Monthly Magzine
Wednesday 14 Nov 2018

सिल्विना ओकेम्पो की चार कहानियाँ

(1) लिविओ रोसा

उस लम्बे, स्याहवर्णी खामोश शख्स को मैंने पहले कभी किसी भी कारण हँसते या हड़बड़ाते नहीं देखा होगा। गरदन पर रूमाल लपेटा और मुँह में हमेशा सिगरेट फंसाया वह किसी भी चीज पर अपनी अखरोटी आँखें हरगिज नहीं गड़ाता। वह चिरयुवा था। उसका नाम था लिविओ रोसा लेकिन डुम्बो कहलाता क्योंकि बहरा होने का स्वांग रचता। वह आलसी था, लेकिन फुरसत के क्षणों (अकर्मण्यता को वह काहिली नहीं मानता) घडिय़ाँ सुधारता जिन्हें उनके स्वामियों को कदापि नहीं लौटाता। बनते कोशिश मैं लिविओ रोसा से दूर ही रहता। मैंने उसे अवकाश के दौरान जनवरी के एक दिन कछारी मैं देखा जहाँ वह गर्मी बिताने आया होगा। तब मैं नौ वर्ष का रहा होगा। अपने परिवार का वह सबसे गरीब शख्स था- रिश्तेदारों के कथनानुसार बेहद अभागा। जिस घर में रहता वह रेलगाड़ी के डिब्बेनुमा होगा। वह क्लीमेंशिआ से प्यार करता; वही शायद एकमात्र तसल्ली तो थी हालाँकि बस्ती में चल रही गपशप का मुख्य विषय भी थी। उसकी मखमली नाक, शिथिल कान, वक्र गरदन,  छोटे -छोटे कोमल केश, और उसका आज्ञापालन कुल मिला उसे चाहने की वजह थे। मैं रोसा को समझ सकता था। रात के वक्त जब वह उसकी काठी उतारता, बड़ी देर वहीं खड़ा रहता तब अलविदा कहता, मानो उसकी पसीना-भीगी देह स्वामी को अनुप्रमाणित करती और जब वह उससे बिछुड़ता उसे निष्प्राण बना देती। विरह विलंबित हो इसकी जुगत के अनंतर उसे-चाहे वह प्यासी न हो तब भी पानी पिलाता। वह उसे, रात में, छत के नीचे, अपनी झोपड़ी में ले आने से झिझकता; झिझकता क्योंकि आशंकित होता बाद में बड़ी दुर्गत हो सकती है: लोग तो पहले ही से कह रहे हैं सनकी है, पूरा सनकी। टोंगा तो बढ़ चढ़ कर बोलता है ही। अपनी कटु भाव-भंगिमा और छुरी जैसी आँखें उभार उसकी और क्लीमेंशिआ की बुराई करता ही है। दोनों में से कोई उसे कदापि नहीं बख्शेगा। मैं भी क्लीमेंशिआ को अपने ढंग से चाहता।

संदूकों से अटे पड़े कक्ष में दादी इंडालेशिआ रोसा का रेशमी बाथरोब टँगा था। वह हरित वर्णी किसी खंडित विरजिन के टूटे पैर निकट बिछे समृतिचिह्न समान होगा। यदा कदा टोंगा और कुटुम्बी, या कतिपय आगंतुक वहाँ अभागे फूल या पुदिना समान महकती जड़ी-बूटियों के छोटे छोटे गुलदस्ते अथवा मीठी मीठी चटकीली मदिराएँ रख जाते। ऐसा वक्त भी रहा आया जब बुझती बुझती लौ फडफ़ड़ाती रंगबिरंगी मोमबत्तियाँ विरजिन के पैरों निकट फडफ़ड़ाती , इसी कारण बाथरोब पर-बटनों की आकृतियों के -मोमकण होते जिनसे वह गंदलाता नहीं बल्कि अलंकृत होता। वक्त इन अनुष्ठानों को निगल गया: इन रस्मों की अदायगी विरल से विरल होती गयीं। शायद इसी वजह, लिविओ ने बाथरोब से क्लीमेंशिआ के लिए एक हैट बनाने का दुस्साहस किया। (इस काम में मैंने उसकी मदद की)। शायद इसी वजह परिवार के अन्य सदस्यों के साथ गफलत उत्पन्न हुई। टोंगा ने उसे विकृत तो किसी एक बहनोई (जो राजगीर था) ने शराबखोर कहा। लिविओ ने इन भत्र्सनाओं को प्रतिवाद के बिना बर्दाश्त कर लिया। उन भत्र्सनाओं से वह कुछ दिनों बाद ही विचलित हुआ।

वह अपने क्लेश ही क्लेश से भरे बचपन को क्या याद करता। करीब नौ महिनों खाज से तो नौ और महिनों ऩेत्र रोग से पीडि़त रहा- जैसा कि उसने मुझे उस क्षण बताया जब हम हैट सी रहे होंगे। इसी खराब बचपन की वजह, शायद अपने आगामी जीवन में, हर तरह की प्रसन्नता के प्रति उसका विश्वास उठ गया। अ_ारह की आयु में जिस कजिऩ मालविना से मिला और उसके साथ सगाई में बंधा, शायद , तत्क्षण- सगाई की अंगूठी पहनाते वक्त-उसे अनर्थ का पूर्वाभास हो गया होगा। क्योंकि, खुश होने की बनिस्बत उदास रहने लगा। वे साथ साथ बड़े हुए: लेकिन उसके संग विवाह का निर्णय लेते क्षण ही उसे लगा बंधन शुभ नहीं होगा। मालविना की बेशुमार सखियाँ उसका नाम उकेर उकेर चादरों, मेजपोशों, और नाइटगाउनों पर कढ़ाई करती गयीं, लेकिन दंपति, अतीव प्रेम से सिरजी उन वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं कर पाये। विवाह के दो दिन बाद ही मालविना चल बसी। सबने उसे दुलहिन के वेश ही में सजाया, ताबूत में लेटाया, नारंगी पुष्पगुच्छ से आवरित किया। बेचारा लिविओ उस पर नजऱ ही नहीं डाल सका, लेकिन मृतक के लिए आयोजित बीती रात के 'जागरण' के अनंतर, आँखों को ढकती अपनी हथेलियों के स्याह में उसने पत्नी के प्रति अपनी वफादारी का-एक सुनहरी अंगूठी के रूप में-अर्पण किया। उसने किसी अन्य स्त्री की क्या मेरी- बेहद कुरूप-कजिऩ की ओर ताक कभी भी आँख नहीं उठायी; नाटकों में क्या सिनेमा शो में भी किसी अभिनेत्री पर नजऱ नहीं डाली। कई एक दफा लोगों ने उसे गर्लफ्रेंड मुहैया करायी। अपरान्ह उन्हें उसके पास ला लचीली कुर्सी पर बैठाते: चश्माधारी एक लड़की के सुनहरे केश थे जिसे उन्होंने इंग्लिश गर्ल पुकारा; चोंटियाँ रखी दूसरी स्याहवर्णी लड़की बड़ी चुलबुली थी, तो तीसरी, सर्वाधिक संजीदा, नुकीला सिर वाली मोटी तगड़ी लड़की थी। लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। इसलिए वह दिलोजाँ से क्लीमेंशिआ को चाहने लगा, क्योंकि स्त्रियाँ उसके लिए बेमतलब थीं। लेकिन एक रात उसके किसी सगे चाचा ने, ओठों पर हँसी उड़ाती मुस्कान बसा, दादी के नाइटरोब को अपवित्र करने की उसे सजा देने के इरादेतन क्लीमेंशिआ पर गोली दाग दी। क्लीमेंशिआ की कराहती हिनहिनान में घुली कातिल की कर्कश हँसी हमारे कानों पड़ी।

 

(2)  मागुश

किसी थेस्सलियाई टोनहाई ने तट लौटती फेन द्वारा उभारे नाना रूपंाकनों के अवलोकन के जरिये पोलिक्रेतिस की; रोम की किसी कुमारी साध्वी ने किसी वनस्पति के निकट पड़ी रेत के छोटे से ढेर के जरिये सीज़र की किस्मतें बाँची; जर्मनी का कार्नेलिअस एग्रिप्पा भविष्य जानने के लिए किसी दर्पण का इस्तेमाल करता था। अर्वाचीन बाजीगर प्याले की सतह पर तैरती चायपत्तियों से या तलछट में जमी कॉफी के जरिये किसी आदमी का भविष्य बताता है, तो कोई ज्योतिषी उसे पेड़ों, बरसती बूंदों, स्याही के धब्बों या अंडे की सफेदियों में, तो कोई सामुद्रिक उसे हस्तरेखाओं में, तो कोई जादूगर उसे बिल्लौरी गोलियाँ गिन गिन देखता है। मागुश अपनी कोयला-टाल(जहाँ वह रहता है) के सामने खड़ी निर्जन इमारत के अंगो के सहारे तकदीर बताता है। छह विशाल चित्रशालाएँ और आसन्न भवन की बारह छोटी खिड़कियाँ उसके लिए ताशपत्तों के समान हैं। मेरे ख्याल से, मागुश के मन में खिड़कियों का ताशपत्तों के सानिध्य में बिठाने का विचार कदापि नहीं आया: वह तो मेरा आइडिया था। उसकी बेतहाशा रहस्यात्मक युक्तियाँ अंशत: ही पल्ले पड़ती हैं। उसने  मुझसे कहा कि दिन में किसी निष्कर्ष को निकालना विकट होता है क्योंकि प्रकाश से छवियाँ विचलित होती हैं। अपने उद्यम को अंजाम देने का बेइंतिहा अनुकूल वक्त सूर्यास्त का लम्हा होता है जब प्रकाश की कतिपय तिरछी किरणें इमारत की भीतरी खिड़कियों में से छनकर सामने की खिड़कियों के शीशे पर जा चिलकती हैं। इसी वजह वह अपने ग्राहकों से इसी वक्त आने का आग्रह करता है। खासे अनुसंधान के बाद मेरे जेहन में यों आ उतरा है कि इमारत का ऊपरी भाग दिल की समस्याओं, निचला हिस्सा रूपये -पैसे और कामकाज, और बीच का परिवारिक तथा तंदुरूस्ती के बाबत काबिले-गौर है।

मागुश-इसके बावजूद कि वह केवल चौदह साल ही का है-मेरा मित्र है। उससे मेरी पहचान किसी दिन इत्तिफाक से हुई जब मैं बोरा भर कोयला खरीदने टाल गया था। भविष्य बताने की उसकी प्रतिभा को ताडऩे में मुझे जरा भी देर न लगी। कोयला टाल के(कोयले के बोरों और कड़कड़ाती ठण्ड से घिरे) प्रांगण में , थोड़ी सी चर्चा के बाद, वह मुझे अपना 'अध्ययन कक्ष ' दिखाने ले गया। कक्ष क्या उसे ऐसा वैसा कोई गलियारा ही माना जाये, प्रांगण ही सा कँपकँपाता शीतल होगा वह, जहाँ के-रंगबिरंगे शीशे और (जिराफ  के आकार जैसी)उत्तंग सँकरी खिड़की के मिले जुले झरोखों से सामने की-बारिश और सूरज की मार झेला मोहरा दर्शाती हुई - इमारत बखूबी देखी जा सकती थी। कुछ लम्हों बाद मुझे लगा कि वहाँ शीत लोप हो कर गर्माहट के खुशनुमा माहौल को जगह दे रही है। मागुश ने मुझे बताया कि यह चमत्कारिक आभास भविष्यवाणी के क्षणों ही होता है, और यह भी कि कक्ष नहीं बल्कि बदन ही उन फायदेमंद रश्मियों को सोखता है।

मागुश मेरे प्रति बेइंतिहा विनम्र था। अनुकूल अवसरों के क्षण उसने मुझे इमारत की - एक के बाद एक करके - सारी खिड़कियों पर नजऱ डालने की अनुमति दी। (यदाकदा अबोधगम्य दृश्य दीख पड़े, इस मामले में, मैं तत्क्षण सौभाग्यवान रहा।) अपने पापों को देखने के इरादे, किसी खिड़की में मैंने उस लड़की को- जो बाद में मेरी प्रेमिका बनी-अपने प्रतिद्वंदी के संग देखा) उसकी पहनी लाल पोशाक मुझे भड़कीली लगी, उसके केश-सिवाय गरदन के पीछे बंधे एक नन्हें गुच्छे के-खुले हुए थे। उस विवरण को देखने के लिए मेरे कोटर में किसी वनविलाव की आँखें होनी थीं, हालाँकि, बेशक, बिम्ब की चोखी रंगत मेरी आँखों की नहीं वरन उस छवि पर आच्छादित जादुई आभा की वजह बनी होगी। (इतनी दूरी होने पर भी मैं  खत या अखबार पढ़ सकता था।) वहाँ मैंने ऐसा दर्दनाक दृश्य देखा जिसे मुझे अपने वास्तविक जीवन में भोगना पड़ा। वहाँ मैंने गुलाबी कंबलों से ढके बिछौने को और थैले उठा-उठा भीतर बाहर जाती आती घिनौनी स्त्रियों को देखा। वहाँ, सूर्यास्त से प्रदीप्त खिड़की में, मैंने तिग्रे और ल्यूजन नदी किनारे हो रहे सैरसपाटे देखे। वहाँ मैं किसी से बस झगडऩे ही जा रहा होगा। बाद में, जब  इन घटनाओं का साक्षात्  अनुभव हुआ, यथार्थ मुझे तनिक धुँधला, और मेरी प्रेमिका कम हसीन लगी।

उन तजुर्बात के बाद, मेरे लिए जो नियत था उसको भोगने के प्रति मेरी दिलचस्पी घट गयी। मैंने मागुश के साथ मशविरा किया। क्या उसकी अनदेखी मुमकिन है? जीवन जीना थाम लेना-संभव है क्या? मागुश, हाँ बुद्धिमान मागुश ने सोचा कि क्या वैसा करना समुचित होगा। कई दिनों तक मैं उसके करिश्मे से सबंद्ध रहा। बिम्बों को-उनकी जाँच पड़ताल और उनमें रमना परे रख-देखते हुए मन बहलाता रहा। मागुश ने कहा कि वर्षों से चली आ रही अपनी मैत्री के वश अपवादस्वरूप मुझे ढील दे रहा वह अन्य किसी को ऐसा करने नहीं देता।

मैं उन खिड़कियों में उभरता अपना प्रारब्ध देख देख स्वयं की दिलकशी करता,  तभी, तत्क्षण, मागुश अपने ग्राहकों पर चाल चलता, यूँ कि मेरी नियति - मानों उन्हीं की हो- उन्हें परोस देता।

''किसी के द्वारा तुम्हारी नियति को खिड़कियों में दिखायी देते ही सजीव कर दिया जाना भविष्य की ज्यादा ही बड़ी दूरदर्शिता है। अन्यथा ही वह तुम्हारी तलाश में चली आयेगी: किसी झाड़ी के भीतर आतुर खड़ी नियति अपने नियोक्ता पर आँखें गड़ा घात लगाई हुई होती है,'' मागुश मुझसे कहता है। अपने वचन की पुख्तगी के इरादे कथन जारी रखता है,  ''किसी दिन, शायद, उन खिड़कियों पर तुम्हारा कोई नामोनिशान नहीं होगा।''

''मरूँगा? '' मैंने बेचैन होते पूछा।

''ऐसा कोई निश्चित संकेत नहीं है,'' मागुश ने जवाब दिया; ''तुम किसी नियति के बिना जी सकते हो।''

''ऐसा कैसे? नियति तो कुत्तों तक की होती ही है।''

''कुत्ते उसे नहीं टाल सकते, वे आज्ञाकारी होते हैं।''

मागुश की भविष्यवाणी अंशत: ही घटी, बेशक मैं कुछ वक्त ऊबता हुआ और खामोश बैठा अपने काम के प्रति समर्पित बना रहा। लेकिन जिंदगी ने आकर्षित किया, हालांकि मैंने उसे, मागुश की बगल में खड़े हो इमारत को देखते हुए, गंवा दिया। मेरी नियति को प्रकाशित करने के लिए अभिप्रेत आकृतियाँ अभी तक भी लोप नहीं हुई थीं। प्रत्येक खिड़की में हम यदाकदा, नये-नये अमिट रूपाकारों को देख चकराये। धुंधली रोशनियाँ, कुत्तों जैसे चेहरों का रूप धरे प्रेत, मुजरिम;हर चीज से यही बात उभरी कि अगर मुझे नजर आये वे बिम्ब हकीकी सूरत अख्तियार न करें तो बेहतर होगा।

''ऐसा बदरंग भविष्य कौन चाहेगा,''मैंने मागुश से पूछा। एक दिन उसने - मेरा ध्यान हटाने के इरादे-शपथ ली कि तत्क्षण कोई परामर्शदाता और जादूगर बन जाएगा। अब मुझे आतिशबाजी, कठपुतलियाँ जापानी लालटेन, बौने, रीछ और बिल्ली जैसी पोशाकें पहने लोग नजर आने लगे। मैंने नाटकीय अंदाज में कहा, '' मुझे तुमसे ईष्र्या होती है। इच्छा जगती है चौदह का हो जाऊँ।''

''मैं अपने तुम्हारे बीच नियतियों की अदल-बदल करूँगा,'' मागुश ने तपाक से कहा।

मैंने मान लिया? हालाँकि उसकी तजवीज मुझे उद्धत मालूम दी। मैं उन बौनों का क्या करूँगा? बड़ी देर हम उन मुश्किलों बाबत् चर्चालीन आयुओं के अंतर में गुँथी हो  सकती हैं। शायद हम अपने लिए अनिवार्य विश्वास को खो बैठे होंगे।

हमारी योजना नहीं चल पायी। हम दोनों ही अपनी जिज्ञासा तृप्त करने का अवसर चूक गये।

यदाकदा हमें नियतियों की अदला बदली का पुनर्नवीत प्रलोभन महसूस होता है, हम उसे आजमाते हैं, लेकिन हमेशा ही हमारा सामना उसी बाधा- अगर मैं उन कठिनाइयों बाबत् सोचूँ जिन्हें मागुश को पार करना पड़ा-से होता है तब ये युक्ति ऊलजलूल मालूम दी। अभी, कुछ ही वक्त पहले, मैं वहाँ से जाने ही वाला होगा ; मैंने अपना  सामान बाँधा उसे अलविदा तक कह दिया ; पलक झपकी न झपकी कि खिड़कियों पर उभरते बिंब बेतहाशा  लुभावने लगे ; तत्क्षण किसी न किसी बात  के वडन् मैं वहीं ठिठक गया। बिलकुल ऐसा कुछ मागुष के साथ भी हुआ: वह तो कोयले की दुकान के प्रांगण को पार कर भागने की हिम्मत ही नहीं बाँध पाया।

मुझे मागुश की नियति  प्राय: मनोहर लगी, मागुष को मेरी (वह चाहे जितनी बुरी क्यों न हो)! बेशक सिर्फ एक ही बात हमने तहेदिल चाही कि इमारत की खिड़कियों पर ध्यान लगाये रहें और अन्यों को अपनी नियतियाँ तब तक प्रदान करते रहें कि जब तक वे हमें विलक्षण न लगें।

 

(3) रहस्योद्घाटन

वह मुँह खोले न खोले उसका चेहरा ही देख लोग अपरिहार्य सचाई को भाँप जाते: वेलेंटिन ब्रउमन जड़मति है। वह कहा करता: ''मैं एक अभिनेत्री को ब्याहने जा रहा हूँ।''

            '' हाँ, हाँ; जनाब किसी एक्टे्रस ही के हाथों वरमाला पहनेंगे,'' उसे उकसाने के इरादे हम कहते।

उसे सताने में हमें बड़ा मजा आता। पेड़ से लटकी झोली में उसे लिटा, किनारों को ऐसा कस कि वह उतर न पाये, लटकन को कई बार लपेट, इस हद गोल गोल घुमाते कि उसका सिर चकरा जाता, वह आँखे भीच लेता। कभी उसे झूलों में बिठा, रस्सियों को बाँध, डोल को इतना ऊँचा धकेलते कि अंतरिक्ष में वह बेहद भौचक हो घूमता। हम जो मिष्ठान्न खाते उसे चखने तक  नहीं देते, बल्कि कोई मिठाई या चाशनी उसके बालों पर डाल देते; वह रोने लगता। वह कोई खिलौने उधार माँगता जिन्हें हम किसी ऊँची अलमारी के ऊपर रख देते जिन्हें लेने उसे किसी हिलती डुलती मेज और परस्पर गुँथी हो कुरसियों (जिनमें से एक दोलन होती) के सहारे डगमगाते हुए चढऩा पड़ता।

जैसे ही हमें ज्ञात हुआ कि वेलेंटिन ब्रउमन, तनिक भी दिखावा किये बिना, किसी न किसी किस्म की बाजीगर है, हम उसे थोड़ा बहुत मान देने लगे, शायद उससे डरे भी।

''तुम अपनी गर्लफ्रेंड से आज रात मिले हो ना?''वह हमें कहता है उस शाम हम अपनी किसी गर्लफ्रेंड से, किसी खाली भूखंड में चोरी छिपे मिले थे। ओफ, हम वाकई अकाल प्रौढ़ होंगे।

''तुम किससे छिप रहे हो?'' वह हमसे पूछता है। हाँ, उस दिन कि जब हमें घटिया स्तर के परीक्षा-फल से भरी पुस्तिकाएँ मिली होंगी और हम लुके होंगे क्योंकि वालिद हमें सजा देने के लिए खोज रहे थे या हिदायत देने के लिए कि जो हजार गुना ज्यादा ही बदतर बात होगी।

''तुम तो मनहूस चेहरा बनाये उदारसमना हो,'' वह चकराता हुआ बोलता है। उसके मुँह ये वचन ठीक उस क्षण निकले जब हम किसी प्रच्छन्न दुख के कारण हृदय चूर-चूर कर रहे होंगे, हाँ, ऐसे त्रास के सबब कि जिसे वैसा ही गोपनीय रहना जरूरी हुआ जैसा अपनी गर्लफेें्रड से मिलने की तारीखों के लिए होता आया।

वेलेंटिन ब्रउमन का जीवन- हमने उसके साथ जो कुछ किया उसकी वजह भर ही से नहीं, उसकी स्वयं ही की उत्कट हलचल के कारण भी - उत्तेजना से सराबोर रहा आया। चाचा के द्वारा उसे प्रदत्त जेबघड़ी असली होगी, हमारे अनुसार तो वास्तव में उसके योग्य चाकलेट, रांगे, या कचकड़े की ही उपयुक्त होती; जबकि मेरे अनुमान से वह रजत होगी, उसकी जंजीर के सिरे विरजिन आफ  ल्यूजन का छोटा-सा तमगा लटक रहा था। जेब से घड़ी निकालते हर दफा, ताबीज से टकराती घड़ी की खनखन अपने प्रति आदर की दरकार उभारती- बेशक तब तक ही कि जब तक दर्शक का ध्यान उसके मालिक की जानिब न घूमें जो उसमें हँसी उपजाता। वह हर दिन हजार एक दफा जेब से घड़ी निकाल कहता, '' मुझे काम पर चल देना चाहिए!'' तपाक से उठ सट से बाहर निकलता; पल बीते न बीते लौट आता।

उसकी ओर कोई भी तनिक सा ही ध्यान नहीं देता। लोग जीर्ण शीर्ण दस्तावेज, फटी-पुरानी पत्रिकाएँ दे उसका मन बहलाते।

किसी मुंशी का स्वांग भर काम करने के लिए वह टाइलेट पेपर, अगर यह भर ही उसे मिल जाता तो, टूटी पेंसिलें और कोई फटा ब्रीफकेस; किसी विद्युतकर्मी का रूप धरते क्षण, कूड़े से बटोरे विद्युतरोधी टेप और तार रखने के लिए वही ब्रीफकेस इस्तेमाल में लेता; जब किसी बढ़ई का जामा पहनता तब कोई आड़ा तिरछा वाश रेक कोई जर्जर बेंच, और कोई हथौड़ी उसके औजार होते; जब किसी फोटोग्राफर की सूरत ओढ़ता, मैं अपना कैमरा उसे उधार देता जिसमें कोई फिल्म चढ़ी नहीं होती। और फिर, कोई उससे पूछता, '' बड़े हो कर क्या बनना चाहोगे, वेलेंटिन?'' वह जवाब देता, ''कोई पादरी या किसी दुकान में परिचर।'' तत्काल दूसरा सवाल होता, '' क्यों'', तो उत्तर मिलता, ' क्योंकि मुझे चाँदी झलकाने में मजा आता है।''

एक दिन वेलेंटिन ब्रउमन ज्वरग्रस्त हुआ जागा। डाक्टरों ने चलती फिरती भाषा में बोला कि मौत सामने आ खड़ी है, देखा जाये तो जैसा उसका जीवन चल रहा था, उसे देखते तो शायद यही उचित होगा। वहीं लेटे हुए उसने इस लफ्जों को सुन कोई चिंता नहीं जाहिर की, यद्यपि उन्होंने समूचे अवसादग्रस्त घर को दहला दिया क्योंकि उस क्षण सारा का सारा कुटुम्ब - हम, उसके चचेरे भ्राता भी- सोचने लगे कि वेलेंटिन ब्रउमन, अपनी अनोखी शख्सियत के कारण, हमें प्रसन्नचित्त बनाया रखता आया है, सो उसका अवसान अपूरणीय क्षति होगी।

मौत ने हमसे ज्यादा इंतजार नहीं करवाया। अगली सुबह ही वह आ गयी; एक एक बात ने मुझे सोचने को बाध्य किया कि वेलंटिन ने अपनी घोर व्यथा के अनंतर उसे दरवाजे पर पल भर ठिठक कक्ष में प्रवेश करते देखा। प्रियतम के उत्फुल्ल स्वागत ने उसका - अमूमन विरति झलकाता आया-चेहरा चमका दिया। अपनी भुजा तान उसकी जानिब तर्जनी तानी।

''आओ, आओ,'' वह बोला; चितवन से हमारी ओर देख वह विस्मय, हर्ष , पीड़ा के उत्कट भाव के अनंतर चीख पड़ा, ''कितनी अद्भुत!''

''कौन? अद्भुत कौन?'' कुछ ऐसी दिलेरी भर  हमने पूछा जो अब मुझे उद्धत लग रही है। हम खिलखिलाये, लेकिन हमारा अट्टहास सहज ही हमारे रूदन में घुला हुआ पाया जा सकता था; हमारी आँखों से आंसू बह चले।

''ये, ये लड़की,'' वह लजाता हुआ बोला।

दरवाजा खुला। कजिन दावे से कहती कि दरवाजा हमेशा आपो आप खुलता है; क्योंकि ताला टूटा हुआ हैैैैै; लेकिन मैं उसकी बात नहीं मानता। वेलेंटिन, बिस्तर पर उठ बैठ, प्रेत- जिसे हम नहीं देख रहे होते - का स्वागत करता है। तथापि, यह बिलकुल स्पष्ट मालूम दिया कि बेशक उसने उस स्त्री को देखा, कि उसके कंधे से लटक रही निकाब को उसने छुआ, कि उस स्त्री ने वेलेंटिन के कानों में कोई गोपनीय बात कही जिसे हम कभी नहीं सुन पायेंगे। फिर, कुछ ज्यादा ही अटपटा घटा: खासी मशक्कत के अनंतर वेलेंटिन ने निकट पड़ी अपनी मेज पर रखा कैमरा उठा मुझे दे कहा कि हम दोनों का एक फोटो खींच दो। उसने अपनी 'साथी' से उचित पोज़ बनाने को कहा।

''नहीं, नहीं; इस तरह मत बैठो,'' वह उससे बोला।

या, शायद, अतिशय मंद स्वर में, फुसफुसाया, ''यह निकाब, यह निकाब तुम्हारा चेहरा ढक रही है।''

या, शायद, दबंग स्वर में बोला, ''इधर उधर मत देखो।''

समूचे परिजनों और कतिपय परिचरों ने ठहाका लगाते लगाते - ऊँचे ऊँचे और भारी भरकम - पर्दों को खिड़कियों के परे खिसका दिया, फलस्वरूप कक्ष खूब उजला हो गया; किसी शख्स ने कदम गिन वेलेंटिन से कैमरे की दूरी तय की ताकि फोटो फोकस के बाहर न रहे। काँपते-काँपते मैंने वेलेंटिन पर केमेरा साधा, जिसने जरा बाँयी बाजू का - स्वयं से ज्यादा अहम-स्थान तर्जनी से इंगित किया, जिसे चित्र में होने का आग्रह उसकी आँखों में झलक रहा था; जबकि वह सर्वथा रिक्त जगह होगी; बहरहाल मैंने मान लिया।

मैंने जल्दी ही फिल्म डेवलेप करवाई। छह फोटोग्राफों में, स्टूडियो ने मुझे एक, शायद गलती से, दिया जिसे किसी अन्य शौकिया फोटोग्राफर ने खींचा होगा। बहरहाल, मेरा टट्टू-टेपिओका-भी; बेकर बर्ड का घोंसला- थोड़ा स्याह और धूमिल होने पर भी- चीह्न लिया गया; जहाँ तक तैराकी वेशवाधी किसी गिलबेर्तानी (प्रशांत महासागर के किसी द्वीप की कोई स्त्री) की झलक की बात है तो वह तो किसी भी फोटो प्रतियोगिता में शामिल की जा सकती है, हाँ, आज भी; आज भी; फिर , इसीके साथ, स्कूल के मोहरे का चित्र? - उसकी क्या कहें, वह तो 'ला नेशिअॅन '  में फोटो मुद्रण के उपयोग में लिया जा सकता है। मैंने ये सभी स्नेपशाट उसी हफ्ते खींचे थे।

आरंभिक क्षणों के दौरान मैंने उस धुंधले अज्ञात फोटोग्राफ  की ओर खूब गौर से आँखें नहीं गड़ाई होंगी। कुछ खफा हो मैं दुकान जा झगड़ पड़ा लेकिन लेब- कर्मचारी ने पूरा यकीन दिलवाया कि उसने कोई गलती नहीं की है; हो सकता है कि कतिपय स्नेपशाट आपके किसी छोटे भाई ने लिये हों!

कुछ अर्सा बीते बाद ही अतीव गहरी दृष्टि डालने पर मैं कक्ष को, फर्नीचर को, वेलंटिन के धुंधले चेहरे को उस प्रख्यात फोटोग्राफ  में चीह्न पाया। सर्वथा अहम सूरत- स्पष्ट , अतिशय विस्मयास्पद रूप से स्पष्ट - निकाबों और गुलुबंदों से आवृत किसी , काफी कुछ दीर्घायु तथा बड़ी बड़ी प्यासी आँखों वाली स्त्री की होगी जो, हाँ, वो, वो पोला नेग्रि की थी।

(4) इसेरा

कोलोन बाजार में बसी खिलौनों की विशालकाय दुकान की शो विंडो के भीतर सजे गुडिय़ा घर के उपस्कर देख इसेरा बेहद ललचा गयी। वह उसे अपनी गुडिय़ाओं (उसके पास एक भी नहीं थी) के नहीं बल्कि अपने ही लिए चाह रही थी, क्योंकि उस नन्हे काष्ट बिछौने पर सोना चाह रही थी जिसकी फ्रेम फूलों की मालाओं और टोकनियों से सजी हुई थी, और कि जिसमें छोटे छोटे दराज और आपोंआप लॉक होता दरवाज़ा था। वह, बेंत की सीट और घूमती पीठ लगी उस छोटी सी कुरसी पर बैठना चाहती थी कि जिसके समक्ष विन्यस्त डे्रसिंग मेज पर साबुन की विशेष टिकिया तथा अपने बेहद उलझे बालों को सँवारने के लिए कंघी रखी हुई थी।

गुडिय़ाओं के प्रकोष्ठ के संचालक, डारिओ क्यूरेडा में लड़की के प्रति क्षणिक अनुराग उत्पन्न हुआ।

''कितनी भद्दी लड़की है,''तत्क्षण यों बोल पड़ा ताकि लड़की के जानिब उपजे ख्याल को अन्य कर्मचारी ताड़ न लें।

इसेरा गुडिय़ाओं को बैरी मानती थी; उन्हें तोहफे स्वरूप भी स्वीकार नहीं करती; वह तो उस अवस्थिति को हासिल करना चाहती थी जो उन्हें हासिल थी। चूँकि बेहद हठधर्मी थी, इसलिए अपने विचार पर अड़ी रहती। उसका यह चारीत्रिक अनोखापन, उसकी ऊँचाई की बनिस्बत(वह औसत से काफी ज्यादा ही नाटी थी), उसकी ओर ध्यान आकर्षित कराता। लड़की माँ संग प्राय: खिलौने देखने जाती, हालाँकि खरीदने के इरादे कतई नहीं, क्योंकि वे गरीब थे। गुडिय़ाओं के प्रकोष्ठ का संचालक, इसेरा को छोटे से बिछौने पर लेटने देता, अलमारी में लगे दर्पण में देखने देता, डे्रसिंग मेज के समक्ष रखी कुर्सी पर बैठने देता, कंघी से बाल सँवारने देता; ठीक उसी तरह कि जैसे घर के सामने - सड़क के पार बने भवन की स्त्री करती है।

इसेरा को कोई भी कैसा ही खिलौना नहीं देता लेकिन डारिओ क्यूरेडा क्रिसमस मनाने के लिए उसे कोई परिधान, छोटी सी एक हैट, दास्ताने, और नन्हें जूते देता; ये सभी चीजें कहीं न कहीं से टूटी फूटी होतीं इसीलिए घटे दामों पर बेची जा सकती थीं। खुशी से पागल होती इसेरा नये वस्त्र पहन बाहर घूमती। वे अभी भी उसके पास हैं।

जब कभी यह लड़की आती, क्यूरेडा के लिए थोड़ी बहुत अड़चन पैदा करती क्योंकि तोहफे की वस्तु चुनने की इजाजत मिलने पर हमेशा अतिशय महँगी चीज पसंद करती।

''मिस्टर क्यूरेडा वाकई बड़े दरियादिल शख्स हैं,''स्टोर के अन्य कर्मचारी नियमित आते ग्राहकों से कहते।

अपना परोपकारी स्वभाव उन्हें काफी महंगा पढ़ता। लड़की उपयोगी खिलौने पसंद करती: कपड़ा सीने और धोने की मशीनें, कोई बड़ा पियानो, सुई धागों आदि का डिब्बा, दुलहिन के साजसामान से भरी सन्दूक, सभी बेशकीमती होते। डारिओ क्यूरेडो उसे एक गिटार और कोई चिमटा देता ; और फिर, चूँकि वहाँ कम दाम के ज्यादा खिलौने नहीं होते, वह उसे साबुन, हैंगर, छोटे-छोटे कंघे दे देता, जिनसे लड़की का चेहरा खिल उठता क्योंकि वे किसी न किसी काम की चीजें होतीं।

''बच्चे बड़े होते जाते हैं,'' इसेरा की निष्कपट लेकिन नाखुश माँ कहती। ''हर माँ अपनी बच्ची का बढऩा देख भेद भरे विषाद से घिरती है, यद्यपि चाहती है उसकी लड़की अन्यों के बरअक्स खूब लम्बी और मजबूत बने।'' इसेरा की माँ सभी माँओं समान ही होगी, बस शायद किंचित गरीब और कुछ ज्यादा ही श्रद्धालु थी। ''किसी दिन यह छोटी पोषाक तुम्हारे ऊपर ठीक नहीं बैठेगी,''नन्हीं गुडिय़ाई ड्रेस उसे दिखाते हुुए माँ ने अपनी बात जारी रखी। ''कितना लज्जास्पद! पहले मैं भी छोटी थी, लेकिन अब मुझे देखो।''

इसेरा अपनी-सभी अनुमानों को दरकिनार करती खूब लम्बी-माँ को देखने लगी। बच्चे सचमुच, बड़े होते हैं। संसार में थोड़ी ही बातें इतनी सच होंगी। फर्दिनांदो लंबी पतलूनें पहनता है, प्रास्पेरा के जूते छोटे पड़ गये हैं, मेरिना पेड़ों पर नहीं चढ़ती क्योंकि उसकी ऊँचाई के हिसाब से (वह किसी जिराफ  के सानी होगी) वे उसके लिए अत्यंत छोटे हैं। अवसाद का कोई गौण नाखून, कई दिनों तक, इसेरा के हदय को कुरेदता गया, लेकिन उसने तय किया अगर वह इन शब्दों ''मैं बड़ी नहीं होऊँगी, मैं बड़ी नहीं होऊँगी'' को लगातार स्वगत दोहराती जाये तब तो वह अपने छलिया विकास को थाम लेगी। और फिर गुडिय़ाई पोशाक, दास्ताने और हैट हर दिन पहने तब वह अपरिहार्यता इसी नापजोख की बनी रहेगी। उसके विश्वास का कमाल देखो-इसेरा संवृद्ध नहीं हुई।

एक दिन वह बीमार पड़ी, और चार हफ्तों अपनी पोशाक नहीं पहन पायी। जब ठीक हुई क्या देखती है-चार इंच लम्बी हो गयी है। उसे बड़ा धक्का यों लगा मानों इस वृद्धि ने उसका अपचय कर दिया। वाकई ऐसा ही हुआ। अब उसे मेज पर खड़ा होने , वाशटब में नहाने से रोक दिया गया; माँ की अंजुरी से मदिरा पीना बंद हो गया; उसे मिले अंगूरों और देहात में उसके द्वारा एकत्रित मेशाचिनों (बीजों) से उसकी हथेली पूरी नहीं भरती। ड्रेस, दास्ताने, और जूते छोटे पड़ गये। हैट बस सिर के शिखर पर टिकी रहने लगी। लड़की की नाखुशी का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता था: अपने ही को देखो, मोटे हो जाने पर, पैरों या चेहरे के फूल जाने पर, जुराबों की उंगलियों के ऊपर मुनगों समान सलवटें पडऩे पर तुम किस कदर खफा होते हो। बहरहाल जरा तन कर सोचने पर उसने इन समस्याओं का समाधान खोज लिया: पोशाक बन गयी ब्लाउज़; लम्बी जुराबें छोटे दास्तानों में बदल गयीं, हील उखाडऩे पर जूते स्लिपर समान इस्तेमाल में लिये जाने लगे।

इसेरा पुन: खुश होने लगी, लेकिन कुछ वक्त बीते किसी खुरापाती शख्स ने उसे उसके दुर्भाग्य की याद दिला दी।

''अरे, तुम इतनी लम्बी हो गयीं!'' मनहूस पड़ोसी बोल पड़ा।

बात झूठी है यह दर्शाने वह आंगन में पत्तों भरी झाडिय़ों बीच जा दुबकी लेकिन तीन अन्य पड़ोसियों ने उसे वहाँ खोज उसकी असामान्य ऊँचाई की चर्चा जारी रखी।

इसेरा खिलौनों की दुकान -सुकून पाने की अपनी जगह-जा दौड़ी। उसका मन कड़वाहट से भर गया था, वह देहलीज पर जा ठिठकी। उस दिन शो विंडो पर सिर्फ  गुडिय़ाएँ ही प्रदर्शित थीं। फ्लोरिडा स्ट्रीट पर आ उमड़े राहगीरों की तारीफ से घिरी, अपने केश और नये वस्त्रों की अनम्य गंध के बीच खड़ी वे कुत्सित गुडिय़ाएँ शीशे के पीछे झलक रही थीं। कुछ गुडिय़ाएँ परमप्रसाद (प्रथम कम्यूनिअॅन) के त्योहार की, तो कुछेक स्कीअर्स (बर्फ  पर फिसलन करने वाले) की ; कतिपय गुडिय़ाएँ लिटिल रेड राइडिंग हुड की, तो चंद गुडिय़ाएँ स्कूली छात्राओं की पोशाकें पहनी थीं; सिर्फ एक गुडिय़ा दुलहिन के वेष में थी। परमप्रसाद के लिए तैयार गुडिय़ा की पोशाक से दुलहिन बनी गुडिय़ा की ड्रेस किंचित भिन्न थी; उसके हाथ मेें नारंगी कलियों का छोटा सा एक गुलदस्ता था, और वह केक बाक्स जैसे लग रहे किसी नीले कार्डबोर्ड बक्से में घिरी हुई थी। अपनी सामान्य संकोच भूली इसेरा खिलौना घर में घुस डारिओ क्यूरेडो को खोजने लगी जो अपने तय स्थान पर नहीं दिखा। उसने अन्य कर्मचारियों से उसके बाबत् पूछताछ की।

''मिस्टर डारिओ क्यूरेडो?''(अमूनन चुप रहती इसेरा में इस क्षण सारी झिझक लोप थी) ''उन्हें बुला देंगे, जनाब?'' उसने उस कर्मचारी से आग्रह किया जिससे बड़ा डरती आयी।

''यहीं तो हैं वह,''खजाँची ने किसी वृद्ध आदमी की ओर संकेत करते कहा , जो किसी वृद्ध आदमी के छदमवेष में डारिओ क्यूरेडो समान दीख पड़ा।

डारिओ क्यूरेडो सलवटों से इस कदर भरा हुआ होगा कि इसेरा उसे पहचान नहीं पायी। जबकि उसकी धुँधली समृति के जोर पर उसने उसे , उसकी ऊँचाई के कारण, पहचान लिया।

''तुम्हारी माँ खिलौने देखने आती थी। उसे बिछौनों की जोडिय़ाँ और सीने की नन्हीं मशीनें खूब भातीं,'' डारिओ क्यूरेडो बड़ी शालीनता से बोला; उठकर मातृभावी कोमलता से आगे आया। उसने ध्यान से देखा कि लड़की की मूंछें निकल आयीं हैं, और उसके दांत नकली हैं। ''ये माडर्न नौजवान लोग,''उसके मुँह से उद्गार फूटे, ''डेंटिस्ट इन्हें वयस्क मान इनका इलाज करता है।''

हम सब किस कदर सलवटों से भरे हैं! डारिओ क्यूरेडो सोचने लगा। कुछ पल बीते उसे लगा यह सब - अपनी थकान से उपजा हुआ - स्वप्न है। इतने सारे वृद्ध चेहरे, इतने सारे नये चेहरे, इतने सारे मनपसंद खिलौने, इतनी सारी पावतियाँ और उतनी ही उनकी कार्बन प्रतियाँ कि जिनके बनाते बनाते ग्राहक अधीर हो जाये। इतने सारे बच्चे वृद्ध होते हुए और वृद्ध लोग बच्चे बनते हुए!

''मुझे आपको एक रहस्य बताना है,'' इसेरा ने कहा।

डारिओ क्यूरेडा के अतिशय लम्बे कान तक इसेरा को अपना मुँह ले जाने के लिए काउंटर पर चढऩा पड़ा।

''मैं इसेरा हूँ,'' इसेरा फुसफुसाई।

''तुम्हारा नाम भी इसेरा है? कोई अनोखी बात नहीं। बच्चों के नाम उनके माँ-पिता के नाम पर अमूनन रखे जाते हैं,'' खिलौना विभाग के सदर ने कहा; वह स्वत: सोच रहा था:वृद्ध आयु मेरे दिमाग पर हावी होती है-बच्चे तक मुझे बूढ़े नजऱ आते हैं। मन ही मन वह शब्दों के गड्डमड्ड उच्चारण से खुद को बहलाता गया)।

''जनाब क्यूरेडो, कृपया मुुझे दुलहिन बनी गुडिय़ा का बॉक्स देंगे?'' क्यूरेडो के कान को कुछ ज्यादा ही जोर से हिलाते इसेरा फुसफुसाई।

इतना लंबा या ठीक उच्चारित वाक्य इसेरा ने पहले कभी नहीं बोला होगा। उसे लगा कि वह बाक्स उसके भविष्य को सुनिश्चित करेगा। उसे हासिल करना उसके लिए अपरिहार्य बन गया।

''हर चीज बदलती जाती है,'' क्यूरेडो के मुँह से ये उद्गार फूटे, विशेषतया अभिरूचियाँ। इस लड़की और इसकी माँ में कोई खास फर्क नहीं। यह लड़की दिखने में बेहतर है लेकिन बूढ़ी स्त्री समान नजऱ आती है,''उसने बात बढ़ाई; उसे यूँ लगा मानो इसेरा की- किसी डाइन सी दीख रही - दादी से बात कर रहा है।

इसेरा ने सोचा कि जैसे ही बक्से में जा घुसूंगी मेरी वृद्धि थम जायेगी। हालांकि साथ में यह भी सोचा कि उन अत्यंत महत्वपूर्ण खिलौनौ के बीच से नीले लेस पेपर की किनार लगे इस बक्से को पाकर दुनिया भर की गुडिय़ाओं से किसी न किसी तरह का बदला ले लूँगी। अपनी शिथिलता के विरूद्ध उद्यम करते डारिओ क्यूरेडो ने - क्योंकि शो विंडो से किसी वस्तु को निकालना छोटा मोटा काम नहीं होगा-गुडिय़ा बसाये बक्से को कस कर बाँधें फीते खोले, और फिर वह बाक्स इसेरा के हाथों थमा दिया।

ठीक उसी क्षण, अपने काम के उपकरण लादा हुआ कोई अप्रत्याशित फोटोग्राफर वहाँ से गुजरा। जैसे ही कॉलोन बाजार में उमड़ी भीड़ देखी, उसने, कई दिनों से जिसे तलाश रहा था  उसे, यानि इसेरा को वहाँ, खिलौना घर में, पाया। फोटोग्राफर ने तस्वीर खींचने की इजाजत माँगी, जबकि इसेरा बाक्स में आराम से जा समायी होगी कि जिसे क्यूरेडो फीतों से कस कर बाँध रहा था। एक घुटने पर झुक उसने कैमरे को साधा, थोड़ा पीछे पुन: नजदीक यों खिसका मानो स्वयं ही कोई गुडिय़ा हो। शायद, यह तस्वीर दुकान का बढिय़ा प्रचार करेगी-क्यूरेडो ने अकड़ कर सोचा। वह मुस्कराया भर होगा कि प्रदीप्त करते फ्लैश लाइट से चौंधिया गया; चौंधियाया कि अपनी क्या लड़की की भी सिलवटों को भूल गया।

किसी अखबार के लिए काम करता यह फोटोग्राफर, इसेरा के साथ खड़ी वृद्धा से पूछ पूछ रिपोर्ट लिखने लगा जो महज औपचारिका ही समझो क्योंकि वह पहले ही से लड़की का नाम, पता, आयु, उसकी जिन्दगी और उससे जुड़े चमत्कारों से वाकिफ  था।

''तुम्हारी लड़की चालीस की कब हुई?'' उसने पूछा।

''पिछले महीने,'' इसेरा की माँ ने जवाब दिया।

तब डारिआ क्यूरेडो को लगा कि जो कुछ हो रहा वह उसकी थकान का प्रतिफल नहीं है। कॉलोन बाजार में इसेरा के पिछले आगमन का क्षण बीते पैंतीस साल गुजऱ गये हैं। उसने, शायद, भ्रांत मन ही से (क्योंकि वह वाकई थका हुआ होगा) सोचा, कि इसेरा उस पूरी अवधि चार इंच से ज्यादा इसलिए नहीं बढ़ पायी क्योंकि वह आगामी रातों उस बक्से में सोते रहने के लिए नियतिबद्ध थी कि जो उसे अतीत में आवृद्ध होने से रोकेगा।