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Monday 22 Oct 2018

भारत के विकास के लिए भारतीय भाषाएँ जरूरी क्यों?

कुछ भ्रम : 1. अंग्रेजी ही ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और उच्चतर ज्ञान की भाषा है; 2. अंग्रेजी ही अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान और कारोबार की भाषा है; और
3. भारतीय भाषाओं में उच्चतर ज्ञान की भाषाएँ बनने का सामथ्र्य नहीं है। पर निम्न तथ्य बताते हैं कि ये बातें मात्र भ्रम हैं, और इनका कोई प्रमाण नहीं है :
शिक्षा और मातृभाषा बनाम अंग्रेजी माध्यम :
1. 2012 में विज्ञान की स्कूली स्तर की शिक्षा में पहले 50 स्थान हासिल करने वाले देशों में अंग्रेजी में शिक्षा देने वाले देशों के स्थान तीसरा (सिंगापुर), दसवां (कनाडा), चौदहवां (आयरलैंड), सोलहवां (ऑस्ट्रेलिया), अठारहवाँ (न्यूजीलैंड) और अठाईसवाँ (अमेरिका) थे, अर्थात पहले, दूसरे, और अन्य उच्च स्थानों पर दूसरी भाषाओं में शिक्षा देने वाले देश थे। इन अंग्रेजीभाषी देशों में भी शिक्षा अंग्रेजी के साथ-साथ दूसरी मातृभाषाओं में भी दी जाती है। 2003, 2006 और 2009 में भी यही रुझान थे।
2. एशिया के प्रथम पचास सर्वोत्तम विश्वविद्यालयों में एकाध ही ऐसा है जहाँ शिक्षा अंग्रेजी माध्यम में दी जाती है, और भारत का एक भी विश्वविद्यालय इन पचास में नहीं आता है।
3. दुनिया भर के भाषा और शिक्षा विशेषज्ञों की राय और तजुर्बा भी यही दर्शाता है कि शिक्षा सफलतापूर्वक केवल और केवल मातृभाषा में दी जा सकती है।
4. भारतीय संविधान व शिक्षा पर अभी तक बने सभी आयोगों और समितियों के भी यही आदेश हैं।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार/कारोबार और मातृभाषा बनाम अंग्रेजी माध्यम :1. सत्रहवीं सदीं में (जब एकाध भारतीय ही अंग्रेजी जानता होगा) दुनिया के सकल उत्पाद में भारत का हिस्सा 22 प्रतिशत था जो अब मात्र 2.50 प्रतिशत है।
2. 1950 में दुनिया के व्यापार में भारत का हिस्सा 1.78 प्रतिशत था जो अब केवल 1.50 प्रतिशत है; प्रति व्यक्ति निर्यात में दुनिया में भारत का स्थान 150 वां है, जबकि हमसे बहुत छोटा देश दक्षिण कोरिया भी हमसे 14 स्थान ऊपर है।
3. पिछले दिनों इंग्लैंड में रिपोर्ट छपी है कि यूरोपीय बैंक इंग्लैंड वालों को इसलिए नौकरी नहीं दे रहे क्योंकि उन्हें अंग्रेजी के अलावा कोई भाषा नहीं आती है, और कोई अन्य भाषा नहीं जानने के कारण इंग्लैंड को व्यापार में चार लाख करोड़ रूपये का सालाना घाटा हो रहा है।
भारतीय भाषाओं का विज्ञान आदि के शिक्षण के लिए सामथ्र्य : चिकित्सा विज्ञान के कुछ अंग्रेजी शब्द और इनके हिंदी समतुल्य यह स्पष्ट कर देंगे हैं कि ज्ञान-विज्ञान के किसी भी क्षेत्र के लिए हमारी भाषाओं में शब्द मौजूद हैं या आसानी से प्राप्त हो सकते हैं।
Haem (रक्त)
Haemacyle (रक्त-कोशिका)
Haemagogue (रक्त-प्रेरक)
Haemal (रक्तीय)
Haemalopia (रक्तीय-नेत्र)
Haemngiectasis (रक्तवाहिनी-पासार)
Haemangoima (रक्त-मस्सा)
Haemarthrosis (रक्तजोड-विकार)
Haematemesis (रक्त-वामन)
Haemantinic (रक्तवर्धकये)
उपरोक्त शब्द ज्ञान-विज्ञान और अंग्रेजी भाषा के सम्बन्ध में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाते हैं। इनमें से एक भी शब्द अंग्रेजी का नहीं हैं, बल्कि सीधे लैटिन से उठाये गए हैं। इसलिए ये समझना भी अतिमूढ़ता है कि यदि आपको अंग्रेजी भाषा आती है तो ज्ञान-विज्ञान की शब्दावली भी समझ में आ जाएगी, क्योंकि स्वयं अंग्रेजी की ऐसी शब्दावली अधिकतर लैटिन और ग्रीक भाषाओं की है।
मातृभाषा माध्यम में शिक्षा और विदेशी भाषा सीखना - यह सही है कि वर्तमान समय में विदेशी भाषाओं का ज्ञान महत्वपूर्ण है। विदेशी भाषा सीखने के सन्दर्भ में यूनेस्को की 2008 में छपी पुस्तक (इम्प्रूवमेंट इन द क्वालिटी ऑफ मदर टंग - बेस्ट लिटरेसी एन्ड लर्निंग, पृष्ठ 12) से यह बात बहुत महत्वपूर्ण है- हमारे रास्ते में बड़ी रुकावट भाषा एवं शिक्षा के बारे में कुछ अन्धविश्वास हैं और लोगों की आँखें खोलने के लिए इन अंधविश्वासों का भांडा फोडऩा चाहिए। ऐसा ही एक अंधविश्वास यह है कि विदेशी भाषा सीखने का अच्छा तरीका इसका शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग है (दरअसल, अन्य भाषा को एक विषय के रूप में पढऩा ज्यादा कारगर होता है)। दूसरा अंधविश्वास यह है कि विदेशी भाषा सीखना जितना जल्दी शुरू किया जाए, उतना बेहतर है (जल्दी शुरू करने से लहजा तो बेहतर हो सकता है पर लाभ की स्थिति में वह होता है जिसकी मातृभाषा पर पकड़ अच्छी होती है)। तीसरा अंधविश्वास यह है कि मातृभाषा विदेशी भाषा सीखने की राह में रूकावट है (मातृभाषा में मजबूत नींव से विदेशी भाषा बेहतर सीखी जा सकती है)। स्पष्ट है कि ये अंधविश्वास है, सत्य नहीं। लेकिन फिर भी यह नीतिकारों की इस प्रश्न की अगुवाई करते हैं कि प्रभुत्वशाली (हमारे सन्दर्भ में अंग्रेजी-ज.स.) भाषा कैसे सीखी जाय? यह कथन दुनिया भर में हुए अध्ययन का नतीजा था। लगभग हर देश में विदेशी भाषा बच्चे को 10 साल की उम्र के बाद पढाई जाती है और इन बच्चों की विदेशी भाषा में महारत भारतीय बच्चों से कम नहीं है। इन देशों को अंग्रेजी की जरूरत भारत जितनी है और ये देश शिक्षा के मामले में भारत से समझदार हैं व विकास में आगे हैं।
भाषा कब मरती है - आज के युग में किसी भाषा के जिंदा रहने और विकास के लिए उस भाषा का शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग आवश्यक है। वही भाषा जिंदा रह सकती है जिसका प्रयोग जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में होता रहे।(भाषा के खत्म होने का खतरा कब होता है, इसके बारे में पढऩे के लिए
http://punjabiuniversity.academia.edu/JogaSingh/papers देखें)
अंग्रेजी माध्यम के कुछ और बड़े नुकसान - अंग्रेजी माध्यम की वजह से एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है, जिसका न अपनी भाषा और न अंग्रेजी में कोई अच्छा सामथ्र्य है और न ही यह अपनी संस्कृति, परंपरा, इतिहास व अपने लोगों के साथ कोई गहन आत्मीयता बना सकती है, और न ही प्राप्त ज्ञान को 95 प्रतिशत भारतीयों के साथ साझा कर सकती है।
निष्कर्ष- भारतीय शिक्षण संस्थाओं का दयनीय दर्जा, विश्व व्यापार में भारत का लगातार कम हो रहा हिस्सा, भाषा के मामलों में विशेषज्ञों की राय और वर्तमान अंतरराष्ट्रीय भाषा व्यवहार और स्थिति इस बात के पक्के सबूत हैं कि मातृभाषाओं के क्षेत्र अंग्रेजी के हवाले कर देने से अभी तक हमें भारी नुकसान हुए हैं और इससे न तो हमें अभी तक कोई लाभ हुआ है और न ही होने वाला है। भारत का दक्षिण कोरिया, जापान, चीन जैसे देशों से पीछे रह जाने का एक बड़ा कारण भारतीय शिक्षा और दूसरे क्षेत्रों में अंग्रेजी भाषा का दखल है।
विनती - उपरोक्त तथ्यों की रोशनी में हमारी विनती है कि भारतीय लोग वर्तमान भाषागत स्थिति के बारे में गहन सोच-विचार करें ताकि सही भाषा नीति व्यवहार में लाई जा सके। इसमें पहले से ही बहुत देर हो चुकी है और भारी नुकसान हो चुके हैं। यदि वर्तमान व्यवहार ऐसे ही चलता रहा तो भारत की और भी बड़ी तबाही निश्चित है।