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Friday 20 Sep 2019

समय का बोध कराती रघुवीर सहाय की कविता

'कवि कह गया है' पुस्तक में अशोक वाजपेयी ने जीने के कर्म की परिभाषा शीर्षक लेख में एक जगह लिखा है- 'पहले कविता के संबंध में हम जो सोचते थे, उसमें इस बात का कुछ न कुछ महत्व होता था कि कविता और जीवन का क्या अंतर्संबंध है। कविता जीवन के जिस क्षेत्र या भाग से संबद्ध है या होने का दावा करती है उसकी अभिव्यक्ति कवि कितनी ईमानदारी और कितनी दक्षता से कर सका  है। पर इस बात का कम महत्त्व होता था कि धारणाओं और विचारों के अतिरिक्त इस महान कार्य में, जिसे हम जीवन कहते हैं, कवि कितनी गहराई, शक्ति, साहस और ईमानदारी के साथ लगा हुआ है। जीने के कर्म ओर कविता में कोई सीधा संबंध अप्रासंगिक नहीं तो आवश्यक भी नहीं माना जाता था। पर अब हमारा आग्रह धीरे-धीरे इस पर अधिक होता जा रहा है कि कविता को कवि के गहन ढंग से जीने का साक्ष्य होना चाहिए। यह एक बड़ी मांग है पर ऐसी दुनिया में जहाँ जीवन अधिकाधिक उथला, अर्थहीन, और मूल्यच्यूत होता जाता है और ऐसे समाज में जहाँ फिल्मी गीतों से उसके ज्यादातर लोग वे दोनों मनोरंजन सुविधापूर्वक पर लेते हैं जो पहले कभी उन्हें कविता और संगीत से मिलते थे। यदि संसार के विनाश के विरुद्ध रचनात्मक कर्म ही एकमात्र बचाव है, (जैसा कि अमरीकी कवि-समीक्षक केनेथ टेकसराय ने कहा है) तो कवि के लिए सबसे अधिक रचनात्मक क्या यह नहीं हो सकता है कि मानव अस्तित्व के अंत:सलिल हो रहे उत्सों को फिर से प्रकाश में लाए? हम ऊबे और थके हुओं को अपने जीने की क्रिया की गहराई और विशदता पर कविता के माध्यम से बल देकर हममें उस कर्म के लिए नई दिलचस्पी, नया महत्वबोध उत्पन्न करें ताकि हम जीवन में अर्थ, उद्देश्य और मूल्य की खोज और प्रतिष्ठा कर सकें ?

रघुवीर सहाय नयी कविता के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक हैं। इनकी कविताओं में अल्ट्रासाउण्ड की तरह आने वाले समय का पूर्वाभास कर यथार्थ को जीवंत कर बेलौस हमारे सामने प्रस्तुत कर देती हैं। रघुवीर सहाय की कविता में विचार वस्तु विविधता में और वैचारिक स्पष्टता में सत्य का साक्षात्कार कराती है। रघुवीर सहाय ने काव्य-कला में अपना रास्ता स्वयं बनाने का प्रयास किया। पत्रकारिता की भाषा को सर्जनात्मक भाषा में बदलने का संघर्ष उनकी कविताओं में स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी कविताएँ विजन में अक्सर इतनी व्यापकता और गहराई समेटती जान पड़ती हैं कि भोंथरे, घिस चुके यथार्थ को बिजली की चकाचौंध की तरह आँखों के सामने ला खड़ा करती है।

रघुवीर सहायक ने दूसरा सप्तक में दिए गए अपने वक्तव्य में कहा था कि विचारवस्तु का कविता में खून की तरह दौड़ते रहना कविता को जीवन और शक्ति देता है, और यह तभी संभव है जब हमारी कविता की जड़ें यथार्थ में हों।  जिस तरह यथार्थ के विविध आयाम होते हैं, उसी तरह यथार्थ को आधार बनाने वाली कविता भी बहुआयामी हो जाती है। रघुवीर सहाय इस मर्म को जानते थे। इसलिए वे ऐसे रचनाकार के रूप में उभरे जिसने कविता की विचारवस्तु को अपने समय और समाज के यथार्थ से तो जोड़ा ही, वे अपने समय के आर-पार देख पाने में भी समर्थ हुए।

समय के बारे में रघुवीर सहाय की अवधारणा उनके लेखकीय जीवन के प्रारंभिक दौर में ही मिलती है। 'सीढिय़ों पर धूप में' में एक स्थान पर उन्होंने लिखा है- 'रचना के लिए किसी न किसी रूप में वर्तमान से पलायन आवश्यक है। कोई-कोई ही इस पलायन को सुरूचिपूर्वक निभा पाते हैं। अधिकतर लोग अतीत के  कोख में लौट जाने की गलती करते हैं, और यह भूल जाते हैं कि वर्तमान से मुक्त होने का प्रयोजन कालातीत होना है, मृत जीवन का भूत बनना नहीं।

समय के आर-पार देखने की उनकी चाहत उनके काव्य में भी व्यक्त होती है जिसकी अभिव्यक्ति 'घड़ी' शृंखला की तीसरी कविता में देखने को मिलता है-

घड़ी नहीं करती है 'डिग' जा

अपने पथ से डिग जाने पर घड़ी नहीं कहती है 'चिक'

और यह तो वह कभी नहीं कहती है, साथी 'ठीक' है

वह कहती है टिक-टिक-टिक-टिक-टिक-टिक-

और टिक-टिक-टिक-टिक-

और टिक-टिक

और टिक

और टिक

टिक।

यहाँ जो 'टिकने' की टेक है, वह सिर्फ  ध्वनियों का खेल नहीं है, बल्कि वह मेटाफीजिकल अहसास है जिसके बगैर बड़ी कविता बल्कि कोई भी रचनात्मक कर्म संभव नहीं  है। रघुवीर सहाय जानते थे कि अमरता जनसमान ही प्रदान करता है और काल के पार जाने के लिए अपने देश और समाज के अतीत, वर्तमान और भविष्य की चिंता करना संवेदनशील रचनाकार के जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। जिसकी चिंता उन्होंने 'भविष्य' शीर्षक कविता में की है-

सब कुछ लिखा जा चुका है अतीत में

यह आकर मत कहो मुझसे पंडित जनों

एक बात अभी लिखी नहीं गई बाकी है

होने को भी बाकी लिखी जाए या न जाय

वह तुम जानते हो क्या ?.....................

रघुवीर सहाय ने अपने समय और समाज को काफी गहराई से देखा था। उन्होंने लिखा है, 'समय की समझ का मतलब है, समाज में मनुष्य और मनुष्य के बीच जितने गैर इन्सानी रिश्ते हैं उनकी समझ- कहाँ से वे पैदा होते हैं, इसकी समझ और उनकी जड़ों तक पहुंच इतिहास की समझ।' वे यह भी मानते थे कि 'अगर इंसान और इंसान के बीच एक गैर बराबरी का रिश्ता है और उस रिश्ते को कोई आदमी मानता है कि ऐसे ही रहना चाहिए, तो वह कोई रचना नहीं कर सकता।' उन्होंने आजादी के बाद के भारतीय समाज में नाबराबरी के सामंती मूल्य को बहुत ही सूक्ष्मता से पहचाना था, क्योंकि नाबराबरी की चेतना बने रहने से लोकतंत्र या जनवाद विकसित नहीं हो सकता, बल्कि अधिनायकवाद के पनपने के लिए जमीन तैयार होती है। 'आत्महत्या के विरुद्ध'संकलन में एक कविता 'अधिनायक' इसी ओर संकेत करती है-

राष्ट्रगीत में भला कौन वह

भारत भाग्य विधाता है

फटा सुथन्ना पहने जिसका

गुन हरचरना गाता है

कौन-कौन वह जन गन मन

अधिनायक वह महाबली

डटा हुआ मन बेमन जिसका

बाजा रोज बजाता है।

 आजादी के बाद के भारत का समय इस अन्याय की गाथा से भरा हुआ था, रघुवीर सहाय ने इस समय के भीतर झांक कर पाया था कि यहाँ मनुष्य और मनुष्य के बीच ना बराबरी का रिश्ता बरकरार है, जो आज भी देखा जा सकता है।  वे जानते थे कि भारतीय समाज में एक ओर वे अधिनायकवादी ताकतें हैं जो लोकतंत्र के माध्यम से भी शोषण और ना बराबरी की परम्परा को बनाये हुए हैं। और दूसरी ओर इनमें संघर्ष करती हुई ताकतें भी हैं किन्तु वे अभी कमजोर हैं। फिर भी वे सोचते थे कि यह संघर्ष चलता रहेगा और कवि को इसकी पहचान करते हुए अपना रचना कर्म करना चाहिए। दरअसल, समय के आर-पार देखने का यह अर्थ है। उन्होंने अपने काव्य संकलन, लोग भूल गये हैं', की भूमिका में लिखा है- 'न्याय और बराबरी के जन्मजात आदर्श' को बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर कवि रघुवीर सहाय ने अपनी चेतना में आत्मसात किया था। उन्हें दया, सहानुभूति और करुणा जैसे मानवीय भावों में भी कहीं न कहीं ना बराबरी और अभिजात्यवादी अहं की गंध महसूस होती थी। अपनी इस रचनात्मक संवेदना को उन्होंने कहानियों और गद्य में तो सीधे-सीधे ब्यान किया ही है, वहीं संवेदना कविताओं के भीतर भी सूत्र की तरह पिरोया है। 'सीढिय़ों पर धूप में', की एक कविता, 'हमने यह देखा' में साफ  तौर से उन्होंने अपनी इस काव्य संवेदना को अभिव्यक्त किया-

'हम ही क्यों तकलीफ  उठाते जायें

दुख देने वाले दुख दें और हमारे

उस दुख के गौरव की कवितायें गायें

यह है अभिजात तरीके की मक्कारी

इसमें सब दुख है, केवल यही नहीं है

.... अपमान, अकेलापन फाका, बीमारी।

सामाजिक अन्याय का प्रतिकार ही उनकी रचनाओं का संवेदनात्मक उद्देश्य था। 'आत्महत्या के विरुद्धÓ की रचनाओं में रघुवीर सहाय का रचनाकार पूंजीवादी जनतंत्र की आड़ में किए जा रहे शोषण, दमन का विरोध करता है। उक्त संकलन की पहली ही कविता 'नेता क्षमा करेंÓ, में उन्होंने लिखा है-

'मैं तुम्हें रोटी नहीं दे सकता न उसके साथ खाने के लिए गम

न मिटा सकता हूँ ईश्वर के विषय में तुम्हारा भ्रम

लोगों में श्रेष्ठ लोगों मुझे माफ करो

मैं तुम्हारे साथ आ नहीं सकता।

'आत्महत्या के विरुद्ध' की कविताओं में जिस 'नयी हंसीÓ की चर्चा रघुवीर सहाय ने की थी, वह आपातकाल के दौरान एक अमानवीय ठहाका बनकर सामने आ गई। 'हँसों हँसों जल्दी हँसों' की कविताएँ सत्तारूढ़ तानाशाह की निर्मम हँसी का एक चित्र उपस्थित करती है- 'हँसों तुम पर निगाह रखी जा रही है बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे।

रघुवीर सहाय ने मध्यवर्गीय समाज को यह अहसास दिलाया कि अकेले-अकेले रहकर हर कोई अधिनायकवादी ताकतों के हाथों मारा जायेगा। अगर संगठित नहीं होंगे तो हर 'रामदास की हत्या' होगी।

खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर

दोनों हाथ पेट पर रखकर

सधे कदम रख करके आए

लोग सिमट कर आँख गड़ाये

लगे देखने उसको जिसकी तय था हत्या होगी।

'लोग भूल गए हैं' की कविताओं में रघुवीर सहाय बार-बार यह याद दिलाते हैं कि हमारे समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों को भुलाया जा रहा है। मध्यवर्ग के लोग जनवादी अधिकार के लिए लड़ लेते हैं मगर उन मूल्यों को भूल गए हैं जिनकी हमने आजादी के समय प्रतिज्ञा ली थी-

पढ़े लिखे लोगों  का

जब दिल बहलाता है

खून किसी और का

करता है आक्रमण

निष्ठुर निहत्थे पर

दमन नए दौर का।     

रघुवीर सहाय नए दौर के दमन की महीन प्रक्रिया को खूब समझते थे। आतंकवाद की मुहिम और सांप्रदायिकता के फैलाव के पीछे शासक वर्गों की और दुश्मनों की चाल को वे भलीभांति समझते थे इसीलिए ये बेबाकी से कहते थे कि- 'देते हैं हथियार/शासक गरीबों को/पानी नहीं देते।'14 पोखरण में अणु अस्त्र विस्फोट के बाद नयी की पहली गरमी के दिनों में पानी की कमी ने पूरे राजस्थान और गुजरात में अकाल की जो स्थिति पैदा कर दी, वह कवि की उक्त पंक्तियों से पूरी तरह चरितार्थ होती है।

रघुवीर सहाय की कविता में 'पानी' का बिंब शुरू से अंत तक बार-बार आया है। पानी मनुष्य की न केवल पहली जरूरत है बल्कि समता और समरसता का प्रतीक भी है। हमारे समाज में सरकारें बार-बार यह घोषणा करती है कि अमुक साल तक हर किसी के लिए पीने को पानी की व्यवस्था हो जायेगी। मगर यह वायदा कभी पूरा नहीं होता। आज भी अकाल और सूखे की स्थितियाँ हर जगह बनी रहती है।

 'सच क्या है' कविता में वे लिखते हैं- इस झूठे करुणामय मन को धिक्कार है वह दुख ही सच्चा है जो हमने झेला है। इसी तरह इस संकलन में एक कविता है 'फूट', जिसमें वे आज भी सांप्रदायिकता के माहौल पर टिप्पणी करते हैं कि दंगों में मारे जाने वाले और बचे हुए के बारे में भी हमारे भीतर एक असमानता का बोध काम कर रहा होता है। असमानता की चेतना सिर्फ  यह जानने की कोशिश करती है कि जो मारा गया वह हिंदू था या मुसलमान या सिख, वह ऐसा नहीं सोचने देती कि जो मारा गया एक इंसान था। इसी को कविता में उन्होंने इस तरह प्रस्तुत किया है-

हिन्दू और सिख में

बंगाली और असमियों में

पिछड़े और अगड़े में

पर इनसे बड़ी फूट

जो मारा जा रहा और जो बचा हुआ

उन दोनों में है।

मनुष्य मनुष्य के बीच समानता की भावना रखने वाले नए मानव की खोज उनका रचनात्मक लक्ष्य था। शुरू के ही दिनों में अपने एक लेख में उन्होंने लिखा था कि 'संश्लिष्ट रूप में नए, मानव की खोज ही नई कविता का धर्म है। वे जीवनपर्यंत इसी नए मानव की खोज में लगे रहे। मूल्यों के स्तर पर बेहतर आदमी बनाने की उनकी कामना से ही उनकी रचनात्मकता को ऊर्जा मिली। अपने अंतिम संकलन के 'साइकिल रिक्शाÓ कविता में रिक्शा चालक और सवार के बीच की असामनता उन्हें खटकती है, लेकिन एक बिंदु पर जब उनमें समानता देखते हैं तो कह उठते हैं-

सिर्फ जब ढुलाई पर दोनों झगड़ते हैं

हैसियत उनकी बराबर हो जाती है।

वे शोषित जन की हैसियत को इस समाज में जैसी है वैसी नहीं देखना चाहते थे। जहाँ भी ना बराबरी को अमल में आते देखते थे, वे अभिव्यक्ति के खतरे उठाने को तैयार रहते थे। वे जन के दुश्मन को पहचानते थे। 'टेलीविजन' कविता में वे जो कहते हैं, वह आज भी कितना सही है, यह कहने की आवश्यकता नहीं-

'वह चेहरा जो जिया या मरा व्याकुल जिसके लिए दिया

उसके लिए समाचारों के बाद समय ही नहीं दिया

तबसे मैंने समझ लिया है आकाशवाणी में बन ठन

बैठे हैं जो खबरों वाले वे सब हैं जन के दुश्मन।

 रघुवीर सहाय की कविता में औरतें खिलंदड़ेपन का लक्ष्य नहीं रह गई। वे यथार्थवादी नजरीये से देखते हैं-

हाथ बालों पर नहीं जिनके कभी फेरा गया

बैठकर दो चार के संग

तजुर्बे अपने सुनाने का नहीं मौका मिला,

औरतें वे सूख कर रह गई'

उनकी बच्चियों ने जवां होकर हादियों की कोठियाँ पायी।

मरणोपरांत प्रकाशित 'एक समय था' संग्रह में औरतों पर जो कविताएँ हैं उनमें औरत या तो जुल्म का शिकार हैं या फिर शिकार बनने की प्रक्रिया में है। 'औरत की पीठ' उनके इस नजरिए का साक्ष्य है-

औरत की पीठ उसका इतिहास है

उस पर जुल्म का असर वहाँ देखो

अपने सीने का अगर उसने छिपा रखा हो।

आखिरी संग्रह की कविताओं में नारी विषयक जो कविताएँ हैं उनमें उसका शोषित रूप ही ज्यादा है, उन कविताओं में 'माँ' है, 'मेरी स्त्री', 'संगिनी' है, 'उसका मन' है। नारी की चेतना में आने वोल 'परिवर्तन' पर भी उनकी निगाह थी और 'नई पीढ़ी' की नई चेतना का भी अहसास उनमें था। अंतिम दौर की कविताएँ उनकी इसी जागरूकता का प्रमाण है। इस संबंध में राजेश जोशी ने ठीक ही कहा है कि 'स्त्री को लेकर उनका नजरिया बदला है।  उस चेहरे को देखने की कोशिश भी की है जो 'उसका विद्रोह है'। पुरुष समाज में स्त्री की स्थिति, उसकी अपनी मानसिकता और कमी का एक गहन विश्लेषण है। पर उसमें स्त्री की पीड़ा अधिक है, उसका जुझारूपन कम।'

इस तरह हम देखते हैं कि रघुवीर सहाय की कविता में समाज की क्रूर विसंगतियों का लेखा-जोखा है, उनके प्रति क्षोभ है, आलोचना है, इस सबके बावजूद इन विसंगतियों और अभावों को दूर करने के लिए यानी समाज को विकास के अगले चरण में ले जाने के लिए एक वैचारिक संकल्प है। वे जन के दुश्मन वर्गों के खिलाफ  खड़े होकर भी खुद को अकेला रखकर 'व्यक्ति स्वातंत्र्य' की कामना रखते थे। वे जन के लोकतांत्रिक सरोकारों के कवि थे, इसीलिए उनका हिंदी कविता में और हमारे सांस्कृतिक रचनाकर्म में महत्वपूर्ण स्थान रहेगा।