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Tuesday 21 Aug 2018

इन दिनों

 इन दिनों

जिस्म के साथ-साथ

चल पड़ती हैं

आशंकाएं

घर से निकलते ही

पलट-पलट कर

देख लेती हैं

कभी पीछे

कभी दायें-बायें

जाने किस बहाने

किस दिशा से

दौड़ी चली आयें

विपदाएं !

 

 

  याद

तारे वहीं के वहीं टंगे थे

आवाजाही कर रहे थे

काले, भूरे, कुछ दूधिया से मेघ

हवा चल रही थी मंद्र मंद्र

चाँद मध्य से खिसक चला था

छत से दो आँखें निहार रही थीं

यूं कहें कि अपलक निहारते चली जा रही थीं

मन में खलबली सी मची थी, धड़कनें थीं थोड़ी तेज

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अपने दुख का बयान मत कर

भगवानों को सावधान मत कर

खड़े -खड़े मर जा कतार में

सरकार को बदनाम मत कर

 

शादी हो, कि सफर, टाल दे

हर वक्त, ज्ञानदान मत कर

 

भूत-वूत से डरते नहीं, ठीक है

मगर उनको हलकान मत कर

 

भक्तों को आईना नहीं दिखाते

सवालों से, परेशान मत कर !

 

पोथी बनाम प्रेम !

 

पोथी आप पढ़ते रहिये

आखिर प्रवचन भी तो देना है

उद्धरणों के साथ विद्वतापूर्ण

अपन तो अभी प्रेम के पन्ने

पलटने में ही हूं मशगूल

ताकि उसके विलोम से

बच जाये यह बेचारी पृथ्वी

हालांकि आशंका बरकरार है

तहस नहस की जबरदस्त !

 

उदासी

तुम क्यों लौट लौट

आती हो

बगैर दिये आवाज

बिन बुलाये

तोडऩे

दुखाने में

कैसे मजा पाती हो

दिल को

अपने दुश्मन को भी

लाया न करो

कभी कभी

साथ में

जब देखो

अकेले चली आती हो

जब भी पाती हो तन्हा !

 

सोचना

 

मौत-कराहें बांट कर

जख्म-मवादें बांट कर

चीख-पुकारें बांट कर

क्या हुआ हासिल?

 

खुद से ही पूछ लेना

जब होना कभी अकेले में

 

कि यह कैसा बदला

कि जिसके कारण

बच्चे हो जाएं अनाथ

मां-बहनें बेवा

कि जो बच गए अपाहिज बन कर

कैसे बोझ उठाएंगे अपना

अपने कमजोर कंधों पर?

 

सोचना, जरूर सोचना

कि नफरत के बीज से

कैसे उगेगी फसल प्रेम की?

 

सोचना जब कभी याद आ जाए

अपनों की

सोचना की हत्या कर दी तुमने कितने

सपनों की।