Monthly Magzine
Sunday 22 Sep 2019

मैं राष्ट्रभाषा को समर्पित हूँ - चन्द्रकांता

जन्म से कश्मीरी और रचनाकर्म से राष्ट्रभाषा हिन्दी को समर्पित साहित्यकार चन्द्रकांता जी अपनी रचनाओं में बदलते समय, आतंकवाद और विस्थापन को बहुत गहनता से अभिव्यक्त करती हैं। 'व्यास सम्मान' सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित चन्द्रकांता जी प्रतिबद्धता से निरंतर लेखन कर रही हैं। 'कथा सतीसर' इनके लेखकीय विमर्शों का अति महत्वपूर्ण एवं जीवंत दस्तावेज है। इसमें प्राचीन कश्मीर से लेकर वर्तमान तक का इतिहास, संस्कृति, राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य बड़ी जीवटता से उपस्थित हुआ है। चन्द्रकांता जी का मानना है कि आधुनिक तकनीकी, प्रगति और संचार का संजाल हमें समाज से काटकर एकांकी कर रहा है। बीते दिनों उनसे आत्मीय संवाद हुआ। प्रस्तुत हैं कुछ अंश -

प्र. आपको कब और कैसे लगा कि आपके भीतर एक सृजक विराजमान है और वह कैसे बाहर आया ?

उ. मैं मूलत: कश्मीर से हूँ। प्रकृति से मुझे गहरा प्रेम था और आप तो जानते हैं कश्मीर को 'धरती का स्वर्ग' कहा जाता है। वहां के झील-झरने, चिनार, बदलती ऋतुएँ, पिघलती बर्फ, आड़ू के पेड़ों की सफेद-गुलाबी बौरों की महक, बसंत के रंगों की खिलखिलाहट सब कुछ मेरे भीतर सुख के भाव के साथ-साथ आश्चर्य भी भरता था। फिर मेरी नानी मुझे बहुत कहानियां सुनाती थीं। लेकिन जब मैं 12 वर्ष की थी तो कविता की चार पंक्तियां लिखी थीं-'भर आता है ये मानव मन/तब मिटते घाव सजग होकर/ कुछ पीड़ा-सी देते मन को/ पलकें भीगी होकर, दिखलाती अपना पागलपन।' मेरी कविता का कारण मेरी माँ की मृत्यु से उपजा दुख था। मैं आज भी मानती हूँ कि मेरी कविता, मेरे लेखन का जन्म दुख से हुआ है। यह कविता तो क्या थी? बस बालमन की भावुक-सी अभिव्यक्ति थी। तब न भाषा-शिल्प का ज्ञान था न ही कोई अनुभव संपदा। बाद में मैं हैदराबाद गई तब मैंने कहानियां लिखनी शुरू की और सितम्बर 1967 में 'कल्पना' पत्रिका में मेरी पहली कहानी 'खून के रेशे' छपी। फिर 'कैक्टस' कहानी, नयी कहानियाँ पत्रिका में छपी। उसके बाद तो लेखन का सिलसिला प्रतिबद्धता से चल रहा है।

प्र. विमर्श आधारित साहित्य के बारें में आपकी क्या राय है ?

उ. देखिए, विमर्श आधारित साहित्य क्या होता है...? अगर आप स्त्री विमर्श की बात करते हैं तो उसके अधिकारों और समाज में उसकी स्थिति की बात करते हैं। ऐसे ही दलित विमर्श है। पहले जो दलित पिछड़े या वंचित लोग थे उनकी तरफ  ध्यान ही नहीं जाता था। ऐसे ही आदिवासी विमर्श है। इनके बारे में कौन लिखता था? प्रतिभा राय ने 'आदिभूम' उपन्यास लिखा है। महाश्वेता देवी को भी आप जानते हैं। हिन्दी में उतना नहीं लिखा गया। फिर भी दलित विमर्श है। कई लोगों की आत्मकथाएँ बहुत त्रासद हैं न जाने कितना सहा है उन लोगों ने। कीड़े-मकौड़ों की तरह जीवन जिया है। स्त्री अपने अधिकारों की मांग तो बढ़-चढ़कर कर ही रही है और ये भी सच है कि स्त्री हमेशा दूसरे पायदान पर रही है। आप कितना ही बोलो-'यत्र नार्यस्तु पूजन्ते रमन्ते तत्र देवता:....।' हो सकता है किसी जमाने में पूजी जाती होंगी, वो हम नहीं जानते परन्तु हम तो ये जानती हैं कि जब विदुषी गार्गी ने महर्र्षि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया तो उसे केवल दो प्रश्न पूछने की अनुमति थी। तीसरा प्रश्न पूछने पर कहा यह अतिप्रश्न है। यहाँ भी उनकी पुरूषवादी वर्चस्व भावना ही थी कि कहीं ये हमसे ज्यादा विदुषी न हो जाए। द्रौपदी ने तो पूरा महाभारत ही करवा दिया। वास्तव में यह उसके अस्तित्व और अधिकारों की ही माँग थी। राजनीति में आप झांसी की रानी को जानते हैं। ऐसा नहीं है कि महिलाएँ कहीं कमजोर थी। अब थोड़ा माहौल बदल गया है। आजाद भारत में नए कानून बन गए। संविधान ने स्त्री को समान अधिकार दिए हैं लेकिन समाज ने नहीं दिये हैं। लड़कियाँ आज भी मारी जाती हैं। कन्या भ्रूण हत्या तो कानूनी अपराध है फिर भी ये हो रहा है। गाँव में जो महिलाएँ हाड़ तोड़ श्रम करती हैं उन्हें पुरूषों से कम वेतन मिलता है ये भेदभाव आज भी है। फिर भी महिलाएँ हर क्षेत्र में काफी आगे आई हैं मुझे लगता है शिक्षा का अभाव था शायद पहले। आजकल शिक्षा और नौकरी से उनमें आत्मविश्वास आ गया हैं और अपने हक की माँग करने लगी हैं। मैं एक बात जरूर कहूँगी समान अधिकारों की बात तो मैं मानती हूँ ठीक है पर कुछ महिलाओं में इससे आगे बढ़कर बदला लेने की भावना है वो नहीं होनी चाहिए। ये ठीक है उन्होंने बहुत दुख-अपमान सहे हैं पर बदले वाली भावना से तो स्त्री की गरिमा घटती है। उसे अपने विवेक से काम लेना चाहिए।

प्र. क्या दलित या स्त्री विमर्श आधारित सहित्य से मुख्यधारा के साहित्य का कुछ हित होता है या अहित?

उ. देखिए, विमर्श तो होता है-वो होता है मनुष्य के प्रति। मैं किसी खास विमर्श के तहत नहीं लिखती। अगर मैं कश्मीर की या आतंकवाद की बात लिखती हूँ तो वहाँ कोई ब्राह्मण या शूद्र नहीं, वहाँ जो तकलीफ  है वह हिन्दू की भी है, मुसलमान की भी है। मनुष्य को ही केन्द्र में रखकर साहित्य लिखना चाहिए। पहले इस तरह स्त्री या दलित की तरफ  लोगों का ध्यान नहीं जाता था अब उन्हें भी लगता है कि हम भी बराबर इंसान हैं, हमने क्या गलती की है? आप भी जानते-मानते हैं कि जाति-धर्म के नाम पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। ऐसा संविधान में भी कहा गया है पर समाज में हो रहा है। अब हरियाणा में ही देखिए दलितों और लड़कियों प्रति क्या हो रहा है? मैं यहाँ अठ्ठाईस साल से हूँ और बहुत अनुभव किया है। ये बात भी है कि जहाँ शिक्षा है और औरतें पढ़ी-लिखी हैं वहाँ बदलाव तो आया है। कुछ लोग कहते हैं आप दलित की बात करते हैं तो आपका ध्यान उनके अधिकारों की ओर जाता है, उनकी समस्याओं की तरफ  जाता है। तो मैं कहती हूँ कि उसे आपने विमर्श में क्यों डाल दिया? वे मनुष्य हैं। उनके दुख तकलीफ  को वैसे भी तो हम जान सकते हैं पर शायद उनको लगता है ऐसा करने से उस तरफ  ज्यादा ध्यान जाता है। मैं व्यक्तिगत रूप से इससे सहमत नहीं हूँ।

प्र. जी बिल्कुल, मेरा प्रश्न ही यही या कि विमर्श का नाम दिए बिना भी उनके दुख-दर्द को समझा जा सकता है। तो अलग धारा बनाने की आवश्यकता क्या है। मुख्यधारा के साहित्य में लिखकर भी अपने अधिकारों की  बात कह सकते हैं।

उ. हाँ, ये सब धीरे-धीरे हो जाएगा। आजकल लेखन कुछ इस तरह से ही चलने लगा है। ये सब मुख्यधारा में लगभग आ ही गए हैं।

प्र. आपकी रचनाओं में लोकभाषा और संस्कृति की महक मिलती है लेकिन आज सारा विश्व ग्लोबलाइज हो गया है। ऐसे में लोकभाषा और संस्कृति की क्या प्रासांगिकता है ?

उ. आज हम जिस वैश्वीकृत समय में जी रहे हैं उसमें सारे विश्व पर अंग्रेजी हावी है तो क्यों न हम अपनी भाषा को समृद्ध कर अपनी पहचान बनाएँ अन्यथा प्रादेशिक भाषाओं के साथ राष्ट्रभाषा भी खत्म हो जाएगी। दूसरा, भाषा और संस्कृति का गहरा संबंध होता है। भाषा जाती है तो संस्कृति भी खत्म हो जाती है। अब अंग्रेजी में तो हमारी संस्कृति नहीं है। वे हमारे मूल्य नहीं हैं। उनका विचार-दर्शन और संस्कृति अलग है। इसलिए अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए भाषा का बहुत महत्व है। मैं मातृभाषा (कश्मीरी) तक सीमित नहीं हूँ। मैं तो राष्ट्रभाषा को समर्पित हूँ। एक अंग्रेजी विद्वान टॉमस एल फ्रीडमैन ने कहा है कि आधुनिक तकनीक आपको दुनियाभर की बातें बताती है, ज्ञान देती है पर वह आपको एक अच्छा मनुष्य नहीं बना सकती। इस ज्ञान के विस्फोट से आप अच्छा भाई, पड़ोसी, बेटा-बेटी नहीं बन सकते। उसमें वो ताकत ही नही है। यह तकनीकी विश्व व्यापार की बात करेगी पर इंसानियत की बात नहीं करेगी। इसलिए सेव योअर ओलिव ट्री। यानि तुम्हारे आंगन में पूर्वजों ने एक ओलिव ट्री लगाया है उसकी रक्षा करो। वो पेड़ कौन-सा है? वो लोकभाषा और लोकसंस्कृति का पेड़ है। इसीलिए अपने आपको बचाने के लिए अपनी संस्कृति को बचाना जरूरी है। वरना भूमण्डलीकरण की इस आँधी में सब कुछ बहा जा रहा है। अंग्रेजी में एक कहावत है कुकीज कटर कल्चर अर्थात अच्छा-बुरा सब एक जैसा हो जाएगा। अच्छा कुछ बचेगा ही नहीं। तुम्हारी भाषा, संस्कृति, अस्मिता बचेगी ही नहीं। तुम कौन हो, क्या हो, तुम्हारा वजूद, तुम्हारे मूल्य क्या है....? वे सब खत्म हो जाएंगे। इसीलिए अपनी भाषा और संस्कृति दोनों को बचाना जरूरी है।

प्र.     आपके पिता प्रो. रामचन्द्र पंडित ने अंग्रेजी के प्रोफेसर होते हुए भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार की मुहिम चलाई थी। उस संदर्भ में आप अपना क्या योगदान मानती हैं?

उ. हाँ, मेरे पिताजी की इच्छा थी। उन्हें हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत के प्रति लगाव था। उन्हें भाषा ज्ञान था पर चूंकि कश्मीर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का माहौल नहीं था। पिता जी कश्मीर में हिन्दी प्रचारकों में रहे हैं। इसी कारण उन्होंने मुझे और मेरी दीदी को ओरियंटल कॉलेज भेजा, जहाँ हमने रत्नभूषण, प्रभाकर की शिक्षा ली। फिर मैंने एम.ए हिन्दी किया। यहीं से मेरी रूचि हिन्दी के प्रति जागी। महादेवी, पंत, प्रसाद मुझे बहुत पसंद आए। पंत जी कहते हैं-छोड़ द्रुमों की मृदुल छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया। बोल तेरे बाल-जाल में, मैं कैसे उलझा दूँ लोचन। और ए नभ की दीपावलियों क्षण भर के लिए तुम बुझ जाना, मधुर-मधुर मेरे दीपक जल, प्रिय का पथ आलोकित कर। जहाँ तक योगदान की बात है तो मैं जहां भी गई मैंने हिन्दी को अपनाया। जैसे हैदराबाद हिन्दीतर प्रदेश है वहाँ मैंने मुनीन्द्र जी ने, नेपाल सिंह वर्मा ने और ओमप्रकाश निर्मल ने साथ मिलकर एक लेखक संघ की स्थापना की जो आज भी चल रहा है। इसमें हिन्दी की गोष्ठियाँ होती थी। कविताएँ, कहानियाँ पढ़ते थे तो इससे हिन्दी का प्रचार-प्रसार होता है। मैं जहां भी जाती हूँ हिन्दी में और हिन्दी की ही बात करती हूँ। बहुत सारे लोग वाट्सअप और फेसबुक पर हिन्दी को रोमन स्क्रिप्ट में लिखते हैं तो मैं बड़ा विरोध करती हूँ कि जब मैं हिन्दी में लिख सकती हूँ तो तुम क्यों नहीं लिख सकते। वास्तव में हमारी भावना हिन्दी के प्रति होनी चाहिए और ये बात भी सही है कि जो हिन्दी को अपनी बपौती समझते हैं अपनी मातृभाषा कहते हैं वही सबसे ज्यादा इसके साथ गलत करते हैं। अपनी भाषा के प्रति आपका प्रेम होना चाहिए। दिल्ली में ही अभिव्यक्ति नाम की स्वायत संस्था है जिससे मैं जुड़ी हूँ। लक्ष्मी जैन जी ने अपनी पत्नी कुंथा जैन की स्मृति में यह संस्था स्थापित की थी। इसे 25 वर्ष हो गए। इसमें हम हर महीने एक गोष्ठी करते हैं। इससे पहले हम किसी भी अच्छे रचनाकार की एक कृत्ति कविता, कहानी, नाटक या उपन्यास को खरीदकर सभी पढ़ते हैं फिर विचार-विमर्श के लिए उस रचनाकार को बुलाते हैं। इससे लेखक-पाठक संवाद भी होता है, साहित्य का प्रचार-प्रसार होता है और साहित्यिक समझ भी बढ़ती है। गुरूग्राम में भी हमने हमकलम नाम की संस्था बनाई है। इसमें भी हम साहित्यिक और सामाजिक लोगों को बुलाते हैं। आप लोगों को भी कॉलेज और स्कूल स्तर पर ऐसे कार्यक्रम करने चाहिए। निर्मल वर्मा ने कहा है-साहित्य मनुष्यता का घर है, साहित्य मानवता सिखाता है। हम कितना सीखते हैं यह दूसरी बात है पर साहित्य के प्रचार-प्रसार का प्रयास होना ही चाहिए।

प्र.     आजकल ट्वेन्टी-ट्वेन्टी का जमाना का जमाना है और लम्बी रचनाएँ पढऩे का साहस और समय पाठकों के पास नहीं है, ऐसे में लम्बी रचनाओं-उपन्यास और कहानियों का भविष्य कैसा होगा ?

उ. ये ठीक है कि आजकल इतना धैर्य नहीं है अगर मैंने 600 पन्नों का कथा सतीसर लिखा तो इसके पीछे बहुत बड़ा कारण है। हमारी एक भरी-पूरी सामासिक संस्कृति का विखण्डन हुआ तो मुझे उसका पूरा इतिहास लिखना पड़ा। आप उसे सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनैतिक तीनों का परिवर्तन कब, क्या, कैसे हुआ का विवरण कह सकते हैं। कश्मीर के भीतर का सच अनावृत हो प्रदेशवासियों के स्वप्न, स्मृतियाँ और उम्मीदें नष्ट न हों और मनुष्यता बची रहे यही मेरा प्रयास था। और उपन्यास इतने लम्बे नहीं हैं। खण्डकाव्य तो चलो ठीक है उसका कथानक लम्बा होता है परन्तु आजकल पता नहीं क्यों लोग इतनी लम्बी-लम्बी कविताएँ भी लिखते हैं। आमतौर पर कविता जितनी छोटी होकर बड़ा काम करे उतनी ही अच्छी लगती है। अब मैं क्या कहूँ.....? उनका अपना मन है। आजकल सोशल मीडिया-फेसबुक आदि पर भी लम्बी-लम्बी कविताएँ लिखते हैं तो मैं हैरान होती हूँ। साहित्य का भी अपना लोकतंत्र होता है। लेखकों का अपना हिसाब और अपनी रूचि है।  हम उन्हें रोक तो नहीं सकते ना...।

प्र.     क्या अभी तक कुछ अनरचा है जो आपके मन-मस्तिष्क में उमड़-घुमड़ रहा हो? या जो रचा जाना चाहता हो?

उ. आजकल बहुत कुछ है लिखने को....और मैंने लिखा भी बहुत है। मैंने दो सौ कहानियाँ लिखी हैं। जिसमें आतंकवाद है, नारी उत्पीडऩ है, वृद्धों की समस्या है और अकेलेपन की समस्या है। बच्चे पढ़-लिखकर बाहर नौकरियाँ करते हैं और माँ-बाप अकेले रह जाते हैं। यह भी एक बड़ी गम्भीर समस्या है। जिसे सभी अपने-अपने ढंग से सुलझाते हैं। मुझे लगता है सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम एक-दूसरे से कटकर मूल्यहीन होते जा रहे हैं। अब पड़ोसी, पड़ोसी को नहीं जानता, कौन जीता-मरता है कोई नहीं जानता। ऐसे में एक सामाजिक जुड़ाव की जरूरत तो है पर यह कैसे हो यह हम सबको अपने-अपने ढंग से सोचना पड़ेगा। अब मैं ज्यादा प्रमुख हो गया है हम नहीं। हम पड़ोस में रह रहे हैं ऐसा लगता ही नहीं...। ऐसा लगता है जैसे हम जंगल में रह रहे हैं।

 वाट्सअप और फेसबुक आपको जोड़ता है पर वो कितना जोड़ता है...? जो लगाव-जुड़ाव मनुष्य का मनुष्य के साथ होता है वो अलग ही होता है। हम आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं। पूरी दुनिया ही ऐसी होती जा रही है।

प्र. अपने जीवन से जुड़ी कोई घटना बताइए, जो पाठकों के लिए प्रेरक हो?

उ. हाशिये की इबारतें मेरी संस्मरणात्मक पुस्तक है। इसमें मैंने तीन स्त्रियों-अपनी मां, बहन और सासू जी को केन्द्र में रखकर अपनी बात कही है। इसमें मैंने यह दिखाना चाहा है कि हर समाज में कुछ दबंग स्त्रियाँ भी होती हैं और कुछ सहन करने वाली भी होती हैं। मेरी माँ गाँव से थी, ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी और कुछ पुराने विचारों की भी थी पर स्वाभिमानी बहुत ज्यादा थी। एक बार मेरे पिताजी ने कश्मीर में एक पाँच मंजिला घर बनाया था। बाद में जब बंटवारा हुआ तो मुझे अच्छी तरह याद है एक छोटा-सा कमरा था जिसमें हम और चाचा के सभी बच्चे पढ़ते थे। तो बंटवारे के समय माँ ने कहा इस कमरे को रहने दीजिए इसका बंटवारा मत कीजिए। इसमें सभी बच्चे एक साथ पढ़ेंगे-रहेंगे तो उनका प्यार ज्यादा बना रहेगा। क्योंकि उस समय तक मेरी माँ के मन में भी कोई भेदभाव नहीं था तो पिता जी ने कुछ ऐसा कहा-नहीं, नहीं तुम इस पर अधिकार जमाना चाहती हो। ऐसा नहीं होगा। यह मेरी माँ को ठीक नहीं लगा। वो इतनी नाराज हो गई कि उस दिन से प्रण लिया कि यह मेरा घर नहीं है। अगर आप मेरी छोटी-सी बात नहीं मान सकते जो मैंने सबके लिए कही, वो केवल अपने लिए नहीं कही थी तो मैं कैसी गृहस्वामिनी...? फिर वो काफी बीमार रही। एक बार हम उन्हें पहाड़ पर ले गए उन दिनों टीबी का इलाज नहीं होता था। नदी किनारे पिता जी का घर था, अब भी है तो पिताजी ने कहा-देखो अपना घर, वहां चलने का मन करता है ? तो माँ ने कहा-नहीं। क्यों, घर नहीं जाना चाहोगी? पिताजी ने पूछा तो कहने लगी-नहीं, मेरा घर तो मेरे साथ है। मेरे साथ मेरे बच्चे हैं, तुम हो तो मुझे घर का क्या करना है और चुप हो गई।

ये बात थी तो बहुत छोटी-सी पर मेरी माँ को बहुत गहराई तक छू गयी थी। मेरी दादी बहुत दबंग थी। वो तो पूरे घर पर शासन चलाती थी। सब उनकी बात मानते थे। एक मेरी छोटी बहन थी-शीला, जिसने बहुत यातनाएँ सहीं। ये बहुत दुखद प्रसंग ही है। कहने का मतलब समाज में हर तरह की औरतें हैं, बहुत दबंग भी हैं और यातनाएँ सहनेवाली भी हैं। खैर... आज स्थितियाँ बदल गई हैं।

प्र. नवोदित साहित्यकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

उ. नवोदितों को सन्देश देने वाले हम कौन हैं? वे अपने ढंग से समय-समाज को देखेंगे और लिखेंगे। जो नए साहित्यकार हैं जो गंभीर साहित्य लिखते हैं वो समाज को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं। उनके पास वो पुराने मूल्य तो नहीं है फिर भी कुछ लोग तो प्रेमचन्द की तरह समाजोन्मुख होकर लिख रहे हैं। उन्हें लगता है जो तंत्र चल रहा है वो गलत है। उसमें कुछ बदलाव आना चाहिए। वे अपनी आवाज अपने ढंग से उठा रहे हैं। वे भी चाहते हैं कि एक प्रगतिशील और स्वच्छ समाज हो। इधर मारकाट, हिंसा, बलात्कार, छीना-झपटी, चोरी कितना कुछ चल रहा है। समाज में जो आदर्श या मूल्य हैं वो सब तो किताबों में रह गए हैं। पिता-पुत्र, माँ-बेटी या बहन-भाई के रिश्तों का कोई मूल्य नहीं रह गया है। ऐसी मूल्यहीनता पूरी मनुष्यता के लिए बहुत बड़ा खतरा है। बच्चों को बचपन से ही अच्छी शिक्षा और संस्कार मिलने चाहिए। आजकल युवा नए-नए विषयों पर लिख रहे हैं। जैसे पर्यावरण है, जल समस्या है, मुझे तो नए लोगों में उम्मीद की किरण नजर आती है। साहित्य समाज का आईना होता है जो यहां होगा वो वहाँ होगा। नए लेखक साहित्य में प्रयोग करें किन्तु इसके लिए निरन्तर साधना और स्वाध्याय की आवश्यकता हैं। इसके लिए कोई शॉर्टकट नहीं है। साहित्य हमेशा उम्मीद दिलाता है। चारों तरफ  विसंगतियाँ हैं, आदर्श कहीं हैं ही नहीं। फिर भी मनुष्यता के प्रति कहीं कोई आस्था बची रहे ऐसा प्रयास तो करना ही है।