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Monday 22 Oct 2018

धर्मचक्र को नचा रहे हैं

धर्मचक्र को नचा रहे हैं

 

फटा तिरंगा रफू कर रहे हैं ,

लहराते हैं

देश भक्ति का जोर शोर से

गाना गाते हैं

 

कदमताल कर रहे ,

तरक्की के शहजादे हैं

मार रहे हैं, पैदल-हाथी

घोड़े -प्यादे हैं

 

बिरवा कहीं रोपते तो

फोटो खिंचवाते हैं

 

ऐसा है उन्माद

शराबी भी भौंचक्के हैं

चितकबरे विकास के

पथ पर बड़े उचक्के हैं

 

भरे पेट वालों के हित

लंगर चलवाते हैं

 

धर्मचक्र को नचा रहे हैं

अपनी उँगली  पर

अपने नाम लिख रहे, सारे

तिथियां-संवतसर

 

इनका अपना पोथी-पतरा

पाठ पढ़ाते हैं

 

लड़वाते आपस में

 

लड़वाते आपस में सुअर गाय कैसे

यक्ष प्रश्न, जीवन को जिया जाय कैसे

 

रोज-रोज की किच-किच, दिनचर्या बासी

सी एम का अवध हुआ, पी एम की काशी

 

रस्ते ईजाद करें हाय -हाय कैसे

 

भाषण में चमत्कार, शब्दों में जादू

पहन रहे हैं ताजा फूलों की खुशबू

 

लोग बोल लेते हैं आंय बांय कैसे

 

साँस-साँस में, साँसें लेते समझौते

काटते सुपारी सा समय के सरौते

 

उम्र हुई काली औ कड़ी चाय जैसे

 

ए बी सी डी वाले, जी एस टी समझें

बड़े-बड़े चौराहे, गलियों में उलझें

 

खास लोग देते हैं आम राय कैसे

 

साफ सफाई कभी न होगी

 झाड़ू लेकर गली मोहल्लों

में आने जाने से

साफ सफाई कभी न होगी

फोटो खिंचवाने से

 

मन का कचरा साफ करो

स्वच्छता तभी आयेगी

बाहर भीतर मची गंदगी

खुद ही चकरायेगी

 

होगा कुछ भी नहीं

दूरदर्शन पर बतियाने से

 

रूह छटपटाती होगी

नित मरता-खपता होगा

जिसका नाम ले रहे हो

वो संत तड़पता होगा

 

गाँधी जी को याद करो मत

बस ताने बाने से

 

राजनीति के नंगेपन से

थोड़ा तो बाज आओ

मुँह में भरकर पान ,

न जन गण मन अधिनायक गाओ

 

रोको ठीक नाक के ऊपर

मक्खी उधराने से