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Thursday 21 Feb 2019

पहली नियुक्ति

नवंबर अंत या दिसम्बर1988 आरम्भ की कोई तारीख। क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी, चमोली गोपेश्वर के कार्यालय के बंद होने से कुछ समय पूर्व पहला नियुक्तिपत्र मिला, पौड़ी गढ़वाल जिले के बरसूड़ी गाँव में स्थित आयुर्वेदिक चिकित्सालय के लिए थोड़ी जानकारी प्राप्त की। पता चला कि वहाँ हाईस्कूल है, डाकघर भी है। अर्थात् कुछ ठीक-ठाक-सा गाँव, थोड़ा विकसित भी, थोड़े पढ़े-लिखे लोग भी होंगे, मतलब कि रहा जा सकता है। अब तो जाकर ज्वाइन करना था। सुनता आया था कि जॉइनिंग तुरंत करनी चाहिए, बाकी काम बाद में। पहाड़ों पर तो जल्दी रात पड़ जाती है। सुबह ही कुछ यात्रा-साधन मिलना था। रात को फिर सूटकेस लेकर उसी होटल में, जो कुछ ऊँचाई पर स्थित रैनबसेरानुमा  कमरों की शक्ल में था यहीं कल रात आकर ठहरा था। दिन-भर की भटकन और थकान नींद में बदल गई। सुबह 5 बजे बस मिलनी थी पास से ही। सुबह उठकर बाहर आया तो सीढिय़ाँ गायब। पता लगा, रात-रात में ढह गईं। खैर, किसी प्रकार बाहर आकर बस में बैठा और कंडक्टर के आते ही भद्र व्यक्ति की तरह टिकट लेने लगा तो पता चला कि पेंट में पर्स ही नहीं। मन में धुकधुकी लिए वापिस उसी होटल पर। जैसे-कैसे तो उतरकर आया था नीचे की मंजिल पर कार्यालय में तफ्तीश की। पता लगा कि अभी कोई साफ करने भी शायद नहीं गया है। चाबी लेकर पहुँचा तो तकिए के नीचे ही पर्स मिल गया। मेहनत वसूल हुई। बेरोजगार व्यक्तिकी थोड़ी पूँजी भी बहुत थी। फिर बस पकड़ी ऋषिकेश की, जिससे श्रीनगर से कुछ आगे खांकरा के स्टॉप पर उतरना था। वहाँ से कच्चे मार्ग पर खांकरा से कांडई के लिए छोटी बस या जीप मिलनी थी। इसके आगे 3 या 4 किलोमीटर की चढ़ाई पर पैदल जाना था। उसी बस में पूछने पर एक दल बरसूड़ी तक जाने वाले लोगों का मिल गया। उन्होंने आश्वस्त कर दिया कि वे मुझे मेरे गन्तव्य तक पहुँचा ही देंगे। बहुत भद्र लोग थे। और भी लोग थे बरसूड़ी जाने वाले पर शेष सभी कुछ दूर तक साथ रहे, फिर चाल बढ़ाते हुए आगे निकल गए। बस, एक छोटा दल मेरा साथ देने के लिए धीरे-धीरे चलता रहा। पूरा रास्ता नापने के लिए मुझे लगभग 5 घंटे की चढ़ाई चढऩी पड़ी, सो यह दूरी वास्तव में कितनी थी,कह नहीं सकता। इस यात्रा में जीवन का यह पाठ मिला कि पहाड़ी चढ़ाई के लिए हाथ में नहीं, कमर पर पि_ू बैग में सामान होना चाहिए, सो भी कम वजन का। एक हाथ में लाठी भी होनी चाहिए, जिसके राह चलने में सहारा देने के अतिरिक्त और भी प्रयोजन थे, मसलन राह में सामने आ जाने वाले साँप आदि से निपटना। मारने के लिए तो व्यक्ति को निपुण होना चाहिए किन्तु लाठी ठकठकाकर चलने से साँप आदि स्वाभाविक रूप से मार्ग छोड़ देते हैं। दल के एक सदस्य ने मुझे एक लाठी देकर मेरी सहायता की और एकाध किलोमीटर चलने के बाद मुझे बोझ उठाने में असमर्थ जानकर मेरे सूटकेस को वहन करने का दायित्व ले लिया। मैं उनके गाँव में बतौर डॉक्टर आ रहा हूँ, इस कारण कुछ आदरभाव और कुछ उनकी अतिशय मानवीयता, दोनों के मिलेजुले प्रभाव से मेरा यह जटिल रास्ता कटना था। ये लोग रास्ते-भर बतियाते चल रहे थे और मेरा जवाब देने में साँस भी फूलने लगा था। उनके द्वारा प्रदत्त जानकारी से पता लगा कि गाँव तो एक किलोमीटर पहले ही पड़ जाएगा, जहाँ कि उन्हें जाना था, और अस्पताल एक किलोमीटर और आगे था। उससे भी एक, दो या अधिक किलोमीटर की ऊँचाई पर डाकघर स्थित था वहां पर उन्होंने आश्वस्त किया कि वे मुझे मेरे गन्तव्य तक पहुँचाकर आएँगे। उन्होंने ऐसा किया भी।

लम्बी दूरी की चढ़ाई का कोई अनुभव न था। मेदस्वी था ऊपर से, बाटा के चमड़े के जूते भी अनुपयुक्त थे। यहाँ स्पोर्ट-शू की दरकार थी। पर, जैसे भी सही, आज तो यह यात्रा पूरी करनी ही थी। शाम घिरने लगी थी जो सर्दियों में वैसे भी जल्दी घिरती है। प्यास से गला सूख रहा था, पानी की इच्छा व्यक्त की। पता लगा कि पानी तो कहीं नहीं मिलेगा। बस गंतव्य से कुछ पहले ही पानी का एक प्राकृतिक स्रोत है, वहाँ तक तो सब्र रखना ही होगा, सो, तब तक टॉफियों से गला गीला रखना पड़ेगा। उन्होंने मुझे टॉफी दी। यह बहुत लोकल किस्म की टॉफी थी। पर मेरे पास जैकिट की जेब में जो कुछ अच्छी किस्म की भी थीं, वे रास्ता काटने के लिए पर्याप्त न थीं। ये तो मैंने यूँ ही महज स्वाद के लिए या सफर में जी को साफ रखने के लिए ली थीं। मुझे ऐसी आवश्यकता का ज्ञान तो था ही नहीं। मैंने भी अपनी टॉफियाँ इस दल के साथ बाँट लीं और खत्म। उनकी टॉफियों ने ही इस यात्रा के अंत तक साथ दिया।

मुझे मार्ग से कुछ हटकर चढ़ाई पर कुछ घरों की बस्ती नजर आई। मेरे प्यासे कंठ को पानी मिलने की उम्मीद हुई। मैंने कहा, वहाँ पानी मिल जाएगा, वहाँ चलें। सहयात्री बोले कि नहीं, वहाँ पानी नहीं मिलेगा। हमें यों ही टॉफियों के सहारे रास्ता पार करना होगा। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि उनके पास बहुत टॉफियाँ हैं, अत: मैं चिंता न करूँ। मैं सहयात्रियों के साथ चले लगा। चारों तरफ सुनसान था और दूसरा कोई उपाय भी न था। सोचा कि कदाचित् पानी को ये ग्रामवासी काफी दूर से अपने लिए ला पाते होंगे और इसीलिए रोज़ आने वाले यात्रियों को न दे पाते होंगे। इतना तो सुना था कि पहाड़ी क्षेत्रों में पानी सुलभ न होकर कष्टलब्ध होता है। कभी मेरे नानाजी ने पौड़ी गढ़वाल के जैहरीखाल में नौकरी की थी तो पानी काफी नीचे बहने वाली किसी नदी से भरकर काफी चढ़ाई तक लाते थे। बहुत अधिक तो लाना संभव न होता होगा।

तो, टॉफियों से गले को तर करते हुए और अल्पकालिक विश्राम लेते हुए हम रास्ता तय करने लगे। इस बीच मैं अपना ज्ञान भी पुष्ट करता चलता था। लगभग तीन-चौथाई मार्ग तय होने को आया और मेरी मन:स्थिति यह बनने लगी कि आज किसी प्रकार गन्तव्य तक पहुँच जाऊँ, मुझे यहाँ रहना नहीं है। मैं ज्वाइन किए बगैर वापिस चला जाऊँगा। सहयात्री दल से पता चला कि दैनिक छोटी-बड़ी आवश्यकता की पूर्ति के लिए जो दो-चार दुकानों का छोटा-सा बाजार था, वह वहीं था जहाँ से हमने चढ़ाई शुरू की थी। आगे कोई सम्भावना न थी। वहाँ से एक बार में खच्चर द्वारा ढुलान का व्यय तब 1988 में 50 या 100 रुपये लगभग था, अगर कोई छोटी-मोटी वस्तु मसलन नमक या माचिस ही समाप्त हो जाए तो या तो यह कष्टप्रद चढ़ाई चढ़-उतरकर नीचे से लाओ या मूल्य के साथ भाड़ा देकर मँगाओ। पहली बार आने पर तो चारपाई बिस्तर वगैरह काफी सामान हो जाना था। काफी ढुलान लगना था। मैं तो जा रहा था मात्र 50 रुपये रोज़ के मानदेय वाली नौकरी पर डाकघर होने पर भी घर से कोई सम्वाद आने-जाने में काफी समय लगना था...सो, मैंने मन बना-सा लिया था कि न यहाँ रहा जा सकता है और न नौकरी की जा सकती है।

साथी मुझे आश्वस्त करते चल रहे थे कि ठीक मार्ग में प्राकृतिक जल का स्रोत मिलेगा और हम सब वहीं पानी पिएँगे। जब वह स्रोत आ गया तो हमने वहाँ अपनी प्यास शांत की। तब उन्होंने बताया कि वहाँ जो बस्ती थी, वह शिल्पकारों की थी और उन लोगों के अछूत होने के कारण वहाँ पानी पीना उनके लिए संभव न था। सहयात्री जाति से ब्राह्मण थे, पर लगते थे साधारण लोग ही। उनके ब्राह्मण होने की कोई विशेष पहचान न थी। पर छुआछूत का यह आचार मेरे लिए नितांत अपरिचित न होने पर भी नया जैसा और हतप्रभ करने वाला था। उसके कुछ बाद उनका गाँव भी पड़ गया और मुझे दल के दो लोग अस्पताल की उस बिल्डिंग तक छोडऩे के लिए चल दिए जहाँ फार्मासिस्ट सपरिवार रहता था। जैसे छोटे-बड़े घर मैं अभी तक देखता हुआ आ रहा था, उस हिसाब से तो यह दोमंजिला भवन काफी बड़ा और भव्य था और लगभग एक चोटी पर स्थित होने के कारण चारों ओर से आकाश की गोद में ही स्थित प्रतीत हो रहा था। एक बँगले का-सा आभास देता हुआ। किसी सम्पन्न व्यक्ति का यह मकान विभाग ने किराए पर अस्पताल के संचालन के लिए प्राप्त किया हुआ था जो गाँव छोडकर कहीं अन्यत्र सुविधाजनक स्थान पर जाकर बस गया था।

फार्मासिस्ट कोई भट्ट जी थे जिन्होंने प्रसन्न मुद्रा से मेरा स्वागत किया। उनके साथ उनके पुत्र भी रहते थे जो उसी गाँव के हाईस्कूल में पढ़ते थे। भट्ट जी ने इच्छा जाहिर की कि मेरे आने के बाद वे कुछ दिनों के लिए अपने गाँव भी होकर आएँगे जहाँ वे काफी दिनों से जा न पाए थे। वे स्वयं अस्पताल के लिए किराए पर प्राप्त भवन का बड़ा हिस्सा अपने आवास के लिए घेरे हुए थे और पानी आदि लाने के लिए उन्होंने दयावश अस्पताल के भृत्य को भी उसी भवन में  टिका रखा था, पर मेरे लिए उन्होंने स्पष्ट व्यवस्था यही दी कि मुझे गाँव में ही अपने निवास के लिए कमरे की व्यवस्था करनी होगी, जोकि लगभग एक किलोमीटर नीचे उतार पर था। उन्हें ज्ञात हो गया था कि मैं पूर्ण नियुक्ति पर न आकर 50 रुपये दैनिक के मानदेय पर आया हूँ और चिकित्सालय के प्रभारी वे ही रहेंगे। इस प्रकार, मुझे ज्ञात हो गया था कि जिसे सरकार मानदेय पर नियुक्ति करना कहती है,वह वस्तुत: अपमानदेय है और मुझे पग-पग पर हर प्रकार के अपमान के लिए प्रस्तुत रहना ही चाहिए। मैंने कभी बड़े मन से गीता का स्वाध्याय भी किया था और ये श्लोक मेरी स्मृति में अन्तर्गर्भित भी थे--

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी,संतुष्टो येनकेनचित।

अनिकेत: स्थिर्मति: भक्तिमान्मे प्रियो नर:।।

और

मानापमान यो तुल्यो तुल्यमित्रारिपक्षयो...

इन श्लोकों का मेरे जीवन और मानस पर स्थायी प्रभाव हमेशा रहा।

भट्ट जी  वहाँ के जीवन की कठिनाइयों का  लगातार वर्णन करते रहे। मानदेय की राशि उन दिनों भी चिकित्सक के सम्मानजनक रहन-सहन के अनुरूप नहीं थी। भट्ट जी स्वयं चिकित्सालय में ही निजी प्रैक्टिस करते थे, पर मुझे उन्होंने हतोत्साहित किया। कहा कि गाँव के लोग बेईमान हैं, पैसा नहीं देते, झगड़ा करते हैं। यहाँ आपकी प्रैक्टिस नहीं चल पाएगी। यद्यपि मैंने उन्हें जाते ही यह स्पष्ट कर दिया था कि मैं तो आज उनके यहाँ शरणार्थी हूँ, कल बिना ज्वाइन किए वापिस जाने का मन बना चुका हूँ। उन्होंने मेरे लिए रात्रि भोजन व विश्राम की व्यवस्था की। साथ ही उन्होंने अपनी जानकारी को खँगालते हुए कई स्थानों की चर्चा भी की जहाँ के लिए मैं अपने नियुक्चि-आदेश को संशोधित करा सकता था। दो स्थान उन्होंने चुनकर मुझे बताए जहाँ चिकित्सक का पद खाली था व वे मेरे लिए सुविधाजनक हो सकते थे। वे थे देवीखेत और तरपालीसैण।

देवीखेत पौड़ी-कोटद्वार बस मार्ग पर कहीं सड़कमार्ग से एक किलोमीटर नीचे था और तरपालीसैण मोटरमार्ग पर ही स्थित था। इसकी ही उन्होंने अधिक वकालत की। पर मैं कई दिनों से यात्रा में था, सो दूसरे स्थान के लिए आदेश को संशोधित कराने के लिए उलटे पाँव गोपेश्वर जाने की बजाय मैंने पहले घर जाने का निर्णय किया। घर से दस-बारह दिनों से कोई संवाद भी हुआ न था। नौकरी तो करनी ही थी. तो सुबह 10-11 बजे लगभग भट्ट जी ने दाल-भात खिलाकर अपने पुत्र को मेरे साथ कर दिया। वही मेरे सूटकेस को पूरे रास्ते ढोकर लाया और कांडई तक छोड़कर गया जहाँ से मुझे खांकरा के लिए कोई बस या जीप मिलनी थी। अब तक मेरे पैर मन-भर के हो गए थे और अधिक चलने-फिरने में असमर्थ थे।