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Sunday 22 Sep 2019

मुकम्मल प्यार की खोज की कथा

बहुत दिनों बाद समकालीन भारतीय साहित्य में सतीश जायसवाल की कहानी मिलकर ढूंढेगे तो... पढ़ा। यह जादुई यथार्थवादी शैली में स्त्री-पुरुष के खोए हुए मन, यानी लगाव और अस्तित्व की तलाश करती कहानी है जो फन्तासी और यथार्थ के साथ घुल-मिल कर संवेदनाओं की गहराई में मन के जुड़ाव को सहज ढंग से घटित होता दिखाती है। वह लगाव, वह प्रेम वहीं-कहीं खो गया है। उसमें कोई लगाव नहीं है। उसका कोई रूप नहीं है। जो खोया है वह विशुद्ध अपना ही लगाव है। उस लगाव की तलाश के बीच सामाजिक बाधाओं का वितान फैला हुआ है।

स्त्री भी वही चीज खो रही है, पर अप्रकट रूप में। उस मन को वे आपस में, एक-दूसरे में नहीं तलाश रहे हैं। वे उसे एक-दूसरे के लगावों में तलाश रहे हैं। और दोनों में यह भरोसा जगता है कि मिलकर ढूढेंगे तो, पा जाएंगे।

कहानी पुरुष के खोए हुए मन की तलाश से शुरू होती है जिसमें स्त्री के अपने मन की तलाश भी जुड़ जाती है। इसका पता पाठक को तब पता चलता है जब पड़ोस की छोटी-सी लड़की उसकी पीली चिडिय़ा के गुम होने के प्रसंग पर उस स्त्री के रोने का राज खोलती है। स्त्री कहती है, कैसे नहीं रोती? पेड़ पर पीले रंग की चिडिय़ा आने लगी थी। वह घर ढूँढ रही थी। उसका रंग बिल्कुल वान गॉग के सूरजमुखी की तरह पीला था। पेड़ काटने वालों ने तो उसका घर भी उजाड़ दिया।

दरअसल पीली चिडिय़ा वह स्त्री ही थी। उसका पेड़, उसका आधार कट गया था यह पुरुष को मालूम नहीं था। या फिर उसकी पीड़ा से उसका लगाव नहीं था। इसलिए प्रकटत: पुरुष के ही मन की तलाश में वे शहर की पुरानी जगह में भटकते हैं और उस हरे-भरे घनेरे के झुरमुट में उसे देख और महसूस कर भी लेते हैं, लेकिन सामाजिक, या कहें भीड़ के आतंक ने उस जगह को भी निरापद नहीं रख छोड़ा है।

पुरुष केवल अपनी खोज में है। वहाँ पेड़ों की घनी छाया में मंडरा रही चिडिय़ों को दिखाते हुए जब वह स्त्री से कहता है कि कहीं इनमें तुम्हारी वह पीली चिडिय़ा तो नहीं जिसका रंग वान गॉग के सूरजमुखी की तरह पीला है? तो कोई जवाब देने के बदले स्त्री उसे ऐसे देखती है जैसे किसी नासमझ को देख रही हो। स्त्री जानती है घर से बेघर होना क्या होता है। एक बार घर से बेघर हुई वह भी तो घर ढूंढ रही है। कथाकार कहता है, इसीलिए दोनों की निश्छल साझेदारियों में सेंध लगा कर, एक गोपन इच्छा स्त्री के अकेले मन में एक जगह बना लेती है।

पुरुष का मन कहीं चोरी नहीं हुआ है, बल्कि गुम हुआ है। वह जहाँ-जहाँ रहा है वहाँ अपने मन को ढूँढऩा चाहता है। इस क्रम में सेक्टर-6 भी उसके ध्यान में आता है। वह कहता है, वहाँ भी तो हो सकता है! स्त्री को यह अच्छा लगता है कि मन की तलाश में पुरुष ने उसके घर को भी शामिल किया। पर वह उसे भटकने से बचाने के लिए कहती है- लेकिन जब तुम वहां सेक्टर-9 में थे, तब इस सेक्टर-6 में मैं कहां आई थी?

पुरुष का गुमा हुआ मन या लगाव का आश्रय वह स्त्री नहीं थी, लेकिन जब उन्होंने मिल कर खोजना शुरू किया तो वे साझीदार बन गए। अब उन्हें भरोसा हो रहा था कि दोनों मिल कर ढूढेंगे तो उसे पा जाएंगे। वे सेक्टर-9, जहाँ पुरुष पहले रहता था, पहुँचते हैं जहाँ उसका लगाया हुआ पेड़ उसे पहचान कर खुश होता है। अब वह वयस्क हो चुका है। पुरुष उस लगाव को छूने के लिए स्त्री को आमंत्रित करता है। पेड़ उसे उलाहना देता है, यहां क्या ढूंढते हो वहां जाओ जहां सेक्टर-10 के मोड़ पर वह घना झुरमुट है। और वहां शाम को चिडिय़ों के आने का समय होता है।

उसके लगाए पेड़ की उलाहना, यानी उसकी खुद की उलाहना ही है जो वह स्त्री को उस सचमुच की-सी शाम का भरोसा करवाना चाहता है जो अब एक व्यतीत स्वप्न हो चुकी लग रही थी। स्त्री उस स्वप्न को जैसे सच का स्पर्श कर रही थी। और अब उस बीत चुके समय में, वह अपनी जगह तलाशने लगी थी, हाय! इतने कोमल, उस समय मैं तुम्हारे साथ क्यों न हुई? वह प्रकट में कह बैठती है।

लेकिन जिस तरह गया हुआ समय वापस नहीं आता उसी तरह उस झुरमुट में शाम को चिडिय़ा भी वापस नहीं आतीं। वह समय बीत चुका है। तब पुरुष को बहलाने के लिए वह कॉफी हाउस ले जाती है। काफी हाउस की गहमा-गहमी में अपने उस गुम हुए मन का विचार और गहरा जाता है। उसकी रात विषादमय हो जाती है।

वह विषाद तब छँटता है जब सुबह सामने वाले घर की दहलीज पर एक छोटी-सी लड़की को मुलायम धूप में चमकते देखता है। लड़की की आंखों में समूचा आकाश उतर रहा था और आकाश पर रंग-बिरंगे सपने तैर रहे थे। उसमें आशाओं और उमंगों की उड़ान दिखाई दे जाती है जो पुरुष में अपने खोए हुए मन को खोजने का उत्साह भरती है। बल्कि उस मन में उस स्त्री के ही माध्यम से वह छोटी-सी लड़की भी शामिल हो जाती है। उसका उत्साह बाहर से लगाव के कारण है। जो उन्हें गुमे हुए मन को खोजने को फिर प्रेरित करता है। इसे एक प्रौढ़ और जिम्मेदार प्रेम की खोज कह सकते हैं जिसमें उस छोटी-सी लड़की का लगाव शामिल है। पर इस वृहत्तर प्रेम के लिए भी सामाजिक स्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं।

खूब गहरे हरे-भरे घनेरे में स्वप्न की तरह खिलती उस गोपन इच्छा का पूरा होना बहुत मुश्किल है। रास्ता रहस्यमय और चक्करदार है जिसमें समाज और उसका व्यवहार है। भीड़ की पहरेदारियाँ हैं। रामलीला के मैदान में रामलीलाएं रची जा रही हैं तो जंतर-मंतर नाम की जगह पर करतब दिखाए जा रहे हैं।

हालांकि वे इस बात से बेपरवाह थे कि समय उनसे हिसाब मांँग सकता है। तटस्थ रहने का हिसाब। उन्हें यह एहसास नहीं था कि अपनी इस तटस्थता में वे भीड़ के निशाने पर आते जा रहे हैं। वास्तव में वे तटस्थ थे भी नहीं। वे उस चीज को खोज रहे थे जे दोनों पक्षों के लिए कल्याणप्रद है।

वे बेपरवाह थे भीड़ के भड़भड़ चंगे से इसलिए कि वह निरर्थक था। उससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण चीज वे खोज रहे थे जो भावुक और अंधा प्रेम नहीं जिम्मेदारियों से भरा मन का लगाव था।

उस घनेरे, हरे भरे झुरमुट में जाने के रास्ते में पडऩे वाला पुल भी पुराना है। उसकी उपस्थिति वहाँ पर खटकती है। वह उस पार को जोडऩे में असमर्थ और निरर्थक जान पड़ता है। लोग उसकी पटरी और रेलिंग उखाड़ कर ले गए हैं। यानी उस पुल से होते हुए मन के स्थान तक पहुंचना बहुत ही कठिन है। समय ने लगावों के बीच के पुल को जीर्ण कर दिया है। फिर भी वे वहां पहुंचते हैं। किन्हीं गहरे हरे-भरे घनेरे में अपने को गुमा सकने का यह आमंत्रण उद्दीपक था। पुरुष को हैरानी हो रही थी कि वह इधर पहले कैसे नहीं आया।

इससे पहले तुम इसलिए नहीं आए कि तुम्हें मेरे साथ आना था। कहती हुई स्त्री ने पुरुष की इच्छा में अपने लिए साफ-सुथरी जगह बनाई। मनोभावों का इस तरह बरीकी से कह जाना कथाकार की खूबी है। यही उसके कहन की जादुई शक्ति है। यहाँ घटनाएँ नहीं, भावनाओं की रेलम-पेल है जो घटनाओं से कहीं ज्यादा ठोस और यथार्थपरक है।

उस हरे-भरे घनेरे झुरमुट में गुमे हुए मन के मिलने की पूरी संभावना दिखती है, पर वह जगह भी सुरक्षित नहीं रह गयी है। वहां भी लुके-छुपे कई लोग हैं और उस झुरमुट के पेड़ों को, यानी लगावों को निर्विघ्न काट रहे हैं। खतरे को भाँपते हुए वे एक दूसरे का हाथ पकड़ते हैं और अँधेरी सुरंग के बाहर आ जाते हैं जहाँ चमकती हुई रेल की पटरियां दिखती हैं जो सुरक्षा में वापस लौटा लाने का भरोसा करा रही होती हैं।

कथाकार ने मनुष्य के एकांतिक लगाव को इस तरह छोटी-सी लड़की के माध्यम से परिवार और बाहर खतरनाक ढंग से कटे हुए समाज से भी जोड़ दिया है। रेल पटरियों के किनारे बस्ती है जो अभी भयावह ढंग से खाली है। वहां के लोग शायद पेड़ों को काटने गए हैं। बस्ती खाली जरूर है पर सूनी नहीं। वह किस्म-किस्म के रंगों और निशानों वाले झंडों से सजी-धजी, किन्तु निस्पंद है और किसी अघटित के घटित होने का रास्ता देखती हुई-सी लग रही है। ऐसी भयावह निस्पंदता को देखकर स्त्री उस छोटी-सी लड़की खुशी की कुशलता के लिए आशंकित  हो जाती है। उसके घर में खुशी अकेली होगी। आजकल तो कहीं भी कुछ भी घटित घट जाता है। खुशी अपनी पेंटिंग में पेड़, चिडिय़ा और घर बनाना चाहती है जिसमें वे तीनों रह सकें। पुरुष उसकी याद कर घर को सुखद विचार में बदलते हुए कहता है, अब तक तो खुशी का घर भी बनकर पूरा हो चुका होगा। और वो हमारा रास्ता देख रही होगी! और वे खुशी की फरमाइश के अनुसार उस घर के दरवाजे पर लटकाने के लिए धान की झालर बनाने का मंसूबा बाँधते हुए लौट पड़ते हैं। धान की झालर लटकी रहेगी तभी तो चिडिय़ा आएंगी।

भीड़तंत्र में जी रहे इस समाज में आशंकित मनों के आशियाने की तलाश कहती है यह कथा। सतीश जी की पिछली कहानियों के मुकाबले इसमें शिल्प और शैली का एक अलग ही आस्वाद है। जीवन यथार्थ की सारभूत प्रस्तुति के लिए जादुई तकनीक को बखूबी बरता गया है। सतीश जी कवि भी हैं इसलिए कहानी में काव्यात्मकता रची-बसी है।