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Tuesday 21 Aug 2018

सांस्कृतिक बहुलता की यायावरी विशेष संदर्भ : ब्रह्मपुत्र

वे तब साठ पार कर चुके थे। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में जाने के लिए मैं आर्य समाज रोड से जिस बस में बैठा था उसी बस को उन्होंने अगले किसी स्टाप से पकड़ा था। कुछ भीड़ और कुछ जगह की पहचान के अभाव में मैं कुछ आगे निकल गया था। और उन्हें उतरते हुए नहीं देख सका था। बस में उनके चढ़ते समय से ही पत्रिकाओं और किताबों में देखे गए उनके चित्र से मन ही मन मैं उनके चेहरे को मिलान करता रहा था। फिर बीच में कभी सम्मेलन स्थल के बाहर, एक खोकानुमा, कैंटीन में दूरदराज से आए बहुत से परिचित अपरिचित लेखकों से उन्हें घिरे देखा था। हाथ में बिना मक्खन वाले स्लाइस लिए, सुड़-सुड़ की धीमी आवाज के साथ वे चाय पी रहे थे। सुड़कते समय चाय उनकी लंबी दाढ़ी और मूछों को भिगोती हुई अपनी जगह बनाती थी। लेकिन वे जैसे इसके अभ्यस्त हो चुके थे। यह नवम्बर 1970 में दिल्ली में आयोजित अफ्रो-एशियन लेखक सम्मेलन की बात है। देशी-विदेशी कोई पांच सौ लेखकों का यह एक बड़ा जमावड़ा था। एक बड़े और भव्य मेले की तरह। उस कैंटीन में खास तौर से उनके पास खड़े होकर और लोगों की बातों को सुनकर ही मेरा अनुमान पुख्ता हुआ कि वे देवेन्द्र सत्यार्थी ही हैं। फिर सम्मेलन में तीनों दिन उनसे भेंट होती रही। और बातचीत का मौका भी मिला। तीनों दिन उनकी धज एक ही थी बिना किसी परिवर्तन के- चौड़े पांयचे का नीचे से लौटा हुआ कुछ उलंग सा पैजामा, कोट और चेस्टर के बीच की लंबाई वाला उनका हल्के स्लेटी रंग का कोट जिसके एक कंधे पर एक शांति निकेतनी झोला पड़ा रहता था। उनके जूते ब्राऊन रंग के थे, फीतों के बजाय ऊपर बकसुए से जड़ी एक पट्टी वाले। मोजे उन पर पहने जा सकते थे, लेकिन उन्होंने पहने नहीं थे।
देवेन्द्र सत्यार्थी पंजाबी मूल के एक बहुभाषी लेखक थे जो अपनी पीढ़ी के कुछ दूसरे लेखकों की तरह पंजाबी, उर्दू और हिंदी में लिखते थे। एक चौथी भाषा के रूप में उन्होंने अंग्रेजी में भी लिखा। उन्होंने गद्य की प्राय: सभी प्रमुख विधाओं में लिखा- उपन्यास, कहानी, संस्मरण, आत्मकथा, यात्रा-वृत्तांत और भी काफी कुछ। लेकिन उनकी मुख्य पहचान एक खानाबदोश यायावर की थी। भरी जवानी में जिसने देश के विभिन्न प्रांतों और भाषाओं के लोकगीत संग्रह करने का जुनून पाल लिया था। उनकी पहचान वस्तुत: उनके उस काम से बनी थी जिसे उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। उन्होंने और जो कुछ किया और लिखा वह उनकी इस मूल पहचान का ही विस्तार था- किसी बड़ी नदी की विभिन्न दिशाओं में कटती और बहती धाराओं की तरह। लोक गीतों के प्रति उनका यह जुनून ही वस्तुत: देश की सांस्कृतिक एवं भावात्मक बहुलता की ओर ले गया। उन प्रांतों के लोक गीतों के माध्यम से ही उन्होंने वहां की लोक-संस्कृति और लोक-जीवन को समझने की कोशिश की स्वयं उसका अभिन्न हिस्सा बनकर। आज सांप्रदायिक केंद्रीयकरण और क्षेत्रवाद-जातिवाद के इस भयावह और विघटनकारी दौर में देवेन्द्र सत्यार्थी को याद करना वस्तुत: घटाटोप अंधेरे के बीच चांदी के तार के मानिन्द एक उजली लकीर को देखना है।
1952 से 1992 के बीच लगभग चालीस वर्ष की अवधि में देवेन्द्र सत्यार्थी ने हिंदी में आठ उपन्यास लिखे। रथ के पहिये (1952), कठपुतली (1954) ब्रह्मपुत्र (1956), दूधगाछ (1958), कथा कहो उर्वशी (1960), तेरी कसम सतलुज (1988), घोड़ा बादशाह (1991), विदा दीपदान (1992)।
देवेन्द्र सत्यार्थी (1908-2003) का रचना-कर्म वस्तुत: जीवन के लिए निर्धारित उसके लक्ष्य का ही हिस्सा था। उनके उपन्यास भी इसका अपवाद नहीं हैं। लोक गीतों के संकलन संचयन की प्रक्रिया में जहां-जहां वे भटके उन स्थानों के प्रति उनके मन में एक गहरा रागात्मक लगाव भी पनपा। उन्होंने उन क्षेत्रों की संस्कृति और मानवीय प्रकृति को भी समझने का प्रयास किया-गहरी संलग्नता और अंतरंगता के साथ। उनके अधिकतर उपन्यास सांस्कृतिक बहुलता के अन्वेषण के माध्यम से देश की आत्मा को ही समझने का एक उपक्रम जैसा है। 'रथ के पहिये' उन्होंने गोंडवाना क्षेत्र की गोंड संस्कृति को आधार बनाकर लिखा। इसी तरह 'ब्रह्मपुत्र' और 'दूध गाछ' क्रमश: असम और केरल की संस्कृति को केंद्र में रखकर, 'कथा कहो उर्वशी' उड़ीसा पर केंद्रित उपन्यास है। जबकि 'तेरी कसम सतलुज' पंजाब पर। अपने इस सांस्कृतिक अन्वेषण की प्रक्रिया में नदी संस्कृति की उनके लिए एक विशिष्ट भूमिका है। चाहे ब्रह्मपुत्र हो या महानंदा और सतलुज, ये एक ओर उनके लिए यदि मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास का पर्याय रही हैं वहीं वे इन क्षेत्रों के वन-जीवन की रंगांरग और बहुवर्गीय छवियों का आईना भी रही हैं। देवेन्द्र सत्यार्थी के लिए इस नदी-सभ्यता का अर्थ है उससे जुड़ा विशाल लोक जीवन।
लेखक के उपन्यास 'ब्रह्मपुत्र' (1956) की परिकल्पना किसी त्वरित या तात्कालिक स्फुरण का परिणाम नहीं है। लेखक की पहली असम यात्रा, 1930 में हुई, उनकी बाईस वर्ष की उम्र में। उनकी दूसरी यात्रा चौबीस वर्ष बाद 1954 में हुई जिसमें वह ब्रह्मपुत्र से अपनी पुरानी मैत्री को याद करता है- अपने पुराने मित्र ब्रह्मपुत्र को मैंने अपने सामने पाया।' (ब्रह्मपुत्र संस्करण 1956, भूमिका पृ. 21) चौबीस वर्ष की इस अवधि में असम में भयानक भूकंप के कारण घटित परिवर्तन और उसके परिणामस्वरूप लगी खुरेचों का उल्लेख ब्रह्मपुत्र के संदर्भ में वह मनुष्यवत् करता है। बांगला में 'पद्मा नदीर मांझी' जैसे उपन्यास के लेखक, जिस पर उत्पल दत्त अभिनीत एक बड़ी फिल्म भी बनी है, माणिक बांद्योपाध्याय से हुई अपनी भेंट का उल्लेख भी देवेन्द्र सत्यार्थी करते हैं। वे माणिक बाबू की इस उक्ति का उल्लेख भी करते हैं- 'पद्मा नदीर मांझी' में मैंने पद्मा को मु_ी में बांधने की कोशिश की, नहीं बांध सका। अब आप ब्रह्मपुत्र को बांधने की कोशिश कर देखें (वहीं पृ.26) यहां पर सूचना भी शायद बहुत असंगत न हो कि यह उपन्यास बांगला में 1936 में प्रकाशित हुआ था। 1936 और 1956 के बीच इसके सात संस्करण बांगला में हो चुके थे। 1957 में श्रीपत राय और भैरवप्रसाद गुप्त के संपादन में मासिक 'उपन्यास' में इसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ। बाद में दो अंकों में माणिक बाबू के 'पुतुल नाचेर इति कथा' का अनुवाद भी प्रकाशित हुआ।
देवेन्द्र सत्यार्थी के उपन्यास 'ब्रह्मपुत्र' की एक संक्षिप्त भूमिका संस्कृतिविद काका कालेलकर ने भी लिखी है- नदी संस्कृति के बखान का उल्लेख करते हुए। काका कालेलकर ने 'लोक माता' नामक अपनी रचना में भारत की प्राय: सभी नदियों के शब्द-चित्र अंकित किए हैं। जब उन्होंने 'लोकमाता' की रचना की, तब तक वे असम की यात्रा नहीं कर सके थे। अत: 'ब्रह्मपुत्र' 'लोक माता' से बाहर रहा। इस कड़ी से 'ब्रह्मपुत्र' को जोड़ते हुए खासतौर से उसकी भाषा के प्रसंग में, देवेन्द्र सत्यार्थी जैसे अपने लिए भाषा की कसौटी प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं, 'जो लोकभाषा की राजकुमारी के समान न जाने कब से पड़ी सो रही थी, अब जाग उठी है या नहीं।'' (वही पृ. 27) ब्रह्मपुत्र एक नदी से अधिक हमारे लिए एक संस्कृति का हिस्सा है और उसका लोक पक्ष ही वस्तुत: रचना का मुख्य उपजीव्य है।
कथा का काल मुख्यत: देश की स्वाधीनता के कुछ पूर्व से चलकर स्वाधीनता के आरंभिक सात-आठ वर्षों तक चलता है। इस तरह मोटे तौर पर कुल मिलाकर कोई एक दशक की कालावधि कथा के केन्द्र में है। स्वाधीनता आंदोलन और औपनिवेशिक दमन की दृष्टि से तो यह कालखंड महत्वपूर्ण है ही उसमें लगता है लेखक ने 1954 में अपनी दूसरी आत्मकथा के अनुभव एवं पर्यवेक्षण को भी शामिल किया है। किसी स्पष्ट और प्रखर राजनीतिक चेतना से अधिक लेखक के सरोकार सामाजिक और सांस्कृतिक ही अधिक हैं। लेकिन अनेक औपनिवेशिक नियमों और नीतियों का स्वाधीनता के सात साल बाद भी बने रहना और उनके प्रति जनता के असंतोष और विरोध की अभिव्यक्ति उस दौर की कम्युनिस्ट राजनीति की ही संगत में है जो देश की इस स्वाधीनता को आधी-अधूरी और सामान्य जनता की कल्पना के विरुद्ध मानती थी। ब्रह्मपुत्र में बहकर आने वाली लकड़ी पर स्वाधीन भारत में जनता को टैक्स देना होता है, जैसा औपनिवेशिक काल में होता था। स्वाधीनता के पूर्व प्रदेश में बने कांग्रेस मंत्रिमंडल ने भी अंग्रेजों के बनाए इस कानून को जारी रखकर पक्का कर दिया। जनआंदोलन में भी यह मुद्दा एक प्रमुख मुद्दा बन कर उभरता है।
कहानी असम के एक बड़े गांव दिसांगमुख में केंद्रित है। यहां पांच बस्तियां हैं। अली सीगा की मीरा बस्ती, अली सीगा की मुसलमान बस्ती, बलमा, चितालिया और जेलगांव। अली सीगा की दोनों बस्तियों को कुछ लोग एक ही मानते हैं। जेलगांव में बांस के टट्टरों को खड़ा करके अंग्रेजों ने कभी एक कामचलाऊ जेल बनाई थी। बाद में पक्की और स्थायी जेल बन जाने पर उस स्थान को गांव के रूप में विकसित किया गया और उसकी पुरानी पहचान के अनुरूप ही उसे जेलगांव कहा गया।
'ब्रह्मपुत्र' में जिन परिवारों को एक सूत्र में गूंथ कर कहानी का ताना-बाना तैयार किया गया है। वे इसी क्षेत्र की जनजातियों से संबद्ध हैं। धर्मा नंदी बलमा है अब्दुल कादिर अली सीगा की मुसलमान बस्ती से है। मीरा बस्ती और मुसलमान बस्ती के बीच आमने-सामने नीलमणि और कल्याण भगत के घर हैं। चितालिया मुख्यत: नेपाली बस्ती है। दो छोरों पर अवस्थित बलमाबिल (झील) और फाकलीबिल के बीच चतुर्दिक घना जंगल है। प्रकृति की आत्मिक और अंतरंग निकटता ही लोगों में ऊर्जा और स्फूर्ति का मुख्य स्रोत है।
निकट ही दुनिया का सबसे बड़ा दीप माझुली है जो तब भी लोगों के आकर्षण का केंद्र था और आज भी है। माझुली पर किसी अंग्रेज लेखक की लिखी किताब देवकान्त ने देखी थी। उसे पढ़कर देवकान्त की प्रतिक्रिया थी 'वह कहना चाहता था हिन्दुस्तान के लोग गर्भवती गाय के समान हैं। फिरंगी बाघ की तरह गाय पर झपटता है। (वही पृ.सं. 266)
अपनी साम्राज्य-विरोधी क्रांतिकारी गतिविधियों के रंग में पुलिस से बचने के लिए देवकान्त माझुली को ही अपना शरण्य बनाता है। माझुली की उषा उसे प्रिय संकेत वाहक और पुष्ट आशावाद का संकेत देती लगती है। माझुली की कुल लम्बाई बीस मील है। वर्षा ऋतु में भी चौड़ाई पांच मील। वर्षाऋतु के बाद बाढ़ का जोर बढ़ जाता है। एक गांव से दूसरे गांव जाने को गुंठिया नाव लेनी होती है। बस्ती की कुल आबादी बीस-पच्चीस हजार है। असम के धार्मिक जीवन में वैष्णव संत शंकरदेव और उनके साधक शिष्य माधव देव के संप्रदाय ने अपने चार सत्र स्थापित करने के लिए माझुली को ही चुना। अपने क्षेत्र की सघन सांस्कृतिक पहचान के कारण ही देवकान्त को उस अंग्रेज लेखक की किताब असहमतियों का पिटारा जैसी लगी थी। वैसे भी वह बाहरी लोगों के लिए लिखी गई थी।
धर्मा नंदी, नीलमणि, कल्याण भगत, अब्दुल कादिर आदि कुछेक विभिन्न पेशों एवं धंधों से जुड़े व्यक्तियों एवं परिवारों के माध्यम से देवेन्द्र सत्यार्थी समूचे असम के जन-जीवन के विभिन्न रूपों को अंकित करने का प्रयास करते हैं। इनमें देवकान्त जैसा क्रांतिकारी युवक और उसकी बूढ़ी बीमार मां भी है। मां को इसलिए अपने एकमात्र बेटे की निकटता और सेवा का सुख नहीं मिल पाता क्योंकि बेटे ने मां से अधिक महत्व भारत-माता को दिया है और अन्तत: उसकी स्वाधीनता के लिए ही वह बलिदत्त हो जाता है। कुछ बाहर से आकर वहीं बस चुके या फिर लंबे समय बाद लौटे लोग भी अब दिसांगमुख का ही हिस्सा हैं। इनमें एक ओर यदि राखाल काका हैं तो दूसरी ओर हडसब साहब की बेटी लिली है जो पेशे से डॉक्टर है। राखाल तीस साल बाद जंगलों में हाथियों के बीच नौकरी करके लौटा है। लिली नें स्थानीय लोगों की सेवा को अपने जीवन का मिशन बना लिया है। पिता की इच्छा के विरुद्ध एक भारतीय युवक नीरद से प्रेम करके वह उससे विवाह करती है। आर्थिक रूप से वह उसके लिए यह सुविधा भी प्रदान करती है कि पूरा समय देकर ब्रह्मपुत्र पर लिखी जाने वाली वह अपनी किताब पूरी कर सके। एक लेखक के रूप में नीरद स्वयं देवेन्द्र सत्यार्थी का प्रतिरूप भी लग सकता है। अपनी प्रस्तावित पुस्तक 'ब्रह्मपुत्र' के संबंध में देवकान्त से बात करते हुए रचना की सफलता का मानक प्रस्तुत करते हुए वह टिप्पणी करता है 'लेखक की रचना से भी सोंधी-सोंधी सुगंध आने लगे, तो समझो लेखक की कला जीवन्त हो उठी है।'(वही पृ.सं. 201)।
नीरद देवकान्त का बहुत सम्मान करता है। उसकी कटुक्तियों एवं व्यंग्य को भी वह हंसकर बर्दाश्त करता है। लेकिन देवकान्त की राह उसकी अपनी राह नहीं है। वह लेखक है और लेखक ही बने रहना चाहता है। उसकी प्राप्ति की कथा भी कहीं न कहीं बाल्मीकि, व्यास और कबीर से मिलती-जुलती है। ब्रह्मपुत्र के किनारे खड़ी एक नाव पर केलों के पत्तों में छिपा एक नवजात शिशु उसकी मां ने देखा और ले आई। इस तरह वह ब्रह्मपुत्र का ही बेटा है। देवकान्त उसकी इस कथा पर अविश्वास करते हुए उसकी खिल्ली उड़ाता है। लेखक की अपनी प्रक्रिया में ही अपनी प्रस्तावित रचना के वस्तु विस्तार की ओर संकेत करते हुए वह राखाल काका से कहता है 'पहले मैं एक नदी की जीवनी लिखना चाहता था, आज मेरी समझ में यह बात आ गई कि नदी किनारे बसे हुए लोगों का संघर्ष भी नदी की जीवनी से अलग नहीं है।' (वही पृ. 206)। यह सूत्र प्रकारान्तर से देवेन्द्र सत्यार्थी के अपने 'ब्रह्मपुत्र' पर भी लागू किया जा सकता है।
नदी के किनारे बसे लोगों का जीवन और उनका बहुविध संघर्ष उस जीवन के उल्लास और उमंग, पर्व त्यौहार और सबसे अधिक उसका सौहाद्र्र एवं सद्भाव ही वस्तुतत: इस उपन्यास का प्रधान उपजीव्य है। युवाओं के जीवन में अंकुरण और पनपा राग और उसकी विभिन्न छवियां इस जीवन को जैसे उषा की तरह ब्रह्मपुत्र को एक अरुणिमा देता है। धर्मानंदी मछुआरा है। पत्नी के असामयिक और आकस्मिक निधन के बाद अब युवा बेटी आरती ही उसके जीवन का सम्बल है। बेटी के गुणों का बखान करते हुए कभी पत्नी उससे कहती थी 'ऐसी लड़की जो किसी को सोने के भाव भी महंगी है।' (वही पृ. 345)। इसी पत्नी के लिए उसने बेटी होने का ताना दिया था। वह पत्नी मगरमच्छ के मुंह में समा गई। उसे लगता है उसी से दुखी होकर उसने जानबूझ कर यह किया था। आरती तब बच्ची थी। उसकी खातिर ही फिर उसने विवाह नहीं किया। आज उस आरती और प्रकृति के सहारे ही जिन्दा है। ब्रह्मपुत्र किस प्रकार उसका सर्वस्व बन गया है। जैसे इसी ओर संकेत करते हुए वह कहता है 'हमारी खेती तो पानी पर होती है। मछलियां ही हमारी खेतियां हैं। (वही पृ. 41)। मछलियां चाहे रोएं या हंसे, सभा बुलाकर आंदोलन करें- हम तो अपना काम करते ही रहेंगे। (वही) पत्नी की मृत्यु के बाद दिसांग नदी के किनारे बलमा वाला पुराना घर धर्मानंदी ने छोड़ दिया है। बहुत बड़ी नाव पर एक झोपड़ी बना ली है। उस नाव को प्राय: वह पानीघाट और नावघाट के बीच ब्रह्मपुत्र के किनारे खड़ी रखता था। इस झोपड़ी की एक खिड़की नदी की ओर खुलती थी। खाली होने पर आरती उसी खिड़की पर बैठी रहती। जूनतारा को भी उसने अपने इस खेल में शामिल कर लिया था और वे देर तक ब्रह्मपुत्र को निहारती रहतीं। इसी झोपड़ी में धर्मानंदी ने जीवन निर्वाह की सारी चीजें जुटाई हैं। अब वही उसका घर है। आरती नाव खेकर दूर तक जाती है। अपनी अनुभव-पगी आंखों से दूर तक टोहकर धर्मानंदी मछलियों वाली जगह पर जाल डालकर अपना खेत काटता है। पच्चीस वर्ष की नितम्बनी नायिका के रूप में आरती देवकान्त की आतुर प्रतीक्षा करती है। मिलिट्री द्वारा घेर लिए जाने पर घायलावस्था में पीठ पर लादे जब अतुल देवकान्त को लेकर उसके यहां पहुंचता है, एकांत के कुछ गिने-चुने क्षण ही उसकी पूंजी बन जाते हैं। देवकान्त की साध को पूरा करने के लिए वही नाव से उसे ब्रह्मपुत्र में जल समाधि देने को ले जाती है। थाने में देवकान्त का पता बताने के लिए नारायण दारोगा उसे और उसके पिता को तरह-तरह की यातनाएं देता है। आरती असम के इतिहास की रानी जयमति बन जाती है और देवकान्त रानी के पति राजा गजाधर सिंह के रूप में उभरता है। अहोम राजा चूलिका का अपने अत्याचारों और उत्पीडऩ के लिए नारायण दारोगा के रूप में ही उसके सामने आ खड़ा होता है।
देवकान्त को खोकर आरती की विक्षिप्तता धर्मानंदी पर भारी पड़ती है। यही दुख जैसे बहुत जल्दी उसे बूढ़ा कर देता है। ब्रह्मपुत्र के किनारे बैठकर उतरती हुई संध्या में, बूढ़ा धर्मानंदी बच्चों को जो कथा सुनाता है, सृष्टि के विकास की, उसमें मनुष्य ही ब्रह्मपुत्र का पर्याय है। ब्रह्मपुत्र की कथा प्रकारान्तर से मनुुष्य की ही कथा है। अब्दुल कादिर वैसे विस्तार से कथा में नहींहै जैसे दूसरे हिंदू पात्र और परिवार हैं। लेकिन आपसी सौहाद्र्र और सद्भाव के उदाहरण के यहां भी कम नहींहैं। भगतजी उसके कान के समीप मुंह ले जाकर कहते हैं, एक बार हज तो अवश्य कर आओ मियां जी। (वही, पृ.22) और फिर जैसे समूची बस्ती के प्रतिनिधि के तौर पर नीलमणि भगत जी की ही बात को आगे बढ़ाता है, मियां जी, जब तक हज को नहींजा सकते, दिसांगमुख को ही काबा समझ लो। हम तो इसे काशी मान बैठे हैं। (वही)।
राखाल तीस साल बाद दिसांगमुख में वापस लौटा है। लोगों में कलह और आपसी फांक देख उसे पीड़ा होती है। नारायण दारोगा तो यही चाहता है। देवकान्त और अतुल के पक्ष में बोलकर वह जैसे अपनी स्थिति स्पुष्ट कर देता है। उसने विवाह नहींकिया है। लेकिन चांदडूबी के जंगलों में हाथियों के बीच रहकर इतनी समझ उसमें जरूर आई है कि औरत को भी हथिनी की तरह सिधाना होता है। अपने अफसर नार्मन साहब से उसने बहुत कुछ सीखा है। रिश्ते में साधन मीरी उसका भतीजा होता है। लेकिन उसके साथ न जाकर वह धर्मानंदी और आरती के साथ खड़ा होता है। देवकान्त के लिए पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर सबसे अधिक चिंता उसे उसकी रिहाई की होती है- खासकर लड़की होने के नाते आरती की। चार-पांच दिन वह उनके कारण उपवास करता है और चाय के अलावा कुछ नहींलेता। छूटने पर, बाप-बेटी को पुलिस की हिरासत में रहने की शर्म नहींहै, यह देखकर उसे अच्छा लगता है। एक तरह से वे दोनों ही इस पर अंदर कहीं गर्वित ही थे।
अतुल देवकान्त से अंतरंगता के रिश्ते में बंधकर भी कई मायनों में उससे अलग है। जूनतारा से उसके विवाह की खबर सुनकर नीरद देवकान्त द्वारा उससे बुरा मानने की बात कहता है। विवाह के चक्कर में न पडऩे की सलाह भी वह देता है। अतुल का उत्तर है, देवकान्त का रास्ता कलकत्ता से आरंभ होता है, मेरा दिसांगमुख से (वही, पृ.202)। लिली के कमरे में अतुल के फोटो की सूचना नीरद ही उसे देता है। उसने तो उसकी भिजवाई असमिया बाइबिल की प्रति भी उसने लौटा दी थी। माझुली और दिसांगमुख के बीच में भले ही ब्रह्मपुत्र बहता है- माझुली की घटना ही दिसांगमुख में दोहराई जाएगी। राखाल का सुझाव है- माझुली को देवकान्त संभाल रहा है, दिसांगमुख को अतुल संभालेगा। राखाल की यह सोच एक तरह से समूची बस्ती का प्रतिनिधित्व करती है। अतुल किसी को निराश नहींकरता।
लिली अंग्रेज है-एक ब्रिटिशि अधिकारी हडसन साहब की बेटी। पहले वह अतुल की ओर आकृष्ट होती है, फिर नीरद के संपर्क में आकर जैसे उसमें एक ठहराव आता है। पिता की मर्जी कके विरूद्ध वह नीरद से विवाह करती है। डाक्टरी की अपनी पढ़ाई के बाद उसी क्षेत्र में वह एक बड़ा अस्पताल खोलती है और ब्रह्मपुत्र पर नीरद की किताब के पूरी होने की धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा करती है। उसका जन्म भारत में हुआ है और असम की युवा पीढ़ी को देख जैसे वह उसी रंग में रंग जाती है, मैं एक अंग्रेज की लड़की हूं, तो क्या हुआ, मैं इस देश के रोगियों की सेवा करूंगी। धन्य है यह देश जहां मेरा जन्म हुआ, धन्य है ब्रह्मपुत्र जो संसार के मैप पर अद्वितीय है.. (वही पृ.236)। यह अकारण नहींहै कि उसके प्रसंग में प्रेमचंद के रंगभूमित की सोफिया याद आती है।
जीवन में हाट-बाजार की एक विशिष्ट भूमिका है। वह लोगों के जीवन को संचालित करने वाला केेंद्र तो है ही, जो उनकी दैनिक जरूरतों की पूर्ति करता है, वह उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का भी प्रधान केेंद्र है। लोग यहां मिलते हैं, संवाद करते हैं, आपसी चुहल और परिहास करते हैं। यहींवे सपने देखते हैं और अपने तथा देश के भविष्य का नक्शा तैयार करते हैं। इसी हाट का एक दृश्य है : हाट-बाजार की रौनक तो देखते ही बनती है। भोर से पहले ही दूर-दूर की नौकाएं दिसांगमुख के नावघाट पर आ लगती हैं। सब अपनी-अपनी बिक्री की चीजें लाते हैं। बत्तखें ले लो। मुर्गियां भी हाजिऱ हैं। मछलियां और कछुए भी पड़े हैं। कबूतर ले लो, सुअर ले लो। अंडों से भरी टोकरियां भी जल्दी-जल्दी खाली हो रही हैं। बांस की नरम खपच्चियों से बने थैलों में सुअर बंद हैं। बड़े-बड़े सुराखों में से सुअर नजऱ आ रहे हैं। उनके आगे और पीछे के पैस कस कर बांध दिए गए हैं। आंखें बंद किए पड़े हैं थैलों के अंदर ये छोटे-बड़े सुअर। छोटे थैलों में सुअरियों के दूध पीते बच्चे बंद हैं। उनके विशेष ग्राहक आते हैं। कभी-कभी सुअर की आवाज चीख की तरह सुनाई दे जाती है। कभी टोकरों में बंद कबूतरों और बत्तखों की आवाज हाट-बाजार के वातावरण में गूंज उठती है (वही पृ.32) यह सिर्फ एक हाट भर नहींहै, दिसांगमुख और प्रकारान्तर से समूचे असम के जनजीवन की झांकी है। यहीं अतुल अपने साथियों से कहता है-कोई तो ऐसा भाई का निकलेे जो गुइडालो के समान अत्याचार से टक्कर ले। (वही पृ.30) औपनिवेशिक भारत, कलकत्ता में वह ऐसे होटलों का जिक्र करता है जहां अंग्रेजों के कुत्ते तो जा सकते हैं, लेकिन हिंदुस्तानी नहीं। इसी प्रकार का अपमान देखकर तो नीरद का बापू तिब्बत चला गया। उसने सौगंध खा ली कि जब तक देश स्वतंत्र नहींहो जाता, वह लौट कर देश नहींआएगा। अब उसका बेटा ब्रह्मपुत्र की कहानी लिखकर जैसे अपनी धरती और जड़ों की ओर लौटने का ही एक रचनात्मक उद्यम करता है।
इसी तरह बोहागबिहू यहां के सामाजिक-सांस्कृतिक पर्व से कुछ अधिक और अलग है। बोहागबिहू के सात दिन माने गए हैं, पर चलता वह पूरे बैशाख भर है। लोगों का मानना है कि बिहू पक्षी कोई अलग नहीं, केतकी ही है। गोहाली की सफाई की जाती है। धूप जलाकर गोहाली को सुगंधित किया जाता है। पशुओं को नई-नई रस्सियों से बांधा जाता है। घर में त्योहार के उपलक्ष्य में विशेष रूप से बनाई गई मिठाई का एक हिस्सा पशुओं को भी मिलता है। दोपहर तक हाट-बाजार वाले स्थान पर गांव के युवक और युवतियां भी जुट जाते हैं। दिसांगमुख का बिहू तो दूर तक प्रसिद्ध है। बड़े ही मादक सुरों में बिहू का मंगलाचरण शुरु होता है :
बिहू वा चराय, करे बिहू, बिहू। आमार बिहू कापर लाई
समनियाई सुफिले, कमे किए बूली। सरूते मरीले आई।
(बिहू पक्षी बिहू-बिहू की रट लगा रहा है। मेरे पास तो बिहू के लिए वस्त्र ही नहींहै। संगी-साथी बुलाएंगे तो मैं बहाना कर दूंगा- बचपन में ही मेरी मां चल बसी थी..) ( वही पृ.136)। युवतियों का मन बिहू गाने को ललकता है। गीत के बहाने ही युवती अपने प्रियतम की लालसा में खो जाती है। भगाकर न ले जाने की हिदायत में भी वस्तुत: भगाकर ले जाने की कामना प्रच्छन्न रहती है। अधिक से अधिक क्या होगा- धन ही तो भरना होगा।
बिहू के लिए प्रसाधित जूनतारा का चित्र है- जूनतारा ने श्वेत मेखला पहन रखी थी। जैसे तहमद बांधा जाता है, उससे थोड़ा ऊपर की ओर खींचकर युवतियां मेखला बांधती थीं। श्वेत मेखला के साथ श्वेत ही अंगिया पहनती थी जूनतारा। श्वेत मेखला और अंगिया से मेल खाती हुई श्वेत चादर कंधों पर। जूनतारा का वेश सब सखियों में विशिष्ट था। शेष कन्याओं में से किसी-किसी ने लाल, नीली या पीली मेखला पहन रखी थी। किसी ने तो आज अंगिया पहनने की आवश्यकता अनुभव न की थी। जूनतारा को श्वेत वस्त्र ही अधिक प्रिय थे। महाश्वेता बनने की प्रेरणा उसे सारस से प्राप्त हुई है, यह सोचकर अतुल ने जूनतारा की अभिरूचि की सराहना की..(वही पृ.53)। रूप, हठ और स्वाधीनता की चेतना के साथ करुणा की एक वेगवती धारा भी जूनतारा के व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। बिहू जैसे युवाओं को जीवन की राह चुनने और बनाने का अवसर देता है। पांत से बिछुड़े बीमार सारस को दोनों युवतियां -जूनतारा और आरती-धर्मानंदी के साथ जाकर कमलिया सापरी में छोड़कर आती हैं। थोड़ा प्रयास करने पर ही वह सारस, सारसों की उतरती हुई पांत में मिलकर नील निर्मल आकाश में खो जाता है।
युवतियों में अतुल के प्रति खासा सम्मान-भाव है। लेकिन जूनतारा उसका रौब बर्दाश्त नहींकरती। वह आरती से कहती है, तुमने देखा नहींथा, वह कैसे रौब जमा रहा था, जैसे मैं कोई उसकी रखैल हूं...जूनतारा किसी से डरने वाली नहीं..(वहीपृ.64)। बिहू की राह ही अतुल के जीवन में आकर वह उसके घर-परिवार की साम्राज्ञी बनती है और फिर साम्राज्ञी के ठस्से से ही वह अपना परिवार चलाती है।
कथानक की दृष्टि से ब्रह्मपुत्र एक सुगठित उपन्यास का उदाहरण नहींहै। उसका बिखराव ही वस्तुत: उसका वैशिष्ट्य है। अपनी प्रकृति में आंचलिक उपन्यास के पर्याप्ट निकट होने पर भी वह आंचलिक उपन्यास नहींहै। न यह गोपीनाथ महन्ती के अमृतसंतान, भारती महाल और परजा की तरह विभिन्न आदिवासी समुदायों पर केन्द्रित है। न ही सतीनाथ भादुड़ी के ढोड़ाय चरित मानस की तरह, जिसके बारे में कभी कहा गया था कि रेणु ने इस पर ही कार्बन रखकर अपने मैला आंचल की प्रतिलिपि तैयार की है, अंचल के कुछ प्रतिनिधि पात्रों के माध्यम से एक अंचल विशेष की कहानी है। जिस सामाजिक- सांस्कृतिक बहुलता को देवेन्द्र सत्यार्थी अंकित करना चाहते हैं, उसके लिए ब्रह्मपुत्र का बिखराव वाला यह शिल्प ही एक गुण बन जाता है। इसके बिना इस बहुलता को एक अंर्तसूत्र में पिरो पाना मुश्किल था। इतिहास साक्षी है, असम लंबे समय से धार्मिक एवं सांस्कृतिक बहुलता का केंद्र रहा है। अहोम राजाओं के समय से ही यह समान रूप से वैष्णव और शाक्त धर्मों का केेंद्र रहा है। शाक्त धर्म की प्रबलता के काल में भी पंचदेव की उपासना का साक्ष्य अहोम राजा प्रताप सिंह द्वारा बनाए गए मंदिर में मिलता है। इसमें केेंद्र में शिव के अतिरिक्त मंदिर के चारों ओर, चारों कोनों पर गणेश, सूर्य, दुर्गा और विष्णु की मूर्तियां स्थापित की गई थीं। देवेन्द्र सत्यार्थी का ब्रह्मपुत्र आज से कोई साठ वर्ष पूर्व लिखा गया था। उसमें संरक्षित प्रकृति और नदी संस्कृति का आकर्षण आज इस संस्कृति के भयावह संकट के दौर में हमें सोचने के कुछ सूत्र देता है। धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलता को बर्बतापूर्वक नष्ट करके जब धार्मिक और सांस्कृतिक केन्द्रीकरण की अंधी सुरंग में ठेले जाने के प्रयास हो रहे हों, ब्रह्मपुत्र का पढऩा-समझना उपयोगी हो सकता है।