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Monday 22 Oct 2018

विविध भारती ने मुझे नाटककार बनाया

  • 1965 की बात है। दिल्ली की एक साहित्यिक संस्था ने मेरे कहानी पाठ का आयोजन किया था। मुझ नवोदित लेखक की कहानी सुनने कुछ वरिष्ठ साहित्यकार भी आये थे। उनमें से एक थे कथाकार-नाटककार सत्येंद्र शरत, जो उस समय आकाशवाणी की विविध भारती सेवा में प्रोड्यूसर थे। गोष्ठी के बाद चाय के समय उन्होंने मुझसे पूछा, ''कहानी लिखने के अलावा आप और क्या करते हैं?''मैंने बताया कि मैं अभी तक दिल्ली प्रेस से निकलने वाली पत्रिका 'सरिता' के संपादकीय विभाग में था, लेकिन वहाँ काम करना मुझे अच्छा नहीं लगा, इसलिए मैंने नौकरी छोड़ दी है और फिलहाल स्वतंत्र लेखन करता हूँ।

    ''रेडियो के लिए नाटक लिखना चाहेंगे?'' उन्होंने पूछा।

    मुझे नाटक लिखने का कोई अनुभव नहीं था, फिर भी युवकोचित उत्साह के साथ मैंने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उन्होंने विविध भारती के लोकप्रिय कार्यक्रम 'हवामहल' के लिए पंद्रह-पंद्रह मिनट के हल्के-फुल्के नाटक लिखने के लिए कहा। और मैं शायद दूसरे या तीसरे दिन ही एक नाटक लिखकर उनके पास जा पहुँचा। उन्होंने  कैंटीन में ले जाकर मुझे चाय पिलायी। मेरे सामने ही नाटक पढ़ा और शाबाशी दी, ''आप अच्छा लिखते हैं, हमारे लिए और नाटक लिखिए।'' मेरे उस पहले नाटक को उन्होंने अपने ही निर्देशन में प्रोड्यूस और प्रसारित किया।

    अब याद नहीं कि मेरा पहला नाटक कौन-सा था और उसमें क्या था। लिखना शुरू करने के कई साल बाद तक भी मुझे यह शऊर नहीं था कि अपनी रचनाओं की प्रतिलिपियाँ अपने पास सँभालकर रखूँ। टाइपराइटर तब मेरे पास था नहीं और कार्बन लगाकर लिखना या अपने लिखे हुए को किसी और से टाइप कराना मुझे झंझट का काम लगता था, इसलिए मैं अपनी रचनाएँ हाथ से लिखता था और भेज देता था। फोटोकॉपी की तकनीक तब तक आयी नहीं थी और टेपरिकॉर्डर आज की तरह सस्ता और सुलभ नहीं था कि नाटक जब रेडियो से प्रसारित हो, तो उसे टेप कर लिया जाये। बहरहाल, 'हवामहल' कार्यक्रम के लिखे हुए मेरे रेडियो नाटक खूब सराहे गये और बार-बार प्रसारित हुए। उनमें से कुछ यदा-कदा अब भी सुनने को मिल जाते हैं और मेरे बच्चे, जो अब खूब बड़े हो गये हैं, उन्हें रिकॉर्ड कर लेते हैं।

    उन दिनों या तो आकाशवाणी में रेडियो नाटकों की माँग बहुत ज्यादा थी या रेडियो नाटक लिखने वालों की संख्या बहुत कम थी। सत्येंद्र शरत् ने मुझे नाटक विभाग के सुशील कुमार से, बच्चों का कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले बालकराम नागर से और महिलाओं के लिए कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाली सई परांजपे से मिलवाया, तो सभी ने मुझसे अपने-अपने कार्यक्रम के लिए नाटक लिखने को कहा। दूरदर्शन के वे शुरूआती दिन थे और वहाँ से भी नाटक प्रसारित किये जाते थे। वहाँ के अक्षोभ्येश्वरी प्रताप ने मुझसे दूरदर्शन के लिए भी कुछ नाटक लिखवाये।

    लेकिन सबसे अधिक रेडियो नाटक मैंने विविध भारती के 'हवामहल' कार्यक्रम के लिए ही लिखे। अपने मौलिक नाटकों के अलावा मैंने देशी-विदेशी लेखकों की प्रसिद्ध रचनाओं के नाट्य रूपांतर भी खूब किये। मैंने ओ. हेनरी, चेखोव, मोपासाँ, तोलस्तोय, मार्क ट्वेन, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, हरिशंकर परसाई, भीष्म साहनी आदि की कहानियों के नाट्य रूपांतर किये, जो आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित हुए। साथ-साथ मैं अपने मौलिक नाटक भी लिखता रहा। उनमें से आधे घंटे का एक नाटक 'अपने-अपने दायरे' बहुत सराहा गया। उसे आकाशवाणी से वर्ष में प्रसारित नाटकों में सर्वश्रेष्ठ नाटक के रूप में चुना गया और आकाशवाणी के सभी केंद्रों से प्रसारित किया गया। उस नाटक की मुझे सबसे अधिक रॉयल्टी मिली। देश भर के आकाशवाणी केंद्रों से चेक आये।

    'हवामहल' कार्यक्रम पंद्रह मिनट का होता था। आगे-पीछे की उद्घोषणाओं  में लगने वाले समय को निकाल दें, तो उसके लिए लिखे जाने वाले नाटक की स्क्रिप्ट तेरह या चौदह मिनट की होती थी। नाटक का विषय प्राय: हल्का-फुल्का और हास्य-व्यंग्य वाला होता था। पहले-पहल मुझे यह काम बहुत आसान लगा था, लेकिन धीरे-धीरे मैंने पाया कि रेडियो नाटक लिखना एक विशेष प्रकार के कौशल, परिश्रम और अनुशासन की माँग करता है।

    रेडियो नाटक मंचीय अथवा नुक्कड़ नाटक के लेखन से ही नहीं, टेलीविजन और सिनेमा के लिए किये जाने वाले पटकथा लेखन से भी बहुत भिन्न प्रकार का लेखन है। मंच, नुक्कड़, टीवी और मूवी के लिए लिखते समय आप दृश्य और श्रव्य दोनों अभिव्यक्ति-रूपों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि रेडियो नाटक में आपको सभी कुछ शब्दों और ध्वनियों के माध्यम से व्यक्त करना होता है। रेडियो नाटक लिखते समय ही मैंने जाना कि पात्रों की मनोदशाओं में और नाटक के 'दृश्यों' में परिवर्तन दिखाने के लिए 'पॉज़' और अंतराल संगीत का क्या महत्त्व होता है। और यह भी कि 'हाँ''हूँ' और 'अच्छा' जैसे शब्दों का प्रयोग प्रसंगानुसार कितने भिन्न अर्थों में किया जा सकता है। हालाँकि अंतराल या पाश्र्व संगीत और साउंड इफेक्ट देने का काम रेडियो नाटक का निर्देशक या प्रोड्यूसर करता है, लेकिन आपको भी मालूम होना चाहिए कि कहाँ कैसा संगीत होना चाहिए और कहाँ कैसा ध्वनि प्रभाव उत्पन्न किया जाना चाहिए।

    मैंने मार्क ट्वेन की लंबी कहानी 'दि मैन दैट करप्टेड हैडलीबर्ग' का नाट्य रूपांतरण आकाशवाणी और दूरदर्शन दोनों के लिए किया था। उसका रेडियो नाट्य रूपांतर सुनकर दूरदर्शन के एक प्रोड्यूसर ने मुझसे कहा कि मैं उसके लिए उस कहानी का टीवी नाट्य रूपांतर कर दूँ। मुझे लगा, इसमें क्या मुश्किल है। रेडियो के लिए लिखी गयी स्क्रिप्ट में ही कुछ फेरबदल कर देने से काम चल जायेगा। लेकिन लिखते समय पता चला कि केवल श्रव्य नाटक लिखना और दृश्य-श्रव्य नाटक लिखना दो सर्वथा भिन्न प्रकार की कलाएँ हैं। उस अनुभव से मैंने नाट्य लेखन के बारे में कई नयी बातें सीखीं।

    रेडियो के लिए नाटक लिखने का मेरा अनुभव आगे चलकर 'पेपरवेट' और 'भारत-भाग्य-विधाता' जैसे मंचीय नाटकों तथा 'गिरगिट' और 'हरिजन-दहन' जैसे नुक्कड़ नाटकों के लेखन में तो मेरे काम आया ही, अन्य विधाओं के लेखन में भी बहुत काम आया। रेडियो नाटक लिखते समय आपको अपने श्रोताओं का ध्यान बराबर रखना पड़ता है कि नाटक प्रबुद्ध और सामान्य दोनों तरह के श्रोताओं को पसंद आये; कि वह न तो इतना बौद्धिक हो कि सामान्य श्रोताओं के पल्ले ही न पड़े और न ही वह इतना हल्का-फुल्का हो कि प्रबुद्ध श्रोताओं को सस्ता लगे; कि उसमें जो कहा जाये, वह संक्षेप में और स्पष्ट रूप में कहा जाये, ताकि उसमें कुछ भी फालतू या अनावश्यक न लगे और समझने में कोई दुविधा या दुरूहता पैदा न हो; कि उसमें कला तो अवश्य हो, पर कलाबाजी न हो; कि भाषा साहित्यिक तो रहे, पर आम बोलचाल की भाषा से बहुत दूर न चली जाये; इत्यादि। विविध भारती के लिए किये जाने वाले रेडियो नाटकों के लेखन के अनुभव से सीखी गयी इन बातों का ध्यान मैं अपनी कहानियाँ, उपन्यास, निबंध, संस्मरण आदि लिखते समय भी रखता हूँ।

    रेडियो नाटकों में धारावाहिकों की शुरुआत मैंने ही की थी। एक दिन बातों ही बातों में मैंने सत्येंद्र शरत् से कहा, ''भाई साहब, कहानियों के नाट्य रूपांतरों की तरह क्या उपन्यासों के नाट्य रूपांतर नहीं किये जा सकते? जो कई किस्तों में, धारावाहिक रूप में प्रसारित किये जा सकें?'' शरत् जी को आइडिया पसंद आया और मैंने उनके लिए, यानी विविध भारती के लिए, दो उपन्यासों के रेडियो नाट्य रूपांतर किये, जो धारावाहिक रूप से प्रसारित हुए। एक उपन्यास था यशपाल का 'मनुष्य के रूप' और दूसरा भगवती चरण वर्मा का 'अपने खिलौने'।

    मैं बंबई (आज की मुंबई) में भी रहा हूँ। पहली बार 1967-68 में स्वतंत्र लेखक के रूप में और दूसरी बार 1970-71 में 'नवनीत' के सहायक संपादक के रूप में। स्वतंत्र लेखन से पैसा कमाने के लिए मैं पत्र-पत्रिकाओं में लिखने और अनुवाद करने के अलावा आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए नाटक लिखने का काम भी करता था। मैं अपने पहले वाले बंबई प्रवास में आकाशवाणी जाकर कवि नरेंद्र शर्मा से मिला, जो उस समय वहाँ के केंद्र निदेशक थे। उन्होंने मेरे रेडियो नाटकों की प्रशंसा करते हुए अपने केंद्र के लिए भी नाटक लिखने को कहा और एक सज्जन को अपने कमरे में बुलाकर उनसे मेरा परिचय करा दिया।

    उन सज्जन का अजीब-सा नाम था। भृंग तुपकरी। वे विविध भारती में थे। उन्होंने मेरे द्वारा किये गये 'मनुष्य के रूप' और 'अपने खिलौने' उपन्यासों के मेरे नाट्य रूपांतर सुन रखे थे। वे चाहते थे कि मैं उनके लिए भी कोई धारावाहिक रेडियो नाटक लिखूँ। मैं उन दिनों शूद्रक का संस्कृत नाटक 'मृच्छकटिकम' पढ़ रहा था। मैंने उसका नाट्य रूपांतर करने का प्रस्ताव किया, तो उन्होंने खुश होकर मुझे यह काम सौंप दिया। मैंने 'मिट्टी की गाड़ीÓ के नाम से उसका रेडियो नाट्य रूपांतर किया, जो कई किस्तों में धारावाहिक रूप से प्रसारित हुआ। उसमें चारुदत्त के चरित्र के लिए रेडियो नाटकों के प्रसिद्ध कलाकार विनोद शर्मा ने और वसंतसेना के चरित्र के लिए फिल्म अभिनेत्री कल्पना ने अपना स्वर दिया था।

    फिल्म अभिनेत्री की बात से याद आया, दिल्ली में एक शाम को सत्येंद्र शरत् से भेंट हुई, तो उन्होंने बताया कि फिल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री कामिनी कौशल मनोज कुमार की फिल्म 'उपकार' की शूटिंग के सिलसिले में दिल्ली आयी हुई हैं। वे उनकी आवाज में छोटी-सी कोई ऐसी चीज रिकॉर्ड करना चाहते थे, जो एक उम्रदराज महिला के एकालाप के रूप में हो और जिसे हल्के-फुल्के नाटक के रूप में 'हवामहल' कार्यक्रम में प्रस्तुत किया जा सके। यह बताकर उन्होंने कहा, ''रमेश, कामिनी कौशल जी मेरे अनुरोध पर रिकॉर्डिंग के लिए आने को राजी हो गयी हैं, पर उन्होंने कल दोपहर का समय दिया है। उसके लिए तुम्हारा लिखा एकालाप कल सुबह तक मुझे हर हालत में चाहिए।'' मैंने उनसे कहा, ''भाईसाहब, शाम हो गयी है, घर लौटते मुझे रात हो जायेगी। रात भर में कैसे मैं...?'' मेरी बात बीच में ही काटते हुए उन्होंने कहा, ''वैसे ही, जैसे अपना पहला रेडियो नाटक तुम अगले ही दिन लिख लाये थे। मेरे लिए यह काम तुम्हें करना ही है। कल सुबह दस बजे मुझे स्क्रिप्ट मिल जानी चाहिए।''

    उस रात मैंने एक छोटी-सी कहानी लिखी और अगले दिन आकाशवाणी जाकर शरत् जी को सौंप दी। वे एक साँस में उसे पढ़ गये। पढ़कर उन्होंने मुझे गले लगाया और मेरी पीठ ठोंककर शाबाशी दी। बाद में उन्होंने मुझे बताया कि कामिनी कौशल भी मेरी कहानी पढ़कर बहुत खुश हुईं। शरत् जी ने उसमें सड़क पर ताँगा चलने की, स्टेशन पर भीड़भाड़ की, टे्रन की सीटी की और टे्रन चलने आदि की आवाजों के ध्वनि प्रभाव जोड़कर उसे एक बढिय़ा रेडियो नाटक बना दिया था।

    'लोकलाज' नामक वह रेडियो नाटक कामिनी कौशल की आवाज में असंख्य बार विविध भारती से प्रसारित हो चुका है और अब भी कभी-कभी सुनने को मिल जाता है। मेरी वह कहानी इसी शीर्षक से 1966 में छपी थी और मेरे कहानी संग्रह 'एक घर की डायरी' में संकलित है।

    'अक्षर पर्व' के पाठकों के लिए वह कहानी, जो रेडियो नाटक बन गयी, यहाँ यथावत प्रस्तुत है।

    लोकलाज

    सब सामान ठीक है न? बिरजू, दीपू, उमा, अरे...निक्की कहाँ गयी? बुलाकर लाओ। देखो, गाड़ी का वक्त हो गया है। लेट हो गये, तो सब किया-कराया रखा रह जायेगा। क्या, एक घंटा पड़ा है अभी? तुम्हें तो हर बात में ढील डालनी आती है। टिकट-फिकट लेने में भी तो देर लगेगी। गाड़ी में जगह आराम की मिल जायेगी। दस-पाँच मिनट पहले पहुँचना अच्छा होता है। बुलाओ, निक्की को बुलाओ। तू जा उमा, कहना-अम्मा नाराज हो रही हैं। आ गयी? क्यों री, तुझे जाना नहीं है क्या? अरे भागवान, यह सलवार-कमीज उतार, धोती पहन ले। गाँव है, वहाँ पहाड़ की पहाड़ लड़कियाँ सलवार-कमीज पहने नहीं घूमतीं। जा, जल्दी जा, मेरा मुँह क्या देख रही है। भाभी से माँग ले। अरे, वो जार्जट वाली पहन ले। ब्लाउज! हे भगवान! जो कुछ करूँ, मैं ही करूँ! अच्छा चल! अजी सुनो, तुम तब तक ताँगा ले आओ...

    ओ दीपू के बच्चे! यह क्या शैतानी लगा रखी है? नहीं, अब एक भी नहीं मिलेगा। सारे बिस्कुट यहीं खा लेगा तो रास्ते में क्या खायेगा? मेरा सिर? चलो, पानी पियो। बहू, जरा मुँह पोंछ दे इसका। देखो तो, कैसा भूत बन रहा है! उमा, बेटा, ले, जरा यह टिफिन भी उठाकर सामान के पास रख ले। बहू, मेंहदी नहीं मिली थी, तो महावर ही लगा लेती। ऐसे पैर अच्छे नहीं लगते। अरे, मैंने कहा था, बक्से में से तोडिय़ाँ निकालकर पहन ले। घर में तो चाहे जैसा रह लो, पर बाहर नंगे पैर अच्छे नहीं लगते। लॉकिट पहन लिया कि नहीं? शरमाने की क्या बात है? आखिर ब्याह में जा रहे हैं? सब बहू-बेटियाँ पहन-ओढ़कर आयेंगी। नहीं, निक्की यों ही ठीक है। चेन डाल लेगी गले में। मैं? अरे, मेरा क्या है, मैं तो यों ही ठीक हूँ। अरे बिरजू, देख तो, पापा ताँगा लेने गये हैं या कहीं किसी से बातों में ही तो नहीं उलझ गये? जा बेटा, देखना तो!

    हाय राम! निक्की, कहीं मेरी नजर न लग जाये। कमबख्त इत्ती बड़ी लगती है साड़ी में। पल्ला ठीक कर ले। साड़ी पहनने का भी सऊर नहीं है। ऐ उमा, चलो बंद करो संदूक। क्या ले रही है? छोड़-छोड़! गाँव के बच्चे ऐसे खिलौनों से नहीं खेलते। रख दे सब। अभी तो दानी करण बनी जा रही है, लौटकर आयेगी, तो कहेगी--अम्मा, खिलौने ले दो। फिर कौन पैसे डालेगा? नहीं माँगेगी? सच्ची कह रही हूँ, फिर कभी कहा कि अम्मा, खिलौने ले दो, तो देख, याद रखना! अच्छा ले ले, मर तू भी! चल, उस थैले में रख दे!

    हाँ-हाँ, सब ले-ले, एक भी न रहे। जैसे लौटकर आना ही नहीं है। बस, ठीक है। निक्की, बहू, सोच लो, कुछ और लेना हो। अरे, चाय! हाँ, चाय का पैकेट जरूर रख लो, वहाँ तो मिलती नहीं। मैं तो रह नहीं पाऊँगी। हेमा के ब्याह में गयी थी, तो तुलसी औटाकर पीनी पड़ी थी। बिरजू, आ गया ताँगा? बुला ले यहीं उस ताँगे वाले को, उठाकर ले जाये सामान। अरे भैया, कौन ज्यादा है! छोटे-छोटे चार नग तो हैं कुल! तो क्या पैसे नहीं लोगे? अच्छा-अच्छा, ठीक है। चलो सब जने, बैठो ताँगे पर!

    अच्छा, बिरजू बेटा, घर का खयाल रखना। जरा चौकन्ने सोना। खाना सावित्री के यहाँ खा लिया करना। चाय बनाने की जरूरत पड़े, तो पैकेट ले आना। घर में जो था, मैं ले जा रही हूँ। और देखो, ज्यादा दोस्त-वोस्त मत ले के पहुँच जाना सावित्री के घर। वैसे सावित्री ऐसी है तो नहीं, पर हमें तो ध्यान रखना ही चाहिए। अच्छा, पैसे तो तुम्हारे पास हैं न? अजी सुनो, बिरजू को कुछ पैसे और दे दो। लेकिन बेटा, जब तक हम न आयें, सिनेमा-विनेमा मत जाना। दफ्तर से सीधे चले आया करना। और...अच्छा, चलते हैं। क्यों जल्दी मचा रहे हो, सब बैठ गये? अजी, तुम तो बैठो...और बेटा, कोई ऐसी-वैसी बात न होने पाये। जीते रहो। चलो भैया। थोड़ी उधर सरक, निक्की!

    देख, निक्की, एक बात पहले कहे देती हूँ, जैसी हा-हा-हू-हू यहाँ करती है, वहाँ बिलकुल नहीं चलेगी। जरा संजीदा होकर रहना पड़ेगा, समझी? वरना गाँव के लोग मन के बड़े पापी होते हैं। जरा कोई बात देखी कि गाँठ बाँध लेंगे। फिर जब हम लोग चले आयेंगे, तो रस ले-लेकर एक-दूसरे को सुनायेंगे। बड़ी जिज्जी आयी थीं हेमा के ब्याह में। उनके पीछे कित्ती बातें बनीं, मालूम है? वैसे तो गलती जिज्जी की भी थी ही। ज्वान-जमान बेटी को साथ ले गयी थीं, तो अपने बेटे को मना नहीं कर सकती थीं कि भैया, घरेलू ब्याह शादी में दोस्त का क्या काम? लेकिन राधेश्याम भी तो ऐसा ही है। माँ को गिनता ही क्या है? कह दिया होगा, मम्मी, या तो मैं नहीं जाऊँगा, या फिर मेरा दोस्त--क्या भला-सा नाम था उसका?...सुरिंदर, वह जरूर चलेगा। और नतीजा क्या हुआ? सब लोगों ने कहा कि जिज्जी होने वाले दामाद को भी साथ लायी हैं। कोई-कोई कहें छिपके-ऐ भैना, सहर में रहने वालों की क्या है? क्या खबर, गुप-चुप सादी कर ली हो। मैंने तो दो-एक को समझाया भी पर...

    अजी, तुम्हारा क्या, तुम तो हर बात में टाँग अड़ाते हो। अब मैं नहीं समझाऊँगी, तो क्या आसमान के फरिश्ते आयेंगे समझाने? तुमको तो बस, हर बात में लेक्चर देती ही दिखायी देती हूँ। ऐसी बात है, तो एक मुसीका ला दो। मुँह पे बाँध के चुपचाप बैठी रहूँगी। ऐ दीपू, सीधे बैठ, गिर पड़ेगा तो सब दाँत टूट जायेंगे। उमा, तू सरक क्यों नहीं जाती? उसे ठीक से बैठ जाने दे। अजी, तुम बिठा लो दीपू को गोद में। ये उमा की बच्ची तो लड़ोकड़ी है पूरी। हँस रही है, बेहया! चलो, उतरो। देख, बहू, सँभलके। निक्की, साड़ी ठीक से क्यों नहीं ओढ़ती? पल्ला पीछे गिरा जा रहा है। सब सामान आ गया? दो इसे, पैसे दे दो। ऐसी जल्दी मचा रहा है, जैसे अम्मा ने भूखा ही ताँगा जोतने भेज दिया हो। अच्छा, तुम टिकट ले आओ। क्या, निक्की क्यों जायेगी टिकट लेने? अच्छा, जनानी खिड़की पे जल्दी मिल जायेगा। पर, तुम साथ तो चले जाओ। देख, खोटे पैसे मत ले आना। ये निक्की तो पूरी बौड़म है। कौन कहेगा कि एम. ए. में पढ़ रही है। हम लोग चलें? कुली कर लें? बुलाओ कुली, ऐ कुली भाई...

    जगह तो अच्छी मिल गयी। ऐ भैया, ऐ सरदारजी, जरा इस पंखे को हमारी तरफ  मोड़ दो। हे भगवान! इत्ती गरमी है कि पसीने में नहा गये हैं। गाड़ी चले, तो थोड़ी हवा आये। निक्की, क्या बजा है तेरी घड़ी में? साढ़े सात! बस? जल्दी आ गये। गाड़ी तो आठ बजे छूटती है, क्यों जी? अरे तो क्या हो गया? जगह तो आराम से मिल गयी। बहू, तू दीपू को उधर बिठा ले, खिड़की के पास। बाहर देखने का बहुत शौक है इसे। अरे, यह क्या खरीद लायी, निक्की? गाड़ी में बैठकर कहानियाँ पढ़ेंगी मेम साहब! तेरा पेट नहीं भरता पढ़ते-पढ़ते? हाँ जी, हम क्या जानें, तुम ठहरीं नये जमाने की लड़की! पढ़ो, खूब पढ़ो, और ले आओ दस-पाँच। एक से क्या होगा?

    क्या कहा? तेरी कहानी छपी है? कहाँ, देखूँ? उँह, बड़ी आयी कहानी लिखने वाली! सुषमा नाम की कोई और लड़की तो जैसे है ही नहीं दुनिया में। पर...अरे, यह तो वही फोटो है, जो बिरजू ने खींचा था। मरी, तू कब से कहानियाँ लिखना सीख गयी? तेरे पेट में तो बहुत बड़ी दाढ़ी है! किसी को बताया भी नहीं। देखते हो जी, अपनी निक्की की कहानी और फोटो छपा है। मुँह मीठा मैं कराऊँ? तुम बाप हो, तुम खिलाओ मिठाई। देख, बहू, तू भी देख ले अपनी गुणवंती ननद के काम। कैसी बैठी है फोटो में, दाँत निकालती हुई। क्या, पचास रुपये मिलेंगे? घर बैठे? तब तो तू खिला, निक्की, मुझसे उधार लेकर मिठाई ले ले। अरे ओ, मिठाई वाले! अजी, जरा उठके ले लो!

    पर, निक्की, तुझे यह सब किसने सिखा दिया? कैसे सीख गयी तू? अपने-आप? भैया का दोस्त कौन? राजे? राजे भी कहानियाँ लिखता है? अच्छा, तो तुम दोनों भाई-बहन मुझे बेवकूफ  बना रहे थे? बेवकूफ  नहीं तो और क्या? बिरजू कहता था कि राजे निक्की की मदद कर रहा है पढ़ाई-लिखाई में। तो यह पढ़ाई-लिखाई होती थी! लो, खाओ तुम लोग। मैं नहीं खाऊँगी। मैं खाती हुई अच्छी लगूँगी? गाड़ी में बैठकर? नहीं-नहीं, तुम लोग खाओ। नाराज क्यों होऊँगी? होकर भी क्या कर लूँगी? अच्छा-अच्छा, ठीक है, लाओ। ऐ, उमा की बच्ची, सीधी तरह बैठ जा, नहीं तो पिट जायेगी मेरे हाथ से। आ ठहर, मैं बिठाती हूँ तुझे खिड़की के पास! तुम छोड़ दो, जी! मारूँगी नहीं, तो क्या भगवानजी के आले में बिठाके पूजा करूँगी? मरी ने नाक में दम कर रक्खा है। दुनिया भर की कुटेवें अपनी ही औलाद में भरी पड़ी हैं। अब खाती क्यों नहीं? नखरे क्यों कर रही है। मैं नहीं खाती। मुझसे बँधी है क्या तू?...तू चुप नहीं होगी, उमा? जरा हाथ छुआ दिया, तो बिसूर रही है बैठी।

    चली अब! सवा आठ बजे छोड़ रहे हैं। इन रेलवे वालों की लापरवाही की भी हद है। मुसाफिर दुख पायें तो पाते रहें, इन्हें क्या परवाह! ये तो अपनी मनमानी करेंगे। अरे, जब आठ का टाइम है, तो सवा आठ बजे क्यों छोड़ते हो गाड़ी? पर कौन कह सकता है! आग लगे इस नये जमाने में। अच्छा जमाना आया है।

    निक्की, एक बात मानेगी बेटा? क्या कहूँ, गाँव का मामला है, इसीलिए कह रही हूँ। पहले तू हाँ कह दे। हाँ, देख, यह तेरी कहानी वाली पत्रिका कोई देखेगा, तो क्या कहेगा? तू नहीं जानती, कैसे-कैसे लोग हैं वहाँ, तिल का ताड़ बनाते देर नहीं लगती। बड़ी जिज्जी की लड़की की तरह तेरी भी बदनामी हो, यह मैं नहीं चाहती। वापस लौटकर तू और खरीद लेना।

    करना क्या है! नहीं-नहीं, यों मत फेंक! सारी क्यों फेंकती है? आखिर पैसे खर्च हुए हैं। ला, मुझे दे। तेरी कहानी के ये तीन पन्ने फाड़ देती हूँ, बस!

    अरे, यह क्या? यह इसी महीने की पत्रिका है? मार्च की? तो क्या यह मार्च है? अप्रैल नहीं? शादी तो अपै्रल में है..