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Wednesday 14 Nov 2018

कश्मीर : आम धारणा और जमीनी हकीकत

कहते हैं कश्मीर की खूबसूरती को देख कर जहाँगीर के मुँह से निकला धरती पर कहीं जन्नत है तो यहीं हैं। आज धरती के इस स्वर्ग में अविश्वास, घृणा और नर्क फैला हुआ है। यह आम धारणा है कि कश्मीर के लोग पाकिस्तान परस्त हैं और वहां आतंकवाद को बढ़ावा देने में कश्मीरियों की अहम भूमिका है। यह भी कहा जाता है फौजियों पर पत्थर फेंकने वाले नौजवान कश्मीरी जिनमें लड़के-लडकियां शामिल हैं, को आतंकी गुटों से पैसा मिलता है। लगभग यही तस्वीर देश का पूंजीवादी मीडिया भी पेश कर रहा है। पर जमीनी हकीकत इससे इतर है जो हमें 14 अप्रैल से 19 अप्रैल तक कश्मीर के गांवों, कस्बों में वहां के लोगों से मिलते हुए ,जम्मू, श्रीनगर,कालेज, यूनिवर्सिटी के छात्रों अध्यापकों, कारोबारियों और आम कश्मीरी से मिल कर उनसे बातचीत करने बाद पता चली। किसी भी देश या उस क्षेत्र को, जहाँ कुछ लोग अपने सामाजिक-सांस्कृतिक वजूद के साथ रहते हैं और अपनी शैली में जिन्दगी जीते हैं, एक तहजीब और अपनी पूरी कायनात रचते हैं, को महज धरती का एक टुकड़ा समझ कर उसे जबरन हड़पने की जद्दोजहद के दायरे में देखना नाइंसाफी होगी। रंग-रूप और जीवन शैली की विविधिता इन्सानी एकता में कहीं बाधा नहीं बनती। मनुष्य के जंगली चौपाये से सामाजिक प्राणी बनने की लाखों वर्षों की प्रक्रिया से हम सब वाकिफ ही हैं। फिर यह जंग क्यों,फौजें और सरहदें क्यों? फौजें और सरहदें हमारे सभ्य होने या सभ्य कहलाने पर सीधा सवाल है। हम अगर सरहदें खत्म नहीं कर सकते तो उन्हें ढीला तो कर ही सकते हैं। जैसे परस्पर लडऩे वाले यूरोप के देशों में हुआ है और बर्लिन की दीवार तक ढहा दी गयी। यह सब वहां की सरकारों ने जनता के दबाव में किया है। आज उसी दबाव की जरुरत है। जनता से जनता के मिलने की यानी पीपुल टू पीपुल कॉन्टैक्ट की। लोग मिलने लगेंगे, मिलजुल बातें करेंगे तो फौजों की जरुरत भी धीरे-धीरे कम होने लगेगी। फौजों का होना और दुनिया के देश की फौजों का आपस में लडऩा कोई देशभक्ति या बहादुरी का कारनामा नहीं है। यह राज्य सत्ताओं की सियासत है जिसकी शिकार होती देशों की जनता और मारे जाते हैं निर्दोष लोग। इसका ज्वलंत उदहारण है अमेरिका-वियतनाम का चला बारह साल का युध्द जिसमें तमाम अमेरिकी फौजी अफसरों ने इस्तीफे दिये और तमाम जंग के डरावने और घिनौने मंजर को देख कर मानसिक रोगी हो गये। कोई भी फौज किसी देश की फौज को तो हरा सकती है पर उस देश और उसकी जनता को नहीं हरा सकती, क्योंकि वे परस्पर दुश्मन होते ही नहीं हैं। हिंदुस्तान-पाकिस्तान की सरहदें खोल दीजिये सब झगड़े खत्म हो जायेंगे। सब एक दूसरे से मिलने को बेताब हंै। मिलने की यह प्यास जंग का जहर घोल कर पी जायेगी। जनता की यही महानता होती है। यह जंग की सियासत हथियारों के सौदागर अपने व्यापार को फलने-फूलने के लिए करते हैं जिसमें दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था का 60 से 70 फीसदी धन लगा है। इसी नजरिये से हम चार साथी एम के सिंह, मोहम्मद मसूद, ओ पी सिन्हा और बी एस कटियार लखनऊ से कश्मीर, कश्मीर की जमीनी हकीकत जानने गये थे। हम किसी बैनर या मंच के तहत नहीं थे बस इतना था कि हम उनका दर्द और उसकी हकीकत जानना चाहते हैं। पूँजीवादी मीडिया एकतरफा तस्वीर पेश कर कश्मीर और वहाँ के लोगों की छवि बिगाड़ रहा है। हम यह भी तय करके गये थे कि उन्हें अहसास करायें कि हम उनके साथ खड़े हैं और हम देश की जनता को उनके संघर्ष के साथ जोडऩे की मुहिम चलाना चाहते हैं। इस यात्रा की प्रेरणा थे जाने-माने विचारक, चर्चित लेखक और एक्टविस्ट साथी गौतम नौलखा जिन्होंने पिछले वर्ष लखनऊ की एक गोष्ठी में कहा था कि हम लोगों को कश्मीर जाकर वहां के लोगों से मिल कर वहां की हकीकत जाननी और समझनी चाहिए और कश्मीरियों के संघर्ष के साथ खड़ा होना चाहिए। कश्मीरियों का दर्द बहुत बड़ा है और एक जख्म की तरह पक गया है जो छूते ही फूट कर बहने लगता है। जम्मू से हम लोग श्रीनगर के लिए जिस टैक्सी से रवाना हुए उसका चालक एक कश्मीरी नौजवान इरफान था जो श्रीनगर का रहने वाला है। उसने रास्ते में हम लोगों से कहा अंकल आप लोग श्रीनगर में हमारे घर ठहरिये। हमारे मेहमान बनिये , हम आपके खाने-ठहरने का इंतजाम करेंगे और पूरा श्रीनगर अपनी गाड़ी से घुमएंगें। यह थी कश्मीरियत से शुरुआती मुलाकात। इरफान यही कोई पच्चीस साल का नौजवान रहा होगा जिसने अलीगढ़ से एम ए बी एड की डिग्री हासिल की है और श्रीनगर में उसका घर है । वह घर में अकेला मर्द है और पांच बहने हैं जिनके पढ़ाने-लिखाने और शादी ब्याह की जिम्मेदारी उसके कन्धों पर है। उसके वालिद और माँ का पहले ही इन्तकाल हो चुका है। उससे दो बड़े भाइयों को फौजियों ने आतंकी बता कर एनकाउन्टर में मार दिया जिसमें एक सरकारी नौकरी में था। इरफान को अपने भाई की जगह नौकरी इसलिए नहीं दी गयी क्योंकि उसके भाई को आतंकी बता कर उसका एनकाउन्टर किया गया था। वह टैक्सी चलाता है और यह टैक्सी उसकी खुद की है। कश्मीर में हर किसी के पास कम से कम अपना घर और खाने-कमाने के लिए कुछ न कुछ तो है। हमारे इलाकों में जाड़ों में जो कश्मीरी शाल और मेवे बेचने आते हैं वे कश्मीरी किसान होते हैं जो माइनस डिग्री तापमान में यू पी- बिहार में कारोबार के लिए निकल पड़ते हैं। यद्यपि एक बड़ी संख्या में कश्मीरी पढ़े-लिखे बेरोजगार नौजवान बेकार घूम रहे हैं। वे मेहनती और स्वाभिमानी हैं इसलिए सेव और अखरोट के बगीचे उनकी मेहनत के पसीने से महकते-लहकते रहते हैं। कश्मीरी खुद नहीं बोलते पर कश्मीर के हालात जानने के बारे में कहने पर वे बम की तरह फूट पड़ते हैं। यह तजुरबा हमें अपनी पूरी कश्मीर यात्रा में लोगों से मिलते हुए हुआ। चाहे छात्र हों या अध्यापक या किसान- मजदूर या कारोबारी सबके दिल जख्मी हैं और दर्द से भरे हैं। पर किसी हिन्दू या किसी हिन्दुस्तानी के प्रति जरा भी नफरत नहीं है उनके अन्दर। उनका झुकाव पाकिस्तान की तरफ भी नहीं है। इरफान के अन्दर आज के मीडिया के प्रति गहरा गुस्सा भरा है। वह कहता है कि मीडिया ने कश्मीर की छवि बिगाड़ी है। वह फौज और मीडिया से एक जैसी नफरत रखता है। लगभग हर आम कश्मीरी का वहां तैनात फौज और मीडिया के प्रति यही नजरिया है। बीएसएफ, सीआरपीएफ तथा फौजी बटालियन मिला कर 10 लाख फौजी वहां वहां तैनात हैं। जगह-जगह गांवों तक में फौजी अड्डे देखने को मिले। पुलवामा, अनन्तनाग, वेरीनाग जैसे तमाम इलाकों में चप्पे चप्पे पर फौजी सिपाही संगीन ताने खड़े मिल जायेंगे। यह है कश्मीर की जमीनी हकीकत। पर इसके बावजूद कश्मीर अपनी कश्मीरियत से जुदा नहीं हुआ है। वे मोहब्बत और मेहमाननवाजी से लबरेज हैं। कश्मीर के नौजवान राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक चेतना से लैस हैं जो इरफान की बातचीत से जाहिर है। जम्मू के कठुआ में नाबालिग के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के खिलाफ प्रतिरोध की लपटें पूरे कश्मीर में दिखाई दीं जिसमें नौजवानों और छात्र- छात्राओं की शिरकत सबसे ज्यादा दिखी। हम अनन्तनाग के अक्कड़ इस्लामाबाद गाँव में एक कश्मीरी परिवार के मेहमान बने। वे लोग अनन्तनाग अपनी कार से हम लोगों लेने आये यह उनकी मेहमाननवाजी का नमूना है। उनके गाँव के मोड़ पर हाइवे पर ढाबे और मिठाई की दुकानें है जिसमें एक मिठाई की दुकान उत्तर प्रदेश के बिजनौर के एक हिन्दू की है जो कश्मीरियों के बीच अपने को पूरी तरह महफूज मानता है। कश्मीरी परिवार से मिल कर एक ऐसी खुशी की अनुभूति हुई जिसे इजहार करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। हमारे वहां पहुँचने की सूचना परिवार में सबको थी। इसलिए हमारे पहुँचने से खुशी की चमक हर किसी के चेहरे पर थी। कश्मीरियों के बैठक या ड्राइंग रूम में फर्नीचर यानी सोफे-कुर्सियाँ आदि नहीं होती। बड़े से हालनुमा कमरे में एक सुन्दर सी कालीन और दीवार से टिके कुशन, मसनद और तकियों से सजी बैठक। एक हसीन महफिल का नजारा जहाँ स्त्री-पुरुष बच्चे पूरी आजादी से बैठते बतियाते हैं। मुझे यह सब देख कर एक अजब सा कौतूहल हो रहा था।  हम लोग तकियों के सहारे टिके बैठे थे कि परिवार का एक नौजवान पानी लेकर हाथ धुलाने आया। इन रिवाजों को देख कर हम कश्मीरियत को सीधे देख पा रहे थे। हर कश्मीरी अपने घर के बगीचे में खाने भर की सब्जियां जरुर उगाता है। मुर्गे-मुर्गियां और दूध के लिए गाय हर कश्मीरी के घर में मिलती है। एक अजब उत्सव जैसा माहौल था। सब प्रेम और मोहब्बत के भावों से लबरेज थे। हमने वहां एक अखरोट का पौधा लगाया इस उम्मीद के साथ कि जब यह दरख्त बनेगा हमारी मोहब्बत की मिठास अखरोट के फलों में घुल जायेगी। यहां हमने मस्जिद और गुरुद्वारे को एक ही स्थान पर साथ-साथ सटे हुए देखा जो साम्प्रदायिक सद्भाव और भाईचारे का जीता जागता सबूत है।

      सिख साथियों से मिल कर बात करने पर पता चला कि कश्मीर में हिन्दू-मुस्लिम कोई मुद्दा ही नहीं है। कश्मीरी यानी कश्मीरी. न हिन्दू न मुस्लिम, जाति न बिरादरी। मुस्लिम हिन्दुओं की शवयात्रा तक में शामिल होते हैं और हिन्दू भी कब्रगाह जाते हैं। यहाँ के मुस्लिम समाज के आज भी कश्मीरी पण्डितों से सौहाद्र्रपूर्ण रिश्ते हैं जो पहले थे। वे एक- दूसरे के शादी विवाह में शामिल होते हैं। अभी भी जो कश्मीरी पण्डित कश्मीर में हैं उन्हें कश्मीरी मुसलमानों पर पूरा भरोसा और यकीन है। यह सारा बिगाड़ा राजनीति ने, जिसने दहशत फैलाकर कश्मीरी पण्डितों को भगा दिया ताकि कश्मीरी मुसलमानों को तबाह किया जा सके। कश्मीरी पण्डितों के रहते राज्य सत्ता का दमन चक्र कश्मीरी पण्डितों को भी प्रभावित करता और तब हिन्दू-मुस्लिम की सियासी आग इस तरह न सुलग पाती जो आज लपटों के रूप में सर्वनाश कर रही है। इस बीच जिस किसी से भी बात हुई तो दो टूक निष्कर्ष निकल कर सामने आया कि कश्मीर को भारत के रहने में कोई गुरेज नहीं है और वे रह ही रहें है वर्षों से साथ-साथ। सारा खेल सियासत ने बिगाड़ा है। हमें साथ साथ रहने की संभावनाओं पर और अधिक संवेदनशीलता से सोचने समझने की जरूरत है।

    यह मोहम्म्द बुर्हनुद्दीन वानी का इलाका है। जुलाई 2016 में इस एनकाउंटर ने पूरे कश्मीर को ही नहीं पूरे देश को हिला कर रख दिया था जिसकी कश्मीर में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई थी। प्रतिरोध की लपटें अभी भी थमी नहीं हैं।

टूरिज्म के इस पीक मौसम में भी लगभग सन्नाटा छाया था। डल झील जो शिकारों से भरी रहती थी। इक्का-दुक्का शिकारा ही दिखाई पड़े। आतंकी माहौल ने टूरिज्म के कारोबार को चौपट कर दिया है। हम लोगों ने एक शिकारा लिया जिसको जहूर मियां चला रहे थे। 5 से 8 बजे रात तक तीन घन्टे हम लोग शिकारा में डल झील घूमें। डल झील भी पुलिस और आर्मी सिक्योरिटी की गिरफ्त में थी। लोगों से बात करते तो सबके दिल दर्द से कराह रहे हैं। सब कहते कि कश्मीर की जन्नत को किसी की बुरी नजर लग गयी।

    वेमिना डिग्री कालेज में प्रो.नदीम अहमद ने हमें अपने साथियों से मिलवाया। सबके अन्दर यह जान कर खुशी थी हम उनके हालात जानने आये हैं। पर बड़ी टीस भी थी उनके अन्दर। बार-बार अपने जख्मों को खोल कर दिखाने से जख्म और हरे हो जाते हैं और दर्द भी बढ़ जाता है। पर उन्होंने हमारे जज्बातों की कदर की। उनकी आप बीती सुन कर न सिर्फ हम रोये वे सब भी फूट-फूट कर रोये। तब हमें लगा दमन और तबाही का मंजर किस स्तर तक पहुँच गया है। प्रो. जी डी वानी (पर्सियन),प्रो.आतिब मंजूर (अरबिक),प्रो. नदीम अहमद (इकनामिक्स),तारिक अहमद(उर्दू),प्रो. बिलाल (इंगलिश),प्रो.मालिक (इकनामिक्स) तथा प्रो.अमरजीत सिंह(हिंदी) ने आज के दौर के कश्मीर पर अपने विचार व्यक्त किये। कश्मीरियों का कहना है कि हालत इतने खराब हो गए हैं कि डेफिसिट ऑफ ट्रस्ट की स्थिति पैदा हो गयी है। उनका मानना है कि सरकार की पालिसी अप्रोच सही नहीं है। कश्मीरियों ने अब डरना छोड़ दिया है। उनका कहना है कि वे यहूदी नहीं हैं जो उन्हें खत्म कर देंगे। प्रो.बिलाल और मलिक ने यहाँ तक कहा कि मौजूदा सरकार उन मुसलमानों के साथ क्या सलूक करती है जो हिंदुस्तान के नागरिक हैं। आये दिन पाकिस्तान भेजने की धमकी। हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति आज का चालू सिक्का है। मुसलमानों को तबाह कर वे हिन्दू वोट संगठित करते जबकि उन्हीं हिन्दुओं में दलितों और पिछड़ों के साथ उनके सलूक मुसलमानों से कम बदतर नहीं हैं। कश्मीर के लोग हिंदुस्तान के साथ रहें इसकी संभावनाएं तलाशी जानी चाहिए पर हालात क्यों बिगड़े और किसने बिगाड़े यह उससे जरुरी और बड़ा सवाल है। जब हमने कहा कि कश्मीर घूमते हुए हमने देखा कि कश्मीरी लोग मेहनती हैं तो उनके चेहरे चमक आई और बोले चलो आप लोगों ने माना तो कि कश्मीर मेहनती हैं। वरना यहाँ तो यह आरोप लगाया जाता है कि कश्मीरियों के गाल केंद्र सरकार से मिल रहे पैसे से लाल हो रहे हैं।

       18 अप्रैल को श्रीनगर से दोपहर 12 बजे चल कर अवन्तिपुरा के रास्ते हम त्राल मिदूरा गाँव पहुंचे जहाँ एक 70 वर्षीय बुजुर्गवान अब्दुल रसीद वानी अपने परिवार के साथ हमारा इंतजार कर रहे थे। कश्मीर के हालात पर बात करते हुए वे सहम जाते हैं और कहते हैं कि हालात ठीक नहीं हैं और फौजों के रहते ठीक होने की उम्मीद भी नहीं है। वे बेझिझक आरोप लगाते हैं कि हिंदुस्तान की सरकार कश्मीर को इसलिए तबाह कर रही है ताकि उसके हिन्दू वोट की फसल लहलहा सके। उनके घर की दीवार पर गोलियों के निशान देखने को मिले। अब लोग इन चीजों के आदी हो गये हैं। शाम तीन बजे हम रसीद साहब के साथ कार से बुरहान वानी के घर त्राल गए और बूढ़े दादा से मिले। बुरहान वानी की कब्र के पास उन तमाम नौजवानों की भी कब्रें हैं जो फौज की बन्दूक से मारे गये हैं। थोड़ी देर में पता चला कि आर्मी किसी नौजवान को उठा ले गयी है। सड़कों पर नौजवानों की भीड़ इकठ्ठा हो गयी। रास्ते में भीड़- भाड़ और तनाव का मंजर देखते हुए घर पहुंचे। सेव के दरख्त में कलम की ग्राफ्टिंग कर तमाम किस्म के सेव एक ही दरख्त में लगते हैं। इस करिश्माई जानकारी ने हमें अचम्भे में दाल दिया। आधुनिक तकनीकी और वैज्ञानिक जानकारियों से लैस हैं कश्मीर के किसान। रशीद साहब ने एक कुशल गाइड की तरह हमें तमाम चीजें दिखाई और सेव पकने के समय यानि नवम्बर- दिसम्बर के महीने कश्मीर आने की दावत भी दे डाली। बेगमपुरा एक्सप्रेस छूट जाने और हिमिगिरी के 12 घंटे लेट होने के कारण हम लखनऊ 21 अप्रैल को रात आठ बजे अपने घर पहुँचे। बहुत थकान और यात्रा का हैंग ओवर दिलोदिमाग पर अभी तक छाया हुआ है। कश्मीरियों के खुशमिजाज चेहरे और कश्मीर में अमन लाने के जलते सवाल हमारी नम आँखों में तैर रहे हैं। हमने अपने कश्मीरी भाइयों से कुछ वायदे किये हैं और उसी दिशा में आगे बढऩा है। इस यात्रा में मैं जान और समझ सका वह यह है कि कश्मीर में  हिन्दू- मुस्लमान, ऊंच-नीच और अमीर-गरीब का भेद बिल्कुल नहीं है। भिखारी शायद ही कहीं दिख जाय। बेपनाह मोहब्बत और दोस्ती-यारी और मेहमान नवाजी से भरे मेहनती और ईमानदार लोग। कुदरत ने जो खूबसूरती कश्मीर को बख्शी है वह कश्मीरियों की शख्सियत में भी झलकती है और यही है उनकी कश्मीरियत जिस पर उन्हें फख्र है। पूरा कश्मीर सूफियाना इश्क में डूबा दीखता है। कश्मीर एक दोस्त की तरह हमारे साथ रह सकता है पर उपनिवेश की तरह नहीं और न ही छोटे और कमजोर भाई की तरह। इस सच्चाई पर गौर करने की जरुरत है। कश्मीर की समस्या जितनी भौगोलिक है उतनी ही ऐतिहासिक की भी क्योंकि इसकी सीमाएं पाकिस्तान से मिलती हैं। आज असल समस्या अजनबियत और परायेपन के बोध की है। इस बोध को दूर किये बिना कश्मीर समस्या का समाधान सम्भव नहीं है। परायेपन का बोध केवल कश्मीरियों में ही नहीं है हम भारतीयों में भी कम नहीं है। हम में कश्मीर के लिए अपनापन होता तो पूरा देश कश्मीर में हो रहे इस दमन के खिलाफ खड़ा दिखाई देता।