यालय स्थापित हो गया था। साहित्यिक-सांस्कृतिक हलचलें लगातार चलती थीं।

1964 में ही किसी दिन बसंत दीवान से परिचय हुआ। वे शायद किसी पत्रकार मित्र के साथ प्रेस आए थे। परिचय में मालूम हुआ कि वे जे.जे. स्कूल ऑफ आटर््स, बम्बई से प्रशिक्षण लेकर लौटे हैं और फोटोग्राफर हैं। मैंने बात-बात में उन्हें सुझाया कि वे अखबार के लिए काम क्यों नहीं करते। उन्हें यह मशविरा पसंद आ गया और इस तरह बसंत दीवान नामक बंबई रिटर्न युवक देशबन्धु का, रायपुर का और छत्तीसगढ़ का पहला प्रेस फोटोग्राफर बन गया। प्रदेश की पत्रकारिता के इतिहास लिखने वाले कृपया यह तथ्य नोट करें। लगभग उसी समय नगर निगम के रामदयाल तिवारी स्कूल के शिक्षक श्रीनिवास (चीनी) नायडू देशबन्धु के मार्फत प्रदेश के पहले खेल पत्रकार बन गए थे। यह हम सबकी तरुणाई का समय था। मैं उम्र में सबसे छोटा था, लेकिन दोस्ती में सब बराबर थे। अखबार हमारे लिए मुनाफे का माध्यम नहीं, समाज को कुछ बेहतर देने का अवसर था। हम लोग काम खत्म होने के बाद घंटों साथ बैठते थे। फुरसत के समय दुनिया भर के मुद्दों पर बहसें करते थे। सुबह चार बजे प्रेस से उठे तो शारदा चौक पर अक्सर सबेरा होटल या कभी-कभार बाम्बे भेल हाउस में चाय पीकर बातों में समय गुजारते थे।

बसंत जब बंबई से लौटे उसी के आसपास मनु नायक भी मायानगरी से लौटकर आए और ज़ाफ़र अली फरिश्ता भी। मनु नायक ने पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाई- कहि देबे संदेस। अब्बास साहब की शहर और सपना की नायिका सुरेखा इस फिल्म की नायिका बनीं। उन्हें देखने भीड़ उमड़ती थी। ज़ाफ़र अली फरिश्ता बंबई में फिल्मों में छोटे-मोटे रोल कर रहे थे। वे भी अपने गृहप्रदेश में शायद नई संभावनाएं तलाश रहे थे। कुछ समय बाद वापिस चले गए। 1964 में ही शायद दुर्ग के नारायण भाई ने एचएमवी में पहला छत्तीसगढ़ी गाना- सावन में लोर-लोर, भादों में घटा घोर रिकॉर्ड करवाया था। मेरे सहपाठी इकबाल अहमद रिज़वी ने भी किसी छत्तीसगढ़ी फिल्म में एक गाना गाया था। हरि ठाकुर और नरेन्द्र देव वर्मा ने संज्ञा पत्रिका प्रारंभ की। कुछ समय बाद विभु खरे ने हस्ताक्षर का प्रकाशन प्रारंभ किया। गुरुदेव काश्यप और प्रभाकर चौबे ने मिलकर धूप के टुकड़े नाम से साइक्लोस्टाइल्ड पत्रिका शुरू की। कुल मिलाकर एक रचनात्मक माहौल बना हुआ था, जिसमें एक युवा पीढ़ी उत्साह व उमंग के साथ भाग ले रही थी।

बसंत दीवान को याद करते हुए इन सबकी याद सहसा आ गई। बसंत दीवान बहुत अच्छे फोटोग्राफर थे। अखबार के लिए तस्वीर लेने हेतु वे भागदौड़ भी बहुत करते थे। उस समय उनका स्टूडियो शायद घर पर ही था। उन दिनों अखबारों की मुद्रण तकनीक पुरानी थी, फोटो से ब्लॉक बनते थे, फिर छपाई होती थी। यहां ब्लॉक-मेकिंग की व्यवस्था नहीं थी। शाम की ट्रेन से फोटो नागपुर भेजते थे, अगले दिन एम.आर. देउसकर एंड कंपनी वाले ब्लॉक बनाकर रात की ट्रेन से रवाना करते थे और तब तीसरे दिन जाकर फोटो छपता था। लेकिन जीवन में आज जैसी आपा-धापी नहीं थी, खबरों के लिए लोग समाचार पत्र का इंतजार करते थे। जशपुर, सरगुजा और बस्तर के दूरस्थ इलाकों में दूसरे दिन शाम तक अखबार पहुंचते थे, इसलिए फोटो तीसरे-चौथे दिन भी छपा तो कोई बड़ी बात नहीं थी। लेकिन हां, इससे हमारे अखबार को भी प्रशंसा मिली और बसंत दीवान की लोकप्रियता भी बढ़ी। लोकप्रिय मैंने इसलिए कहा क्योंकि वे लोगों को अपना बनाने की कला में सिद्धहस्त थे।

बसंत दीवान की प्रेस फोटोग्राफी का दौर दस-बारह साल चला। इस बीच उन्होंने अपना स्टूडियो भी खोला। पहले शारदा चौक के पास शुक्ला भवन की ऊपरी मंजिल पर एक तिकोने कमरे में, बाद में नवीन बाजार में उन्होंने व्यवस्थित रूप से स्टूडियो स्थापित किया। लेकिन तब तक उनका मन दूसरी दिशा में मुडऩे लगा था। डॉ. खूबचंद बघेल द्वारा स्थापित छत्तीसगढ़ी भ्रातृसंघ से वे जुड़ गए थे। पृथक छत्तीसगढ़ आंदोलन के शुरूआती दौर से ही वे उसके साथ रहे। फोटोग्राफी के अलावा गीत लिखने में भी उनकी दिलचस्पी थी और उन्होंने अच्छा कंठ स्वर भी पाया था। इनके चलते वे आंदोलन के जलसों में भाषण देने लगे। उन्हें कवि सम्मेलनों में भी आमंत्रित किया जाने लगा। एक तरह से बसंत अपनी प्रतिभा को एक दिशा में केन्द्रित न कर अनेक दिशाओं में फैलाने में लग गए थे। हम लोगों का मिलना-जुलना चलता रहा, यद्यपि उसमें पहले जैसी नियमितता नहीं रही।

1971 में मेरी बड़ी बेटी के पहले जन्मदिन पर जो कुछ मित्र इकट्ठा हुए थे, उनमें बसंत दीवान भी थे। उन्होंने इस अवसर पर जो फोटो लिए वे अभी भी मेरे एलबम में सुरक्षित हैं। यद्यपि अधिकतर मित्र अब हमारे बीच नहीं रहे। घर और प्रेस के कार्यक्रमों के फोटो अनेक अवसरों पर उन्होंने ही लिए। बसंत दीवान के दो मजेदार प्रसंग मुझे ध्यान आ रहे हैं- 1972 में अपने मित्र डॉ. रमेश आहूजा की शादी में हम बहुत से लोग महासमुंद गए। रात को रेस्ट हाउस में रुके थे। बरामदे में बैठकर गप्पें चल रही थीं। कहीं एक कुत्ता भौंका। बसंत ने हूबहू उसकी नकल उतारी, देखते ही देखते सौ-पचास कुत्तों का समवेत स्वर में भौंकना शुरू हो गया। एक तरफ श्वान सेना, दूसरी तरफ अकेले बसंत दीवान। अपने प्रबल कंठस्वर और  नकल उतारने की प्रतिभा से उन्होंने युद्ध जीत लिया। सारे कुत्ते थककर वापिस लौट गए। एक दूसरा प्रसंग अगले साल 1973 का है। मेरे छोटे भाई देवेन्द्र का विवाह रायपुर के पास चम्पारण से होना था। मैं तैयारियों के लिए पहले चला गया था। बसंत सहित कुछ मित्र बस से आने वाले थे। उसमें छोटे भाई के जबलपुर से आए मित्र भी थे। बाराती धर्म का निर्वाह करते हुए उन्होंने कुछ ऊलजलूल ढंग से बातें करना शुरू कीं। मना करने पर भी नहीं माने। दूल्हे के दोस्त, वे भी जबलपुर के, तब बसंत दीवान ने कमान संभाली और उन उदण्ड लड़कों को ऐसे चुन-चुनकर जवाब दिए कि वे पानी मांगते न•ार आए। बसंत दीवान को गुरु मानकर उनके पैर पकड़ लिए।

बसंत दीवान यारबाश थे। दोस्ती निभाना जानते थे। एक प्रसंग का उल्लेख उदाहरण स्वरूप देना चाहूंगा। प्रदेश से बाहर किसी नगर के एक युवा पत्रकार साथी एक दिन अचानक रायपुर आए। वे अपनी प्रिया को खोजते-खोजते यहां पहुंचे थे। उसके परिजन इस संबंध से नाखुश थे। इन्हें कहीं से खबर लगी कि कन्या को छत्तीसगढ़ के किसी नगर में उसके दूरदराज के रिश्तेदारों की पहरेदारी में रखा गया है। हम कुछ लोग सलाह-मशविरा करने बैठे। राजूदा याने राजनारायण मिश्र और बसंत दीवान ने जिम्मेदारी ली कि वे सही खबर पता करके रहेंगे। उनको मिशन में सफलता मिली। रायपुर में कलेक्टर को अर्जी दी गई कि कन्या बालिग है, उसे मर्जी के खिलाफ रोका गया है। रविवार के दिन कलेक्टर के बंगले में कन्या, उसके रिश्तेदार और साथ में पुलिस इंस्पेक्टर आए। कन्या से परिवार का दु:ख नहीं देखा गया। हमारे दु:खी साथी ने उसके प्रेम पत्र और प्यार की निशानी रुमाल वगैरह वहीं लौटा दिए। ये जो हुआ सो हुआ, लेकिन दा और बसंत दीवान ने एक मित्र के लिए जो खतरा उठाया उसकी तो तारीफ करना ही होगी।

जैसा कि मैंने पहले कहा बसंत इस बीच अन्य गतिविधियों में मसरूफ हो गए थे। मैं भी अपने काम में मुब्तिला था। पहले जैसी फुर्सत और निश्चिंतता अब नसीब नहीं थी। लेकिन फिर एक दिन मैंने ही उनसे बात की। 1964 में मैंने उन्हें प्रेस फोटोग्राफर बनने का मशवरा दिया था। इस बार मेरा परामर्श था कि देशबन्धु के लिए व्यंग्य कविता का एक दैनिक कॉलम लिखो। वे मान गए और बसंत राग  शीर्षक से उनकी व्यंग्य कविता का स्तंभ प्रकाशित होने लगा। यह कॉलम संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित होता था। ये बात शायद 1994-96 के आसपास की होगी। कॉलम लोकप्रिय हुआ, लेकिन अपने बिंदासपन के मारे बसंत इसे लंबे समय तक जारी नहीं रख पाए। मैं आज सोचता हंू कि बसंत अपने नाम के अनुरूप जीवन भर एक तरुण ही बने रहे। कुछ-कुछ बेपरवाह, कुछ-कुछ जिद्दी, कुछ-कुछ स्वप्नदर्शी। कहना होगा कि उन्होंने नाम के अनुरूप अपने व्यक्तित्व को बचाकर रखा। गर्मी, बरसात, जाड़ा, सब झेलते रहे, लेकिन अपने जीवन में शिशिर को आने नहीं दिया।