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Friday 20 Sep 2019

पाश - कविता रेजीमेंट का एक बहादुर सिपाही जो वीरगति को प्राप्त हुआ

कविता शस्त्र कैसे बनती है, कलम से तलवार का मुकाबला कैसे किया जाता है, एक कविता पूरी व्यवस्था को कैसे तिलमिला देती है, चंद लाइनें बंदूक, बम और मिसाइल पर किस तरह भारी पड़ जाती है, यह जानना है समझना है तो पाश को पढिय़े, आप भी पाश की फौज में भर्ती हो जाएंगे जब पाश आपको कहेंगे –

हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिये

हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिये

कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर

बुझी हुई नजरों की कसम खाकर

हाथों पर पड़े हुए घट्टों की कसम खाकर

हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे तब तक

जब तक वीरू बकरिहा

बकरियों का मूत पीता है

खिले हुए सरसों के फूल को

जब तक बोने वाले खुद नहीं सूंघते

कि सूजी आँखों वाली

गाँव की अध्यापिका का पति जब तक

युद्ध से लौट नहीं आता

हम लड़ेंगे जब तक

दुनिया में लडऩे की जरूरत बाकी है

जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी

जब तलवार न हुई, तब लडऩे की लगन होगी

लडऩे का ढंग न हुआ, लडऩे की जरूरत होगी

और हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे

कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता

हम लड़ेंगे

कि अब तक लड़े क्यों नहीं

हम लड़ेंगे

अपनी सजा कबूलने के लिए

लड़ते हुए जो मर गये

उनकी याद जिंदा रखने के लिए

हम लड़ेंगे

पाश की रचनाओं में शंखनाद है। कविता जो अपनी नज़ाकत और लचीलेपन के लिए जानी जाती है वह पाश तक आते आते नुकीले धारदार शस्त्र में तब्दील हो जाती है। पाश का साहित्य कविता में से निवेदन को नकार देता है, कविता में से कोमलता को हटा देता है, कविता में से प्रेम को बाहर का रास्ता दिखा देता है, कविता की प्रचलित परम्परा को तोड़ कर कविता को नये कलेवर में स्थापित करता है। पाश की कविताओं में जो कविताओं का पाशपन है,  उसमें निवेदन नहीं आह्वान है, कोमलता नहीं खुरदरापन है, प्रेम नहीं आन्दोलन है। पंजाब का यह शेर जब अपनी रचना में दहाड़ता था तब उसकी गूँज से कुरीतियों का जंगल काँप उठता था, जरा उनके तेवर तो देखिये –

यदि देश की सुरक्षा यही होती है

कि बिना जमीर होना जिन्दगी के लिए शर्त बन जाए

आँख की पुतली में हाँ के सिवाय कोई भी शब्द

अश्लील हो

और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे

तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है।

हम तो देश को समझे थे घर जैसी पवित्र चीज़

जिसमें उमस नहीं होती

आदमी बरसते मेंह की तरह गलियों में बहता है

गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है

और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन –जैसे एक एहसास का

नाम

हम देश को समझते थे काम – जैसा कोई नशा

हम तो देश को समझते थे कुर्बानी – सी वफा

लेकिन गर देश

आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है

गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है

तो हमें उससे खतरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है

कि कर्ज के पहाड़ों से फिसलते पत्थर की तरह

टूटता रहे अस्तित्व हमारा

और तनख्वाह के मुंह पर थूकती रहे

कीमतों की बेशर्म हंसी

कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो

तो हमें अमन से खतरा है

गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा

कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी

कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा

अक्ल, हुक्म के कुंए पर रहट की तरह धरती नोचेगी

तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है

पाश की कविता, कवितागिरी के स्वभाव के विपरीत रची गई कविताएं हैं या कविता को उसके वास्तविक स्वभाव में लाने वाली कविताएं हैं ,यह प्रश्न तो अनुत्तरित है लेकिन यह तय है कि यह कविता का सरस्वती स्वरूप नहीं बल्कि कविता का दुर्गा रूप है। सौ डिग्री तापमान में खौलने वाली कविताएं में से विचार भांप बनकर उड़ते हंै और उन तक पहुंच जाते हंै जिन तक उन्हें कवि पहुंचाना चाहता था, इनकी कविताओं की मारक क्षमता बहुत दूर तक निशाना भेदती है। मासूम सी सूरत के इस उत्तेजक कवि की यह चुनौती तो देखिये जो वह डंके की चोट पर अपनी कविता के माध्यम से दे रहा है –

मैं घास हूँ

मंै आपके हर किये धरे पर उग आउंगा

बम फेंक दो चाहे विश्वविद्यालय पर

बना दो होस्टल को मलबे का ढेर

सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपडिय़ों पर

मेरा क्या करोगे

मै तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आउंगा

बंगे को ढेर कर दो

संगरूर मिटा डालो

धूल में मिला दो लुधियाना जिला

मेरी हरियाली अपना काम करेगी

दो साल ...दस साल बाद

सवारियां फिर किसी कंडक्टर से पूछेगी

यह कौन सी जगह है

मुझे बरनाला उतार देना

जहां हरे घांस का जंगल है ,

मैं घास हूँ ,मै अपना काम करूंगा

मैं आप के हर किये धरे पर उग आऊंगा

सत्तर अस्सी के दशक में पंजाब में आतंकवाद अपने चरम में था और उसी समय अवतार सिंह सद्धू पाश अपनी लेखनी के उत्कर्ष पर विराजमान थे। हर दौर का साहित्य अपने समय और काल से प्रभावित होता है, पाश को हालात ऐसे मिले ही नहीं कि यह कलमनवीस इश्क मोहब्बत के तराने लिखता, हुस्न शबाब के कसीदे गढ़ता। अनेक लोगों के जेहन में यह ख्याल जरूर आता होगा कि इनके पास तो लिखने की सलाहियत थी फिर इन्होंने कोरी कल्पनाओं को क्यों नहीं रचा? खुशामद खोरी भी तो लिखने की ही एक तरकीब है, पाश ने इसे क्यों नहीं अपनाया? कितना अच्छा हो सकता था अकादमियों से संबंध होते, आर्थिक लाभ के दरवाज़े खुल जाते, सुविधाओं का जीवन जी रहे होते - इसका एक ही जवाब है कि यकीनन पाश अपने बुजुर्ग कवि शायर फैज़ अहमद फैज़ के इस कौल से राय रखते होंगे कि - हर लिखने वाले का अपने समाज के प्रति एक कमिटमेंट होता है। जो लिखने वाला लेखन के इस रहस्य को जान लिया फिर वह कलम का सिपाही हो जाता है, फिर उसकी रचनाएं गुलदस्ता नहीं दोनाली बन जाती हैं। पाश कविता की दोनाली में विचार भर कर फायर करते थे तो देशद्रोहियों में हड़कंप मच जाता था। पाश का अंदाज़ देखिये –

हाथ अगर हों तो

जोडऩे के लिए ही नहीं होते

न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही

होते हैं

यह गर्दने मरोडऩे के लिए भी होते हंै /

हाथ अगर हों तो

'हीर' के हाथों से चूरी पकडऩे के लिए ही

नहीं होते

'सैदे' की बारात रोकने के लिए भी होते हैं

'कैदो' की कमर तोडऩे के लिए भी होते हैं

हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते

लुटेरे हाथों को तोडऩे के लिए भी होते हैं

पाश की रचनाओं का अध्ययन करो तो एक सीख यह भी मिलती है कि कृति में नाराजगी, क्रोध, कटाक्ष जो भी हो अपनी चरम सीमा में हो। पाश की कविताएं आलोचना, विमर्श, संवाद, सहमति–असहमति, अनुनय विनय की सीमा को लांघ कर सीधे वार की स्थति में आ गई हंै, समझने और समझाने की सीमा कवि के लिये समाप्त हो गई थी, अब कवि के पास एक ही विकल्प बचा था प्रहार प्रहार और प्रहार। पाश के समय हालात इतने नागवार हो चुके थे कि उनको यही निर्णय लेना पड़ा कि इन्हें सुधारने की कोशिश न करके इन्हें नष्ट कर देना ही बेहतर विकल्प है, इस मूव्हमेंट में मध्य का रास्ता नहीं होता, इसलिये प्रेम के इस कवि को आक्रोश का कवि बनना पड़ा। एक रचना में तो इन्होंने लिखा भी है – मुझे जीने की बहुत चाह थी/ कि मैं गले –गले तक जिन्दगी में डूब जाना चाहता था/ मेरे हिस्से की जिन्दगी जी लेना मेरे दोस्त /

पंजाबी भाषा का यह कवि हिंदी बेल्ट में सबका चहेता कवि बन गया था क्योंकि वह अपनी जबान से आवाम की बात कहता था। ये उमंग की कविताएं हंै, कमजोरों को शक्तिमान बना देने का टॉनिक है पाश साहब की कविता। इसे दम साधे पढऩा पढ़ता है। ये विद्रोह का वातावरण निर्मित करती हैं। यहाँ अवतार सिंह सिद्धू पाश को माइक पर युद्ध में लोगों को शामिल होने का आह्वान नहीं करना पड़ता, वे तो बस एक रचना में सोच भर कर जनमानस में छोड़ देते और देश के गद्दारों के खिलाफ चक्रव्यूह का रचना शुरू हो जाता। यहां पाश का चिन्तन देखेंगे –

                (एक)

क्यों सुना दिया जाता है हर बार / पुराना चुटकुला

क्यों कहा जाता है कि हम जिंदा है / जरा सोचो –

हममें से कितनों का नाता है, जिंदगी जैसी किसी वस्तु के साथ।

                  (दो)

हमारे लहू को आदत है/  मौसम नहीं देखता, महफिल नहीं देखता

जिंदगी के जश्न शुरू कर लेता है/  सूली के गीत छेड़ लेता है।

                  (तीन)

संविधान/  यह पुस्तक मर चुकी है

इसे मत पढ़ो, इसके लफ्जों में मौत की ठंडक है।

                   (चार)

भगत सिंह ने पहली बार पंजाब को

जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से

बुद्धिवाद की ओर मोड़ा था/ जिस दिन फांसी दी गई

उनकी कोठरी में लेनिन की किताब मिली

जिसका एक पन्ना मुड़ा हुआ था

पंजाब की जवानी को / उसके आखिरी दिन से

इस मुड़े पन्ने से बढऩा है आगे, चलना है आगे।

                  (पांच)

हम चाहते है अपनी हथेली पर कोई इस

तरह का सच/ जैसे गुड़ की चाशनी में कण होता है

जैसे हुक्के में निकोटिन होती है

जैसे मिलन के समय महबूब के होठों पर

कोई मलाई जैसी चीज़ होती है।

पाशपन से भरपूर इस कवितागिरी में बिम्ब न तलाशियेगा, इसमें सीधा संवाद और दृश्य है। पाश की कोई भी कविता का वाचन कर लिया जाये आप पाएंगे कि कवि नफे नुकसान को ध्यान में रख बीच का रास्ता नहीं अपनाता, वह तो जुआरी की तरह दाँव खेलता है उसे या तो सब कुछ चाहिये या कुछ भी नहीं। मैंै यह नहीं लिखूंगा कि पाश की आग उगलती रचनाओं के कारण फलां तारीख को फलां लोगों ने फलां उम्र में पाश को मार डाला। मैं किसी तरह के आंकड़े नहीं दूंगा क्योंकि यह पाश की रचनाओं का विवेचन है पाश की हत्या की इन्वेस्टिगेशन नहीं। मैं किसी सरकार, समाज, संगठन पर यह आरोप भी नहीं लगाता कि पाश को बचाया क्यों नहीं? जो लोग यह कहते हैं कि पंजाब में आतंकवादियों ने 23 मार्च 1988 को 38 वर्षीय कवि पाश की उनके बेबाक लेखन के कारण हत्या कर दी मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। अगर पाश मर गया होता तो आज यूँ उसकी चर्चा न होती, पाश तो अपनी कविताओं में आज भी जीवित है और सदा जीवित रहेगा क्योंकि पाश एक व्यक्ति का नहीं एक विचारधारा का नाम है और विचारधारा मरा नहीं करती, अरे हाँ अंत में मरने पर पाश की यह जीवित रचना का पाठ कर लिया जाये –

 

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती

गद्दारी और लोभ की मु_ी सबसे खतरनाक नहीं होती

बैठे बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है

सहमी सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है

सबसे खतरनाक नहीं होता /

कपट के शोर में सही होते हुआ भी दब जाना बुरा तो है

जुगनुओं की लौ में पडऩा

मु_ियाँ भींचकर बस वक्त निकाल लेना बुरा तो है

सबसे खतरनाक नहीं होता /

सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से मर जाना

तड़प का न होना/ सब कुछ सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर/  और काम से लौटकर घर आना

सबसे खतरनाक होता है / हमारे सपनों का मर जाना

सबसे खतरनाक वो घड़ी होती है

आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो

आपकी नजर में रुकी होती है

सबसे खतरनाक वो आँख होती है

जिसकी नजर दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है

और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है

सबसे खतरनाक वो गीत होता है

जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है

आतंकित लोगों के दरवाजे पर

गुंडों की तरह अकड़ता है

सबसे खतरनाक वो चाँद होता है/ जो हर हत्याकांड के बाद

वीरान हुआ आंगन में चढ़ता है

लेकिन आपकी आँखों में

मिर्ची की तरह नहीं पड़ता /

सबसे खतरनाक वो दिशा होती है

जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए

और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा

आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए /

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती

गद्दारी और लोभ की मु_ी सबसे खतरनाक नहीं होती

सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से मर जाना