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Thursday 21 Nov 2019

शब्दों से परे

त्रिलोक महावर के रचना-संसार में एक बार प्रवेश कर जाने के बाद उससे मुक्त होना बेहद दुष्कर है। अपने आसपास घटित होने वाली हर गतिविधि के बीच वे मनुष्य के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। उनकी कविता की दृष्टि पैनी है पर आतंकित नहीं करती। इसके विपरीत बेहद त्रासद स्थितियों के बीच यथार्थ की गहरी पड़ताल करती है। त्रिलोक महावर ने इस मनुष्य विरोधी व्यवस्था को न केवल करीब से देखा है बल्कि उसकी पेचीदगियों को समझा भी है। उनकी सहजता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। एक व्यक्ति के रूप में भी एक नौकरशाह के रूप में भी और इन सबसे ऊपर एक कवि के रूप में भी।

अपने कविता संग्रह 'शब्दों से परे' में वे कई बार इस बात का प्रमाण भी देते हैं। लेकिन जब मैं यह कह रहा हूं तो उनके भीतर जो एक गहरी पीड़ा और टीस है, उससे विमुख नहीं हो सकता। समाज की समसामयिक स्थितियां मनुष्य को किस तरह विवशता के गर्त में धकेल देती हंै। उसका प्रभाव उनकी कविता 'बहुत दिनों से' में देखा जा सकता है।

''निपट अकेले ही / बोझिल कदमों से / धुंध की एक सुरंग में हूं / परछाई देखे एक मुद्दत हो गई है, शिराएं फट जाना चाहती हैं / तोड़कर सब्र का बांध।''

उनकी एक और छोटी कविता को मैं उद्धृत करना चाहता हूं जिसमें हमारे समय की गहरी त्रासदी छिपी है। 'हादसे' - वन उजड़े धरती से ऐसे, संगीनों के बल पर बच्चे बिछड़े मां की गोदी से जैसे।

इस तरह कम शब्दों में बड़ी बात कह जाना एक जोखिम भरा काम होता है। जिसे त्रिलोक महावर बार-बार उठाते है। उनकी कविता में एक तरह का संयम भी है। स्थिति की भयानकता का सामना करने के लिए वे आवेश में नहीं आते बल्कि सधे हुए प्रतीकों और शब्दों का सहारा लेते हैं और अपनी जमीन पर मजबूती के साथ खड़े रहते हैं। जीवनी की तमाम विसंगतियों कष्टों और यातनाओं के बीच घिरे मनुष्य को उनकी कविता लगभग एक सहारा देती है। ऐसा संभवत: वे इसलिए कह पाते हैं कि वे अपने जीवनानुभव से कभी विलग नहीं होते। राजेश  जोशी ने इस कविता पुस्तक के ब्लर्ब पर उचित ही लिखा है कि 'त्रिलोक महावर ने कई कविताओं में छोटे-छोटे आख्यानों को रचा है। उनकी कविताएं अनुभव की प्रयोगशाला में पैदा हुई कविताएं हंै।'

यह सच है कि जिस यथार्थ के बीच कवि रहता है उस यथार्थ के साथ उसका रिश्ता कई तरह का हो सकता है। वह उसे विचलित भी करता और कई बार वह उसे पीड़ाजनक स्थितियों में निरपेक्ष भी बना देता है। यह बात मुझे आश्वस्त करती है कि त्रिलोक महावर निरपेक्ष बने रहने की स्थिति से बचकर निकलने में सफल रहे है।

'अस्पताल और दफ्तर की जद्दोजहद के बीच / नापता हूं हर एक गलियारा / और सीढ़ी दर सीढ़ी नीचे उतर जाता हूं / अपने मर्ज के साथ...। यह कविता इस मायने में महत्वपूर्ण है कि कवि अपने मर्ज की पहचान तमाम गलियारे नाप लेने के बाद करता है। ये गलियारे जाहिर है कि व्यवस्था के हैं, उस व्यवस्था के जो कि अपने चरित्र में मनुष्य विरोधी है और कवि को अपने इस मर्ज की पहचान है। यह मर्ज उनका निजी नहीं है बल्कि इसमें कुछ समाज का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। जिसके साथ वे नीचे उतरते हैं दरअसल यह संकेत है कि इस तथ्य का कि वे अपने मर्ज को पहचानते हैं, और यह अपने आपमें बहुत महत्वपूर्ण है।'

त्रिलोक महावर का 'नास्टेलजिया' बहुत प्रभावी है। वे एक अंर्तयात्रा अपने स्मृति-लोक में करते हैं लेकिन सचेत रहते हैं कि उन्हें लौटना है। वे स्मृति में भी अपनी ठसक के साथ जाते हैं- 'तमाम औपचारिकता के बाद विदा करने के लिए लौटना है जहां से तुम्हें अपने घर और मुझे फिर कविता में एक और कविता के लिए। इस तरह कवि अपनी कविता के लिए प्रतिबद्ध है और यह प्रतिबद्धता उसे पूरे समाज के साथ जोड़ती है। समाज निरंतर कवि की चिंताओं में शामिल है। 'एक पायली नमक के बदले एक पायली चिरौंजी' ले जाता है। दुकानदार हाट बाजार में नोनी अनजान है, दुनिया के हिसाब-किताब में दरअसल यह जो दुनिया का हिसाब-किताब है उसमें नोनी की पक्षधरता पर उंगली रखना त्रिलोक महावर की कविता का सबसे उजला पक्ष है। उनकी भाषा में सादगी से परिपूर्ण एक तरह की साधारणता है जो कविता को बड़ी सुगमता के साथ संप्रेषित करती है। यही बात इस कविता-पुस्तक को अनूठी और विशिष्ट बनाती है कि इसमें गहरे संवेदनात्मक स्पंदन के साथ समाज की बेहद जटिल स्थितियों को बड़ी आत्मीयता के साथ उकेरा गया है। बस्तर उनकी कविताओं में ऐसे ही रचा-बसा है जैसे कि वहां का नैसर्गिक सौदर्य। वहां की लाल पट्टी उनकी कविता में संकेतों में बहुत सशक्त हो उभरी है।

बावजूद इसके त्रिलोक महावर की पैनी दृष्टि बस्तर के जंगलों में दूर-दूर तक जाती है और नोनी यानि कि एक छोटी आदिवासी बच्ची पर जाकर ठहर जाती है। उनकी बेहद मार्मिक कविता है- 'इतना ही नमक।'

'पत्थर के बीच कभी पिस जाती है / चिरौंजी गुठली के साथ। तो कभी पत्थर से टकराकर / पत्थर उगल देते हैं चिंगारी / नोनी जानना चाहती है।, इतनी मेहनत से, एक पायली चिरौंजी के बदले अब भी क्यों मिलेगा इतना ही नमक।'

त्रिलोक महावर ने लगातार लिखते हुए अपनी कविता में अपने अनुभव क्षेत्र को व्यापक बनाया है। उनका कवि कर्म एक तरह से गंभीरता लिए हुए है, जो उन्हें बस्तर के आदिवासी समाज की जड़ों की ओर ले जाता है। वे वहां के चप्पे-चप्पे से और पत्ते-पत्ते से परिचित हैं। पेजई के फूल वहां बसंत में खिलते हैं। इन फूलों की पंखुडिय़ों में मानव के सिर का कंकाल डरावना दिखाई देता है। इन फूलों को देखते हुए लगता है मानो बगीचे में स्केल्टन ही स्केल्टन पंखुडिय़ों पर छा गये हंै। अपनी कविता पेजई में कवि एक बेहद कड़वे सच का साक्षात्कार करते हैं- 'पीठ फेरते ही वे दाग देंगे गोलियां और एक खंजर उतार देंगे आरपार। ऐसी उम्मीद तो कतई न थी। इसी कविता में आगे वे कहते हैं- 'यकीनन भरे होंगे किसी दोस्त ने कान/  कान का भरा जाना उतना खतरनाक नहीं है / जितना कान का कच्चा होना।'

इस तरह कवि के पास समाज को देखने परखने की एक गंभीर और परिपक्व दृष्टि है जिसे वह अपने सम्पूर्ण संवेदनात्मक अर्थ में अपनी कविता में जगह देता है। त्रिलोक महावर एक आत्मसजग कवि हैं और चीजों को अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देता। वे जीवन के भीतर के कवि हैं। वे पारदर्शी हैं लेकिन अपनी कविता में 'फेटेन्सीÓ का इस्तेमाल सोच समझकर करते हैं। उनकी भाषा सादा शब्दों और बिम्बों की भाषा है। 'फेटेन्सी' के मोहजाल में फंसकर वे अपनी कविता को दुरुह नहीं बनाते। इसीलिए संप्रेषणीयता उनकी कविता की सबसे बड़ी ताकत है। उनकी पीड़ा मर्मांतक है और संभवत: सच भी। 'पेजई की अंतिम पंक्तियां हैं- एक अर्से बाद जब होगा उन्हें एहसास कि वे गलती पर थे। तब एक पेजई के फूलों में उभरे स्कल्टन हो चुके होंगे / हम।'

इस तरह वे यह उम्मीद तो करते हैं कि एक दिन उन्हें अपनी गलती का एहसास होगा पर यह आश्वस्ति उन्हें भी नहीं है कि तब तक भले लोग अपनी अस्मिता के साथ बच पाएंगे या नहीं। एक आशंका उन्हें बार-बार घेरती है। उनकी कविता 'बातचीत के इंतजार में' की आरंभिक पंक्तियां हैं- ''नहीं मालूम क्या कर रहे होंगे इस क्षण, शायद दंतेवाड़ा में बिछाई गई बारुदी सुरंग पर/ चलने की तैयारी / या इन सुरंगों को हटाने में व्यस्त होंगे, सुरंग विरोधी दस्ते के साथ मुमकिन है कोई सुरंग फट जाए। वे बस्तर की समस्या को उसके मूल में जाकर छूने की कोशिश करते हैं जो कि एक साहस से भरा-पूरा काम है। इस दृष्टि से उनकी कविता अपने हाथ कटा लिए हैं उसने'' को मैं उनकी प्रतिनिधि कविता के रूप में देखता हूं। हरे-हरे सागौन पर / कल टपकाई थी जिसने लार हरेक दरख्त सौदा है उसके लिए / जड़ तना और शाखाओं के तयशुदा हैं दाम / पत्ते भी अलहदा नहीं है / खरीद-फरोख्त से / वह नहीं जानता कि / दरख्त नहीं / अपने हाथ कटा लिए हैं उसने।