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Monday 22 Oct 2018

ग़ज़ल

शिवपुरी मध्यप्रदेश निवासी वरिष्ठ कवि ने इस मार्च में जीवन यात्रा के नब्बे साल पूरे कर लिए हैं। अपने जन्मदिन पर उन्होंने अनेक गीत- ग़ज़लों की रचना की, जिनमें से कुछ यहां कवि के दीर्घ रचनाशील जीवन के  प्रति शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत हैं। (संपादक)

 

   (1) 

कैसा है जीवन क्या कहे!

कच्ची है जीवन क्या कहे!

गंगा तैरा, सागर तैरा,

गागर में डूबा क्या कहे!

दिन-रात क्या कहने वाला,

संभाषण भूला क्या कहें!

काँटों की बागड़ लाँघ गया,

राह चलते गिरा क्या कहे!

पास रहकर वे साथ नहीं,

संयोगी-विरही क्या कहें ?

       (2)

 

जो मन में है कहना ऐसा होगा

सीधा पहाड़ चढऩा जैसा होगा।

प्रथम प्रीति की दृष्टि जी रहा हूं

मालूम नहीं मरना कैसा होगा।

खाली बर्तन को जब चाहे भर लो

रीते मन को भरना कैसा होगा।

जो बात-बात में बात खड़ी कर दें

विरही उनको सहना कैसे होगा।

       (3)

 

अँधियारा कुछ बाकी है अभी,

सूरज उगना बाकी है अभी।

तुमसे मिलकर ऐसा न लगा-

तुमसे मिलना बाकी है अभी।

घन सघन घिरे गर्जन वाले

बिजली गिरना बाकी है अभी।

विरही ने कितना कहा, मगर-

कितना कहना बाकी है अभी।

          (4)

 

कभी ऐसा अजब होता है सबेरा,

रात का आभास देता है सबेरा।

कभी मुश्किल से कटा है कोई दिन,

और बातों में हुआ कोई सबेरा।

रात हो तुम पर उजाले से भरी,

मैं अँधेरे से भरा लेकिन सबेरा।

और को कुछ और विरही के लिए -

रोज जैसी शाम वैसा ही सबेरार्।