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Wednesday 14 Nov 2018

आधी अधूरी कहानी

विचारों के भंवर जाल से मैं उन्मुक्त नहीं हो पा रहा था, महिला को मैंने कहाँ देखा याद नहीं आ रहा था लेकिन उसके गोरे और नर्म हाथ के स्पर्श से मुझे अजीब सी अनुभूति हुई।

जाड़े की गुनगुनी धूप मेरे अंदर ढेरों पलों की मिठास घोले थी। सांस ऊपर नीचे हो रही थी। मैं सुदीर्घ श्वांस छोड़ते हुए बोला, ''मैडम आप डिटेल से कुछ बताएं... मुझे कुछ याद नहीं आ रहा।‘’

''आप मुझे नहीं पहचानते?’’ विस्फारित नेत्रों से उसने कहा। मैं हतप्रभ रह गया, ये क्या कह रही है.? सुबह-सुबह वह मेरे घर आ गई थी और मुझे देखे जा रही थी। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था।

''माफ  कीजिये, आइये बैठिये।‘’

वह अहाते में पड़ी कुर्सी पर बैठ गई मैं भी पास पड़े स्टूल पर बैठ गया।

मेरी निगाहें उस पर उठीं, वह गजब की सुन्दर थी, झक्क सफेद रंग, तीखे नाक नक्श, काले लंबे घुंघराले बाल ं...! मैं अपलक देखता रह गया।

वह बोली, ''कहां। खो गये?’’

''कहीं नहीं...।‘’चौंकते हुए मैंने कहा, जैसे तंद्रा से किसी ने जगा दिया हो। मेरे समक्ष एक अप्रतिम महिला बैठी थी, यादों को विराम ही नहीं लग रहा था, ये कैसी विडम्बना है, अपनों से परिचय मांगना...। मेरी यादें साकार नहीं हो रही थी, मैं निरंतर गोता खाये जा रहा था।

'' मैं सपना...।‘’ वह बोली, ''बीस साल पहले कान्वेंट स्कूल में हम पढ़ते थे।‘’ धुंधली सी तस्वीर मेरी आंखों में खिंची, छोटी फ्राक पहनी परी सी चहकती, महकती सपना। यादें जैसे महक गई। हम साथ ही रहते थे। वह बस्ता टांगे हमारे साथ स्कूल जाया करती थी, अक्सर बस्ता मुझे देती कहती तू टांग बहुत भारी है। मैं दो बस्ते लेकर चलता, वह अलमस्त सी चलती। तस्वीर साफ  होती गई। मेरे पड़ोस में सिंह साब रहते थे। उनकी लड़की सपना...।

''हाँ... हाँ... याद आया’’ उछलते हुए मैंने कहा जैसे पतंग हाथ में आ गई हो।

''डोर तुम्हीं तो खींचते थे, मैं गर्रा थामे रहती थी।‘’

लगा जैसे मेरी मन की बात उसने जान ली। आंखों से हंसी झर गई। बचपन की याद मिश्री-सी घुलती जा रही थी। विश्वास भी नहीं हो रहा था। मेरी सूनी वीरान जिन्दगी में अचानक चटक रंगों की कूची चलेगी सोचा भी नहीं था, पूछे बिना न रह सका, ''अब तक कहाँ थी?’’

''दुबई से कल ही लौटी हूँ।‘’

''दुबई कैसे?’’ ''कई सालों से वहीं रह रही हूँ। पापा ने बेकरी खोली है।‘’ ''मेरी याद कैसे आई?’’ उसकी झील सी गहरी आंखों में झांकते हुए पूछा?

एक क्षण तो वह हड़बड़ा गई थी। ऐसे प्रश्न की उसे आशा नहीं थी, फिर बोली, ''आपकी किताब पढ़ी, ये गुलिस्तां... बस दिल हो आया।‘’ मैं बाग-बाग हो गया जैसे रेत पर पानी की फुहारें बरस गई हो, किताब इतनी प्रसिद्ध होगी सोचा भी नहीं था। काश किताब का कॉपी राइट मेरे पास होता, कुछ पैसा मिल जाता। कमाई तो प्रकाशक को चली गई। गहरी सांस लेकर रह गया।

       आज सुबह ठंड थी, ठंड से निजात पाने बाहर धूप में आया था, धूप तो बादलों में छिप गई लेकिन रोशनी से नहाई हुई कल्पना साकार हो गई। ये सुखद क्षण मीठे अहसास से भर गये। कुछ क्षण खामोशी पसरी रही बातों का सिलसिला कैसे बढ़ाया जाये, मैं सोच ही रहा था कि दूब को पैरों की अंगुलियों से कुरेदते हुए उसने कहा, आपने तो एक खत भी नहीं डाला। मैं अवाक रह गया, कैसा खत... कुछ अता-पता नहीं... बचपन की यादों का पुलिंदा तो पीछे छूट गया था, कब तक ढोता, बोला, ''वो दिन आपको आज भी याद है? उसे जैसे शूल से चुभ गये, दर्द की आड़ी तिरछी रेखाएं चेहरे पर खिंच गई, मैं बात सम्भालता हुआ बोला, मुझे सब याद है, मैं आपसे पूछ रहा हूँ।‘’

नर्म हाथों को मोड़ते हुए उसने कहा, ''ये आप-आप क्या लगा रखा है, तुम नहीं बोल सकते।‘’ ''हाँ... हाँ... क्यों नहीं, तुम्हारी तस्वीर आज भी हमारे पास है।‘’ यह सुन वह मोगरे सी गमक उठी। मैं मीठे अहसास से भर गया।

बचपन की घटनाएं जैसे हमें पुराने दिनों की ओर घसीटती रही। मेरे घर की माली हालत वैसे ठीक नहीं थी, चाय शक्कर उधार लेने मैं उसके घर यदा-कदा पहुँच जाता था वह खुशी से देती। मैं लौटाने की बात करता तो मेरे मुख पर अंगुली रख देती, मैं उसे देखता रहता...।

छुट्टियों के दिन हम जुहू बीच जाते... रेत के घर बनाते। मेरा घर उससे ऊंचा बनता। वह जब भी मुझसे ऊँचा घर बनाती, भरभरा कर गिर जाता, वह उदास हो जाती, मुंह बना के बैठ जाती मैं मनाता वह मचलती भाग खड़ी होती पर क्षण में आ भी जाती। बचपन का प्रेम प्रसंग डेढ़-दो साल चलता रहा एकाएक उसके पापा पड़ोस का मकान छोड़ कर रायपुर चले गये। यादें भूली बिसरी हो गईं।

उन यादों के लुभावने सुरों ने आज झकझोर सा दिया... एक ऐसी प्रेरणा जिसकी चाह में किताबों की किताबें लिखी आज उसे समक्ष देख अंदर के रेशे लहरा गये। मन फूला नहीं समा रहा था।

बैठे-बैठे एक घंटा गुजर गया, धूप चली गई, हवा का ठंडा झोंका आया। वह सिहर उठी, उसकी लालिमा और प्रखर हो गई, बाल चेहरे पर उड़ आये। मैं अविरल देखता रहा। बालों को सहेजते हुए उसने कहा, ''यहां तो बहुत ठंड है।‘’

''हाँ हवा चल रही; चलो अंदर चलते हैं।‘’ मैंने उठते हुए कहा।

हम दोनों अंदर आये। मेरा छोटा सा कमरा था एक दीवान दो कुर्सी और एक मेज ही थीं। मेज पर पुस्तकें और कागज फैले हुए थे। मैं समेटने लग गया।

''मैं समेट देती हूँ।‘’ पुस्तकें उठाते हुए उसने कहा,

नहीं... नहीं... रहने दो आप बैठिये।‘’

''फिर आप!’’ वह तुनक कर बोली

''सारी... तुम बैठो...।‘’ ''क्या हो गया, मैं तुम्हारी मदद नहीं कर सकती बचपन में हम शायद इसी कमरे में पढ़ा करते थे।‘’ यादें पुन: झकझोर गई। रोज ही हम दोनों इस कमरे में नोट लिखते... और शर्त लगाते कि कौन जल्दी नोट लिखता है। इसमें मैं ही जीतता और वह बस्ता पटक कर चल देती। मैं ही उसके घर बस्ता पहुँचाता।

वह कमरे को गौर से देखने लगी, एक सीलिंग फैन, दीवार घड़ी और दो पुरानी पेंटिंग टंगी थी। फर्श खुरदुरा था। उसका ध्यान भटकाते हुए मैंने कहा ''पेपर पढिय़े मैं चाय बनाता हूं।‘’ ''हरीश क्यों तकलीफ  करते हो। मैं बना देती हूँ।‘’

इस बार उसकेे मुख से अपना नाम सुनकर मन प्रफुल्लित हो गया,

''नहीं नहीं बैठो, मैं बनाता हूँ।‘’

वह पेपर देखने लगी मैं अंदर चाय बनाने चला गया। कुछ ही क्षण में मैं चाय बनाकर ले आया।

''और कौन रहता है यहाँ?’’ ''मैं और मेरी यादें।‘’ ''शादी नहीं की?’’ ''मन ही नहीं हुआ।‘’ वह गुलाब-सी गमक उठी, जैसे ओस की बूंदे पड़ गयी हों।

मैं अपने में ही डूबा था। जीवन के थपेड़ों से थका लेखनी के बल पर जी रहा था। मेरी विरासत भी यही थी, पूंजी भी यही। कल्पनाएं, भावनाएं सपने सब किताबों में ही गुंथ गये थे, कोई गीत निकल के ऐसा भरमायेगा, सोचा भी नहीं था।

आज अकसमात मेरी कल्पना में पंख जुड़ गये जिसे देख मैं आल्हादित तो था ही चिंतित भी कि उसे सहेजने मेरे पास कुछ भी तो नहीं। निर्धनता में कोई कैसे टिकेगा ये प्रश्न मुझे कौंध गये। वह मेरे मनोभाव को पढ़ते हुए बोली, मैंने मुम्बई में ही रहने का इरादा कर लिया है, विदेश से अब ऊब चुकी हूँ। डैडी ने गोरेगांव में मकान ले लिया है।

''माँ भी होंगी?’’ मैंने पूछा।

''नहीं हम दो ही हैं। माँ का आठ वर्ष पहले देहान्त हो गया।‘’

मैं समझ गया कि सपना ने शादी नहीं की। माँग सूनी दिख रही थी। गले में मंगलसूत्र भी नहीं था, कहीं शादी का विचार तो नहीं उठ रहा इसके मन में...। तरह तरह के विचार उमड़ गये। मेरी दीवारें तो बहुत कमजोर हैं भला ये गरीबी से कैसे समझौता कर पायेगी, जहां दो जून का खाना मुश्किल से पूरा होता है वहाँ ये कैसे सांस ले पायेगी। लेकिन दिल का एक कोना हर्षित था कि देर अबेर कोई अंदर झांका तो... अंधेरे में रोशनी तो चमकी।

कुछ देर चुप्पी पसरी रही मैं उसके अनुपम सौन्दर्य में खोया भीतर की रिक्तता को पाटने की जितनी कोशिश करता उतना उलझता जाता कि दरिद्रता में विहंसता चेहरा कब तक खुश रहेगा, उसे सहेजने के लिए उसके पास सागर जैसा तो कुछ नहीं।

पलकों को झपकाते हुए उसने कहा, ''मेरे साथ चलोगे ये गुलिस्तां में जो तुमने सपने देखे उनके सच होने का अब समय आ गया है।

मैंने सोचा सपने और यथार्थ में बड़ा अंतर होता है, मेरा अंतरंग कहीं उस पर भारी न पड़ जाये ये विचार मुझे बेचैन किये था।

मेरी खामोशी को स्वीकृति समझ उसने उठते हुए कहा, ''चलो सामान बाँधो।

''नहीं...!’’ दृढ़ता से मैंने कहा, ''मैं यह कोठरी नहीं छोड़ सकता, मेरा आधार तो यही है।‘’ यह सुनते ही उसके चेहरे पर दर्द की रेखाएं खिंच गई।

मुस्कुराता चेहरा पता नहीं कहाँ तिरोहित हो गया। मैं समझ गया मेरे न कहने से उसे दु:ख पहुँचा है लेकिन मैं अपने अस्तित्व को कैसे भूल सकता था। मैं उस पर बोझ नहीं बनना चाहता था, मेरी सामथ्र्य ही इतनी कहॉं थी, मैं सिकुड़ता हुआ कैसे रह सकता था। मेरी भावनाएं मेरी धरोहर थी मेरी चेतना कोठरी में थी। मैं उसे कैसे तज सकता था और वह यहाँ रह नहीं सकती थी। मेरा गुलिस्तां तो यही था। उसके फूल ही यहां खिले थे कैसे इससे मुख मोड़ता।

जीवन के अजीब मोड़ पर मैं खड़ा था। एक तरफ  जीवन का महकता सपना था तो दूसरी तरफ  मेरा वजूद...।

वह चुपचाप उठकर चली गई। मैं चाहकर भी नहीं रोक सका। उसकी ओझलता में, मैं यादों को महकाने की नाकाम कोशिश करता रहा।