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Friday 22 Jun 2018

विविध भारती और सिनेमा के अंर्तसंबंध

मेरी मां लोकगीत और भजन गाती थीं और जीजी को ये दोनों गायन विधाएं विरासत में मिलीं। पिता कबीरपंथी होने की वजह से कबीर के भजन विशेष रूप से गाते थे, साथ में अन्य भक्तकवियों में तुलसी, सूर, दादूदयाल और लोककवि ईसुरी उनके प्रिय थे। मैंने भी बचपन से लोकगीत गुनगुनाना शुरू कर दिया था और अनेक धुनें अब भी मन के कोनों से गाहे बगाहे फूट पड़ती हैं। कह सकते हैं उस जमाने में गांव में रामायण मंडलियां लोकगीत गायक, गायिकाओं के समूह ही मनोरंजन के मुख्य साधन थे।

हमारा गांव छिंदवाड़ा कोलफील्ड्स का इलाका है। मैं गुढ़ी पाड़ा-चौरई में जन्मा। मां और पिता नौकरी की तलाश में पैदल उडऩी, पिपरिया से चलकर यहां पहुंचे थे। वो जमाना प्राइवेट शावेलेस कंपनी का था। बाद में एन एच ओझा कंपनी ने कोयला खदानों को खरीद लिया। मां, पिता और बड़े भाई कोयला खदान में रोजनदारी या जनरल मजदूर के रूप में काम में जुट गए। रोजी-रोटी का सहारा कोयले की खुदाई, ढुलाई आदि हो गए। गरीबी के उन दिनों में हाड़ तोड़ मेहनत के बाद गाना-गुनगुनाना ही मनोरंजन के मुख्य साधन थे।

कोयला खदान के मालिकों ने मजूरों को बांधे रखने के लिए और प्रतिरोध से खुद को बचाने के लिए एक फैसला लिया। मोबाइल वैन के जरिए फिल्म-प्रदर्शन। हफ्ते में एक रोज (रविवार) वैन आती और खुले मैदान में फिल्म का प्रदर्शन करती। आसपास के गांव खाली हो जाते। सांझ होते ही लोग बोरा, चादर आदि लेकर जगह घेर लेते। एक अनूठा माहौल पैदा हो जाता। लोग लड़ते-झगड़ते और जगहों पर कब्जा कर लेते। फिल्म प्रदर्शन आश्चर्य की तरह जीवन को ढंक लेता।

इस तरह फिल्म और फिल्मी गाने समाज के अभिन्न हिस्से हो गए। लोग हीरो-हीरोइनों की छवि में अपने को उकेरने लगे। बच्चे-बूढ़े, महिलाएं छिप-छिपकर फिल्मी गाने गुनगुनाने लगे। हमारे गांव में एक रामप्रसाद थे। उन अकेले के पास मर्फी का ट्रांजिस्टर था। वे उसे नन्हें बच्चे की तरह सीने से लगाए निकलते। हालांकि उन्होंने तब तक शादी न की थी। उनके जीवन में सब कुछ रेडियो था। वे जहां से निकलते हवा में फिल्मी गाने गूंजते रहते। वे फिल्मों के चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया बन गए। वे मुझे प्यार करते और लीला नाम से आवाज देते। मैं उनके घर में कभी भी बेधड़क जा सकता था। रेडियो सीलोन और विविध भारती. उनके पसंदीदा चैनल थे। फिल्मी गायकों, संगीतकारों और कलाकारों का परिचय, रामप्रसाद एक्टर ने ही करवाया। मैं उन्हें चाचा कहकर संबोधित करता था। उन दिनों सभी की चाहत में एक बात होती- काश हम रेडियो खरीद सकते। हमने अमीन सयानी की आवाज का जादू बिनाका गीतमाला में सुना।

एक्टर चाचा ने बताया कि विविध भारती का शुरुआती नाम आल इंडिया वैराइटी प्रोग्राम था। जिस का तर्जुमा हुआ अखिल भारतीय विविधरंगी कार्यक्रम। बाद में पंडित नरेन्द्र शर्मा, लेखक-गीतकार ने इसे विविध भारती नाम दिया। जो देश की धड़कन बन गया। इसके साथ पंक्ति (टैगलाइन) पंचरंगी अर्थात पांच कलाओं का समावेश, ये नाम श्रोताओं  के ख्वाबों  का हिस्सा हो गया। लोगों ने रेडियो सीलोन और विविध भारती से ही फिल्मों को जाना, फिल्मों के प्रचार-प्रसार में रेडियो की भूमिका, असंदिग्ध और अविश्वसनीय है। अगर रेडियो न होता तो इतनी फिल्में न बन पातीं, न ही सिनेमाघरों में चल पाती। लोग पहले फिल्मी गानों के दीवाने हुए और उन गानों से बंध खिंचे सिनेमाघरों तक पहुंचे।

मुझे याद है कि सुबह दस बजे शार्टवेव 19 और 25 मीटर बैंड पर उद्घोषणा होती थी- ये विविध भारती है- आकाशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम-और समय जैसे थम जाता था। शार्टवेव पर बंबई के अलावा यह कार्यक्रम मद्रास (चेन्नई) से भी शुरु हुआ। विविध भारती चेन्नई से पहली उद्घोषणा तेलुगू भाषी उद्घोषिका राजलक्ष्मी ने की। वास्तव में उस दिन हिंदी का उद्घोषक ड्यूटी पर पहुंच न सका। इस तरह दक्षिण भारत में हिंदी का प्रवेश फिल्मी गानों के माध्यम  से हुआ। राजलक्ष्मी चेन्नई आकाशवाणी में सात बरस तक विविध भारती की उद्घोषिका रहीं। उन्होंने कहा था- फिल्मी गानों ने हमें विशाल भारत से न केवल जोड़ा अपितु एकता के सूत्र में बांधा। एक्टर चाचा ने यह बताया था कि बंबई केेंद्र से विविध भारती पर पहली उद्घोषणा शील शर्मा ने की। उनकी आवाज़ में लयात्मक रवानी थी। बंबई में होने की वजह से फिल्मी कलाकारों की आवाज़ों को सीधे रेडियो पर सुनकर हम सब रोमांचित हो उठते थे। एक्टर चाचा की स्मृति अद्भुत थी। उन्होंने बताया कि विविध भारती पर पहला गीत मन्ना डे की आवाज़ में-नाच रे मयूरा प्रसारित हुआ था। इसके गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा थे और संगीतकार अनिल बिस्वास। इसे प्रसार गीत कहा गया। वाह क्या खूब स्मृित थी एक्टर चाचा की। एक और बात- चाचा नृत्यगीतों के मुरीद थे और कुक्कू उनकी पसंदीदा डांसर थीं। मानो वे उस पर निसार थे। लगता था फिल्मी गानों और कुक्कू में डूबने की वजह से उन्होंने शादी नहींकी।

रेडियो पर कार्यक्रमों के प्रसारणों को पहचानने का आसान शिल्प था, उसकी सिग्नेचर ट्यून अर्थात परिचय धुनों को याद रखना। परिचय धुनों से हम बिनाका गीतमाला, छायागीत, गीतों भरी कहानी, जयमाला, भूले-बिसरे गीत, चित्रध्वनि, चित्रमाला, साज़ और आवाज़़ आदि को कार्यक्रम के शुरु होने से ही पहचान लेते और चाचा के पांव के पास बैठ जाते। इतनी रच-बस गई थी परिचय धुनें। रेडियो एक बच्चे की तरह उनकी गोद में होता और वे सिर हिलाते। मेज़ पर उंगलियों से ताल देते और गुनगुनाते। कुंदनलाल सहगल को वे खूब गाते। वही उनके आदर्श थे। इसके अलावा नूरजहां, मल्लिका पुखराज, मन्ना डे, शमशाद बेगम, मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर वे इस हद तक सुनते किगाने के आरंभिक संगीत को सुनकर फिल्म और गायक का नाम बता देते।

विविध भारती पर उनका प्रिय प्रोग्राम था फौजी भाइयों के लिए विशेष जयमाला कार्यक्रम। यह कार्यक्रम उन्हें इस कदर प्यारा था कि उन्होंने अपनी ड्रेस ही फौजी स्टाइल में सिला रखी थी और अमूमन उसे ही पहनते थे। इस तरह उनकी शिनाख्त  एक ड्रेस के हीरो के रूप में बनी। यह असर था जयमाला कार्यक्रम का। हम उनसे पूछते और वे दुर्लभ जानकारी देते- जैसे कि पहला विशेष जयमाला कार्यक्रम नर्गिस ने प्रस्तुत किया, जिसे उन्होंने मेरे बड़े भाई के साथ सुना। बड़े भैया राजकपूर और नर्गिस के फैन थे। उनके गाल पर राजकपूर की तरह निशान था। और अपनी सजधज बनत और चाल-ढाल में मानो राजकपूर की कापी थे। पिता सुरैया पर मरते थे। मां सुरैया के नाम से चिढ़ती थी। लेकिन सुरैया के फोटो को पिता के लिए प्रेम से साफ करती थी। फिल्मों ने घरों में इस तरह कब्जा किया किघर की संस्कृति बदलने लगी। फिल्मों का प्रभाव जीवन पर छा गया।

मुझे याद है कि एक्टर चाचा रेडियो के कारण गांव के आइकन बन गए थे। उन्हीं की वजह से फौजी भाइयों के लिए जयमाला प्रोग्राम के बहाने हम मशहूर फिल्मी हस्तियों जैसे मीना कुमारी, सोहराब मोदी, राज कुमार, धर्मेंद्र, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, शंकर-जयकिशन, ओ पी नैयर, सचिन देव बर्मन, चेतन आनंद, रोशन,मदन मोहन आदि महान कलाकारों का आत्मीय और कला समर्पित मन, उनकी सजीव आवाज़ों के माध्यम से जान सके। फौजी भाइयों के लिए उनके संदेशों को सुनकर हमारी श्रद्धा  फौजी भाइयों के लिए आकाश हो गई। फिल्म और फिल्मी गाने न होते तो हम देश और उसकी सरहदों को न जान पाते।

उस जमाने में सिर्फ विविध भारती को ही यह सुविधा थी कि वे फिल्म प्रोड्यूसर्स की विशेष अनुमति से एक बार प्रसारण के लिए फिल्मी गीतों को टेप पर रिकार्ड कर सकेें। इन फिल्मी गानों को देश के कोने-कोने तक शार्टवेव से पहुंचाने के लिए उन्हें एक ही समय पर अनेक आकाशवाणी केेंद्र प्रसारित-अनुप्रसारित करते थे। और इस प्रसारण से घरों के चलते हुए काम रुक जाते थे। यात्रा पर निकले लोग रुक-रुक कर और किसी रेडियोवाले को खोजकर घेर लेते थे। बिनाका गीतमाला और जयमाला की वही प्रतिष्ठा  थी, जो दूसरे और बड़े रूप में रामायण या महाभारत को प्राप्त हुई।

विविध भारती इतना लोकप्रिय चैनल था कि अलक्षित दबावों के कारण 1958 में इसे दिल्ली में शिफ्ट करना पड़ा। लेकिन फिल्मी दुनिया तो बंबई में थी और बालीवुड को हासिल करना है तो बंबई ही उपयुक्त जगह थी। सो 1972 में विविध भारती पुन: बंबई के हवाले हो गई। इसके पहले 1967 में विज्ञापन प्रसारण सेवा की शुरुआत हुई। पहले कार्यक्रमों के साथ कमर्शियल स्पाट और जिंगल प्रसारित हुए बाद में 3 मई 1970 को दोपहर साढ़े 12 बजे विज्ञापन प्रसारण सेवा पर पहला प्रायोजित कार्यक्रम प्रसारित हुआ-सेरीडान के साथी। इसमें मशहूर फिल्मी सितारे अपने साथी और कलाकारों के बारे में दिलचस्प बातें, किस्से और प्रसंग साझा करते थे। इस कार्यक्रम की पहली मेहमान थी सिमी ग्रेवाल। उसी दोपहर 12.45 मिनट पर कोहिनूर मिल्स द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम कोहिनूर गीत-गुंजार प्रसारित हुआ। इसके कंपीयर थे पंडित विनोद शर्मा। विविध भारती पर सबसे लंबे समय तक चलने वाला सुपरहिट कार्यक्रम था- सेंटाजन की महफिल।  एक्टर चाचा के एनसाइक्लोपीडिया ने बताया, इस कार्यक्रम से कई नाम जुड़े जो श्रोताओं में मशहूर हुए। वे नाम थे- सईदुल हसन, अजय कश्मीरी, मोना अल्वी, रमेश तिवारी, मुजफ्फर कादरी, विजय वर्मा और वी सूरी। इसी प्रोग्राम में उन्होंने पहली बार टुनटुन और मोहन चोटी को सुना। चाचा के फिल्मी ज्ञान का ट्रांसफर कब मेरे भीतर हुआ पता नहीं, लेकिन भीतरी सतहों पर वह इतना प्रभावी था किमैं कहींरेडियो में नौकरी के बारे में सपने देखने लगा।

विविध भारती पर पहला फिल्मी स्पाट कब, क्यूं और कहां फिल्म का था। इसे पेश करते थे संयुक्त रूप से विजय बहल, मधुर भूषण और बृजभूषण, प्रायोजित कार्यक्रम चेरी ब्लासम नोंकझोंक में। फिल्मी स्पाट और कार्यक्रम में नोंक-झोंक को श्रोताओं  ने खूब पसंद किया। जैसे-जैसे आकाशवाणी के केेंद्र देश में बढ़ते गए, फिल्मी गाने और उससे जुड़े कार्यक्रम श्रोताओं  तक पहुंचते गए और फिल्मों को बिना प्रमोशन के प्रचार मिलता गया। अगर आकाशवाणी न होती तो फिल्म इंडस्ट्री का जो विकास हम देख रहे हैं वह इतना न हुआ होता।

पचास के दशक के बाद आकाशवाणी के जितने केेंद्र खुलते गए, फिल्मी गानों के अनेक कार्यक्रम शुरु हुए। इस तरह हिन्दी फिल्मों के साथ ही क्षेत्रीय सिनेमा को भी बड़ा फलक मिला। हर राज्य में अपनी भाषाओं या हिन्दी के माध्यम  से फिल्मी गीत और उन पर आधारित कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। जहां कहींफिल्मी सितारे पहुंचते थे,  वे आकाशवाणी के माध्यम से श्रोताओं  को संबोधित करते, जो अंतत: फिल्मों के दर्शकों में तब्दील हो जाते। इन केेंद्रों ने शुरुआत में प्रस्तुति में विविध भारती की शैली को अपनाया और अपने स्तर पर कुछ और आकर्षक तत्व जोड़ दिए। फरमाइशी फिल्मी गानों के प्रोग्राम में चिट्ठियां बोरियों या कई बोरियों में आती। जगह-जगह रेडियो फिल्मी श्रोता क्लब बन गए। उनकी अपनी पहचान बन गई। कहना न होगा कि विविध भारती पर भेजी जाने वाली फरमाइशें अब क्षेत्रीय और स्थानीय केेंद्रों पर आने लगीं। यदि इन चिट्ठियों पर केन्द्रित कोई किताब निकले तो हर दौर के गानों की लोकप्रियता को आंका जा सकता है। सिर्फ इतना ही नहींइन पत्रों में मार्मिक और रोमांटिक बातें भी मिलती हैं। इस तरह बिना टीआरपी के गानों की उस दौर की लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है। फिल्मी गानों ने लोगों के सुख-दुख में जितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है उसका आकलन मुश्किल है।

जयमाला विशेष जो हफ्ते भर प्रसारित होता था, उसका रविवारीय अंक जयमाला संदेश के नाम से होता था, जिसमें फौजी भाई अपनी बातें, संदेश और सलामती की खबर अपने परिवार वालों तक पहुंचाते थे। कारगिल युद्ध के दौरान विविध भारती ने जो संदेश प्रसारित किए उन्हें सुनकर मन श्रद्धा से भर उठता था।

मैं याद करता हूं तो एक्टर चाचा की बातें ही पहले पहल याद आती हैं। ये और बात है कि मेरी रूचि भी साहित्य और फिल्मों में लगातार बढ़ी है। अनेक जानकारियां जुड़ती गईं और मैं रेडियो के माध्यम से फिल्मों के बारे में जानता गया। यानी फिल्मों के तमाम पहलू जो कार्यक्रम से जेहन में पहुंचे- जैसे एस कुमार्स का फिल्मी मुकदमा। आज जो अदालत वाले कार्यक्रम टीवी पर चल रहे हैं, उनका फार्मेट विविध भारती की ही देन है। फिल्मी सितारों से मुलाकात का हिट कार्यक्रम सेल्युलाइड के सितारे, संगीत की हस्तियों का प्रोग्राम सरगम के सितारे, फिल्मी गानों में शास्त्रीय रागों को खोजने वाला कार्यक्रम संगीत सरिता, और सूचना और मनोरंजन का मिश्रित कार्यक्रम पिटारा। ये सभी कार्यक्रम उस जमाने से आज के जमाने तक यादों में बसे हैं। और इसलिए वे तमाम फिल्में जिनके गाने हैं, और जिन्हें सुनकर आकाशवाणी पर फिल्में देखी गईं, अब जीवन के साथ हैं।

मैं आकाशवाणी की नौकरी में 1976 में अपनी कलात्मक अभिरूचि के चलते आया और फिल्मी गानों के आकर्षण की वजह से भी। हालांकि तब मेरी जेब में नौकरी के कई अच्छे आफर थे, लेकिन आकाशवाणी में आकर मालूम हुआ कि फिल्मी दुनिया से इसका कितना गहरा नाता हो। चाहे मीडियम वेव की बात हो, या शार्ट वेव की या फिर अब एफ एम के फिल्मी गानों के प्रसारण की, रेडियो का वह पहला अनिवार्य तत्व है और खासकर मनोरंजन की दृषिट से। यही कारण था कि विविध भारती सेवा को आरंभ करने के समय गिरिजाकुमार माथुर, पं.नरेन्द्र शर्मा, गोपाल दास  और केïशव पंडित जैसे दिग्गज प्रसारकों ने यह परिकल्पना की और परिणाम हुआ कि रेडियो सीलोन को लोग भूलते गए। आज आकाशवाणी के खजाने में फिल्मी हस्तियों के अनेक इंटरव्यूज़ हैं और रेडियो आटोबायोग्राफी, जिनमें नौशाद, ओ पी नैयर, खय्याम, कल्याणजी आनंद जी. माला सिन्हा, वहीदा रहमान, महेन्द्र कपूर जैसे सितारे हैं। इन रिकार्डिंग्स को आज भी जब सुनाया जाता है, तो पुरानी यादें ताजा हो जाती है। और लोग टीवी या टीवी पर डीवीडी चलाकर फिल्में देखते हैं। विविध भारती का नेटवर्क अब बहुत बड़ा है। सौ वाट के सौ से अधिक ट्रांसमीटर देश में लगे हैं। और वहां से विविध भारती सेवा ही चलती है। इस पहुंच में अब सभी प्रमुख जिले और सरहद के इलाके शामिल हैं। मीडियम वेव सेवा, एफ एम पर देश भर में उपलब्ध है और मोबाइल पर एक बड़ा वर्ग इन्हें सुन रहा है, जो रेडियो से पहले दूर था। सो इस तरह रेडियो ने फिल्मों को जीवनदान भी बहुत हद तक बख्शा है।

अब फिल्म प्रोड्यूसर्स रेडियो पर फिल्मों के प्रचार-प्रसार के लिए पार्टनरशिप करते हैं और नि:शुल्क प्रमोशन सामग्री उपलब्ध कराते हैं। पहले रेडियो, प्रोड्यूसर्स के पीछे भागता था, अब प्रोड्यूसर्स सितारों को स्टूडियो में लेकर पहुंचते हैं। अब अधिकांश एफ एम रेडियो डीटीएच और इंटरनेट पर उपलब्ध हैं औैर उनकी पहुंच विश्वव्यापी हो गई है। रेडियो के कार्यक्रम पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान से लेकर मिडिल ईस्ट में मनोयोग से सुने जाते हैं। प्रवासी भारतीयों के अलावा एक बड़ा फिल्म बिजनेस आकार ले चुका है जिसमें आनलाइन खरीद में गानों के अलावा फिल्मों का व्यापार चलता है। रेडियो केेंद्रों को भी विज्ञापन में खासी कमाई होती है और एफ एम केेंद्र विशेषकर प्राइवेट चैनल की कमाई का जरिया फिल्मी गाने ही हैं। अब एफ एम केंद्रों से सितारों से बातें होती हैं, फोन इन फरमाइशी कार्यक्रम होते हैं और काउंट डाउन के अलावा हिट सुपरहिट, फेवरेट फाइव जैसे प्रोग्राम हैं, साथ ही एस एम एस के बहाने वीबीएस के तराने जैसे चर्चित कार्यक्रम जो फिल्मों को मजबूत आधार देते हैं।

कह सकते हैं अगर रेडियो का साथ न होता, तो सिनेमा के सौ सालों का इतिहास इतना सुनहरा शायद ही होता। पाठकों को ये जिज्ञासा अवश्य होगी कि फिल्मों, फिल्मी गानों ने फिल्मों के विकास में हमसफर नहींबल्कि मार्गदर्शक की भूमिका कैसे निभाई। इसमें दो बातें प्रमुख हैं- पहली यह कि फिल्मी गानों में दुख और सुख की गहरी अभिव्यक्ति थी, जिसका संबंध आम आदमी के अनुभव और सपनों से था। फिल्मों में उसके परिवार, समाज और देश का रूपायन था। उसकी आकांक्षाओं का आईना भी फिल्में थीं। गानों में करुणा, ऐसा आधारतत्व था जो कंपोजिशन में खासतौर पर रखा जाता था, ताकि वह आम आदमी के भावजगत को घेर ले।

इसके अलावा उसमें मार्मिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक संदेश होते थे। दूसरी बात थी फिल्मी सितारों से जीवंत या रिकार्डेड बातचीत का प्रसारण, जो फिल्मी दर्शक पैदा करने और संख्या बढ़ाने का परोक्ष काम करता था। इस तरह की बातचीत में संघर्ष की कहानी, आत्मीय संस्मरण और देशप्रेम की बातें होती थीं, ये प्रसारण दरअसल एक तरफ दर्शकों को आकर्षित करते थे, तो दूसरी ओर बालीवुड की ग्लैमरस दुनिया का हिस्सा होने का स्वप्न बुनते थे। दोनों ही फिल्मी प्रसारण अंतत: फिल्मों के प्रति जिज्ञासा को बढ़ाकर टिकट खिड़की पर पैसा वसूल कर लेते थे।

कहना न होगा कि यह कहानी जितनी सरल, आकर्षक और मनोरंजक लगती है, उतनी है नहीं। अंतर्तहों में वास्तव में फिल्मों की मार्केटिंग चल रही होती थी और वह भी सामाजिक, सांस्कृतिक अर्थों, आशयों पर आधारित। इसलिए वह दोनों काम एक साथ करता था, यानि ऊपर से सामाजिक सुधार और भीतर से व्यापार। और अब तो खुल्लमखुल्ला व्यापार पहले है, साथ में सुधार, जागरण, हो जाए तो ठीक, अन्यथा- नाट फिकर, फिल्मी सेठ।