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Wednesday 19 Sep 2018

नारी विमर्श और मीराकांत के नाटक

साहित्य समाज का दर्पण है। तत्कालीन समाज की विसंगतियाँ, प्रवृत्तियाँ, समस्याएँ आदि को समाहित करते हुए साहित्य आगे बढ़ता है। साहित्य की विविध विधाओं में नाटक का अलग स्थान है। नाटक युगीन संवेदनाओं का वाहक है। यह विधा दृश्य एवं श्रव्य जैसे द्वित्व गुण से संपन्न है। नाटक की सार्थकता तो रंगमंच से संपृक्त होने में है। समकालीन नाटककार इस तथ्य को दृष्टि में रखते हुए सार्थक नाट्य सृष्टि में जुड़े हुए हैं। वर्तमान युग उत्तराधुनिक युग है। इस युग में ऊब, संत्रास, पीड़ा, निराशा, संबंधों में दरार, हाशियों की दु:स्थिति आदि नकारात्मक वृत्तियाँ पनप रहे हैं। हाशिएकृत वर्ग के अंतर्गत स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक, पर्यावरण आदि आते हैं। इनकी दु:स्थिति एवं पीड़ाओं से उद्भुत संघर्ष एवं तनावपूर्ण स्थितियों को नाट्य विधा के जरिए अभिव्यक्ति देने की कोशिश वर्तमान नाटककार करते आ रहे हैं। साथ ही उनके समाधान ढूँढने की कोशिश भी वे करते हैं। प्राय: इन संघर्षों से ही विमर्श का उदय हुआ है। साहित्य में स्त्रीवादी चेतना, दलित चेतना, पारिस्थितिकी, मीडिया विमर्श को स्थान मिलने लगा। अस्सी के दशक का नया समाज और नए व्यक्ति एक दूसरे के पूरक हैं। इन उत्तराधुनिक विमर्शों को अपने नाट्य साहित्य का कथ्य बनानेवालों में मीराकांत का स्थान भी अग्रणी है।

       आज स्त्री विमर्श तो एक सशक्त साहित्यिक विमर्श है। सदियों से हाशिएकृत स्त्री अब चर्चा के केंद्र में आने लगी। पुरुष प्रधान प्रणाली का ह्यस उत्तराधुनिकता की पहचान है। नाटककार विचार प्रणाली से ज्यादा जीवन प्रणाली की ओर उन्मुख होने लगा। मीराकांत ने कुल तेरह नाटकों की रचना की है। आपके नाटक नेपथ्यराग और उत्तर प्रश्न के लिए साहित्य कला परिषद् दिल्ली से मोहन राकेश सम्मान मिला। सन् उन्नीस सौ अठावन में कश्मीर में जन्मी मीराकांत ने अपनी नाट्य साधना से हाशिएकृतों की पीड़ा को उकेरने का तीव्र प्रयास किया है। संघर्षशील नारी उनके साहित्य की धुरी है। प्रमुखत: उनके नाटक नेपथ्यराग, अंत हाजिर हो, उत्तर प्रश्न नारी चेतना से संपृक्त रचनाएँ हैं। इसमें नारी के युगीन प्रश्नों को प्रस्तुत किया है। इन नाटकों से यह बात स्पष्ट होती है कि किस तरह स्त्री का सांस्कृतिक संहार किया गया है। लेखिका स्त्री की सच्ची स्वतंत्रता का अर्थ खोजने के लिए तत्पर है। स्त्री मुक्ति और स्त्री सशक्तीकरण को अपने नाटकों में प्रतिस्थापित करती है। स्त्री के संवेगों, इच्छाओं, क्षमताओं और आकांक्षाओं को वे महत्व देती हंै। स्त्री को यह नहीं करना चाहिए, वह नहीं करना चाहिए आदि निषेधमूलक वक्तव्यों के स्थान पर स्त्री को यह भी करना चाहिए, ऐसी प्रतिस्थापना लेखिका करती है। लेखिका स्त्री को अपनी समस्याओं से जूझने की शक्ति दिलाती है। नारी चेतना से ओतप्रोत उनके नाटक पारंपरिक लीक से हटकर नारी की समानता और आर्थिक स्वतंत्रता से संबंधित प्रश्नों को उठाते हैं। लगभग दो दशक से वे निरंतर अपने नाटकों और अन्य रचनाओं के जरिए हाशिएकृत जनता की पीड़ा को नेपथ्य से मंच पर लाने के लिए सचेष्ट है।

       मीराकांत ने अपने नाटक नेपथ्यराग में अहंवादी पुरुष समाज में स्त्री की नियति को नए रूप से उभारा है। स्त्री की उन्नति पुरुष समाज देख भी नहीं सकता और सह भी नहीं सकता। इस नाटक की मुख्य नायिका खना है। उसके माध्यम से सदियों से स्त्री पर होनेवाले अत्याचार को प्रस्तुत किया है। नाटक में खना की ऐतिहासिक कहानी मेधा को उसकी माँ सुनाती है। मेधा एक आधुनिक युवती है। वह अपने कार्यालय सहकर्मियों के सहयोग न मिलने पर दुखी है। उसकी माँ उदाहरण के रूप में खना की कहानी सुनाती है। इस कहानी से उसे पता चलता है कि स्त्री-पुरुष संघर्ष की गाथा आज की नहीं बल्कि सदियों पुरानी है। इतिहास को आधार बनाकर यह नाटक लिखा गया है। खना ज्योतिषी बनना चाहती है। प्रत्येक नक्षत्र की गतिविधियाँ, प्रभाव आदि जानने के लिए वे उत्सुक रहती थी। अपने ससुर आचार्य वराहमिहिर के शिष्यत्व में वह एक बहुत बड़ी भविष्यवक्ता बन जाती है। ज्योतिष क्षेत्र में खना की अपूर्व विलक्षण प्रतिभा से राजा विक्रमादित्य प्रभावित होते हैं और अपनी सभा में नवरत्नों के साथ स्थान देना चाहा। एक स्त्री को नवरत्नों में शामिल करने के विचार से ये नवरत्न स्तंभित होते हैं। ये विद्वान्गण मानते हैं कि खना उसकी प्रतिभा से नहीं बल्कि वह अपने ससुर वराहमिहिर द्वारा बनाए ज्योतिषमती तेल को पीकर ऐसी बनी है। ऐसा कहकर उसकी विद्वता को गलत सिद्ध किया जाता है। स्त्री के बुद्धि तत्व के प्रति उन्हें नकार है। वे खना के व्यक्तित्व एवं उसकी वैचारिकता की हत्या करने में तुले हैं। खना की विलक्षण प्रतिभा को वे कुचलना चाहते हैं। यहाँ पुरुष की अहं की अभिव्यक्ति होती है। आचार्य वराहमिहिर भी पुरुष समाज के अंग बनकर उसकी उन्नति को स्वीकार नहीं कर पाते। उनका कहना है कि यदि स्त्री सभासद बने तो पहले उसकी जीभ काट ली जाए।

       स्त्री पुरुष संघर्ष ने खना की विलक्षण प्रतिभा को नेपथ्य में ही रखा, सामने नहीं आने दिया। खना को यहाँ प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया है। समाज की हर स्त्री की भावना खना के व्यक्तित्व से मुखरित होती है। खना अपने समय में अपनी तीक्ष्ण बुद्धि एवं वैचारिकता के कारण जिस यंत्रणा को झेलती है उसका परिदृश्य वर्तमान समाज में भी देख सकते हैं। सामंतवाद, पूँजीवाद, लिंगवाद, पुरुषवाद आदि ने स्त्री की इच्छाओं को कुचल डाला है। राजा के नवरत्नों में भी सामंतवादी एकाधिकार मौजूद हैं। स्त्री प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध किया गया। खना और मेधा के जरिए दो युगों में स्त्रियों की नियति को दर्शाने का प्रयास है। प्रत्येक युग की स्त्री को लेखिका ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देखा, परखा और समझा है। अपनी नियति को बदलने की इच्छा वाली स्त्री ही सही स्त्री शक्ति को निर्धारित करती है। पुरुष हित के लिए अपनी कामनाओं का त्याग करनेवाली स्त्री को भारतीय संस्कृति के अनुसार  देवी माना जाता है। मीराकांत इस नाटक में इसी संस्कृति एवं परंपरागत सोच को स्त्री संदर्भ में चुनौती देती है। अपने तनावग्रस्त जीवन से बाहर निकलने की प्रेरणा एवं शक्ति लेखिका अपने इस नाटक के जरिए दिलाती है।

       स्त्री विमर्श की ओर झुकनेवाले दूसरा नाटक है कंधे पर बैठा था शाप। नाटक में ऐतिहासिक आधार को ग्रहण किया है। नाटक समकालीन स्थितियों के संस्पर्श से आगे बढ़ता है। लेखिका ने अपनी कल्पना के जरिए चरित्रों का सामाजिक मनोविश्लेषणात्मक चित्रण प्रस्तुत किया है। इसमें कालिदास, कुमारदास, कामिनी, विद्योत्तमा जैसे पात्रों की मनोविश्लेषणात्मक स्थितियों को प्रकाश में लाया है। इस नाटक में उन परिस्थितियों पर टिप्पणी की है जो स्त्री को अपराध तक ले जाती है। संस्कृत साहित्य की महाविभूति कालिदास के जीवन की अधिकतर घटनाओं पर अनेक नाटक लिखे गए मगर उनके देहांत पर नाट्यमंच की यवनिका पटाक्षेप की अवस्था में ही है। बस इसी यवनिका को उठाने का प्रयास है यह नाटक। कालिदास की मृत्यु के साथ ही सिंहल देश के नरेश और महाकवि कुमारदास की मृत्यु भी होती है। दोनों की मृत्यु सिंहल देश में घटित होती है। इन दोनों महाकवियों के त्रासद अंत का उल्लेख सब कहीं मिलता है। मगर इस नाटक की नायिका कामिनी के त्रासद अंत का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता। कामिनी की उपेक्षा और इस एकपक्षीय विवरण को स्त्री विमर्श के परिप्रेक्ष्य में मीरा कांत उद्घाटित करती है। उसी प्रकार पुरुष के एकांगी निर्णय ने कालिदास की पत्नी विदुषी विद्योत्तमा की नियति को ही बदल डाला है।

       नाटक की कथा इस प्रकार आगे बढ़ती है। कालिदास के रघुवंशम् से प्रभावित होकर सिंहल नरेश कुमारदास ने जानकीहरण की रचना की और कालिदास ने उसकी मुक्तकंठ प्रशंसा की। इस महान् विभूति से मिलने के लिए कालिदास साधारण वेश में सिंहलदेश जाते हंै। वहाँ वे गणिका स्त्री कामिनी के यहाँ आश्रय लेते हैं। कामिनी कुमारदास की प्रेमिका थी। कुमारदास ने कामिनी के घर एक अधूरा श्लोक लिखकर टाँगा था। इस श्लोक को पूरा करनेवाले को अमूल्य उपहार प्रदान करने की घोषणा भी की। अगर कामिनी उसे पूरा कर दें तो कुमारदास उससे विवाह करेगा। कामिनी के प्रेम व विवाह के स्वप्न को स्वार्थ और लोभ कहकर टाला नहीं जा सकता। वास्तव में कामिनी अपने शापग्रस्त जीवन अर्थात् वेश्यावृत्ति से मुक्त होना चाहती थी। वह पतिव्रता होकर सम्मान के साथ जीना चाहती थी। लेकिन गणिका वर्ग इसके लिए अनुकूल न था। अत: परिस्थिति जन्य प्रेरणा से उसे एक कुकृत्य करना पड़ा। वह यह था कि जब कालिदास ने उस श्लोक को पूरा किया तो कामिनी उसे विष पिलाकर मार देती है। क्योंकि कहीं कालिदास उसके स्वप्नपूर्ति के लिए बाधक न बन जाएँ। लेकिन जब वह जान जाती है कि उसने कालिदास जैसे महान कवि को मार डाला तो आत्महत्या कर लेती है। कामिनी के प्रेम के विषय में मीराकांत लिखती हैं- कामिनी का कुमारदास की अद्र्धांगिनी बनने का स्वप्न राजप्रसाद के वैभव का लोभ कहकर नहीं टाला जा सकता। इस किंवदंती के पीछे नारी हृदय की सहज, मर्यादित प्रेम आकांक्षा सक्रिय है। समाज नारी हृदय की तड़प और आकुलता को नहीं समझते बल्कि कामिनी की राजवैभव प्राप्ति की इच्छा को प्रतिपादित करता है। यह नारी कामनाओं का घोर अपमान है।   

इस नाटक में एक और घटना समांतर रूप से चलती है। कालिदास और उसकी पत्नी विद्योत्तमा के संबंधों के माध्यम से स्त्री विमर्श का नया कोण उद्घाटित होता है। मूर्ख कालिदास के साथ विद्योत्तमा का विवाह पंडितों ने इसलिए निश्चित  किया क्योंकि विद्योत्तमा केवल स्त्री नहीं बल्कि विदुषी थी। अनमेल विवाह से पति पत्नी के रिश्ते टूट जाते हैं। ज्ञान, विज्ञान, राजनीति आदि क्षेत्रों में स्त्री को दूर रखने की प्रवृत्ति हमेशा रही है। विद्योत्तमा अपनी स्थिति यों स्पष्ट करती है-- ..मुझसे छल किया गया...एक ग्रामीण सरल मूढ़ व्यक्ति से काशी नरेश की विदुषी कन्या का विवाह कराकर उसे उपहास का पात्र बनाया गया।... कभी प्रतीत होता है कि यह छल मुझसे नहीं एक स्त्री से किया गया है जिसका अपराध था उसका बुद्धिमती होना..उसका वैदुष्य। हम सब के सामने एक प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या नारी केवल बुद्धि है या केवल देह? एक स्त्री को उसकी पूर्णता में नहीं देखी जाती है। स्त्री के वैचारिक तत्व और बुद्धि तत्व ही उसे पूर्ण स्त्री बनाते हैं। इस तथ्य को उजागर करते हुए मीरा कांत इस नाटक में स्त्री अस्तित्व एवं महत्व को प्रमुखता देती हैं।

मीरा कांत का अगला नाटक है अंत हाजिर हो। इसमें समाज में छिपे हुए सत्य को बेबाकी से सामने लाने की हिम्मत करती है। वर्तमान परिस्थितियाँ स्त्रियों के लिए असुरक्षा का माहौल पैदा कर रही है। यह समाज अबोध बच्चियाँ, किशोरियाँ, स्त्रियों सबके लिए खतरा बन रहा है। संवेदनाशून्य पुरुष कामवासना से दिग्भ्रमित होता है। परिवार के भीतर भी हम सुरक्षित नहीं। परिवार में बलात्कार के मामले इक्कीसवीं सदी की खोज नहीं। वर्तमान सचेत समाज के कारण यह बात जनता के सम्मुख अधिक उजागर होने लगी है। यदि बचपन में ही कोई लड़की यौन हिंसा का शिकार हो जाती है तो मानसिक रूप से वह तितर बितर हो जाती है। नाटक में शिल्पा की छोटी बहन ऐसी मानसिक पीड़ा सहती रहती है। समाज में पिता-पुत्री, माँ -बेटे के रिश्ते अत्यंत पवित्र एवं सुरक्षित हैं। मगर वतर्मान बाजारवादी समाज के प्रभाव से इस पवित्रता में कालिमा छाने लगी है। नाटक में चित्रित पिता एक प्राध्यापक है। नाटक में जो पिता है वह अशिक्षित, गँवार नहीं बल्कि प्राध्यापक हैं। पत्नी को सदा कोसता है कि वह एक बेटा पैदा नहीं कर पाई। पत्नी की मृत्यु के बाद अपनी पुत्रियों पर ही आसक्त होता है। उनका यौन शोषण करता है। नाटक में निरंतर छोटी लड़की  ही यौन शोषण का शिकार बनती है। शिल्पा कहती है - सुना था लताएँ पेड़ से आश्रय पाती हैं। पेड़ अपना सत्व देकर उनका सहारा बनता है। पर ऐसी अभागी लताएँ भी तो होती है जिन्हें आश्रय के नाम पर पेड़ निगल जाते हैं। अंत में वह आत्महत्या कर लेती है। हमें यह सोचना चाहिए कि क्या आत्महत्या ही इन सबका  समाधान है? स्त्रियों की समस्याएं पूरे समाज की समस्या है। नारी मुक्ति आंदोलन का प्रचार प्रसार सही अर्थों में करना चाहिए। मानवता से हीन ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की बड़ी आवश्यकता है। स्त्री विमर्श की अवधारणाओं में पारिवारिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अधिक बल देना चाहिए।

उत्तर प्रश्न नामक नाटक समाज की एक संतुलित व्यवस्था की कामना करता है। यह ऐसी व्यवस्था है जहाँ स्त्री अकेली नहीं, समस्त मानव मूल्यों से युक्त पुरुष उनके साथ है। यह नाटक कश्मीर की पहली महिला शासक यशोमती की कहानी है। उसका पति युद्ध में कृष्ण के सुदर्शन चक्र से मारा गया। जब राज्याधिकार यशोमती को मिला तब वह गर्भवती थी। पुत्र होने के बाद मंत्रीगणों ने उस प्रतिभावान नारी को अधिकार से हटाना चाहा। यशोमती जागरूक, सक्षम और आत्मगौरव से मंडित नारी है। वह दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ती है और कहती है कि पुत्र का राज्याभिषेक अभी नहीं होगा और तब तक पद का त्याग नहीं करेगी जब तक पुत्र स्त्री शक्ति की अभिव्यक्ति का पक्षधर न बने। आरक्षण के लिए संघर्षरत नारी का चित्रण मीरा कांत नाटक के जरिए प्रस्तुत करती है। इसमें स्त्री संघर्ष को आगे ले जाने के लिए पुरुषों की मानसिकता में बदलाव लाने की बात पर जोर दिया है।

 निष्कर्षत: मीरा कांत के स्त्री पात्र अपनी नियति को परिवर्तित करने के लिए संघर्षरत हंै। चरित्रों में जो तनाव उपस्थित होता है उसी से व्यक्ति में स्वातंत्र्य की भावना जागृत होती है। उत्तराधुनिकता से जन्मी परिस्थितियाँ नारी के लिए मुक्ति से अधिक बंधन बनने लगा। आज आवश्यकता है कि नारी के दर्द को महसूस करते हुए उसका उपचार किया जाए। नारी मुक्ति आंदोलन के प्रचार प्रसार को उसके सही अर्थों में करना चाहिए, न कि चुप्पी और मौन इसका समाधान है। परिवार के भीतर ही मानवता का पतन हो तो समाज की क्या स्थिति हो सकती है? स्त्री विमर्श की अवधारणाओं में पारिवारिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी बल देना चाहिए। मानवीय मूल्य युक्त समाज की उन्नति ही हमारा लक्ष्य है। पीड़ा से तड़प तड़पकर स्त्री के अंतर्मन से उद्भूत तीव्र विकार स्त्री को पुरुष से भी सशक्त बनाता है। पुरुष के अहं, ईगो आदि स्त्री के इस मनोविकार में दब जाते हैं। मीरा कांत का लक्ष्य है - स्त्री की इस मानसिक शक्ति को उजागर करना।