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Sunday 22 Sep 2019

पहाड़ों की सैर

शिमला-मनाली जाने का हमारा कार्यक्रम एकाएक ही बना। काश्मीर जाने की इच्छा थी किन्तु फोन पर जम्मू निवासी काश्मीरी कवि मित्र अग्निशेखर ने कहा- अभी वहां जाने की सोचिए भी नहीं। मुझे भी धरती के स्वर्ग में जाकर स्वर्गवासी होने का शौक नहीं, तो पहाड़ों की सैर का कार्यक्रम बनाया। वह सितम्बर का महीना था। मैंने शिमला निवासी लेखक मित्र हरनोट को फोन किया। उन्होंने सलाह दी कि अक्टूबर के शुरूआती दिन शिमला-मनाली घूमने का बढिय़ा समय है। तब तक एक स्वेटर भर की ठंड रहती है। इसके अलावा चमकीली धूप आपका स्वागत करेगी। उन्होंने अपनी सहज विनम्रता के साथ कहा- 'बाकी मैं तो हूं, आप निश्चिंत होकर आइए। हफ्तेभर का समय लेकर आएं। अपना रिजर्वेशन कराकर तुरंत सूचित करें। शिमला और मनाली दोनों ही स्थानों पर आपके रुकने के लिए मैं सही जगहों पर बुकिंग करवा दूंगा।' हरनोट हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग के महत्वपूर्ण पद से रिटायर हुए हैं। शिमला-मनाली जाने पर उनके प्रति लोगों का सम्मान भाव देखकर खुशी हुई। राजधानी ही नहीं दूरदराज के इलाकों तक लेखक और अधिकारी के रूप में वे पहचाने जाते हैं।

हमें शिरडी-कालका एक्सप्रेस में 1 अक्टूबर का आरक्षण मिला। 2 अक्टूबर दोपहर हम कालका स्टेशन पर उतरे जहां से हम टैक्सी करके शिमला के लिए रवाना हुए। स्टेशन पर ही टैक्सी ओनर यूनियन है जिसकी बाबत नेट पर ही यह सूचना पढ़ ली थी कि टैक्सी के रेट उसी के द्वारा तय किये जाते हैं। हमारे ड्राइवर (जो स्वयं टैक्सी मालिक थे) यूनियन से असंतुष्ट दिखे। यूनियन के नफे-नुकसान के बारे में ज्यादा बातें न करके मैंने अन्य बातों की ओर ध्यान दिया। ड्राइवर साहब से मेरी पहली जिज्ञासा थी कि इतनी अधिक धूल क्यों उड़ रही है?

ड्राइवर साहब ने सुस्पष्ट नाखुशी से कहा- 'रास्ते चौड़े किए जा रहे हैं सर।'

कालका-शिमला के बीच एक शहर के पास सड़क फोरलेन बनाई जा रही है। दूर तक धूल का गुबार फैला था। आगे मोड़ पर जाम लगा था। मालूम हुआ कि कभी-कभी तो यहां डेढ़-दो घंटे का जाम भी लग जाता है। यूं तो वन वे ट्रेफिक में भी ऐसी व्यवस्था संभव है कि आवागमन सुविधापूर्वक हो सके। ठहरी हुई टैक्सी से और आगे भी अपनी यात्रा में हिमालय के जख्म दिखलाई दिए। नए पर्वत (न्यू माउंटेन) के कटावों को धसकने से रोका नहीं जा सकता। विकास की बीमार अवधारणा वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और बुद्धिजीवियों की चिंता को पिछड़ापन कहने की मूर्खता करती है। वस्तुत: बड़ी कंपनियों के लाभ और साथ ही खुरचन से अपनी जेबें भरने का यह उपक्रम है। सत्ता की दानवी ताकत ने प्रकृति के वरदानों पर आक्रमण किया है। प्राचीनकाल से जिस पर्वतराज के सौन्दर्य पर देशवासी मुग्ध रहे हैं उसे व्यावसायिकता के दानवी पंजों ने काफी कुछ जकड़ लिया है।

अपनी यात्रा पर निकलने से पहले पर्यटन और पर्यटन व्यवसाय से संबंधित दो लेख पढ़े थे- Tourism at a cost ( Ranjita Biswas ) और Tourism and the Tourist's gaze ( Uma Ramchandran ) The Hitbada- 13 सितंबर 2017 के अंक में यह विवरण था कि कई शहरों के नागरिक अपने शहर पर पर्यटकों के भीषण दबाव से परेशान होकर Stop mass Tourism जैसे आंदोलन के द्वारा अंधाधुंध पर्यटन का विरोध कर रहे हैं। विदेशों और अपने देश के कई नगरों के नाम उसमें शामिल हैं। अभी जब अपना यात्रा संस्मरण लिख रहा हूं तब फेसबुक पर शिमला निवासियों का निवेदन आ रहा है कि कृपया अभी यहां न आएं क्योकि यहां पानी की भारी तकलीफ है। पढ़े हुए लेखों की बातो ंको मैंने दिमाग से झटक दिया। आखिर मैं भी तो उन्हीं सैलानियों में था जो हिमालय के अप्रतिम सौन्दर्य और पहाड़ों के आकर्षण में बंधकर यात्रा कर रहा था।

मात्र 88 किलोमीटर का रास्ता लगभग छ: घंटों में तय करके हम लगभग आठ बजे शिमला के टूरिस्ट होटल पहुंच गए। जहां हरनोट के सौजन्य से हमारा कमरा आरक्षित था। नहा-धोकर हरनोट जी को फोन किया तो कुछ देर बाद ही वे हमारे कमरे में उपस्थित हुए। शिमला घूमने का कार्यक्रम उनकी सलाह से फाइनल हुआ। उन्होंने अपने परिचित टैक्सी वाले को हमारे लिए तय किया। उसने टैक्सी ड्राइवर से दूसरे दिन सुबह 9 बजे आने के लिए कहा।

टैक्सी एकदम सही वक्त पर पहुंची और हम सैर को निकल पड़े। हमारा पहला पड़ाव था जाखू। यह एक ऊंचा स्थान है जहां देवी का मंदिर है। उसके परिसर से चारों तरफ का खूबसूरत नजारा दिखलाई देता है। लोगों का विश्वास है कि यह प्राचीन मंदिर है। यह देखना दिलचस्प है कि देवी मंदिर से कुछ ही नीचे समतल स्थान पर सिंदूरी रंग से रंगी हनुमान जी की विशाल प्रतिमा है। प्रतिमा 108 फुट ऊंची है। जिसमें डेढ़ करोड़ खर्च किए गए हैं। उस मूर्ति को लोग भक्तिभाव से कम, इस जिज्ञासा भाव से अधिक देखते हैं कि इसे अमिताभ बच्चन ने बनवाया है और इसकी स्थापना के अवसर पर अभिषेक बच्चन का आगमन हुआ था। जहां तक मूर्ति का प्रश्न है उसमें कोई कलात्मकता नहीं है। विशालता भर उसका आधार है। बड़ी मूर्ति के अनुपात में बड़े पुण्य की प्राप्ति का सूत्र उसकी संरचना का आधार है। वैसे भी इन दिनों ऊंचा ध्वज दण्ड, ऊंची इमारत, सबसे बड़ा आमलेट बनाने आदि का रिकार्ड स्थापित करने के सरकारी-गैर सरकारी प्रयासों का मौसम है। मूर्ति के चरणों पर बैठकर और हनुमान जी को कवर करके फोटो खिंचवाने और सेल्फी लेने में लोगों की खास रुचि दिखी। यह स्वाभाविक भी है। एक मजेदार बात यह है कि इस मंदिर परिसर के आसपास के बंदर पर्यटकों के चश्मे छीनने में पटु हैं। उनकी दक्षता ऐसी है कि वे कहां से और कैसे अपने पसंदीदा शिकार का चश्मा ले कर भाग खड़े होते हैं। टैक्सी ड्राइवर ने हमें पहले ही बता दिया अत: हमने अपने चश्मे पहले ही बैग में रख लिए थे। वरना शायद उन सज्जन जैसा हमारा हश्र होने की संभावना थी जो एक बंदर द्वारा अपना चश्मा छीने जाने के बाद भौंचक्के होकर उस बंदर को देख रहे थे जो कुछ दूर बैठकर चश्मे से खेल रहा था। हनुमान जी के उस साथी ने चश्मे का स्वयं उपयोग किया या नहीं, यह जानने के लिए हम नहीं रुके। आगे बढ़ लिए।

हमारे देश में अधिकांश शहरों के साथ कुछ मिथक जुड़े हैं। शिमला के विषय में कहा जाता है कि शिमला नाम श्यामली देवी के नाम पर पड़ा है। इसी तरह यदि किसी पर्यटन स्थल पर किसी फिल्म की शूटिंग हुई है तो वह स्थल विशेष हो जाता है। यदि शहर का संबंध किसी सेलीब्रिटी से जुड़ा है तब तो क्या कहना। शिमला के बारे में यह जरूर सूचना दी जाती है कि अभिनेता मोतीलाल, प्रीति जिंटा, अनुपम खेर, चित्रकार रामकुमार शिमला के हैं। इतना ही नहीं प्रसिद्ध लेखक रस्किन बांड, नीतू सिंह, प्रेम चोपड़ा, अमरीशपुरी, मीरा नायर ने यहां शिक्षा प्राप्त की थी। और तो और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जिया-उल-हक ने भी यहीं पढ़ाई की थी। इसी तरह पर्यटन स्थलों पर कुछ ऐसे स्थल होते हैं जिन्हें विशिष्ट माना जाता है, कुछ इस तरह कि लौटकर आप बतला सकें कि आपने उन स्थानों को देखा है। मसलन किसी अभिनेता का घर, गोल्फ क्लब, कोई खास रेस्तरां, मनोरंजन स्थल। ऐसे कुछ स्थान कुछ थोड़ा समय लेकर हमने भी देखे। हमारी रुचि को भांपकर हमारी टैक्सी ड्राइवर हमें मशोबरा नाम के स्थान पर ले गया जो हार्टीकल्चर और फारेस्ट्री का संस्थान है। संस्थान के सुंदर और शांत स्थान पर आप भीड़भाड़ से मुक्ति पाकर वृक्षाच्छादित घाटी का बेहद खूबसूरत नजारा देख सकते हैं। भवन के हरे-भरे लॉन और बगीचे के फूल आपके साथ होते हैं। कुछ देर वहां बेंच पर बैठकर घाटी का सौन्दर्य देखा। चमकीली धूप ने और आसमान पर कुछ सफेद टुकड़ों ने मनोरम दृश्य की रचना की। यहां चार-छ: पर्यटक आए जिनसे बातचीत का मज़ा लिया।

फिर हमने एक लंबा चक्कर लिया और ग्रीनवेली का रुख किया। यह शिमला का सर्वाधिक दर्शनीय स्थल है। यह एक व्यू प्वाइंट है जहां से मीलों गहरे उतरती घाटी दिखलाई देती है। पहाड़ों की ढाल पर चीर और देवदारू के घने जंगलों का हरापन आंखों को ठंडक पहुंचाते हैं। कैमरों, मूवी कैमरों और मोबाइल फोन के इस्तेमाल के लिए आदर्श स्थान। लोगों की खासी भीड़ यहां थी। इस स्थान से भी ऊपर एक और चढ़ाई है। नाम भूल रहा हूं शायद नाल डेरा। वहां से दृश्य और दूर तक देखा जा सकता है। लेकिन या तो आपके पैरों में क्षमता हो या आप घोड़े पर बैठकर जा सके। यह हमारे लिए संभव नहीं था। हमने उस स्थान को छोड़ा और एक रेस्टोरेंट में खाना खाया जहां की खिड़की से एक दूसरी घाटी का दृश्य दिखलाई देता था।

होटल लौटकर हमने आराम किया। शाम मॉल रोड के नाम की, जहां आशियाना रेस्टोरेंट में अपने कुछ साहित्यिक मित्रों के साथ हरनोट मिलने वाले थे। हमें मालूम था कि मॉल पर ठंड होगी। अत: पूरी आस्तीन के गर्म कपड़ों में सज कर पैदल ही रवाना हुए। मात्र पांच मिनट में हम मॉल तक ले जाने वाली लिफ्ट तक पहुंच गए। मॉल तक जाने की नई व्यवस्था में लिफ्ट नं. 1 से आधी ऊंचाई तक फिर लिफ्ट नं. 2 से पूरी ऊंचाई पर स्थित मॉल रोड पर पहुंचते हैं जहां बाजार गुलजार है। शिमला का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण और जनसंकुल स्थल है। लिफ्ट से जाने के लिए टिकट लिया। एक साथ दो लिफ्ट काम कर रहे थे और दोनों के लिए ही लंबी लाइनें थीं। मैं पत्नी के साथ यह चर्चा कर रहा था कि यहां तो लंबी प्रतीक्षा करनी होगी। तभी किसी ने कहा आप सीनियर सिटीजन हैं। लिफ्टमैन से बात करें। हम लाइन की बगल से होकर लिफ्टमैन तक पहुंचे। उसने पूरी भद्रता से हमें लाइन में सबसे आगे कर लिया। हमें आश्चर्य हुआ कि किसी ने भी एतराज नहीं किया। लोगों के इस सहयोग भाव ने प्रभावित किया। पहली लिफ्ट जहां रुकी वहां एक बाल्कनीनुमा पैसेज से होते हुए हम दूसरी लिफ्ट के टिकट काउंटर से टिकट लेकर ऊपर पहुंचे तो जैसे एक सजे-धजे मेले में पहुंच गए। तो यह था शिमला का सिरमौर। चौड़ी सड़क पर सजे बाजार में खासी चहल-पहल थी। बाजार में आगे बढऩे का मतलब है और भी हल्की चढ़ाई वाले रास्ते पर चलना।

कुछ दूर चलकर एक दुकान पर आशियाना रेस्टोरेंट के विषय में पूछा तो उसने सीधे आगे बढऩे के लिए कहा। हर सौ कदम पर हम पूछते गए और सभी ने कहा बस, जरा सी दूरी पर। आगे आपको एक चर्च दिखेगा, उसी के पास आशियाना है। खैर साहब, जितना हम चले वह हमारे लिए भारी था। अत: दाहिने तरफ चर्च दिखा जो उत्तर भारत का एक पुराने चर्च है। लगता है अंग्रेज मॉल घूमने और भगवान से मिलने का काम एक साथ निपटा लेते थे। आशियाना साफ-सुथरा और सुंदर रेस्टोरेट है। मॉल रोड की शान। हरनोट अपने सात-आठ मित्रों के साथ बहुत ही प्रेम से मिले। हरनोट की मित्र मंडली में विभिन्न क्षेत्र के लोग थे। सभी सज्जन और अनुरागी। उनमें एक रिटायर्ड आईएएस और एक टैक्सी कंपनी के मालिक। दोनों ही कवि। कॉफी का आनंद लेते हुए उनसे कविताएं सुनी। घंटेभर की गपशप रही। यह चर्चा भी हुई कि मनाली यात्रा में कौन-कौन से स्थान देखना चाहिए। सभी की अपनी-अपनी राय थी जो मेरे लिए मूल्यवान थी। हरनोट जी ने जिम्मेदारी ली कि यदि एक दिन बाद टूरिस्ट विभाग की बस मनाली जाने वाली होगी तो वे दूसरे दिन शाम को हमारे होटल में टिकट पहुंचा देंगे। लौटकर हम लोग अपने होटल के रेस्तरां में भोजन करके निश्चिंत निद्रा की गोद में चले गए।

आशियाना में टैक्सी कंपनी के जिन मालिक से भेंट हुई थी, दूसरी सुबह दस बजे उनकी कंपनी की टैक्सी हमारे लिए आ गई। उस दिन का हमारा प्रमुख आकर्षण था- 'सेंटर ऑफ एडवांस स्टडीÓ। हमारे देश के सामान्य नागरिकों की मानसिक धारा कुछ इस तरह मोड़ दी गई है कि अधिकतर पर्यटक मंदिर-मंदिर, बाबा-बाबा गाता जाए बंजारा की श्रेणी में शामिल हंै। गंभीर अध्ययन केन्द्रों और महत्वपूर्ण संग्रहालयों में उनकी रुचि उतनी नहीं है। उच्च शिक्षा केन्द्र हमारे देश का गौरव स्थल है इसके अलावा उस केन्द्र के साथ आधुनिक भारत के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना भी जुड़ी है। ब्रिटिश इंडिया में यह विशाल और सुंदर भवन वायसराय का ग्रीष्मकालीन आवास था। स्वतंत्र भारत में यह राष्ट्रपति के ग्रीष्मकालीन निवास स्थान के रूप में परिवर्तित किया गया। जब डॉ. राधाकृष्णन राष्ट्रपति बने तो सन् 1965 में इसे उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थान के रूप में बदल दिया। एक दार्शनिक शिक्षाविद् की कल्पना का यह मूर्तरूप है। अब इस खूबसूरत शांत स्थान पर विभिन्न विषयों के विद्वान शोध कार्य और सृजनात्मक कार्य करते हंै जिसके लिए उन्हें पूर्ण सुविधाएं और आकर्षक मानयदेय मिलता है। आधुनिक भारत की कई महत्वपूर्ण कृतियों का सृजन यहां रहकर विद्वानों ने किया है। गनीमत है कि अभी यहां सीताजी के टेस्ट-ट्यूब बेबी होने के प्रमाण स्वरूप जैसे शोध कार्य नहीं किए जाते हैं। हम लगभग ग्यारह बजे वहां पहुंचे। टैक्सी वाले ने हमें टिकट काउंटर दिखलाया और कहा- सर, आप जब वापस होने लगे तो मुझे रिंग कर दीजिए। यहां गाड़ी पार्क करना मना है। मैं कुछ नीचे रोड के किनारे गाड़ी लगा देता हूं। टिकट काउंटर पर बतलाया गया कि गाइड के साथ ही ग्रुप में भीतर जाने की अनुमति है। अभी एक ग्रुप जा ही रहा है आप उनके साथ हो लीजिए। इमारत के दायें पाश्र्व के बरामदे की ओर जाते हुए समूह में हम शामिल हो गए। उस भवन के कुछ कक्ष ही दर्शकों को दिखलाए जाते हैं। इन कक्षों को देखकर ही उस भवन की शानो शौकत का अनुमान पर्यटकों को हो जाता है। कक्षों की खिड़कियों, दरवाजों और छतों से लकड़ी की लाजवाब कारीगरी देखकर कारीगरों की दक्षता और श्रम को परखा जा सकता है। यह सूचना दी गई कि लकड़ी का सारा काम स्थानीय कारीगरों को ही सौंपा गया था।

आजादी के पूर्व से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत के वायसराय और राष्ट्रपतियों की यादें यहां सजाकर रखी गई है। विश्व के महान जनान्दोलन भारत के स्वाधीनता आंदोलन की विभिन्न घटनाओं में शामिल हमारे नेताओं की तस्वीरें तीन दशकों तक चलने वाली राजनैतिक हलचलों की गवाह है। केवल कांग्रेस नहीं उस दौर के सभी नेताओं के चित्र बहुत कुछ संकेत देते हैं कि कौन उस स्वाधीनता आंदोलन में शामिल थे और कौन उससे कतरा रहे थे। लाहौर में झंडा फहराने के लिए घोड़े पर बैठकर जाते हुए नेहरू का भव्य व्यक्तित्व, पटेल के साथ नेहरू की आत्मीयता आकृष्ट करती है। एक खूबसूरत हॉल के ग्लास पार्टीशन के उस पार संस्थान के कार्यालय और पुस्तकालय का कुछ हिस्सा दिखलाई देता है। उस समय भी कुछ शिक्षाविद् अपने काम में संंंलग्न दिखे। उन कक्षों को देखने के बाद हम बाहर आकर बगीचे की बेंच पर बैठकर भवन को सामने से, उसकी संरचना को कुछ देर देखते रहे फिर बगीचे का चक्कर काटकर भवन के दायें पाश्र्व की झलक देखकर वापस लौटे। हमने ड्राइवर साहब को फोन किया और वे गाड़ी लेकर ऊपर आ गए। हमारे पास काफी समय था। अत: हमने एक बार फिर मॉल घूमना तय किया। टैक्सी वाले ने हमें लिफ्ट तक पहुंचाया। उसे विदा करके हम फिर लिफ्ट से मॉल तक गए। थोड़ी चहलकदमी के बाद एक रेस्तरां में खाना खाकर हम वापस होटल आ गए।

शाम को हरनोट हमारे कमरे में आए। इन्होंने बतलाया कि पर्यटन विभाग की गाड़ी दूसरे दिन सुबह 10 बजे मनाली जाएगी, जिसकी दो टिकटें उन्होंने ले ली हैं। हमारी लाख कोशिशों के बाद भी उन्होंने पैसे नहीं लिए। यह उनका प्रेम था। शिमला मनाली की यात्रा उनकी ओर हमारे लिए गिफ्ट रही। हमारी बस समय पर रवाना हुई। मनाली पहुंचने में खासा वक्त लगा। हम शाम लगभग साढ़े सात बजे वहां पहुंचे। बस स्टैंड से लगी हुई मॉल रोड है जहां सौ कदम दूर ही टूरिस्ट होटल है। कुली ने हमें वहां पहुंचा दिया। रिसेप्शन पर मैंने जैसे ही अपना नाम बतलाया वे सज्जन बोले- 'आइए सर, हम आपका ही इंतजार कर रहे थे। हमारे अधिकारी ठाकुर साहब अब तक आपके विषय में तीन बार पूछ चुके हैं। आप कमरे में पहुंचकर फ्रेश हो लें। ठाकुर साहब का ऑफिस इस होटल से लगा हुआ है। वे वहां नौ बजे तक बैठते हैं।' मैं पन्द्रह बीस मिनट बाद ही टूरिस्ट होटल से लगे हुए भवन में ठाकुर साहब के सामने आया। सूट टाई में सजे अधेड़ उम्र के ठाकुर स्मार्ट व्यक्ति हैं। गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए उन्होंने पूछा- 'कोई तकलीफ तो नहीं हुई यात्रा में।' चाय पीते हुए हरनोट से अपनी मित्रता का जिक्र करते हुए उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि मनाली में मुझे कोई तकलीफ नहीं होने दी जाएगी। उनकी यह व्यावसायिक दक्षता थी कि उन्होंने फौरन शिमला फोन करके हरनोट को मेरे पहुंचने की सूचना दी और मेरी बात हरनोट से करवाई। हरनोट ने कहा- 'बस अब चिंता न करें। हां, अपने तीन दिन के प्रवास में आप नाग्गर जरूर जाइए। वह स्थान आपकी रुचियों के अनुकूल है।'

इस बीच ठाकुर साहब ने अपने सहयोगी से चर्चा करके दूसरे दिन के लिए हम लोगों की रोहतांग दर्रे की यात्रा का कार्यक्रम तय कर दिया था। मनाली जाने वाले पर्यटक की यात्रा अधूरी है यदि वह रोहतांग दर्रे तक नहीं गया। होटल, बाजार, मंदिर, पिकनिक स्थल तो हर जगह मिल जाएंगे। लेकिन रोहतांग दर्रा अकेला और अनोखा स्थान है। हर समय वहां जाना भी संभव नहीं है यह संयोग ही था कि पर्यटन विभाग की बस दूसरे दिन वहां जाने वाली थी। गाड़ी का जाना पर्यटकों की संख्या और मौसम के मिजाज पर निर्भर करता है। यह हमारा भाग्य ही था कि हमारे प्रवासकाल में मौसम मैत्रीपूर्ण रहा। रोहतांग यात्रा-वृत्त के पूर्व मनाली के विषय में कुछ कहना अप्रासंगिक न होगा। 15900 फुट की ऊंचाई पर कुल्लू जिले का यह हिल स्टेशन प्राचीन व्यापार मार्ग है। पौराणिक मान्यता के अनुसार मनु के नाम पर इस स्थान का नाम मनाली पड़ा। इसे सप्तर्षियों का घर भी माना गया है। ब्रिटिश राज में सेबों के बगीचों और ट्राउट मछली के शिकार के लिए इसका महत्व बढ़ा।

रोहतांग दर्रे की यात्रा के लिए आपको गर्म कपड़ों से लदकर जाना होता है। रास्ते में ऐसी दुकानें हैं जहां किराए में गर्म कपड़े मिल सकते हैं। ठाकुर साहब के निर्देशानुसार हमने गर्म कपड़ों का भरपूर इस्तेमाल किया। मैंने स्वेटर के ऊपर जर्किन और ऊनी कैप लिया और दीपा ने ऊनी ब्लाउज पर कार्डीगन और शाल अपने साथ लिया। तेरह हजार फुट से भी ऊपर की ठंडी हवा का मुकाबला जो करना था। बस स्टैण्ड से हमारी गाड़ी दस बजे रवाना हुई। हमारी बस में छ: सात ऐसे यात्री भी थे जो लगातार जोरजोर से बोल रहे थे और हंस रहे थे। उनमें सबसे ज्यादा हुल्लड़ मचाने की कोशिश दो अधेड़ व्यक्ति कर रहे थे जो सींग कटाकर बछड़े बने हुए थे। ऐसे लोग हर यात्रा में मिल जाते हैं जो भरपूर कोशिश कर यह दिखाते हैं कि वे टूरिस्ट हैं। हां जी टूरिस्ट। अत: बेहद खुश हैं। अति प्रसन्नता का ओवरडोज उन्हें विचित्र किन्तु सत्य के दायरे में नाचते विदूषक जैसा बना देता है। उनकी प्रसन्नता आत्मिक अनुभूति न होकर ध्यानाकर्षण की बचकाना हरकत बनकर रह जाता है। नगरीय इलाके और आसपास के गांवों को पीछे छोड़ते हुए जब गाड़ी और ऊंचाई पर पहुंचती है तो हिमालय का वैभव उसकी फैली हुई श्रृंखलाओं और विभिन्न शैल श्रृंगों के रूप में दिखलाई देता है। भारत की पूरी उत्तरी सीमा को घेरते हुए हिमालय को देखकर कवि कालिदास ने कल्पना की थी कि हिमालय ने अपनी विशाल बांहें को फैलाकर धरती को चूम लिया है। ताकि वह सागर की गहराई में विलुप्त न हो जाए। चमकीला दिन होने के बावजूद बाबा नागार्जुन की कविता बादल को घिरते देखा, याद आई। जब आप दस हजार फुट से भी अधिक ऊंचाई पर पहुंचते हैं, पर्वत शिखरों की चट्टानों को भेदकर झाग से भरे दूध जैसे पानी के झरने को देखते हैं। इन झरनों और पर्वत चोटियों के स्थानीय नाम भी होंगे। इन्हीं के आसपास गांव भी बसे होंगे जो एकाएक नजर नहीं आते। पता नहीं वहां तक विकास के ढोल-ढमाके पहुंचे या नहीं।

लगभग ग्यारह हजार फुट की ऊंचाई पर सड़क की दाहिनी ओर एक खूबसूरत झरना मिला। झरने के पानी को सड़क के नीचे दबे पाइप के द्वारा सैकड़ों फुट नीचे गिराया जा रहा है जो वैसे भी उसका प्राकृतिक रूप है। इस सुरम्य स्थान पर गाड़ी कुछ मिनटों के लिए रुकी। न वहां कोई रेस्तरां और न ही लोगों का मेला। सड़क से कुछ फुट दूर झरने की कल-कल, बायीं तरफ सैकड़ों फुट की घाटी और इसके उस पार बर्फ से ढंका एक पर्वत शिखर। पूछने पर मालूम हुआ कि वही रोहतांग दर्रा है। जहां तक पहुंचने के लिए पचासों मोड़ों को पार करते हुए हमारी बस को जाना है। हमारे साथ के खास टूरिस्ट झरने के आसपास आड़े-टेढ़े होकर अपनी असीम प्रसन्नता का प्रदर्शन कर रहे थे जिसे देखकर अन्य सहयात्री मुस्कुराए बिना न रह सके।

यूं तो किसी भी घाटी की चढ़ाई पर जब बस चढ़ती है तो भय लगता है लेकिन हजारों फुट की ऊंचाई पर चलती बस में हमें डर नहीं लगा। दरअसल आसपास का नजारा इतना अद्भुत था जिसे न देखना किसी अमूल्य वस्तु से आंखें फेरने की तरह है। घाटी की ढालों पर कभी कभार लंबे बालों वाली पहाड़ी बकरियां भी दिखीं। हम ज्यों-ज्यों ऊपर गए आसमान पर उड़ती चीलों से होड़ लेते हुए एडवेंचर प्रिय पैराग्लाडिंग करते हुए आकाशचारी कई साहसी दिखलाई दिये। हिमालय का वास्तविक 'बर्ड आई व्यू' उन्हें ही मिलता है। जब आप हिमालय की ऊंचाई पर होते हैं तो देश का सांस्कृतिक इतिहास नदियों, पर्वत श्रृंगों के माध्यम से आपको देश के दिल की धड़कन का अहसास कराता है। यह देशप्रेम का निर्मल रूप होता है। उस 'देश प्रेम' से भिन्न जो राजनीति प्रेरित नारों-हुंकारों के टुच्चेपन में पर्यवसित होता है। जो बात बात पर देशप्रेम और देशद्रोह जैसे शब्दों को अपने मतलब के लिए अस्त्र की तरह इस्तेमाल करता है। दुनिया की सबसे ऊंची चलती सड़क पर यात्रा करते हुए हमारी बस उस स्थान पर पहुंची जो हिमालय प्रदेश की अंतिम सीमा है। 13058 फुट की ऊंचाई पर हमारी बस रोकी गई। सड़क आगे लेह तक जाती है। जिस स्थान पर गाड़ी रुकी वहां से कुछ किलोमीटर दूर एक खूबसूरत लैंडस्केप की तरह बर्फ से ढंकी पर्वतमाला दिखलाई देती है। तो, यह है रोहतांग दर्रा! पौराणिक कथा के अनुसार भृगुतुंग पर्वत को शिवजी ने अपने त्रिशूल से काटकर रोहतांग दर्रा बनाया। विराट परिदृश्य की यह विराट कल्पना है।

जिस समतल जगह पर गाड़ी रोकी गई थी वहां पर्यटकों को बतलाया गया कि तीन बजे बस की वापसी होगी। यहां कोई भी रेस्टोरेंट वगैरह नहीं और दूर-दूर किसी प्राणी की उपस्थिति भी नहीं। तभी एक औरत थर्मस में चाय लेकर सैलानियों को बेचते दिखी। यह आकस्मिक प्रसन्नता थी और गजब की थी। हमने भी दो कप चाय ली और पूछा कि यहां तो कोई दुकान है नहीं। उन्होंने अपनी गाड़ी की तरफ इशारा करके कहा कि यहां तो स्थायी दुकान संभव नहीं है। वे सीजन में नीचे से थर्मसों में चाय भरकर लाती है। जो हाथों हाथ बिक जाती है। उस ऊंचाई पर कौवे के आकार के पक्षी दिख रहे थे जिनके शरीर का रंग भी कौवे जैसा ही था लेकिन उनकी चोंच लाल रंग की थी और पैर नारंगी रंग के थे। चाय वाली भद्र महिला से हमने पूछा कि यह कौन सा पक्षी है तो उसने कहा कौआ ही है। हमें यकीन तो नहीं हुआ लेकिन हम मान गए। सड़क से कुछ हटकर बड़ा बोर्ड और सीमेंट के स्तंभ पर बड़े अक्षरों में हिन्दी और अंग्रेजी में लिखा है- रोहतांग दर्रा, ऊंचाई 13058 फुट। उसी के सामने और आसपास पर्यटक एक फोटो जरूर खिंचवाते हैं। हमने भी अपने मोबाइल कैमरे का इस्तेमाल किया। सामने भृगुतंग के हिम आच्छादित शिखरों को देखते हुए हमारा मन नहीं भर रहा था। ठंडी हवा के मस्त झोंके थे। हम जैसे जैसे ऊपर आते गए थे पेड़ों ने हिमाचल की ऊंचाई से होड़ लेना बंद कर दिया था। वे अपनी औकात में आकर बौने होते गए थे और दर्रे तक आते-आते थक-हारकर नीचे ही विश्राम करने लगे। रोहतांग में कुछ छोटी झाडिय़ां और जमीन से लगी वनस्पतियां भर रह गई थी। शायद मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए, औषधियों का यह खजाना इस ऊंचाई पर उपस्थित है। कई बार ये खबरें आई हैं कि दुर्लभ वनस्पतियों का निर्यात भी गैरकानूनी ढंग से होता रहा है। इस ऊंचाई पर पर्वतराज अपनी पूरी कठोर सुन्दरता में है। पूर्णत: मौलिकता और अद्वितीयता का बोध कराते हुए। यहां के पत्थर कुछ चमक भरे हैं। कोई भूगर्भ शास्त्री बता सकता है कि किस खनिज के कारण ऐसा है। हमने कुछ छोटे पत्थर बीन लिए और जाकर गाड़ी में बैठ गए। तीन बजे हमारी यात्रा शुरू हुई।

लौटकर हमने थोड़ी देर आराम किया फिर मॉल पर चहलकदमी की और ठाकुर साहब से चर्चा करके नाग्गर जाने का कार्यक्रम बनाया। नाग्गर की यात्रा मन को प्रफुल्लित करने वाली थी। दूसरे दिन सुबह दस बजे हमारी यात्रा शुरू हुई। हमारा पहला पड़ाव था नाग्गर कैसल। यह कभी कुल्लू राजा का महल था। दरअसल नाग्गर कभी कुल्लू राज की राजधानी था। 1846 तक परवर्ती राजाओं का यह ग्रीष्मकालीन आवास हुआ करता था। अब यह हेरीटेज होटल के रूप में तब्दील कर दिया गया है। इसके शाही इतिहास से कहीं अधिक आकर्षक और महत्वपूर्ण है इसकी कलात्मकता। स्थानीयता वास्तु कला 'काष्ठकुणी' का यह बेजोड़ नमूना है। इसे तराशे गए पत्थरों और देवदार के लट्ठों से बनाया गया है। यहदेखकर आश्चर्य होता है कि इसमें कहीं भी किसी गारे का इस्तेमाल नहींहै, न सीमेंट का और न ही पुरानी पद्धति के गारे का। यह अनोखी वास्तुकला है अत: इसे राष्ट्रीय धरोहर में शामिल किया गया है। इसमें कमरे, बाल्कनी और खुले आंगन हंै। हर जगह लकड़ी की नक्काशी का चरम सौन्दर्य आश्चर्य में डालता है। बेशक यह मध्यकालीन बेजोड़ दुमंजली हवेली है। हर खिड़की और बाल्कनी से प्राकृतिक सुंदरता का नजारा दिखलाई देता है। विभिन्न ऋतुओं में ये घाटियां कैसी दिखती है यह कल्पना ही की जा सकती है।

कैसल के बाद रोरिक आर्ट गैलरी को देखकर भी सुखद अनुभव रहा। रूसी कलाकार निकोलस रोरिक का निवास स्थान एक रमणीक स्थान पर बना है जो अब रोरिक कला वीथिका के नाम से जाना जाता है। यह लकड़ी का बना हुआ दोमंजिला मकान है। चित्रकार, लेखक, पुरातत्वविद और दार्शनिक के रूप में ख्यात यायावर कलाकार निकोलस रोरिक ने चीन, तिब्बत, मलेशिया में भटकते हुए अंत: में कुल्लू राज्य के नाग्गर को अपना ठिकाना बनाया। रोरिक, उनकी पहली पत्नी हेलेना और पुत्र जार्ज तथा स्वेमोस्ताव, 1928 से 1947 तक यहां रहे। उन्होंने 'उरूस्वती हिमालयन रिसर्च सेंटर' बनाया जो आज भी काम कर रहा है। कुल्लू में रहकर रोरिक ने सैकड़ों चित्र बनाए। यह चित्र वीथिका भारतीय चित्रकला के एक पृष्ठ को खोलती है। एक छोटे फ्रेम में नेहरू का पोट्रेट है जो साहित्य और कला के पारखी थे और जिन्हें दुनिया अतुलनीय राजनीतिज्ञ मानती है। मकान की ऊपरी मंजिल पर एक फोटो है जिसमें रोरिक और उनके पुत्र के साथ नेहरू युवा इंदिरा के साथ खड़े हैं।

रोरिक के मकान की दूसरी मंजिल एक अन्य कहानी की याद दिलाती है। रोरिक की पत्नी की मृत्यु के बाद भारतीय फिल्मों की महान अभिनेत्री और फिल्म निर्मात्री देविका रानी ने उनसे विवाह किया। उनके पति हिमांशु राय का भी देहावसान हो चुका था। रोशन ख्याल देविका राय चौधरी उच्च शिक्षा प्राप्त महिला थी जिन्होंने इंग्लैंड में रहकर टेक्सटाइल डिजाइनर की पढ़ाई की थी। वापस लौटकर उन्होंने अपने पति के साथ बाम्बे टॉकीज स्टुडियो की स्थापना की। भारतीय सिनेमा में पहला चुंबन दृश्य उन्होंने दिया था और वे पहली स्टार एक्ट्रेस थीं। वे पहली कलाकार थीं जिन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला था। देविका ने 1945 में रोरिक से विवाह किया। रोरिक के शयन कक्ष और देविका रानी के ऑफिस के कमरे वैसे ही रखे गए हैं जैसे उनके समय में थे। बंद खिड़की, दरवाजों के कांच से उन्हें देखा जा सकता है। कई बार क्या इतिहास भी झिलमिलाता हुआ आधा अधूरा सा इसी तरह नहीं दिखलाई देता? जिसे अपनी कल्पना से भरना पड़ता है। 'आधी हकीकत आधा फसाना' जिसका सदुपयोग और दुरुपयोग किया जाता रहा है। बरामदे में लगे फोटोग्राफ्स को देखकर लगता है कि देविका रानी फिल्मों में जैसी खूबसूरत दिखलाई देती हैं उससे कहीं अधिक सुंदर थी।

रोरिक आवास के हरे भरे परिसर में आज आर्ट गैलरी, रिसर्च सेंटर और हिमाचल प्रदेश की लोक कलाओं के केन्द्र हैं। रोरिक आवास के पास ही त्रिपुर सुंदरी का प्राचीन मंदिर है जिसमें मुख्य काम लड़की की नक्काशी का है। इस यात्रा के दौरान हमने हिमाचल क्षेत्र के लोक गीतों का मजा भी लिया। हमारे ड्राइवर सुनील ने हमसे टेप रिकार्डर चलाने की अनुमति मांगी थी। हमने कहा कि यहां के लोक गीत सुना सको तो बेहतर। रास्तेभर हम गीत सुनते आए। पहाड़ की धुनों का इस्तेमाल हमारी फिल्मों में खूब हुआ है। जब परिचित धुन का गीत बजता तो उससे मिलती-जुलती धुन पर आधारित हिन्दी फिल्म का गीत गाकर हम सुनाते और ड्राइवर सुनील खुश होकर हंसते। सुनील से हमने पूछा कि शिमला और मनाली में गाडिय़ों को बगल से निकालने, जाम लगने पर हमने ड्राइवरों को झगड़ते नहीं देखा। सुनील का उत्तर था- सर, यदि हम एक-दूसरे का सहयोग न करें तो इन पहाड़ी रास्तों पर हमारा चलना ही असंभव हो जाएगा। हमारी समझ में आया कि रोजी-रोटी के दबाव में उनमें यह सहयोग भाव पनपा है। होटल लौटकर हमने सुनील को दूसरे दिन सुबह दस बजे आने के लिए कहा। शाम का वक्त हमने मॉल रोड पर घूमने-फिरने में बिताया। गर्म कपड़ों का बाजार गर्म था। मुझे दुर्ग निवासी लेखक मित्र विनोद साव की याद आई। उन्होंने कहा था मनाली में गर्म कपड़े अच्छे मिलते हैं। हम लोग यात्रा के दौरान अक्सर खरीदारी नहीं करते पर मनाली में मन नहीं माना तो हमने कुछ गर्म कपड़े खरीद ही लिए।

तीसरे दिन हमारी सूची में केवल दो-तीन स्थानीय जगहें भर थीं। दस बजे सुनील टैक्सी लेकर आए तो हमने सबसे पहले हिडिम्बा मंदिर चलने की फरमाइश की। वर्षों से इसके संबंध में पढ़ता आया था। अपने देश में ऐसे कई स्थल हैं जिन्हें देखकर हम रोमांचित होते हैं। ऐसे स्थान भारत की समावेशी संस्कृति के आइने की तरह हैं। महाभारत में हिडिम्बा भले ही राक्षसी मानी गई किन्तु इस क्षेत्र में वह देवी के रूप में पूज्य है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने, इसी कारण, यह धारणा बनाई कि नस्ल की श्रेष्ठता और रक्त की शुद्धता केवल एक भ्रम है- विशेष रूप से भारत के संबंध में। पगोडा शैली में यह मंदिर सन् 1553 में बनाया गया। कुल्लू का राजा हिडिम्बा को अपनी दादी मानता था। थोड़ी चढ़ाई के बाद देवदारू के वृक्षों से घिरा यह मंदिर दर्शनीय है। पहले यहां भैंसे की बलि दी जाती थी। मंदिर परिसर में ही घटोत्कच पूजा मंदिर है। घटोत्कच भीम और हिडिम्बा का पुत्र था। महाभारत कथा में वह पाण्डवों की ओर से लड़ा था। यह मंदिर भी राष्ट्रीय धरोहर है। हमने देवदारू वृक्षों की छाया में बैठ शांत शीतल हवा का कुछ देर आनंद लिया। दूसरी जिज्ञासा हमें वशिष्ठ मंदिर ले गई जो एक छोटा और अलंकृत लकड़ी का स्थापत्य है। वस्तुत: देखने के लायक वह गर्म पानी का सोता है जो मंदिर के पास है। इस स्रोत को एक बड़े कुंड में बदल दिया गया है जिसमें उस समय भी कुछ लोग स्नान कर रहे थे। इसके जल को चर्म रोग के लिए लाभकारी माना जाता है।

मनाली में कई स्थानों पर व्यास नदी आपके साथ होती है। होटल वापस लौटते समय जिस पुल से पार होकर हमें अपने गंतव्य तक पहुंचना था वहां मोड़ के पहले काफी दूरी तक व्यास नदी सड़क के समानांतर बहती है। मजे की बात यह है कि उस स्थान से सुदूर स्थित बर्फ से ढंकी भृगु तुंग भी दिखलाई देता है। हमारा मन कर रहा था कि अपने किनारों से कुछ हटकर बीच से बहती व्यास की धारा तक पहुंचें। छोटी-छोटी चट्टानों से टकराकर उथली जलधारा जैसे आमंत्रित कर रही थी। हमारी दुविधा को देखकर सुनील ने एक स्थान पर गाड़ी रोककर कहा- सर, आप पानी की धारा तक जाइए। यहां सड़क ऊंची नहीं है। मैं आप लोगों को नीचे उतरने में मदद करता हूं। सुनील ने दीपा को हाथ पकड़कर रेत पर उतारा। रेत पर 25-30 फुट चलकर हम व्यास नदी की जलधारा तक पहुंच गए। स्वच्छ, शीतल जल से मुंह धोकर बहुत आराम मिला। नदी और उसके बैक ग्राउंड में रोहतांग के साथ दो-चार फोटो लेकर जब हम वापस टैक्सी में बैठे तो मन आनंद से भरा था।

होटल लौटकर हमने सामान पैक किया। रात साढ़े नौ बजे हमारी शिमला वापसी बस से हुई। जब हमने यात्रा का कार्यक्रम बनाया था तो कालका-शिमला टॉय ट्रेन से शिमला जाना संभव नहीं हो सका अत: हमने वापसी के लिए शिमला से कालका हिमालयन क्वीन ट्रेन से आरक्षण ले लिया था। रात 9.30 बजे बस से हम रवाना हुए और लगभग साढ़े पांच बजे शिमला पहुंच गए। एक होटल में कुछ घंटे बिताकर हम दस बजे शिमला के साफ सुंदर स्टेशन पहुंच गए। दस बजकर पच्चीस मिनट पर ट्रेन रवानगी हुई और हम यूनेस्को द्वारा घोषित विश्वविरासत टॉय ट्रेन हिमालयन क्वीन की खिड़की से प्रकृति के नजारे को एक नए कोण से देख रहे थे। शिवालिक की पहाडिय़ों में नैरो गे•ा की यह छुक-छुक गाड़ी 103 सुरंगों और 869 पुलों पर से गुजरती है। यह इतने मोड़ लेती है कि ट्रेन का अगला हिस्सा बार-बार दिखलाई देता है। यात्रा के बीच लगभग दस स्टेशन हैं। यह एक रोमांचक यात्रा है जिसमें अनोखापन है। आप बाहर पीछे छूटते हुए दृश्यों से नजर नहीं हटा सकते। लोगों की याद में 'मेरे सपनों की रानी कब आएगी' गीत गूंज रहा था। समुद्र तल से 2073 मीटर की ऊंचाई पर स्थित शिमला से 656 मीटर की ऊंचाई पर बसे हरियाणा के कालका स्टेशन पर लगभग पांच बजे हम पहुंच गए। हमारी वापस की ट्रेन रात 9 बजे थी। कालका स्टेशन भी सुविधा संपन्न है। ट्रेन जैसे ही प्लेटफार्म पर लगी। हम अपने कोच में बैठे और आराम की मुद्रा में बर्थ पर लेट गए। नींद की गोद में जाते हुए मन में यह विश्वास तो भारतीय रेल पर था कि चाहे देर सबेर वह हमें भोपाल पहुंचा ही देगी।

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