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Wednesday 14 Nov 2018

बिना मिट्टी के पृथ्वी

इस परेशानी से सूखी विचलित है कि रात बिताने के बाद बच्चा कैसे स्कूल जायेगा? स्कूल तो नजदीक में है नहीं। सूखी खुद एक किलोमीटर दूर नदी से पानी लाती है। अस्पताल भी आठ किलोमीटर दूरी पर है और उसी आठ किलोमीटर दूर में लगे बाजार में शाल पत्र, दातुन, जंगली चीजें आदि बैचने के लिए जाती है। इसलिए उसके लिए दो किलोमीटर की दूरी कुछ भी नहीं है। असल बात तो यह है कि वह रास्ता सही नहीं है। रास्ता जंगल से होते हुए बाजार तक जा पहुँचता है। इतना घना जंगल है कि उसमें भेड़ से लेकर शेर तक सभी की संख्या बहुत अधिक है। कभी-कभी तो हाथियों का झुंड अचानक से रास्ते पर आ पहुँचता है। उसने चईना को एक-दो बार बताया है कि चलो हम शहर को चले जाते हैं। यहाँ तो जंगल से कुछ खास जंगली चीजें नहीं मिल रही है। अब तो हर बात में नियम कानून बना दिया गया है। पेड़ में हाथ देते ही पुलिस आँख दिखाने लगती है। चलो ! शहर को चले जाते हैं। अंतत: वहाँ हम दोनों को काम तो मिलेगा। मैं घर-घर में जाकर काम कर लूँगी। वहाँ पर बाबू लोगों के घर में काम करने को मिल जाता है। और तुझे भी काम की कमी नहीं होग। इसमें क्या परेशानी है?

शुक्रा को भी पढ़ा पायेंगे। सुना है वहाँ हर बस्ती में स्कूल है। स्कूल की संख्या इतनी अधिक है कि पढऩे के लिए बच्चे नहीं मिलते। यह बात सुनकर चईना का सिर फिर जाता है। वह गुस्से में आकर कहता है, तेरे दिमाग पर यह सब बातें कौन डालता है? पढ़ाई क्या है? इंसान कैसे जियेगा उसके बारे में कोई चिंता नहीं, बोल रही है बच्चा पढ़ेगा कैसे? तू मुझे बस इतना बता दे कि अगर सभी पढऩे में ही जुट जायेंगे तब गाय कौन रखेगा? जंगल को कौन संभालेगा? हम यहाँ है तभी तो जंगल है, नहीं तो यह पुलिस वाले क्या इसे रहने देते ? जंगल न हो तो हम कैसे जियेंगे?

सूखी कभी-कभी सोचती है कि इन पुरूषों को कौन कैसा बनाया किया? कुछ भी नहीं समझते हैं। अगर पढ़ाई जरूरी नहीं है तब ऐसे हजार-हजार बच्चे क्यूँ पढ़ते हैं? उनके माँ-बाप क्या मूर्ख हैं? दूसरे गाँव के बच्चे तो साइकिल से स्कूल जाते हैं।

वह चईना को समझाने की कोशिश में लगी रहती है। पढ़ाई का भी अपना महत्व है। अगर नहीं है तो सरकार बच्चों को किताब, कपड़े, मध्यान्ह भोजन, साइकिल आदि क्यूँ देती? कभी-कभी उसे दुख भी होता है कि उसके और एक-दो बच्चे होते तो कितना अच्छा होता? स्कूल से एक वक्त का खाना तो मिलता है। जितने दिन चाहते स्कूल जाते, उसके बाद जमीन की देख-रेख करते और कहीं मजदूरी करते। पर चईना वह सब बातें बिलकुल भी नहीं समझता है। कहता है, पढ़ाई से बेकार और कुछ नहीं है और इस बारे में मुझसे बिलकुल बात नहीं करना।

हर दिन की तरह उस दिन भी सूखी चईना को हाथ जोड़कर कहने लगी- बेटे को जरा जंगल के उस पार छोड़ आओ, ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। मैं तुम्हारे गाय-बकरी को लेकर जंगल जाती हूँ।

स्थिर होकर चईना सूखी को देखना लगा। उसके बाद बोला-तू तो पढ़ाई को जोंक जैसे पकड़ के रखी हो। उससे सारा रक्त क्या तू अकेले ही चूस लेगी? ज्यादा मत चूस। जोंक जैसे फूलकर मोटी हो जाएगी। उसने सूखी की बात अनसुना कर दिया। सूखी ने देखा कि दूसरे टोली वाले बच्चे चले गए हैं। उनके साथ जाता तो चला जाता। पुआल के बने हुए छप्पर में घुसाई हुई लकड़ी के डांडा को निकालकर वह खुद तैयार हो गयी। चईना भी अपने काम को जाने के लिए तैयार है। उसने सूखी को पूछा - तू कब तक लौटेगी ? मैं आज साहूकार के घर जाऊँगा। साला, आज को तीन महीना हो गये मगर तलाब खुदाई करने का पैसा अब तक नहीं दिया है। बोल रहा है कि सरपंच नहीं दे रहा है । और सरपंच बोल रहा है ब्लॉक से नहीं मिला है। साला कौन यहाँ सही है?

अरे! तू थोड़ा धीरे से बोल, रास्ते से जा रहे लोगों में से अगर कोई सुन ले तो खैर नहीं।

मैं क्या गलत कह रहा हूँ? अब तक गंदी गाली तो नहीं बका है न?

मैं तुझे गाली देने की बात नहीं कह रही हूँ , तो तू क्या कह रही है?

मैं अभी आती हूँ।

सूखी बेटे को लेकर चली गयी। रास्ते में बेटे को समझाती है- मास्टर जी किताब और पेंट-सर्ट देंगे, वह सब लेते आना। हाँ, और एक बात भात खाने समय कुछ भी नहीं छोडऩा। बाद में भूख लगेगी। जंगल पार होने के बाद भी और कुछ रास्ता बेटे को पैदल चलना है। अब उसे कोई डर नहीं। सूखी वह जंगली रास्ता पार कराकर बेटे को दूसरे गाँव के रास्ते तक पहुंचने तक खड़ी होकर वहाँ से देखने लगी। आते समय ओर कोई डर नहीं, बाकी बच्चों के साथ वापस आ जायेगा।

सूखी के लौटने तक चईना वैसे ही घर के सामने बैठा हुआ था। हैरानी की बात है, तू तो साहूकार के घर जाने वाला था ?

'क्या हुआ तुझे?'

'नहीं गया?'सूखी पूछने लगी।

जाने से क्या होगा? साला दुष्ट कहीं का? घनिआ गया था उसके घर, बोल रहा है स्वतन्त्रता दिवस के दिन आए हुए मंत्री जी के लिए जो दावत हुई थी उसमें खर्च हुआ पैसा हमारा मजदूरी का पैसा है। हिसाब लगाने के बाद जितना बचेगा उसे हम सब में बांट देगा। यह सुनकर सूखी कहती है उसमें से हमें कितना मिलेगा? हम तो किसी खाने में शामिल नहीं हुए थे, न कहीं खाये थे। हम तो ये भी नहीं कहे थे कि हमारे पैसों से दावत दी जाए?

मैं क्या ऐसे ही गुस्सा हो रहा था? मौज-मस्ती तुम करोगे और पैसे हम देंगे?

यह कैसा न्याय है? तुम इतना गुस्सा होकर भी क्या कर लोगे? मार-पीट करोगे क्या? गुस्सा करने से अपना ही नुकसान है। भलाई इसमें है कि चुप रहो और देखो क्या नतीजा निकलता है। सब जो करेंगे हम भी वही करेंगे।

घर के अंदर जाकर सूखी फिर वापस आँगन में आ गयी और गहरी सोच में डूब गयी। चईना पूछता है तू क्या सोच रही है कि बच्चे को जैसे भी हो पढ़ाएगी? क्यूँ उसके पीछे इतनी लगी हुई है? पढ़कर क्या तुझे वह पक्का घर में रखेगा? और तू कुर्सी-मेज पर बैठेगी?

तू क्यूँ हर वक्त उसी बात को लेकर शुरू हो जाता है? उसके पढ़ाई में तेरा कौन सा पैसा खर्च हो रहा है? उसे तो सरकार सब दे रहा है। दिन में चावल-दाल भी मिल रहा है, नहीं तो तू दे पता क्या? अब चईना भी गुस्से में आ गया। मैं दे रहा हूँ तेरे सरकार को! वह तो देख रहा है न वे लोग कैसे हमारे पैसे से मजा कर रहे हैं? अब बेटे को सात साल पूरा होकर आठ साल होने को है। धीरे-धीरे वह भी अब सियाना होने लगा है। इस उम्र में उसे काम सीखना चाहिए। घर चलाने में मेरी मदद करना चाहिए , मुझे भी थोड़ा आराम मिल जाता। तू गाँव के दूसरों बच्चों को देख नहीं रही है? हमारे गाँव के कितने बच्चे स्कूल जा रहे हैं बोल तो? यह कहकर वह थोड़ा शांत हो गया जैसे आग से लोहे को निकालने के बाद धीरे-धीरे ठंडा होने लगता है।

तू मेरी बात सुन! वह फिर कहने लगा, दीना राऊत मुझे कह रहा था, बेटे को मेरे पास छोड़ दे। मैं उसे शहर में दूध बेचने वाले होटल में रखवा दूँगा। बहुत बड़ा होटल है। एक दिन में कम-से-कम दस हजार रोजगार वहाँ होता है। उधर खा-पीकर दो-चार दिन में ही तगड़ा हो जाएगा। माह की माह तनख्वाह भी मिलेगी। वैसे भी क्या काम करना है? बस बर्तन धोना है और रसोईया की थोड़ी मदद करनी है।

सूखी चुप होकर सुन रही थी। बेटे की पढ़ाई और नहीं हो पायेगी। इस बात से उसे बहुत कष्ट पहुंचा था। एक ही तो बेटा है, भगवान उसे दो भी नहीं दिये हैं। दो अक्षर पढ़ता तो गाँव में उसकी इज्जत होती। गाँव के थोड़े बहुत पढ़े-लिखे बच्चों को वह देख रही है। उनमें से कई तो ब्लॉक ऑफिस, पंचायत ऑफिस में काम करके पैसे कमा रहे हैं। पैंट-सर्ट पहन कर साइकिल में आना-जाना करते हैं। जरा-सा कष्ट सहकर बेटे को पढ़ाती तो दस साल बाद उसको अपने बेटे पर फख्र होता। और पढ़ाई का भी सारा खर्च तो सरकार उठा रही है।

फिर सूखी सोचने लगी कि दो वक्त के लिए खाना मिले तो सही, इतवार के दिन तो स्कूल छुट्टी रहती है और रात में तीनों का पेट भूखा रहता है। कुछ समेटना चाहे तो बाकी बिखरा हुआ रहता है। कमाई तो थोड़ी सी है और खर्च उससे कई गुना ज्यादा। कहाँ से होगा? दो लोग चाहे जितने भी काम करें पर वहीं सरकार छलकर भूखे रहने के लिए मजबूर कर देती है। चलो ! हम दोनों तो न खाकर पानी पीकर सो जायेंगे मगर बच्चे का पेट खाली रहेगा तो क्या हम शांति से रह पायेंगे? खाने के लिए कुछ दो सुनते ही जैसे माथे पर पहाड़ टूट पड़ता हुआ लगने लगता है।

बी.पी.एल कार्ड तो है मगर खाली कार्ड रहने से क्या होता है? सरकार चावल देगा तो उसके लिए भी पैसे चाहिए। अचानक उसकी दिमाग में यह सवाल उमडऩे लगा कि सरकार के घर में तो हमारा ही पैसा है। इसलिए सरपंच को हमें दो रूपये वाला चावल देना चाहिए और हम मुफ्त में तो मांग नहीं रहे हैं। यह सब सुनकर चईना आश्चर्य से उसे देखने लगता है। तेरे दिमाग में इतनी बुद्धि कहाँ से आती है? दीना राऊत की बात ने सूखी के मन को फिर से उदास कर दिया। पर किसी भी प्रकार वह अपने बेटे को होटल में बर्तन धोने नहीं  देगी। चाहे उसके लिए वह खुद को तैयार कर लेगी पर बेटे को जैसे भी हो पढऩे देगी। बच्चे का भी पढऩे में मन है। जितना हो पायेगा उतना पढ़ेगा और बाद में उसकी किस्मत में जो होगा उसे वह भुगतना पड़ेगा। उसने चईना को यह सब बातें खुलकर बता दी। शुक्रा की पढ़ाई बंद नहीं होगी। चाहे इसके लिए मुझे उसी होटल में काम क्यूँ न करना पड़े।

       धेत! चईना जोर से चिल्लाने लगा। तू औरत जात! जाकर होटल में काम करेगी? होटल में काम कब शुरू होता है और कब खत्म होता है उसके बारे में कुछ पता है? सुुबह के चार बजे से शुरू होकर रात के ग्यारह बजे खत्म होता है। तू मर्दों के साथ रात में काम करेगी? और तू रहेगी कहाँ? शहरी मर्दों के बारे में कुछ अता-पता है? बोलते-बोलते चईना के मुँह में स्मित अर्थपूर्ण हास्य उभरने लगी। सूखी को यह हँसी सुई जैसे चुभ गई। वह सोची कि यह जान-बूझकर चईना ने कहा है। मर्दों के साथ काम करने से क्या होगा? क्या यहाँ मैं मर्दों के साथ काम नहीं करती हूँ? मिट्टी उठाते समय कितने बार सीना से सीना टकराया है। मदन भोई हो या सपन तंति, जाने या अनजाने में, न जाने कितने बार धक्का हुआ है। यह नहीं हुआ है, कहा नहीं जा सकता। उसके हाथ-पैर भी खूब सख्त एवं मोटे है। बड़े-बड़े पेड़ों को काटकर जंगल से घर तक सिर के बल पर उठा ला सकती है। लेकिन कभी उसे किसी जानवर जैसे भूखे आँखों में नहीं देखा है।

हाँ, सरपंच दाम सिंह की बात कुछ अलग है। मिट्टी की खुदाई करने समय वह कई बार सूखी के पास जाकर खड़ा हुआ है, हँसा है और उससे मजाक करके बात करने की कोशिश किया है। मगर सूखी उसे कभी सीधे मुँह न कभी देखी है न उसके साथ बात की है। हर साँप जैसे बीन सुनने के लिए नहीं ठहरते हैं, उसी तरह हताश होकर लौटने वाली लहर जैसे हृदय लेकर वह लौट जाता था। हजारों पुरूषों के पास काम करने या जान बूझकर कोई उसके शरीर से घिसने से उसको क्या फर्क पड़ता है? उसने अपने को मजबूत बना लिया है। उसके शरीर और मन को काबू में रखा है। लेकिनआज चईना यह क्या कह रहा है? वह क्या सूखी को आज पहली बार देखा है? दस साल से घर-संसार करने के बाद यह पहली बार देखा है?

ये भी तो एक मर्द है। सब मर्द समान हैं। सिर्फ खुद की औरत को छोड़कर सारे मर्द दूसरी औरतों को देखते रहते हैं। सूखी के अंदर एक नारी सुलभ स्वाभिमान उमड़ पड़ा, जिसके ऊपर थोड़ी सी भी दरार सहन नहीं करेगी।

तुम क्या मुझे उस तरह की औरत समझते हो? ऐसे क्यूँ कह रहे हो? मुझे काम करना है और मैं करूँगी भी। मैं मर्दों को दोष नहीं देती हूँ। हम औरतों का भी दोष है। पैर फिसलने से गहरे पानी में जा गिरेगें और उठ नहीं पाएंगे। सूखी वहाँ से चली गई। गुस्से से एक जहरीले साँप जैसे वह फाँ-फाँ कर रही थी। इतनी छोटी सी बात पर सूखी इतनी आग बबूला बन जायेगी यह बात चईना को पता नहीं थी। वह तो मजाक में बोल दिया और चुप हो गया।

उस दिन दोपहर को चईना को घर के सामने छांव में चटाई बिछाकर सोया हुआ देखकर सूखी चौंक गई। वह तो दोपहर में कभी नहीं सोता है। पिछली रात को भी कुछ नहीं खाया था। तब वह तो कोई सोचने वाली बात नहीं है। इस टोली में कितनों के घर में चूल्हा दो बार जलता है? हाँ ! दो दिन पहले साहूकार के दुकान से दो किलो चावल उधारी से लाया था तब आज दिन में भात पका था। खाने के बाद चईना को नशे जैसे लगा होगा और अभी काम भी तो कुछ करने को नहीं है।

'तू सो गया ?'

'कहीं जाने का नहीं है क्या?'

तबीयत ठीक नहीं लग रहा है। बुखार जैसे लग रहा है। सूखी उसके सिर पर हाथ रखी तो उसे पता चला कि चईना को तेज बुखार है। तू बाहर क्यों सोया है? मैं घर के अंदर बिस्तर लगा देती हूँ। वहाँ जाकर सो जा। बारिश भी होने वाली है। सूखी परेशानी में पड़ गयी। घर का मर्द अगर बिस्तर पर आ जाए तब चारों ओर अंधकार दिखाई पड़ता है। वही साहूकार बुखार की दवाई भी देता है और तंत्र-मंत्र के पानी भी।  सभी का वह पहला डाक्टर होता है।

कहता है कि ईश्वर के नाम पर एक रूपये रखकर प्रणाम करो। सूखी सोची कि संध्या समय उसके पास जायेगी। पर यह नहीं हो पाया। संध्या से पहले तूफान आने लगा, बिजली कड़कने लगी। सूखी देवी माँ के पास दीया जलायी और प्रार्थना की। अब वह क्या करेगी, कहाँ जायेगी? कौन उसकी मदद करेगा। उसके आँखों से आँसू बहने लगी। सूखी को इस विपत्ति से बचाने के लिए कोई नहीं है। मनुष्य के पास इसी तरह के विपदा कभी-कभार आती है जहाँ सब होते हुए भी कोई नहीं होता है। मनुष्य का भरोसा केवल ईश्वर पर और किसी के ऊपर नहीं। सूखी के जीवन जंजाल में ईश्वर ने कभी कोई सुख नहीं दिया है। इस बात को सूखी ने कई बार परखा है। फिर भी वह ईश्वर से गुहार लगाती रहती है। इस जीवन रूपी समुद्र में कहीं कोई सहारा न होने पर अगर वह सहायता कर दें तो उसका घर बच सकता था।

चईना को सात दिन से बुखार हुआ है, छूटता ही नहीं। सभी प्रकार के इलाज करा चुकी है। साहूकार बैदराज से लेकर चमनपुर के तंत्र-मंत्र के साधक भी दो बार झाड़-फूँक किया है पर नतीजा कुछ नहीं। उस दिन सरपंच आया था, कहा कि इन सब देहाती ईलाज को छोड़कर सरकारी अस्पताल जाओ। उसने अपने ओर से कहा मैं आदमी भेज दूंगा, वह दवाई लेकर आ जाएगा।

जब सूखी ने उधारी से लाये हुए दस रूपये सरपंच को दिए तब अचानक से सरपंच खड़ा हो गया और कहने लगा अरे! यह क्या बात हुई। सरकारी अस्पताल में मुफ्त की दवाइयां मिलती हैं। वहाँ पैसों की कोई जरूरत नहीं है। अरे! सुरिया तू चला जा, मेरा नाम डाक्टर बाबू को कहना और दवाई लेते आना। उसके बाद उसने घूमकर सूखी से कहा, ठीक है तू उसे दस रूपये दे दे। वापस आने में एक दिन तो चला जाएगा, रास्ते में कुछ खा-पी लेगा। बेचारा वह भी तो गरीब है। अपने से खाने के लिए कहाँ से पैसे लायेगा।

रात के करीब दो बजे तक सुरिया खाली हाथ लौट आया। कहा कि वहाँ डाक्टर या कम्पाउंडर कोई नहीं था। सात दिन से बंद है। वहाँ एक लड़का बैठा था। उसने दो दिन के बाद आने को कहा है। तभी डाक्टर से मुलाकात हो पायेगी। बुखार ही तो हुआ है, इतना परेशान होने का क्या है? सूखी की दुख पहाड़ जैसे बढ़ता जा रहा था। चईना चीत्कार करने लगा। ओह! मुझे पकड़ो, पकड़ो! सूखी दौड़ते हुए उसके पास गयी। चईना जोर-जोर से हाथ पैर पटक रहा था और सिर पकड़कर रोता जा रहा था। माँ-बेटे दोनों उसे जोर से पकड़े हुए थे पर उसे संभाल नहीं पा रहे थे।

पड़ोस में रहने वाला नरीया चईना के घर गया और कहा कि 'सूखी, अगर तू कहेगी तो मैं एक खटिया और उसे ढोने वाले आदमियों को साथ ले आऊँगा। उनके साथ मैं भी चलूँगा। वे कुछ नहीं लेगें। शहर के बड़े अस्पताल में इसे ले जायेंगे। इसके बिना ओर कोई उपाय नहीं है। पर इसके लिए भी कुछ चाहिए। मैं एक बात कहूँगा, मानोगी?Ó

सूखी आँसू चाहे जितना पोंछ रही थी लेकिन आँसू खत्म ही नहीं हो रहे थे। आँसू क्या कभी खत्म होते हैं? शायद भगवान इन आंखों के पीछे एक विस्तृत नदी जोड़ दिये हैं, जिससे हर बात में, काम में और हर समय औरतें आँसू से मुँह धो पायेंगी। ईश्वर द्वारा दिया गया यह एक सुंदर वरदान है। इसे कोई बदल नहीं सकता है।

नरीया ने कहा तू पैसों की इंतजाम करने चली जा, मैं यहाँ खटिया और बाकी इंतजाम करता हूँ। आज रात में ही इसे अस्पताल ले जाना होगा। रात होने से क्या है? हम चार लोग तो जा रहे हैं, डरने की कोई बात नहीं है। नरीया की बात मानकर सूखी गाँव के अंदर के तरफ भागने लगी और जाकर साहूकार की पैर पकड़ ली। 'मुझे बचाओ साईं! जो कहोगे वही करूंगी। मुझे बस अभी 500 रूपये उधारी दे दो। मैं चईना को लेकर बड़े अस्पताल को जाऊँगी। नहीं तो मैं आपके पैर नहीं छोडूंगी।

साहूकार खा चुके थे और खड़े होकर अपने मोटे से पेट पर हाथ फिरा रहे थे। कुछ समय तक शांत हो गये। उसके बाद कहने लगे 'अरे! तू क्यूँ रो रही है? इसमें रोने का क्या है? हाँ, तू विपत्ति के समय में मेरे पास आयी है, इन कुछ रूपये के लिए...क्या मैं नहीं दूँगा? एक ही गाँव में तो रहते हैं।'

पर मैं खाली हाथ आयी हूँ। सूखी रो-रोकर कहने लगी। तुम जो कहोगे मैं वह करने के लिए  तैयार हूँ। साहूकार का गला नरम होने लगा, उसने कहा कि तू तो औरत है, मैं तुझे क्या कहूँगा? तू कर भी क्या सकती है? ठीक है, यह ले! बस यहाँ अपनी उंगली का निशान लगा दे और कुछ करने की जरूरत नहीं है। एक लंबा और मोटा सा कागज उसके सामने रख दिया। उसके बाद सूखी के उंगली में काली लगाकर कागज में निशान लगा दिया।

तब नरीया और शुक्रा भागते हुए वहाँ आ पहुँचे। वे दोनों कुछ नहीं कह पा रहे थे। उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था, जैसे गूंगे हो गए हैं। एकदम चुप होकर खड़ा हुआ शुक्रा जोर से रोने लगा। उसके क्रंदन से सूखी और नरीया के अंदर अज्ञात भय की सिहरण पैदा कर रही थी। शुक्रा अपनी माँ को पकड़कर जोर-जोर से चिल्लाकर रो रहा था। बारिश की वह रात अधिक गंभीर और गहरी हो उठी थी। जंगल-पहाड़ सभी उस बारिश के साथ एकात्म हो गए थे।