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Wednesday 19 Sep 2018

असहयोग आन्दोलन में राहुलजी का योगदान

एक विस्तृत परिप्रेक्ष्य में भारतीय स्वतंत्रता की समस्याएं मूलत: दो कालखण्डों में विभाजित कर देखी जा सकती हैं, मगर दोनों ही की समस्याओं में कतिपय साम्य और असाम्य का अनुमान भी लगाया जा सकता है। आजादी-पूर्व भारत की स्वतंत्रता की समस्या में जहां ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ  भारतीय राजनीतिक स्वतंत्रता के लिये चलाये जा रहे संघर्ष के स्वरूप, उसकी कार्य-नीति और रणनीति निर्धारण में समस्याएं आती रहतीं, वहीं ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन में आजादी के बाद राजसत्ता के चरित्र की समस्याएं भी जुड़ी हुई थी। इन व्यापक पृष्ठभूमि की समस्याओं पर राहुल जी का अपना दार्शनिक, राजनीतिक और आर्थिक विचार था, जिसका प्रकटीकरण उनके लेखनों, भाषणों और व्यावहारिक कार्यों में स्पष्टत: प्रकट हुआ है।

स्वतंत्रता संग्राम में पदार्पण : राहुल जी का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पदार्पण काल इस अर्थ में संक्रमणकालीन था कि 1905 के बाद से 1908 तक मजदूर वर्ग की साम्राज्यवाद-विरोधी राजनीतिक शिरकत ने स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग और उसके राजनीतिक मंच कांग्रेस के सामने यह सवाल दरपेश कर दिया था कि ब्रिटिश सरकार के साथ भारत में किसी भी तरह का सहयोग भारतीय जनता को स्वीकार्य नहीं होगा। सन् 1916 में लखनऊ पैक्ट में कांग्रेस-लीग एकता के बाद अब भारतीय राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ राजनीतिक सौदेबाजी की अपनी ताकत को, जो पहले दो हिस्सों में बंट चुकी थी, एक कर बढ़ा लिया था। प्रथम विश्वयुद्ध जनित आर्थिक संकट से मजदूर वर्ग उत्तेजित था तथा आन्दोलनात्मक कार्रवाइयों की तरफ  उन्मुख भी हो चला था। सन् 1917 की रूसी समाजवादी सफल क्रान्ति ने साम्राज्यवाद की अजेयता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर एक नई आर्थिक- सामाजिक व्यवस्था के सफल निर्माण के लिये आशान्वित वातावरण का सृजन कर दिया था। इन सारे पर्यघटनों का सम्पूर्ण तार्किक योगदान राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में हुआ, वह था एक नयी साम्राज्यवाद-विरोधी राजनीति, रणनीति तथा कार्यनीति के प्रति जागरूकता का प्रदर्शन।

 सदेह राजनीति में राहुल जी का पदार्पण 1922 में हुआ था, जब वे गांधी के असहयोग आन्दोलन से जुड़े। असहयोग की रणनीति, उसका अंतिम लक्ष्य या राजनीतिक नारा, गांधीजी की कार्य पद्धति या कि दर्शन के प्रति राहुल जी की क्या मनोदशा थी, इसको राहुलजी की कृतियों के आधार पर विश्लेषित किया जा सकता है। गांधी का साम्राज्यवाद के खिलाफ  लड़ाई का अस्त्र था चरखा, जो भारतीय सामंतवादी ग्राम व्यवस्था के अर्थतंत्र के उत्पादन का एक औजार था और स्वतंत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता था, जिसे यूरोपीय औद्योगिक क्रान्ति के फलरूवरूप मशीन आधारित सामाजिक व्यवस्था के विकल्प के रूप में गांधी द्वारा रखा जा रहा था। स्वाभाविक था कि तकनीकी तौर पर अविकसित चरखा के द्वारा निर्मित सामाजिक सम्बन्ध, मशीनी सभ्यता द्वारा निर्मित सामाजिक सम्बन्धों की जननी नहीं हो सकती थी। गांधी ने इसी के अनुरूप राजसत्ता का नारा राम-राज में दिया, एक ऐसा राज जो पिछड़ी उत्पादन प्रणाली पर आधारित सामाजिक सम्बन्धों या उत्पादन सम्बन्धों पर निर्भर था।

गांधी के असहयोग आन्दोलन में जाने के पूर्व राहुल जी ने जिस आर्थिक-सामाजिक संरचना का बिम्ब 1918 में ही अपने मस्तिष्क में निरूपित किया था और जो 1923 में साकार होकर 22वीं सदी के रूप में सामने आया, वह गांधीवादी चिंतन के ठीक उल्टा खड़ा था। वर्तमान किसी भी समाज से ज्यादा उन्नत। असहयोग आन्दोलन के पूर्व ही जिस काल्पनिक समाज का खाका राहुलजी ने 22वीं सदी में रखा है, उसमें उन्होंने यूटोपिया की विस्तार से चर्चा की है। इस सम्बन्ध में राहुल सांकृत्यायन का अभिमत है, ''मानव समाज के भीतर की विषमता और भयंकर उत्पीडऩ को कुछ लोगों ने दिमागी परिवर्तन लाकर बदलना चाहा। उन्होंने धर्म की दुहाई दी, ईश्वर की कसम खायी, मनुष्य के उच्च भावों से अपील की, उसकी बुद्धि को दूर के फायदे को सुनाकर पलटना चाहा। और चाहा कि सम्पति में वैयक्तिक स्वार्थ न रहे और सारे समाज के हित में समाज का संगठन हो। ऐसे समाजवादियों को हमने वहां स्वप्नचारी समाजवादी कहा है।ÓÓ भारत में बुद्ध पहले आदमी मिलते हैं, जो व्यक्तिवाद और वैयक्तिक सम्पत्ति के विरोधी तथा संघवाद के पक्षपाती थे। उन्होंने अपने भिक्षु-भिक्षुणियों के संघ में आर्थिक साम्यवाद चलाया। किन्तु आगे उसका विकास संभव नहीं हुआ, क्योंकि एशियाई समाज की मिट्टी उस योग्य नहीं थी। सर टामस मूर (1478-1535 ई.) का मानना था कि तलवार के बल पर किसानों के विद्रोह को दबाया जा सकता था, किन्तु समाज की आर्थिक विषमता की अनदेखी नहीं की जा सकती थी। बेकन (1569-1626 ई.) ऐसे समय में पैदा हुआ जब सुधारवादी ईसाई-धर्म विजयी हुआ। स्वतंत्रता के प्रति लोगों की रूझान बढ़ा। आविष्कार और भूगोल की ओर भी लोग उन्मुख हुए। वैज्ञानिक और दार्शनिक फ्रांसिस बेकन ने नवीन एटलांटिस लिखी, जो दूसरा प्रसिद्ध यूटोपिया है। इस यूटोपिया में साम्यवादी अर्थनीति पर उतना जोर नहीं है, जितना कि विज्ञान के प्रचार पर। उसका आर्थिक साम्यवाद पर उतना विश्वास नहीं था जितना विज्ञान में साम्यवाद पर। रूसो ने अपने समय के शिक्षित संस्कृत वर्ग की कड़ी आलोचना करने के साथ ही तत्कालीन शासन-प्रथा को समाप्त कर देने पर बल दिया। उसके अनुसार वैयक्तिक सम्पत्ति लूट के सिवा और कुछ नहीं है। राहुल जी के अनुसार माक्र्स ने यूटोपिया की सृष्टि नहीं की। वस्तुत: माक्र्स ने जिस यूटोपिया का निर्माण किया, वह वैज्ञानिक समाजवाद के आधार पर वर्गहीन समाज की भावी परिकल्पना है। यूटोपिया एक स्वप्न है जिसे पूरी तरह पाना संभव नहीं भी हो सकता है। लेकिन किसी स्वप्न या आदर्श से वंचित नहीं भी रहा जा सकता है। यह द्वन्द्वात्मकता के विरूद्ध होगा।

ऐसे विचारों के साथ राहुल जी ने अपनी पूर्ण सहमति दी हो या नहीं, मगर फिर भी मूर की ही काल्पनिक कथा के रूप में 22वीं सदी की रचना कर अपने राजनीतिक विचारों को न सिर्फ  रखा, बल्कि गांधीवादी दर्शन के समानान्तर एक नया दर्शन जो समता और सामूहिक उत्पादन प्रणाली में उन्नत मशीनों के उपयोग का था, रखा। उनका दर्शन गांधीवाद के समानान्तर खड़ा हो गया। टामस मूर के यूटोपिया के संदर्भ में राहुल जी ने लिखा है कि मूर के कुछ ही समय के बाद कुछ कल्पित कथाएं हिन्दी में भी जायसी के पद्मावत और धरणीदास (जहांगीर- औरंगजेब के सम-सामयिक) प्रेम प्रकाश के रूप में लिखी गयी थी। किन्तु हमारे काठ-मारे समाज में वह चेतना कहां थी कि लेखक सामाजिक अन्याय के खिलाफ  कलम उठाये। यहां तो प्रेम और सूफीवाद के परदे में या तो यौन-अतिचार का प्रचार किया जाता था, या अपने लिये महन्ताएं तैयार की जाती थी।

22वीं सदी माक्र्सवाद के प्रभाव तले लिखी गयी है, इसका विरोध तो वे खुद करते हैं, ''साल भर पहले रूस की साम्यवादी क्रान्ति की खबरों के साथ ही मैंने पहले-पहल साम्यवाद का नाम सुना था। साम्यवाद के बारे में मैंने कोई पुस्तक नहीं पढ़ी थी, उसके विषय में मेरा सारा ज्ञान अवलंबित था - साप्ताहिक प्रताप (कानपुर) में जब-तब निकले लेख या टिप्पणियां, और जहां तक मुझे स्मरण है, उसमें साम्यवाद के सिद्धान्त के विषय में उतना नहीं छपा था, जितना साम्यवादी क्रांतिकारियों के जीवन पर।''

राष्ट्रीय संग्राम की समस्या पर दृष्टिकोण: असहयोग आन्दोलन में उनके प्रवेश के समय राहुल जी का विश्व दृष्टिकोण माक्र्सवादी नहीं था। फिर भी आर्य समाज और बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण उनका चिंतन, गांधी के उस चिंतन से, जिसमें गांधी वर्ण-व्यवस्था का समर्थन करते थे, अपने को सनातनी हिन्दू कहते थे, चरखा का प्रचार करते थे और सबसे बढ़कर राम-राज की स्थापना की बातें करते थे, राहुल जी का किसी भी स्तर पर साम्य नहीं था। आर्य समाज के प्रभाव ने राहुल जी के चिंतन को सनातनी हिन्दू मिथ्या विचारों, मूर्ति-पूजा, वर्णाश्रम धर्म के प्रति अगर विद्रोह की भावना जगा दिया था तो बौद्ध धर्म के प्रभाव से उनका चिंतन विश्व समाज की परिकल्पना करने लगा था। गांधी का अहिंसावाद, बौद्ध दर्शन, जिसका प्रभाव राहुल जी पर था, मगर भावी भारतीय समाज की रचना में गांधीवादी दर्शन राहुल जी के लिए एक मिथ्या प्रयास था, जिसके स्वरूप ग्रहण करने की कोई वस्तुगत स्थिति भारत में थी ही नहीं। जिस प्राचीन भारतीय सभ्यता को तिलक से लेकर गांधी तक आदर्श मानते रहे, उसके प्रति राहुल जी का दृष्टिकोण था कि सहस्राब्दियों से भारतीय समाज मुक्त-प्रवाह नहीं, प्रवाह-शून्य नदी का छाडऩ हो गया है। आज भी धार्मिक हिन्दू गंगा के छाडऩ में नहाना बुरा समझता है, वह उसके लिये मुर्दा के साथ स्नान, पुण्य छीनने वाला स्नान है। वैसे भी ऐसे पानी के पास गुजरने पर नाक में सड़ांध की बू आने लगती है। भारतीय मानव समाज 19वीं सदी तक ऐसा ही छाडऩ था। उसे अपने पुराणपन पर अभियान रहा। उसने बहते पानी के महत्व को समाज में लाने की ओर ध्यान तक नहीं दिया। माक्र्स के शब्दों में ''सारे गृहयुद्ध विदेशी आक्रमण, क्रांतियां, विजय, अकाल - चाहे जितने ही तेज, नाशकारी रहे हों, मगर वह भारत में सतह से भीतर नहीं घुस सके।‘’

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ  राष्ट्रीय आन्दोलन में एक प्रमुख समस्या साम्राज्यवाद के खिलाफ अपनायी जाने वाली रणनीति और कार्यनीति का था, जो संघर्षों के हर मुद्दे पर साम्राज्यवाद द्वारा अपनायी गयी संघर्ष-विरोधी कार्रवाइयों की राजनीति और संघर्ष दोनों ही मोर्चों पर करारा जबाव दे सके। असहयोग आन्दोलन ने राजनीति के क्षेत्र में एक विकसित आंदोलन का स्वरूप तो जरूर रखा था, मगर उसके द्वारा आन्दोलन का दूरगामी लक्ष्य, जो जन-आवाम को उसके पीछे व्यापक रूप में गोलबंद रख सतत् उत्साहित करता रहे, वास्तव में निम्न कोटि का था। क्योंकि गांधी पूंजीवाद के सबसे विकसित स्वरूप साम्राज्यवाद के खिलाफ  संघर्ष में प्राक-पूंजीवादी या सामंतवादी समाज-व्यवस्था को पुन: स्थापित करने का लक्ष्य रख चल रहे थे तथा भीमकाय विद्युत-चालित इंग्लैंड के कारखानों के साथ संघर्ष में चरखा को स्थािपत कर देना चाहते थे। भारतीय इतिहास से सबक ले राहुल जी ने देखा कि अंग्रेज तथा अन्य आक्रमणकारियों में, जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया था, बुनियादी फर्क था। राहुल जी लिखते हैं, जिस परिवर्तन से यूरोपीय दुनिया बहुत पहले गुजर चुकी थी, भारत को उसे अपनाने के लिये मजबूर करना अंग्रेजों का काम था। अंग्रेज उन विजेताओं की भांति भारत में नहीं आये थे, जो भारत में आकर भारतीय बन -भारत के हो गये, वह यूनानियों, शकों, तुर्कों, मुगलों की भांति हिन्दू नहीं बन गये। अंग्रेजों में पहले के विजेताओं से भिन्न, उनमें विशेषताएँ थीं। दूसरे विजेता जरूर थे, किन्तु साथ ही वह सभ्यता में उस तल पर नहीं पहुँचे हुए थे, जिस पर हिन्दू पहुंच चुके थे, इसलिए इतिहास के सनातन नियम के अनुसार राजनीतिक विजेता-विजित जाति की श्रेष्ठ सभ्यता द्वारा पराजित हो गये। अंग्रेज हिन्दू सभ्यता से कहीं ऊंची सभ्यता के धनी थे, इसलिए विजित जाति उन्हें हजम नहीं कर सकती थी। पीढिय़ों तक यही कोशिश होती थी कि विजेता की सभ्यता से दूर-दूर रहें, लेकिन मूढ़ हठ कितने दिनों तक चल सकता था। आज हम देखते हैं, भारत का वह पुराणपन कितना हटता जा रहा है, और किस तरह उसकी जगह नये समाज का निर्माण हो रहा है।

राहुल जी कहते हैं कि अंग्रेज भारत में अंग्रेज राजवंश कायम करने नहीं आये थे। जिसने विजय करके भारत के शासन को पहले-पहल अपने हाथ में लिया, वह कोई राजा या उसका सेनापति नहीं था, वह था ऐसे सौदागर का गिरोह, जो अपनी पूंजी पर अधिक से अधिक सालाना मुनाफा कमाना चाहते थे। यह बिल्कुल ही नयी तरह की विजय थी। ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत पर शासन इसलिये कर रही थी, कि वह अपने भागीदारी को अधिक से अधिक नफा बांटे, भारत से अधिक से अधिक अंग्रेजों का भरण-पोषण हो। यह काम मुगलों और शकों की कर उगाहने की नीति से नहीं हो सकता था। मुगलों-शकों के अपने खर्च के लिये लिया गया रूपया भी फिर भारत में ही जीवनोपयोगी चीजों के खरीदने में बंट जाता था, इसलिये वह एक तरह से देश के भीतर विनिमय के रूप में चक्कर काटता रहता था। अंग्रेजों को यह धन सात समुन्दर पार खर्च करने के लिये चाहिये था, जिससे एक बार की गयी सम्पति फिर लौट कर यहां आने वाली न थी। इसके लिये जरूरी था कि अंग्रेज स्वदेशी हो गये विजेताओं से ज्यादा धन शोषण करें।

संक्षेप में, अंग्रेजों को अपने सारे शासक वर्ग (पूंजीपति वर्ग)के स्वार्थ के लिये भारत को दोहन करना था - पहले व्यापार से, फिर व्यापार और शासन से, फिर व्यापार, शासन और पूंजीवादी शोषण - कच्चे-पक्के माल के क्रय-विक्रय से। इस भारी शोषण में ग्रामीण प्रजातंत्र बचाया नहीं जा सकता था। चाहे उसका कवित्वमय रूप तत्कालीन और आधुनिक कितने ही भावुक व्यक्तियों को बहुत आकर्षक मालूम होता रहा हो और कौन-सा अतीत है, जो आकर्षक नहीं होता। जिन प्राचीन स्वावलम्बी ग्राम प्रशासन को गांधी और कांग्रेस आदर्श व्यवस्था मानकर पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्धों से उत्पन्न संस्कृति के विकल्प में लाना चाहते थे, उनके प्रति राहुल जी का क्या विचार था ? राहुल जी ने कहा है- हमें भूलना नहीं चाहिये कि वह काव्यमय ग्राम्य-संगठन, चाहे देखने में कितने ही मासूम दिखलाई पड़े, लेकिन यही सदा से पूर्वी स्वेच्छाचार की ठोस बुनियाद रहे हैं। इन्होंने मानव-मस्तिष्क को छोटे से छोटे दायरे में बंद रखा और उसे मिथ्या विश्वास को चुपचाप मान लेने वाला हथियार बनाया, उसे पुराने नियमों का गुलाम बनाया और उसे सभी महान् ऐतिहासिक (इतिहास की प्रगति से उत्पन्न) शक्तियों से वंचित रखा। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि एक तुच्छ छोटी-सी जमीन की टुकड़ी में केन्द्रित बार्बरिक ममता साम्राज्यों के ध्वंस, अकथनीय नृशंसता के नग्न-नृत्य, शहरों की समाप्ति का कारण हुआ है। हमें नहीं भूलना चाहिये कि इस अपमानजनक, मुर्द कीड़े- मकोड़े के जीवन, निर्जीव से अस्तित्व ने, दूसरी ओर इसके विरूद्ध, जंगली निरूद्देश्य, सत्यानाश की असीम शक्तियों को उत्तेजना दी और खुद मनुष्य हत्या को हिन्दुस्तान में धार्मिक कृत्य बना दिया। हमें नहीं भूलना चाहिये कि यह छोटी-छोटी जमातें, जाति-भेद और दासता के रोग में फंसी हुई थी, उन्होंने मानव को ऊपर उठा परिस्थितियों पर विजयी बनने की जगह बाहरी परिस्थितियों का गुलाम बनाया, उन्होंने स्वयं विकसित होनेवाली सामाजिक स्थिति को अपरिवर्तनशील प्रकृति के हाथ की कठपुतली बना दिया। इस प्रकार प्रकृति की पाशविक प्रथा को स्थापित किया, और प्रकृति के राजा मानव का इतना अध:पतन कराया कि वह बानर हनुमान और कपिला गाय की पूजा में घुटने टेकने लगा।

यह सच है कि इंग्लैंड जो हिन्दुस्तान में एक सामाजिक क्रान्ति ला रहा है, उसके पीछे एक बहुत ही नीच उद्देश्य छिपा हुआ है, किन्तु सवाल यह नहीं है। सवाल यह है-क्या एशिया की सामाजिक स्थिति में क्रान्ति लाये बिना मानव-जाति अपने ध्येय को पूरा कर सकती है? अगर नहीं, तो इंग्लैंड ने चाहे जो भी अपराध किया हो, किन्तु उक्त क्रान्ति को लाने में उसने इतिहास के अनजाने हथियार का काम किया। फिर एक पुरातन जगत के टूट-टूट कर गिरने का दर्दनाक नजारा चाहे जितनी भी कटुता हमारे व्यक्तिगत भावों में पैदा करें, किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से देखने पर हमें गोयथे के शब्द याद आते हैं:-

''इसका हमें सोच करना क्या लिप्सा का स्वभाव ही ऐसा, बढ़ती चले अयास,

और नहीं क्यों तैमूरी तलवार बनाती कोटि जनों को क्रूर काल का ग्रास ?’’

राहुल जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को माक्र्स की उस पैनी दृष्टि से देखते हैं, जिसमें उन्होंने (माक्र्स) भारत से दूर बैठकर 1853 में ही एक दृष्टि प्रदान की थी जो भारतीय समाज के तह तक पैठी थी। उन्होंने क्रूरता के साथ हमारे उस लुटते सोने के गढ़ के लिये दो आंसू बहाना काफी नहीं समझा, बल्कि बतलाया कि हमारी उस दयनीय दशा का कारण क्या है। उसने यह भी बतलाया कि उस पुरानी सामाजिक व्यवस्था को नष्ट होने से बचाने की जरूरत नहीं है, जैसा कि नब्बे वर्ष बाद आज गांधी और गांधीवादी दिल से याद दिलवाने के लिये कह रहे थे, बल्कि उससे जो सबसे बड़ा फायदा, एक प्रवाहशील उन्मुक्त समाज के निर्माण का अवसर मिला है, उसमें हमें लाभ उठाना चाहिये।

गांधीवादी राम राज्य की परिकल्पना परराहुल जी चोट करते हुए उसकी अवैज्ञानिकता को दिखाते हैं और इसके लिए माक्र्स को उद्धृत करते हैं- ''क्या बात थी, जो कि हिन्दुस्तान में अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हुआ? मुगल सूबेदारों ने मुगल शासन केन्द्र को तोड़ा। सूबेदारों की ताकत को मराठों ने तोड़ा। मराठों की ताकत को अफगानों ने तोड़ा। और, जबकि वह सभी सबके खिलाफ  लड़ रहे थे, अंग्रेज दौड़ पड़े, और वह सबको दबाने में सफफल हुए। हिन्दुस्तान वह देश है, जो हिन्दू-मुसलमानों में ही बंटा नहीं है, बल्कि वह कबीलों-कबीलों, जातों-जातों में बंटा हुआ है। उसके समाज का ढांचा एक तरफ  के ऐसे संतुलन पर आधारित था, जो कि उसके सभी व्यक्तियों के बीच साधारण बिखराव का परिणाम था। इस तरह का देश, इस तरह का समाज, क्या पराजित होने के लिये ही नहीं बना था? चाहे हिन्दुस्तान के अतीत के इतिहास को हम न भी जानते, किन्तु क्या यह एक जबर्दस्त अविवादास्पद बात नहीं है, कि इस क्षण भी भारत अंग्रेजों की गुलामी में जकड़ा हुआ है, हिन्दुस्तान के खर्च पर रखी एक हिन्दुस्तानी नौसेना द्वारा। फिर भारत पराजित होने से बच नहीं सकता था और उसका सारा अतीत इतिहास, अगर कोई चीज है, तो वह लगातार पराजयों का इतिहास है, जिनसे होकर वह गुजरा है। भारतीय इतिहास, कम से कम ज्ञात इतिहास, कोई इतिहास नहीं है। जिसे हम उसका इतिहास कहते हैं, वह उन्हीं लगातार आने वाले आक्रमणकारियों का इतिहास है, जिन्होंने निष्क्रिय अपरिवर्तनशील समाज की निश्चेष्टता के आधार पर अपने साम्राज्य कायम किये।

भारत में अंग्रेजों को दो काम पूरा करने थे - एक ध्वंसात्मक, दूसरा पुनरूज्जीवन - पुराने एशियाई समाज का ध्वंस, और एशिया में पाश्चात्य समाज का भौतिक शिलान्यास। अंग्रेजों ने ग्राम्य समाज को तोड़कर, देशी उद्योग-धंधे को जड़मूल से उखाड़ कर, देशी समाज में जो कुछ महान और उच्च था, उसे जमीन के बराबर करके अपने ध्वंसात्मक कार्य को पूरा किया। ध्वंसों के ढेर में पुनरूज्जीवन का काम आज मुश्किल से दिखाई पड़ता है, तो भी वह आरम्भ हो गया था। भारत की राजनीतिक एकता, जो कि महान मुगलों के शासन में भी ज्यादा संगठित और विस्तृत थी, पुनरूज्जीवन के लिये सबसे पहली आवश्यक चीज थी। अंग्रेजी तलवार के द्वारा जबर्दस्ती लादी गयी वह एकता अब बिजली के टेलीग्राफ द्वारा और मजबूत तथा चिरस्थायी बनायी गई।

ग्रेट ब्रिटेन के शासक वर्ग का अब तक भारत की प्रगति में सिर्फ  आकस्मिक चलता-फिरता एक खास तौर का स्वार्थ था। सरदार वर्ग भारत को जीतना चाहता था, थैलीशाही उसे लूटना चाहती थी और मिलशाही सबकी गलाकट्टी कर रही थी। लेकिन अब व्यवस्था बदल गयी। अब मिलशाही (पूंजीवादी) को पता लग गया था कि भारत को उत्पादक देश में परिणत करना उसके लिये एक आवश्यक बात थी, और इसके लिये यह जरूरी हो गया था कि भारत के पास सींचने और भीतरी यातायात के साधन प्रस्तुत किये जायें। अब मिलशाही सारे भारत में रेलों का एक जाल बिछाना चाहती थी। और उसने ऐसा किया भी। मैं जानता हूं कि अंग्रेज मिलशाही भारत में रेलें सिर्फ  इसलिये बिछाना चाहती है कि कम खर्च में कपास और दूसरे कच्चे माल को अपने कारखानों के लिए प्राप्त कर सके। लेकिन जब एक बार ऐसे देश में मशीनरी तुमने चला दी, जहां पर कि लोहा और कोयला है, तो उनके निर्माण (उद्योग) से तुम उसे रोक नहीं सकते। इसलिये रेलें भारत में आधुनिक उद्योग-धंधे का अगुआ बनेंगी। और (भारतीयों की मानसिक योग्यता के बारे में) कैम्बैल को मानने के लिये बाध्य होना पड़ा कि भारतीयों की बड़ी संख्या एक बड़ी औद्योगिक शक्ति रखती है। वह पूंजी जमा करने की क्षमता, दिमाग में गणित जैसी स्पष्टता, आंकड़ों और पक्के विज्ञान के योग्य विचित्र प्रतिभा रखती है। उनकी प्रतिभा बहुत तेज है। रेलों के कारण स्थापित होने वाले आधुनिक ढंग के उद्योग-धंधे उस खानदानी श्रम विभाग को उठा देंगे, जिसके ऊपर भारतीय जांत-पांत आश्रित हैं और जो कि भारतीय प्रगति और भारतीय शक्ति में निश्चय ही जबर्दस्त बाधा है। अंग्रेज बुर्जुआ, जो कुछ भी करने के लिये मजबूर होगें, वह न जनता को मुक्त करेगा और न उसकी सामाजिक अवस्था को ही आर्थिक तौर से सुधारेगा। क्या पूंजीवाद ने कभी भी ऐसी कोई प्रगति होने दी, जिसमें व्यक्ति और जनता को खून और कूड़े-करकट में से, कष्ट और अघ:पात में से न घसीटा गया हो?

अंग्रेज बुर्जुआ इनके बीच में जो समाज के नवीन तत्वों को बो रहे हैं, उसके फल का भारतीय तब तक उपयोग नहीं कर सकेंगे, जब तक खुद ग्रेट ब्रिटेन में आज के शासक वर्ग को हटाकर कारखानों के कमकर (सर्वहारा) न आ जायें, अथवा हिन्दू खुद ही इतने मजबूत हो जायें, कि अंग्रेजी जूए को उतार फेंके। चाहे कुछ भी, कम या वेशी सुदूर समय में यह जरूर देखने में आयेगा, जबकि उस बहाने और मनोहर देश का पुनरूज्जीवन होगा, जिसके कोमल प्रकृति वाले निवासियों की अधीनता स्वीकृति में भी एक तरह का शांत स्वाभिमान है, जिन्होंने अकर्मण्यता के रहते भी अपनी बहादुरी से अंग्रेज अफसरों को चकित कर दिया, जिसका देश हमारी जबानों, हमारे धर्मों का स्रोत रहा, और जो अपने जाटों में प्राचीन जर्मनों और अपने ब्राöों में प्राचीन यूनानियों के प्रतिनिधि हैं।‘’

गांधीवादी राम राज्य की परिकल्पना को राहुल जी भारतीय समाज में निर्जीवता लाना कहते हैं और इतिहास चक्र को पीछे धकेल कर ले जाने का निरर्थक प्रयास। राहुल जी गांधीवादी दर्शन के प्रतिक्रान्तिकारी परिणामों को देखते हुए साम्राज्यवाद की अनिष्टकारी नीतियों का आकलन भी करते हैं, क्योंकि बिना इसके भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मूलभूत दिशा निर्देशन का कार्य अधूरा रह जाता है। उनकी दृष्टि में अंग्रेजी पूंजीवाद ने भारतीय पुराणपंथी समाज पर प्रहार तो किया, मगर उसका दृष्टिकोण इस सोने की चिडिय़ा (भारत) को विकास के मुक्त गगन में स्वतंत्र पर फडफ़ड़ाने देने के लिये नहीं, अपितु पौराणिक आर्थिक-सामाजिक पिंजड़े से निकाल उसका सम्पूर्ण पर नोंच लेना था।

प्रथम जेल यात्रा और उसके बाद: असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें 31 जनवरी, 1922 को गिरफ्तार कर लिया गया। यह गिरफ्तारी उनके छपरा, सोनपुर आदि जगहों में राजनीतिक कार्यों का परिणाम था। 13 फरवरी, 1922 को, असहयोग आन्दोलन को गांधी द्वारा बिना शर्त वापसी के दो-तीन बाद वे बक्सर जेल पहुंचाये गये। छ: मास की जेल सजा के बाद रिहा होने पर उनका राजनीतिक चिंतन अपेक्षाकृत ज्यादा विकसित हुआ था। असहयोग आन्दोलन की बेशर्त वापसी के कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक नया प्रश्न दरपेश था - ऐसे असमझौतावादी तत्व जो राष्ट्रीय आन्दोलन को जन-कार्रवाइयों के बल स्वराज्य-प्राप्ति के अंतिम लक्ष्य तक ले जाना चाहते थे, निरूत्साहित थे, नरम से नरम दली विचारधारा वाले भी किंकत्र्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में थे। कांग्रेस के सैद्धांतिक मतभेद का स्पष्ट प्रभाव उसके गया महाधिवेशन में, जो 1922 के आखिरी माहों में आहूत हुआ था, प्रकट हो परिवर्तनवादी और अपरिवर्तनवादी रणनीति और कार्य-नीति में देखा गया। गया कांग्रेस महाधिवेशन में असहयोग आन्दोलन की मनोवादी ढंग से गांधी द्वारा अपनाई गयी असफलता ने चिंतन के क्षेत्र में भी एक अराजकता की स्थिति पैदा कर दी थी। परिवर्तनवादी इस कारण घबराए हुए थे कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा असहयोग के बाद के वर्षों में अपनाया गया दमनात्मक रूख उन्हें भयभीत कर रहा था, तो अपरिवर्तनवादी ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनायी गयी दमन की कार्रवाइयों में किसी संसदीय आन्दोलन की संभावना से इंकार करते थे। इनसे भिन्न एक विचारधारा भारतीय कम्युनिस्टों की थी, जो 1921 से ही पूर्ण स्वराज्य की मांग उठा रहे थे, 1922 के गया कांग्रेस में कांग्रेस को मजदूर आन्दोलनों के प्रति अपना रूख करने की अपील कर रहे थे तथा एक मांग-पत्र भी प्रतिनिधियिों के बीच बांटे थे। दूसरी तरफ  युवा क्रान्तिकारियों का दल था, जिसकी विचारधारा, असहयोग की असफलता से, एक भिन्न दिशा में चली गयी थी और आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न थी।

असयोग आन्दोलन के प्रति राहुल जी का दृष्टिकोण: असहयोग आन्दोलन में हिन्दू-मुस्लिम एकता का जो आधार गांधी ने बनाया था, वह एक धार्मिक आन्दोलन- खिलाफत को एक धर्मनिरपेक्ष आन्दोलन भारतीय राष्ट्रीयता संग्राम - के साथ जोड़ता था। साम्प्रदायिकता समस्या के ऐसे निदान के प्रति राहुल जी का चिंतन हमेशा आशंकित रहा, वे इसे कोई  समाधान नहीं मानते थे। धार्मिक समस्याओं के प्रति ऐसे रूख को हालांकि राहुल जी स्वीकार नहीं करते, परन्तु राष्ट्रीय चेतना के उत्थान में इसके क्षणिक योगदान से वे प्रभावित जरूर हुए थे।

छपरा जिला कांग्रेस कमिटी के मंत्री 1923 में बनने के बाद राहुल जी का राजनीतिक जीवन प्राय: इस प्रयास में रहा कि असहयोग आन्दोलन की बेशर्त वापसी से उत्पन्न निरूत्साह को कैसे समाप्त कर पुन: जन-आवाम को राजनीतिक क्रियाकलापों के प्रति अग्रसर किया जाय। इसके लिए मूल समस्या, जो राहुल जी के सामने थी, वह थी स्वतंत्रता संग्राम के प्रति मूल उद्देश्यों की स्पष्ट समझ। बक्सर जेल का अनुभव बताता था कि आन्दोलनकारी मात्र भावात्मक ढंग से राष्ट्रीयता के नाम पर आन्दोलन से संबद्ध हैं, किसी सुनिश्चित उद्देश्य की कमी उनमें है। उन्होंने लिखा है, साथी सिर्फ  राष्ट्रीयता के नाम पर राजनीतिक स्वतंत्रता के लिये क्रान्ति चाहते हैं। गोलमोल स्वतंत्रता में न सफलता होगी और न उससे काम चलेगा। देश की धनिक श्रेणी और देशी राजा लोग सत्तावन में भी स्वतंत्रता के बाधक हुए थे, और अब तो और बाधक होंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि यह स्वतंत्रता साधारण जनता के बल पर प्राप्त की जाने वाली है, और उसमें साधारण जन-स्वार्थ का ख्याल सबसे अधिक रखा जायेगा। इसलिए अच्छा है कि हमारा राजनीतिक आन्दोलन अर्थनीति पर अवलंबित हो, और हजार में नौ सौ नब्बे शोषित जनता के लिये हमें लडऩा चाहिये।

वे स्पष्ट करते हैं, ''सभी वर्गों की एकता को मैं भी समझता हूं, लेकिन यह संभव नहीं। राजा-महाराजाओं और धनिकों का स्वार्थ वही नहीं है जो कि साधारण जनता का। लेकिन, अपनी प्रजा की इज्जत, धन और प्राण के साथ वे खुले खेल सकते हैं। रियासती की सारी आमदनी और दस साल कर्ज लेकर भी फूंक सकते हैं। वे प्रजा की गाढ़ी कमाई को सालों-साल यूरोप के नफीस होटलों में वेश्याओं और शराब के लिए पानी की तरह बहा सकते हैं। रेजिडेन्ट और ब्रिटिश गर्वनर इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता महसूस नहीं करते। जनता की बात मानी जाने पर रंगीले राजा ऐसी वाजिदअलीशाही कर सकेंगे? इसलिये आप निश्चय ही देशी रियासतों के शासकों से एकता की आशा नहीं रख सकते। यही बात कलक्टर के इशारे पर अमन-सभाओं में नाचने वाले जमींदारों, राजाओं और नबावों के बारे में भी समझिये।‘’

खिलाफत के प्रश्न पर राहुल जी के विचार: हालांकि 1916 के लखनऊ पैक्ट के बाद कांग्रेस-लीग एकता बनी थी, परन्तु राष्ट्रीय आन्दोलन में साम्प्रदायिक सद्भाव को पूरा करने के लिए गांधी ने जिस तरह खिलाफत आन्दोलन के साथ राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का एकाकार किया, उसे राहुल जी समस्या का समाधान नहीं मानते थे। उन्होंने इसके सम्बन्ध में अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा, खिलाफत के धार्मिक सवाल को सामने रखकर हमने मुसलमानों को अपनी तरफ  खींचना चाहा। खिलाफत को कमालपाशा ने बासफोरस में डुबो दिया, और हमारे यहां सिर्फ  कुछ मौलवियों के महत्व और धार्मिक कट्टरता के बढ़ा देने के सिवा वह आन्दोलन टांय-टांय फिस रहा। अब हमारे शासक कान ऐंठकर मुसलमानों को कितना तैयार कर चुके हैं, यह तुम अपनी आंखों देख रहे हो। यदि हमने धर्म को हटाकर शुद्ध राजनैतिक और आर्थिक प्रश्न सामने रखा होता, तो यह अवस्था न हुई होती, चाहे उतनी संख्या में मुसलमान आन्दोलन में शामिल न भी होते, लेकिन जो होते, वे समझ-बूझ कर होते।‘’

राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की एक बड़ी समस्या थी - बिहार में जांत-पांत की राजनीति। मगर असहयोग आन्दोलन में विकसित राजनीतिक चेतना ने इस पर जो प्रहार किया था, राहुल जी उसका स्वागत करते हैं, मगर उनकी दृष्टि में यह प्रक्रिया काफी धीमी है। वे लिखते हैं, ये बातें अभी छिट-पुट देखी जा रही हैं, और हिन्दू भोजनालय भी उसी समय पहले-पहल जहां-तहां खड़े होने लगे। आज उन्हीं का प्रताप है कि आज खाने में कोई परहेज नहीं। इसी तरह यह जांत-पांत का तोडऩा भी जो बीसवीं शताब्दी के उतराद्र्ध के आरम्भ होने के साथ हुआ था, वह अगले 25-30 वर्षों में ही इतना बढ़ जायेगा कि हजारों वर्षों की वज्र-सी मजबूत समझी जाने वाली दीवारें ढह के रहेंगी। बूढ़े नौजवानों के रास्ते में रोड़ा न अटका व्यर्थ का अपयश सिर पर न उठायें।‘’

 राष्ट्रीय संग्राम में धर्म की प्रतिगामी भूमिका का सिंहावलोकन उस समस्या के प्रति राहुल जी के दृष्टिकोण का प्रतिपादन करता है जिसने आजादी की लड़ाई में जनशक्ति को बांटने का काम किया। खिलाफत जैसे धार्मिक आन्दोलन को राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के साथ एकाकार कर देने से तत्काल भले ही साम्प्रदायिक एकता बन गयी हो, मगर इसके दूरगामी परिणाम संभवत: अच्छे नहीं हुए। आगे की साम्प्रदायिक समस्याओं को मदद देने में ऐसे आन्दोलनों की भूमिका अपेक्षाकृत ज्यादा रही। आज वर्तमान भारत में धर्म के नाम पर हो रहे खून-खराबे तथा साम्प्रदायिक तनाव की पृष्ठभूमि में ऐसे ही विचारों का आधार काम कर रहा है। राहुल जी ने बहुत पहले ही धर्म के इन विभेदकारी प्रवृत्तियों पर प्रहार किया था। अपने प्रसिद्ध लेख ''तुम्हारे धर्म की क्षय’’ में राहुल जी ने लिखा है कि ''हिन्दू और मुसलमान के फर्क-फर्क धर्म रखने के कारण क्या उनकी अलग जाति हो जाती है, जिनके नसों में उन्हीं के पूर्वजों का खून बह रहा है, जो इसी देश में पैदा हुए और पले, फिर दाढ़ी और चोटियां, पूरब और पश्चिम की नावाज क्या उन्हें अलग कौम साबित कर सकती हैं, क्या खून पानी से गाढ़ा नहीं होता, फिर हिन्दू और मुसलमान से बनी इस अलग-अलग जातियों को हिन्दुस्तान से बाहर कौन शिकार करता है? जापान में जाइए या जर्मनी, ईरान जाइए या तुर्की - हमें हिन्दी और इन्डियन कहकर पुकारा जाता है।

धर्मों की जड़ में कुल्हाड़ा लग गया है और इसलिये अब मजहबों के मेल-मिलाप की भी बातें कभी-कभी सुनने में आती हैं। लेकिन क्या यह संभव है? ''मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ - इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना। अगर मजहब बैर नहीं सिखाता तो चोटी-दाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमारा मुल्क पामाल क्यों है? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिये, आज भी हिन्दुस्तान के शहरों और गांवों में एक मजहब वालों को दूसरे मजहब वालों के खून का प्यासा कौन बना रहा है? असल बात यह है - मजहब ही तो सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को है सिखाता भाई का खून पीना। हिन्दुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी। बल्कि मजहबों की चिता पर। कौए को धोकर हंस नहीं बनाया नहीं जा सकता। कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसका, मौत को छोड़कर, कोई इलाज नहीं। एक तरफ  तो वे मजहब एक दूसरे के इतने जबर्दस्त खून के प्यासे हैं। उनमें से हर एक-एक दूसरे के खिलाफ  शिक्षा देता है। कपड़े-लत्ते, खाने-पीने, बोली-बानी, रीति-रिवाज में हर एक-दूसरे से उल्टा रास्ता लेता है। लेकिन जहां गरीबों को चूसने और धनियों की स्वार्थ-रक्षा का प्रश्न आ जाता है, तो दोनों एक बोली बोलते हैं।

असहयोग आन्दोलन से आगे के वर्षों में राहुल जी: सन् 1923 से 1925 की दूसरी जेल-यात्रा के बाद हजारीबाग जेल से 1925 में दो वर्ष की सजा काट कर रिहा होने के बाद 1926 की कानपुर कांग्रेस महाधिवेशन में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के सदस्य निर्वाचित होने के बाद उनकी यात्रा का एक और चरण आरम्भ हुआ, जिसमें लेह-लद्दाख होते हुए उन्होंने पश्चिमी तिब्बत की यात्रा की। इसके बाद 1926 में हुए गौहाटी कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए। सन् 1930 के सिविल नाफरमानी आन्दोलन की मूल समस्या के रूप में राहुल जी पुन: मध्यमवर्गीय बुद्धिवादियों की ढुलमुल समझ को रखते हैं, जो या तो नमक-सत्याग्रह को अप्रभावकारी आन्दोलन समझते हैं, या ब्रिटिश-पक्षीय बुद्धिजीवियों के भय से, क्योंकि ऐसे लोगों की पहुंच उच्च सरकारी मुलाजिमों तक है, चुप रहते हैं। दूसरी तरफ  ग्रामीण गरीबों का, वह समूह है जो अपनी तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए भी उत्साहपूर्वक सत्याग्रह में भाग ले रहा है। राहुल जी गरीब किसानों-मजदूरों की आजादी के प्रति प्रतिबद्धता तथा उच्च वर्गों के साम्राज्यवाद-पक्षीय या निष्क्रियता का उदाहरण देते हुए वर्ग-स्वार्थों के आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की मिशाल पेश करते हैं, ''जनता का उत्साह मंद नहीं हो रहा है। जुर्माने की सजा में घर की चीजों को उठते देखकर बच्चे- बच्ची का ख्याल कर लोगों को कुछ दु:ख जरूर होता है, लेकिन जेल का डर तो उनके दिल से बिल्कुल निकल गया था। अमन-सभा वाले खूब दौड़-धूप कर रहे थे। चौकीदारों, दफादारों को जमा करके वे अंग्रेजी राज्य को बरक्त और देश में अमन-चैन पर व्याख्यान झाड़ते थे। उनको पूरा विश्वास था कि जिस प्रकार पिछला असहयोग आन्दोलन असफल रहा, यह सत्याग्रह उससे भी बुरी तरह असफल होकर रहेगा।‘’

उग्र वामपंथी, जो सत्याग्रह, चरखा, सिविल नाफरमानी जैसे कार्यक्रमों को मिथ्या समझते थे और दूसरी ओर ब्रिटिश साम्राज्यपक्षीय, जो अंग्रेजों के प्रति भक्ति भाव रखते हुए यह समझते थे कि अंग्रेज भारत को शिक्षित कर रहे थे, दोनों ही को चिंतन के स्तर पर राहुल जी गलत समझते थे। हालांकि राहुल जी का दृष्टिकोण पूर्णत: गांधीवादी नहीं था, फिर भी गांधीवादी उन नीतियों में, जिनमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ  संघर्ष का उचित तरीका निहित था, उनकी आस्था थी। गांधीवाद के प्रति उनका दृष्टिकोण रचनात्मक विरोध का था, अंध-विरोध का अंधभक्ति का नहीं। अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए राहुल जी कहते हैं, चरखे से स्वराज्य पर सचमुच ही मुझे विश्वास न था। लेकिन हम अंग्रेजी माल के बहिष्कार को राजनैतिक हथियार समझते थे। वस्तुत: हिन्दुस्तान पर अंग्रेज बनियों का राज है। बनिये की पॉकेट पर जब तक हाथ नहीं डाला जाता, तब तक वह होश में नहीं आता। उसका सबसे कोमल और कमजोर अंग जेब है। नमक से स्वराज्य मैं नहीं मानता, लेकिन कानून तोड़कर ही हम ब्रिटिश सरकार को चुनौती दे सकते हैं।‘’

गांधी-इरविन समझौता के बाद सत्याग्रह समाप्त होने पर देश की राजनीति में जो नया वर्ग संतुलन प्रकट हुआ, उसमें पता लगा कि जमींदारों ने जितना खुलकर अंग्रेजों की सहायता की थी, उससे राष्ट्र-कर्मियों की आंखे खुल गयी थी और एक तरह से मालूम होता था कि देशभक्ति और देशद्रोह धनिक, खासकर जमींदार, और निर्धन श्रेणियों में बांट दिये गये हैं। इरविन की मीठी-मीठी बातों और धर्मानुराग को देखकर गांधी जी ने समझा कि इंग्लैंड का हृदय परिवर्तन हो गया। शायद, उनके ऐसा समझने में विलायत की मजदूर-सरकार का ख्याल काम कर रहा था, लेकिन इसका पता तो तभी लग गया, जबकि गांधी जी की हजार मिन्नतों के बाद भी भगत सिंह के लिए प्राण-भिक्षा मंजूर न हुई। इस नये अनुभव ने राहुल जी के सामने एक नई समस्या को प्रस्तुत किया, जिसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद ही नहीं, बल्कि उसके समर्थक जमींदार वर्ग के खिलाफ आन्दोलन अपरिहार्य बन गया।

किसानों की समस्या और स्वराज्य के प्रति राहुल जी दृष्टि : असहयोग और सिविल नाफरमानी के आन्दोलनों में अपना योगदान देते समय राहुल जी की दृष्टि माक्र्सवाद या सर्वहारा क्रान्ति के वशीभूत भले ही न रही हो, मगर उनकी एक हार्दिक पीड़ा जरूर रही थी कि किसानों और मजदूरों के कष्टों का निवारण तो होना ही चाहिये। उन्हीं के शब्दों में असहयोग के समय भी मैं जिस स्वराज्य की कल्पना करता था, वह काले सेठों और बाबुओं का राज नहीं था, वह राज था किसानों और मजदूरों का, क्योंकि तभी गरीबी और अपमान से जनता मुक्त हो सकती थी। अब तो देश-विदेश देखने के बाद और भी पीड़ा का अनुभव करता था। मैंने भारत जैसी गरीबी कहीं नहीं  देखी। माक्र्सवाद के अध्ययन ने मुझे बतला दिया कि क्रान्ति करने वाले हाथ हैं, यही मजदूर किसान क्योंकि उन्हीं को सारी यातनायें सहनी पड़ती हैं, और उन्हीं के पास लड़ाई में हारने के लिए सम्पत्ति नहीं है। लेकिन यह सब करते हुए जब तक वह अपना संगठन तैयार नहीं करते, तब तक क्रान्ति करने की शक्ति उनमें नहीं आ सकती। उनका संगठन भी तभी मजबूत हो सकता है, जबकि अपने रोज-ब-रोज के कष्टों को हटाने के लिए वह संघर्ष करें। उनके इस संघर्ष के संचालन के लिए कोई सेना-संचालक मंडली होनी चाहिए, जिसके सदस्य दूरदर्शी हों, अंतिम त्याग के लिए तैयार हों और जिनको कोई प्रलोभन अपनी ओर खींच न सके। रूस में मजदूर किसानों की क्रान्ति इसीलिए सफल हुई कि वहां बोल्शेविक पार्टी- कम्युनिस्ट पार्टी मजदूरों-किसानों के संघर्ष का संचालन कर रही थी।

किसानों की स्थिति की जानकारी के लिए 2 नवम्बर, 1938 तक सारण जिला के महराजगंज, अतरसन, एकमा, वरेजा, मांझी आदि गांवों में घूमते हुए राहुल जी बनारस और प्रयाग भी गये, मगर हर जगह राजनीतिक स्थिति का जायजा लेते रहे। 24 नवम्बर, 1938 को डालमियानगर के मजदूरों की स्थिति का जायजा लेकर वे 4 दिसम्बर को दरभंगा के ओइनी गांव में हो रहे बिहार प्रदेश किसान सभा के सम्मेलन में भाषण किये। उनके इस भाषण का एक सुफल यह हुआ कि जैसा राहुल जी लिखते हैं कि किसानों की जय का नारा जिन लोगों ने लगाकर किसानों से वोट लिये, वहीं कांग्रेसी मंत्रिमंडल में पहुंचकर अब कोई बात करने से जमींदारों की तकलीफों पर लेक्चर देने लगते हैं।

24 फरवरी, 1939 को अमवारी में किसानों के संघर्ष का नेतृत्व करते हुए राहुल जी का जमींदार के गुंडे द्वारा लगी लाठी से सिर फूटा और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अपने इस सत्याग्रह के अनुभवों का वर्णन करते हुए राहुल जी ने जिन राजनीतिक परिवर्तनों को दर्शाया है, उनमें प्रमुख हैं जाति-गुहार के नारों का बेअसर हो जाना, कांग्रेसी राज में भी पुलिस स्वेच्छारिता तथा कांग्रेसी राज का किसानों के प्रति रूख आदि। वे लिखते हैं  लठधरों में से कुछ को तो जमींदार ने भाड़े पर बुलाया था, कुछ आदमी आसपास के दूसरे जमींदारों ने दिये थे, और कुछ को समझाया गया था कि कुर्मी एक राजपूत माई की इज्जत बिगाड़ रहे हैं, जाति-गुहार में शामिल होना चाहिए। लेकिन पिछला प्रोपैगण्डा जान पड़ता है, सफल नहीं हुआ क्योंकि सवेरे के चार-पांच सौ लठधरों में बहुत से खेत पर नहीं आये थे। यद्यपि अमवारी में पचासों सशस्त्र पुलिस आ गयी थी, लेकिन इंस्पेक्टर ने उन्हें 3 फलांग दूर ही एक बाग में रोक रखा था। खेत पर सिर्फ दो दानेदार, एक सिपाही और दो चौकीदार आये थे। इंस्पेक्टर को अच्छी तरह मालूम था कि जमींदार खून करने को तैयार हैं, फिर भी हाथियों और लठधरों का खेत पर जमा होने देना और सिपाहियों को न भेजना - इसका क्या अभिप्राय था, वह बिल्कुल स्पष्ट था। हमारे खेत पर पहुंचते ही जमींदार के दो व्यक्ति लठैतों को लाठी चलाने के उकसा रहे थे, लेकिन कोई आगे बढऩा नहीं चाहता था। शायद मेरे शरीर पर जो पीले कपड़े थे, उसकी वजह से उनको हाथ छोडऩे की हिम्मत नहीं पड़ती थी, अथवा वह समझते थे कि यहां लाठी चलाने वाला कोई नहीं है। ग्यारह निहत्थे आदमी हाथ में हंसिया लेकर ऊख काटने आये। मैंने दो ऊख काटी, थानेदार ने मुझे गिरफ्तार कर लिया। इसी तरह बाकी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। मैंने सिर पीछे की ओर किया, देखा- जमींदार का हाथीवान कुरबान हाथी से उतरा। मैंने दूसरी ओर मुंह घुमाया, उसी वक्त खोपड़ी के बाएं ओर जोर की लाठी लगी। मुझे कोई दर्द नहीं मालूम हुआ, हां देखा कि सिर से खून बह रहा है। थानेदार ने दूसरी लाठी नहीं लगने दी। वहां से हमें डिप्टी मजिस्ट्रेट के कैम्प में लाया गया। थानेदार ने कुरबान को गिरफ्तार कर लिया था, किन्तु जमींदार के कहने पर इंसपेक्टर ने उसे छोड़ दिया। उस दिन 52 आदमी गिरफ्तार हुए, लेकिन पुलिस ने 28 को छोड़ दिया। शाम के वक्त 15 आदमियों को मोटर में भरकर सीवान के लिए रवाना किया। रास्ते में पेशाब करने के लिए गाड़ी को ठहरने के लिए कहा गया, लेकिन पुलिस ने मना कर दिया। पता लग गया कि डेढ़ साल के कांग्रेसी राज में हम कितने आगे बढ़े हैं।

       किसान आन्दोलन के प्रसंग में राहुल जी का एक बड़ा अनुभव किसानों के वर्ग-चरित्र में गहराई तक व्याप्त उस मनोवृत्ति का पता चला जो उन्हें एक सूत्र में बांधने के काम में आड़े आती है। शैक्षणिक स्तर पर कुछ आगे किसानों की मनोवृत्ति ठीक उसी तरह की थी, जो निम्न मध्यमवर्गीय लोगों में पायी जाती है, जो अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने का हमेशा प्रयास करता रहता है। ऐसी किसान-प्रवृत्ति राष्ट्रीय आंदोलन में किसान एकता को निर्मित कर सशक्त आंदोलन विकसित करने में बाधा बन जाती है। राहुल जी लिखते हैं, ''मैं सोचता था कि शिक्षित-अशिक्षित के साथ क्यों नहीं चल सकते। आखिर ग्यारह आदमियों को सैंतीस आदमियों से अलग रहने की जरूरत क्या? यह ठीक था कि जेल में बेकार रहना भी झगड़े का एक कारण है। मैंने 9 तारीख को डायरी में लिखा - ''शिक्षित साथी मुझसे बहुत नाराज हैं। कारण यही है कि मैंने अशिक्षित साथियों को दबाया क्यों नहीं। लेकिन शिक्षितों का अशिक्षितों के साथ रहना क्या असंभव है ? कुछ कठिनाइयां जरूर हैं। सबसे बढ़कर बात यह है कि शिक्षित स्वयं एक अलग ही श्रेणी बन जाते हैं।‘’ हमारे शिक्षितों का व्यवहार अधिक बुद्धिपूर्वक था, किन्तु वे गलतफहमियों को कटा नहीं सकते थे। 18 अप्रैल की डायरी में लिखा था, ''शिक्षित क्यों साधारण जनता के विश्वास पात्र नहीं होते, आखिर वह भी तो उसी में से हैं ? वह उनकी परवाह नहीं करते है।‘’ अगले दिन लिखा था - नेतृत्व की ईष्र्या ही झगड़े का प्रधान कारण होती रही है। मैं यह नहीं कहता कि अशिक्षित किसानों का कोई दोष नहीं था, लेकिन 24 घंटे साथ रहने पर आदमी नंगा हो जाता है, इसलिए तो प्रताप के रौब गांठने का प्रयत्न व्यर्थ है, इस बात को हमारे शिक्षित मानने के लिए तैयार नहीं थे। छितौली के सत्याग्रह के बाद राहुल जी पुन: जेल गये। किसान आन्दोलन और लेखन का कार्य साथ-साथ चलता रहा।

राष्ट्रीय आन्दोलन में भाषा की समस्या और राहुल जी: राष्ट्रभाषा के सवाल पर हिन्दी-उर्दू और हिन्दुस्तानी की बहस कांग्रेस के कानपुर महाधिवेशन (1925) में काफी जोर पकड़ ली थी। चूंकि प्रगतिशील आंदोलन भारत की सभी भाषाओं में रचे जा रहे साहित्य की नई धारा थी और उसमें हिन्दी और उर्दू के लेखक एक साथ शामिल थे, इसलिए भाषा-विवाद का प्रगतिशील आन्दोलन पर तत्काल प्रभाव पडऩा स्वाभाविक था। एक साहित्यिक प्रश्न साम्प्रदायिक रंग में डूबने लगा। राहुल ने राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी का मजबूती से पक्ष लेकर मातृभाषाओं के विकास की वकालत की। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक स्तर की पढ़ाई-लिखाई मातृभाषाओं के माध्यम से हो। उन्होंने मातृभाषाओं पर हिन्दी के थोपे जाने का विरोध किया। क्षेत्रीय स्तर की मातृभाषाओं के विकास की हिमायत करते हुए वह भावुक हो उठते हैं-हिन्दी को हम अन्तरप्रांतीय भाषा मान ले सकते हैं, पर वह हमारी मातृभाषा नहीं है और उसे कभी किसी भी मातृभाषा को मारकर सूतना बनाने का अधिकार नहीं है। यहां स्पष्ट है कि राष्ट्रभाषा से उनका आशय भारतीय राष्ट्र-राज्य की एकल भाषा ही नहीं, राष्ट्रीय सम्पर्क या अन्तर्देशीय संवाद की भाषा का था। राष्ट्रभाषा के संदर्भ में राहुल जी के विचार बिल्कुल स्पष्ट थे। ''राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी का उसका वांछित हक दिलाने के उनके अपने तर्क थे - भारत की एकबद्धता के लिए एक राष्ट्रभाषा की आवश्यकता है, जिसका काम प्रांतीय भाषा का स्थान ग्रहण करना नहीं, बल्कि एक भाषी-भाषी प्रान्त का दूसरे भाषा-भाषी प्रान्त के साथ और प्रान्तों के साथ केन्द्र का सम्बन्ध जोड़ता है। हमारा हिन्दी के लिए आग्रह सिर्फ  इसीलिए है कि वह पहले से ही भारत के एक विशाल भाग में बोली जाती है।‘’ उन्हें हमेशा यह बात कचोटती रही कि हिन्दी बनाम अन्य भारतीय भाषाओं के अन्तर्विरोध के नाम पर अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा या राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा के ओहदे पर बरकरार रखने की कोशिश हो रही थी। राहुल जी ने उर्दू को जन-समाज से जोडऩे की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा - ''यहां दो शब्द उर्दू के बारे में भी में कह दूं। उर्दू हमारी भाषा है, हिन्दी की ही एक शैली है, जिसमें फारसी-अरबी के शब्द अधिक इस्तेमाल किये गये हैं। दूसरी भाषा और उसके बोलने वालों के घनिष्ठ सम्पर्क में आने पर शब्दों का ऐसा लेन-देन सभी देशों और कालों में हुआ है। शुद्ध देववाणी संस्कृत भी इससे बरी नहीं है। केन्द्र जैसे शब्द ग्रीक भाषा के हैं। आज यह कहने पर भी लोगों को आश्चर्य होता है। फारसी बोलने वाले तथा अरबी में अपने धर्म-ग्रंथों को पढऩे वाले जरा इस देश में शताब्दियों तक रहे और अन्त में लोगों में घुल-मिल गये तो फारसी- अरबी शब्दों का हमारी भाषा एक सीमा तक ही शब्दों को उधार ले सकती है। यह वहीं हो सकता है नब्बे प्रतिशत शब्द उधार हों और दस असली भाषा के। हम समझते हैं कि इसमें उर्दू वालों ने गलती की। जिसका परिणाम यह हुआ कि उसका समझना आम लोगों के बूते के बाहर की बात हो गयी। पर इसे तो हमारे भावी साहित्यिकारों को सोचना होगा।‘’ उन्होंने कहा, ''शिष्टाचार और किसी को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि हमें दिल से उर्दू की महान विभूतियों को अपना समझना होगा। अब तो सुझाव देने की जरूरत नहीं है। गालिब, वजीर, अकबर आदि की उर्दू कृतियां  नागरी अक्षरों में छप चुकी हैं और उन्हें हाथों-हाथ अपना रहे हैं।‘’ भाषाई प्रश्नों पर राहुल सांकृत्यायन और डॉ. राम विलास शर्मा जैसे लोगों में काफी मतभेद रहा, मगर जो एकता दोनों में हैं, वह है हिन्दी के सम्पर्क और राष्ट्र भाषा के स्वरूप के बारे में। लेकिन स्थानीय बोलियों और भाषाओं को लेकर राहुल जी के विचार कुछ ज्यादा ही आंचलिक आग्रह वाले थे। मैथिली, मगही, भोजपुरी, बुंदेलखंडी, मारवाड़ी और छत्तीसगढ़ आदि को उन्होंने भाषा का दर्जा देते हुए हिन्दी को समृद्ध बनाने में इन भाषाओं को उल्लेखनीय भूमिका का हवाला दिया है। 

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