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Thursday 21 Nov 2019

यहीं कहीं है रास्ता

दिनमान नामक पत्रिका का समापन समारोह लखनऊ में आयोजित किया गया था। लगभग पचास वर्षों तक प्रत्येक पढ़े-लिखे परिवार की प्राथमिक आवश्यकताओं की सूची में सम्मिलित रहने वाली अत्यन्त लोकप्रिय पत्रिका के बन्द होने से साहित्य जगत में बवण्डर सा आ गया था। दूर-दूर से लोग आये थे। अन्त में फिर से शीघ्र प्रकाशित करने का संकल्प लेकर समापन हुआ।

अमृता और मेहताब भी इसी कार्यक्रम में आई थी। आज वापिसी थी। वापिस जाने के लिये दोनों पूरे दो घण्टे पहले स्टेषश आ गई। टैक्सी वाले ने बहुत दूर उतारा था और यह व्यवस्था ट्रैफिक को दुरुस्त रखने के लिये पुलिस ने कर रखी थी। मई महिने का तपता लखनऊ; गर्मी से बेहाल लोग, रेलवे प्रळासन की व्यवस्था बनाए रखने की लाख कोशिशों पर पानी फेरता भीड़तंत्र। रेल्वे ट्रैक को बख्श कर हर जगह पैर पसारे हुए यात्री । अमृता ने मेहताब के कान में चिल्लाकर कहा- पूछताछ में कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, सो कुली, पुलिस, टी.टी.आई कुल चार लोगों से पूछकर पक्का पता कर लिया है; हमारी ट्रेन पुराने स्टेशन पर जो इससे लगा हुआ हेै,वहॉ पर आयेगी, अब चलें?

नये स्टेशन का यह हाल है, पुराने का क्या होगा? पुराना स्टेशन बाहर से स्टेशन जैसा लग ही नहीं रहा था। दोनों पूछते हुए अन्दर गईं। यहां तो नये से अधिक बड़े प्लेटफार्म, और दूर-दूर तक खाली जगह, हरियाली और बहुत स्वच्छता थी। मेहताब ने कैमरा निकाला और सेट करने लगी। लगेज, बैग, सूटकेस, टीनपेटियां, सुतली से बंधा हुआ बिस्तर, थैले, पानी की बोतलें एक के बाद एक पंक्तिबद्ध रखे हुए थी; रेलगाडी से भी ज्यादा लम्बी लाइन। ऐसा तो कभी देखा ना था, ये क्या माजरा है? जो भी हो फोटो तो खींच ही लूं, तभी अचानक जैसे हवा से या जादू से जाने कहां-कहां से निकल कर लोग आ गये, अधिकांश लड़के थे, अपना सामान सहेजने लगे, और फिर सामने के ट्रैक पर मुंबई जाने वाली ट्रेन आ गई, अच्छा तो ये बाम्बे जाने वाले लोगों का सामान था ! पता नहीं क्यों हर जगह से लोग मुंबई ही क्यों जाते हैं, वहां ना जमीन है ना आसमान। भरपेट खाने लायक, रोजीरोटी तो अपने अपने गांव, शहर में मिल ही जाती होगी और वहां इन्सानों की तरह जीने का वातावरण भी होगा, स्वच्छ हवा, पानी, खुली जगह, नीला आसमान, शान्ति, हरियाली और एकाध तालाब या किसी नदी का घाट तो लगभग सभी स्थानों में होते ही हैं। रोटी कमाने का जुगाड़ लोग वहीं क्यों नही करते जहां अपना घर हो? अब इंसान रोटी नहीं पैसा कमाना चाहता है।

         ट्रेन तो लखनऊ से ही शुरु होने वाली थी अत: वहीं खड़ी थी, परन्तु बन्द दरवाजों के साथ। गर्मी से बदहाल प्रतिक्षुक यहां वहां दुबके थे। बुकस्टाल के पास एक सम्भ्रान्त सज्जन किताबें छांट रहे थे। अमृता और मेहताब भी पहुंच गईं। पूरा स्टाल अंग्रेजी पत्रिकाओं और नये घटिया अंग्रेजी उपन्यासों से अटा पड़ा था। एक पुस्तक विक्रेता के सामने रखकर पैसे देते हुए वे सज्जन बोले इसके पैसे काट लो। अमृता और मेहताब की दृष्टि एक साथ पुस्तक पर गयी - नोबेलप्राइज विनर स्टोरीज। हमें भी देना एक प्रति, अमृता बोली। सॉरी मैम एक ही थी।

कोई बात नहीं हमारे बैग वैसे भी किताबों से भारी हो रहे हैं।

रेल्वे कर्मचारी रेलगाड़ी के दरवाजे खोलकर, ए.सी. चालूकर बाकी जांच पडताल कर रहे थे। गर्मी से परेशान लोगों ने अपनी बर्थ पर कब्जा किया। संयोग से अमृता मेहताब और उन सज्जन की सीट आसपास ही थी। शीघ्र परिचय और बातचीत होने लगी। वे बोले मेरा नाम इन्द्र नागपाल  है, पेशे से डाक्टर हूं, अभी दस सालों से कनाडा में रहता हूं, पर जबलपुर का रहने वाला हंू और वहीं जा रहा हूं, अभी तो दिनमान के विदाई समारोह में आया था, बहुत दु:ख हुआ मैं उसका आजीवन सदस्य था। दिनमान मेरे परिवार के सभी लोगों की चहेती पत्रिका थी ।

- बहुत हैरानी हुई और बहुत खुशी भी आप डाक्टर हैं और साहित्य से इतना लगाव ?

- हां साहित्य में बहुत रुचि है, पढऩा मेरा शौक है किताबी कीड़ा भी कह सकती हैं। ये एक लुप्तप्राय प्रजाति हो गई है ,लोग अब किताबें पढऩे के लिये जरा भी समय नहीं निकालते हैं ।

अच्छा, हमारा तो घर है जबलपुर में, आप वहां कैसे जा रहे हैं ? विदेशी दिखने वाले उन सज्जन ने कहा अरे मेरा तो जन्म ही वहां हुआ है, नाल गड़ी है मेरी नर्मदा घाटी में, बंधा हूं कितनी भी दूर रहूं खिंचकर आऊंगा। रेल की तेज गति अच्छी लग रही थी, रिश्तेदारों को पहुंचाने आये सभी अतिरिक्त लोगों से खाली हो जाने के कारण कोच में सभी लोग चैन की सांस ले रहे थे। बहुत से लोग लेटे थे, कुछ गपशप  का आनन्द ले रहे थे। मेहताब बोली बहुत ही अच्छा लग रहा है, यह ट्रेन लगातार यूॅं ही भागती रहे, हम बस यूं ही लेटे रहें। डा. नागपाल हंसे, किताब दिखाकर बोले इसे पढिय़े इसके लिये तो आप दोनों मायूस हो गईं थीं। अमृता बोली अभी शाम के 6 बजे हैं, सुबह तक हम दोनों इसे पूरा पढ़ डालेंगे। मेहताब बोली- सर ! अगले स्टेशन पर मैं दौड़कर जाउंगी और गर्मागर्म चाय लेकर आउंगी; तब तक मैं आपका इंटरव्यू ले सकती हूं?

मेरा .....! वो क्यों ?

-सर ! मैं एक लम्बा शोधपरक आलेख लिख रही हूं....एक एन.आर.आई. को कौन सी बातें विदेश खींचकर ले जाती हैं, और कैसा लगता है उन्हें यहां वापिस आकर; जाहिर है कनाडा बहुत साफ, तकनीकी सुविधाओं से लैस, बहुत आरामदायक होगा और पैसा का जिक्र करना ही व्यर्थ है । मैं तो आपका पीछा नहीं छोडऩे वाली, आप दस साल बाद अपने देश और अपनी जन्मस्थली पर वापिस आये हैं, उत्सुक हूं आपकी प्रतिक्रियाओं के लिये।

अकेला ही आया हूं। दो बड़ी बहनें हैं मेरी नागपुर में उनसे मिलने भी जाऊंगा। दो बेटियां हैं, हावर्ड यूनि. में पढ़ती हैं। पत्नी भी अच्छी है, बहुत सुखी हूं। लेकिन देश बहुत याद आता है। जब आना चाहता हूं वो लोग कहती हैं -क्या काम है ? इस बार तो मैंने उन्हें पहले से कुछ बताया ही नहीं था। 

- तो अब आप जबलपुर जा रहे हैं 

- बिल्कुल ठीक। मेरा अपना घर है वहां, मेरे रिश्तेदार हैं, दोस्त, मेरे पड़ोसी मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

-लेकिन जबलपुर गन्दा है, पूरे नगर में हर समय उफनते चौड़े गटर, पग पग पर कचरे के ढेर, चीखते, धुंआ उगलते टेम्पो।

डा.नागपाल बोले अरे तुमने देखा ही क्या होगा, अभी आई हो दुनिया में। हम जानते हैं क्या है ,जबलपुर। कितना शुद्ध वातावरण, खूब घने जंगल। जंगल में पहाडिय़ां। पहाड़ों पर बड़े ऊंचे ऊंचे घने वृक्ष। गहन गम्भीर, अपने में खोई हुई सी बहती, और कभी कभी गर्जन करती नर्मदा, संगमरमर की घाटियां और नीले आसमान से टिक कर बैठे पहाड़।

-आपको जबलपुर अच्छा लगता था ?

- अच्छा ...! अरे कोई तुलना नहीं उस स्थान की, उस समय की अैार हमारी उस जिन्दगी की। क्या सुबह होती थी, चार बजे हम लोग घण्टा भर पढ़ाई के बाद, छूटकर भागते थे.........दौडऩे कसरत करने, तैरने। उन दिनों गुप्तेश्वर शक्तिनगर कॉलोनियां नहीं थीं, बस दो चार घर थे। बाकी दूर-दूर तक सघन वन, पतली पगडंडी बडे विकट झाड़झंकार, अनेक प्रकार के पशु पक्षी। इसके बाद वहां बरगद नीम पीपल अमलतास सागौन साल टीक आम जामुन के सतर्क सिपाही हम बच्चों पर नजर रखते थे, हम सभी बच्चे सहज रूप से यही मानते थे कि ये सब कुछ सुनते और समझते हैं । हमारा झुण्ड कभी सीधे नहीं दौड़ता था- कभी सरपट, कभी कूद-कूद कर, कभी छलांगें मारते हुए, रास्ते में पडऩे वाली चट्टानों पर चढ़ते-उतरते, शाखों से झूलकर दूसरे टीले पर कूदे, बहुत मजा आता था, पेड़ भी हंसते थे, कोई कुछ पूछता नहीं था, हम क्यों दौड़ रहे हैं, कहां भाग रहे हैं। बस एक ने राह पकड़ी, बाकी सब पन्द्रह का झुण्ड उसके पीछे। भूख की परवाह नहीं थी। ठंड में पेड़ अमरूद सीताफल, बेर, तेन्दूफलों से लदे रहते थे; गर्मियों में जामुन आम वर्ष भर फलने वाला अमरूद इतना होता था कि स्वयं भरपेट खाते और बांटने को भी ले जाते थे। टक्कर रहती थी हमारी सिर्फ बन्दरों से। बन्दरों को हमसे जाने क्या बैर था, जिस पेड़ पर हम जाकर आम तोड़ें वहीं पहुंच जाएं। वो दांत, दिखाते हम डंडा। धीरे धीरे दोस्ती हो गई, फिर तो एक ही पेड़ पर बंदर और हम चढ़कर अलग-अलग डाली से फल खाते थे।

शक्तिनगर तरफ कम ही जाते थे हम लोग, वहां जंगली जानवरों का राज्य था  एक गोल चक्कर काटकर, फलों सहित हम सब  एक सांस में मदनमहल की पहाड़ी पर चढ़ते थे। इतने विकट झाड़ झंखार कि हरियाली और झरे पत्तों के ऊंचे ढेर में सीढिय़ां छुपी रहती थीं। बन्दरों और हमारे झुण्ड को सीढिय़ों की दरकार नहीं थी। कुछ लोग उसे गलती से रानी दुर्गावती की चौकी कहते हैं। गोंडराजा मदनसिंह ने एक पहाड़ी पर मदनमहल बनवाया था। दो अनगढ़ चट्टानों पर बिना नींव डाले यह भी जैसे प्रकृति ने स्वयं निर्मित किया हो ऐसा महल है। हमारी टोली सुबह सुबह धमाल मचाते हुए दौड़ती थी, वहां लोगों का आना जाना बहुत ही कम था, कुछेक साधु संन्यासी मिल जाते थे। दो चार झोपड़े, पतझड़ में झरे पत्तों की नदी आदि से अन्त तक मिलती थी। बरसात में घुटनों तक ऊंचा पानी जाने कहां से आता था, जाने कहां जाता था। बन्दरों की बहुतायत थी, लोमड़ी, लडैय़ा, सांभर, हिरण, कबरबिज्जू भी खूब थे।

- डर नहीं लगता था ?

हंसते हुए- एक तो हम मर्द, ऊपर से उमर तेरह - चौदह बरस, इस उम्र में डर नहीं लगता। उस उजाड़महल के सबसे ऊपरी खण्ड में पहुंचकर, हमें लगता हम अन्तरिक्ष में हैं, झरोंखों से दूर दूर तक रहस्यमयी शान्ति को अनुभव करते हुए पाकड़, छेवला के चौड़े पत्तों को बिछाकर लेट जाते थे। थकान के बाद का वह विश्राम ऐसा अद्भुत आनन्द मिलता था उसे यादकर आज भी रोमांच हो आता है। कितना सुख था, वही तो स्वर्ग था, वहीं तो स्वर्ग था।

अमृता और मेहताब सम्मोहित होकर अनुभव करती हुई सुन रही थीं। डा.सा.डूबे हुए थे उन दिनों की स्मृति में।

-उजाला फैल चुका होता था तब तक हम वहां से उतरकर विशालकाय चट्टानों पर चढ़ते थे। एक चट्टान के उपर दूसरी चट्टान संतुलन बनाये हुए टिकी हैं, उनके ऊपर तन कर खड़े होते थे, गर्व से आसमान की तरफ निहारते थे, फिर चारों ओर घूम घूम कर देखते थे। नीचे सारा जबलपुर कीड़ों जैसा, ऊंघता, बर्राता हुआ नजर आता था। धूप निकलती तो नलों के नीचे बाल्टी और घड़ों की लाइन लगाता जबलपुर। इतनी वेगमयी पवित्र उर्जस्वनी नर्मदा के अमृत जल को नालियों के उपर बिछायी हुई पाईप लाईनों के द्वारा अपने घड़ों में भरती हुई संस्कारधानी। 

जबलपुर में बरसात के दिनों में दस बारह दिनों तक दिन-रात झड़ी लगी रहती थी। तमाम पहाडिय़ों से बरसाती झरने बहने लग जाते थे। मदनमहल की पहाडिय़ों से जो आठ दस छोटे बड़े झरने वेग से नीचे आते थे, वे बहुत बड़ी नदी का रूप धारण कर लेते थे, अत्यन्त रोमांचकारी दृश्य होते थे आधा नगर पानी में डूबा, आधा रौद्ररूपा गरजती नर्मदा से डरा हुआ। जेठमास की गर्मी में जली काली पहाडिय़ां फिर हरी  भरी  हो जाती थीं। हंसते हुए बोले ये तो प्रकृति का चक्र है, अभी भी ऐसा ही होता होगा। पर मुझे ऐसा लगता है जाने बिजली उन दिनों इतनी खूंखार गर्जना क्यों करती थी कि प्रत्युत्तर में नर्मदा भी भयंकर हाहाकार मचाती थी। सभी पशु -पक्षी शरण ढूंढते थे, घबराये से रहते थे इसीलिए वे हम लड़कों के झुण्ड से भी स्वयं बचकर निकल जाते थे - सरसराते, मचलते हरे काले सांप, फन उठाये बिच्छू, आंखें चमकाते कबरबिज्जू, भीगी लोमड़ी, रोते से लडैय़े। पर हां शेरों के साम्राज्य  की सीमा रेखा लांघने की मूर्खता हमने कभी नहीं की।  भोला कुटीर में जो कुआं है वह पाताल फोड़ बावली जानी जाती है जब बाढ़ का पानी, मदनमहल पहाड़ी के झरनों का पानी चारों तरफ भर जाता था तो उस बावली की मुंडेरों का पता नहीं चलता था। हमारे घरों से दूर दूर तक कमर तक पानी भरा  होता था, खूब तेज बहाव में सब कुछ बहता जाता , ऐसे में हम लड़कों का झुण्ड खूब नहाता और तैरता, तब जानते ही नहीं थे क्या हाईजीनिक, क्या गन्दा। अपनी चप्पलें सिर पर संभाल कर खूब घूमते थे। दोनों ने चौंक कर देखा, महंगे ब्राण्डेड कपड़े महंगे जूते, पारकर पेन, सोने की रिम वाला चश्मा ..... कीमती अंगूठियां..

- क्या कहा आपने चप्पलें सिर पर?

- हां भई, तब मैं छोटा लड़का था  सामान्य परिवार का, दो भाई दो बहनें। पिता की साधारण नौकरी। सभी दोस्त ऐसे ही थे। माताएं संभाल-संभाल कर घर चलाती थीं सो चप्पलें बह ना जायें इसलिये सिर पर रखकर कमर तक पानी में टहलते थे, बहाव से टक्कर लेते हुए वह हमें अपने साथ बहाने का प्रयत्न करता हम उसे काटकर आगे बढऩे में सफल रहते थे, तभी तो हर रोग से लडऩे की ताकत आ गई  हममें।

- आप लोग इतना घूमते खेलते थे तो पढ़ाई?

- पढ़ाई नहीं करते तो इतने बड़े डाक्टर कैसे बनते? चार दोस्त डाक्टर, तीन इंजीनियर एक तो आई.जी.है। मैंने तो स्कूल जीवन में खूब हिन्दी साहित्य पढ़ा, देवकीनन्दन खत्री से लेकर प्रेमचन्द, अज्ञेय तक, मलिक मुहम्मद जायसी से लेकर महादेवी तक सबको खूब पढ़ा। जब मेडिकल कॉलेज पहुंचा तो अंग्रेजी को मजबूत करने, इलियट, कीट्स, रसेल और शेक्सपीयर का पूरा साहित्य पढ़ डाला।

-हे भगवान शेक्सपीयर!!  जिसके हाथ हाथ भर लम्बे संवाद देख कर मेरे हाथों के तोते उड़ जाते हैं ।

- डाक्टर बन गया, बड़ा नाम मिला, गृहस्थी बसी। फुर्सत मिली और फिर पढ़ा मैंने संस्कृत साहित्य - चारों वेद, पुराण, रघुवंश, कुमारसंभव। पुराण और उपनिषद तो समझ में नहीं आये परन्तु ऋगवेद अत्यन्त भव्य काव्य है।

थोड़ी देर सब चुपचाप चाय का आनन्द लेते रहे। पूरे कोच में यात्री या तो बातें कर रहे थे या फोन। पढ़ता हुआ कोई नहीं  दिखा। डा.सा. बोले पता नहीं लोग पढ़ाई किये बिना कैसे रह लेते हैं। मेहताब बोली भारतीयों में पढऩे की आदत कम होती जा रही है गम्भीर साहित्य तो और भी कम पढ़ा जाता है। और आपका तो प्रोफेशन भी साहित्य के विपरीत है .....डा.सा.टोकते हुए बोले साहित्य के विपरीत कुछ नहीं होता है। साहित्य सहस्र चक्षुओं से देखता है, दस सहस्त्र मुखों से कहता है।

 

प्रकृति के  प्रत्येक रूप में, ठिठुरन भरा जाड़ा हो, भीषण गर्मी या घनघोर वर्षा, हमें आनन्द अनुभव होता है, इस रोमांच को, इस आनन्द को मैंने खूब भोगा, खूब जिया है। रघुवंश में कालीदास ने कितना सटीक लिखा है -''पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति ÓÓ। -देवों का लिखा हुआ यह काव्य  'प्रकृतिÓ देखो न कभी मुरझाता है न जीर्ण होता है ।

अमृता जो लगातार 'नोबलप्राइज विनर स्टोरीज Ó पढ़ती जा रही थी पर बहुत ध्यान से डा.सा. की बातें भी सुनती जा रही थी, किताब बन्द करते हुए बोली आपकी बातें तो इतनी सुन्दर हैं जैसे परी लोक की कथा हो । बस अब यही ख्याल आता है कि अब क्या होगा? जब आप वर्तमान रूप देखेंगे, आपको बहुत धक्का पहुंचेगा। डा.सा. बोले हूं ...थोड़ा अंदाज है ,समाचार सुनता हूं, पढ़ता हूं ,समय सुखद नहीं रहा। इसीलिए तो हर वृद्ध को बीते दिन अच्छे लगते है। हम इतनी कम उम्र के बच्चे, कितनी भोर, मुंह अन्धेरे भटकने, खेलने निकल जाते थे, न किसी का अपहरण हुआ न कोई भागा, न नशा न पार्टी। आज आराम और तरह तरह के सुख हैं साधन हैं, इलाज हैं पर ऐसा लगता है कुछ, बहुत कुछ गलत हो रहा है, ये तो विकास नहीं है रास्ता भटक गये हैं हम।

   सुबह उतरने की तैयारी करते हुए सामान समेटते हुए अमृता बोली , 'सर हम दोनों एक क्वार्टर में अकेली रहती हैं, आपको वहां कोई दिक्कत नहीं होगी । आपका घर सालों से जाने किस हाल में होगा।

- अरे अभी देखना तुम, हम भारतीय हैं अभी भी रिश्तों में वही गर्मी वही सच्चाई है।

डा. सा. के स्वागत का दृश्य भाव विभोर करने वाला था। जैसे ही उन्हें जरा समय मिला, अमृता बोली, सर आपकी पुस्तक ........

- नहीं इसे अभी रखो चैन से पढ़ो और हां पूरा जबलपुर, आसपास के सभी स्थान घूमने जाना है, बच्चियों तुम भी हमारे साथ  चलना।

डा.सा. की मित्रमंडली ने दूरी के हिसाब से अच्छा कार्यक्रम बनाया था। प्रथम दर्शन किये त्रिपुरसुन्दरी के तेवर ग्राम में। डा. सा. बोले जाउलीपत्तन अर्थात जबलपुर से भेड़ाघाट जाने वाली सडक के आठवें मील पर वर्तमान त्रिपुरी मिलेगी । लिंग एवं पदमपुराण में त्रिपुरी का वर्णन है। तेवर से करणबेल के रास्ते में एक पत्थर की दीवार है जो त्रिपुरासुर दैत्य राज्यकुल की प्रतीक है। इन्हीं दैत्यों की बड़े बड़े पत्थरों की बनी दीवार मगध के गिरीव्रज या पुराने राजगिर में देख लो। इन्हीं दैत्यों ने बलूचिस्तान में हाब नदी का बांध ऐसे ही पत्थरों से बनाया था। त्रिपुरी के ढंग की दीवारें यूनान में भी देख लो। उस समय पूर्व यूरोप से लेकर भारत के पूर्वी भाग आसाम तक दैत्य कुल का राज्य था। डा.सा. हंस कर बोले पर ये दैत्य तुम्हारे किस्से कहानियों वाले नहीं हैं। अमृता बोली मुझे तो लगता है शारीरिक रंगरूप बदल गया है पर दैत्यों का साम्राज्य पूरे संसार में है। चौसठ योगिनी की मूत्र्तियां आक्रमणकारियों ने तोड़ी थीं, पर नुकसान पहुंचाने का सिलसिला आज भी जारी है।

भेड़ाघाट पहुंचने तक बारह बज गए थे। पैदल चलने वाले रास्ते के दोनों ओर अस्थायी दुकानें बनी हुई थीं, कोल्डडिं्रक चिप्स, पूजन सामग्री, सबसे अधिक संगमरमर से बने हुए हस्तशिल्प रखे हुए थे। अमृता और मेहताब ढेरों व्यंजन बनाकर ले गईं थीं, दोपहर का भोजन वहीं करना तय हुआ था। कहीं साफ सुथरी जगह नहीं मिली। दूर-दूर तक कचरा, सड़े फूल पत्ते, डिस्पोजल कप, गिलास, चिप्स आदि के सैकड़ों पैकेट, दर्जनों कुत्ते मंडराते हुए। कुछ की तरफ तो भूल कर भी दृष्टि पड़ जाती तो उबकाई आ जाती थी।

जनसंख्या बढ़ी; सम्पन्नता भी सामथ्र्य भी; खूब घूमना फिरना आरम्भ हुआ; खान पान की पाबन्दियां हटीं तो चारों तरफ कूड़ा फैलने लगा। डा.सा. बोले मुझे दु:ख इस बात का है कि नर्मदा का भी पाट सूख गया है, जिसकी अथाह गहराई से अच्छे तैराक भी भय खाते थे अब उसकी तलछट दिख रही है काई लगे हुए पत्थरों और दरकी हुई चट्टानों को देख कर लगता है यह तो उस गरिमामयी नदी का कंकाल है।

धुआंधार जलप्रपात देख कर वापिस लौटते हुए रास्ते में दोनों तरफ संगमरमर के शिल्प बेचते हुए लोग मिले। गमछा बिछाकर रखी हुई मूत्र्तियों के उपर छाता तान कर खुद धूप में सूखते हुए एक किशोर से कुछ अद्भुत कलाकारी के नमूने खरीद कर सब वापिस आये।

अमृता बोली, ये लीजिये आपकी पुस्तक, हम दोनों ने पढ़ ली है। दिल को छूने वाली कहानियां हैं। सर ! मेहताब बोली, आपको दु:ख तो बहुत हुआ होगा, जबलपुर की यह दशा देख कर; कहां आज से पचास साल पहले का स्वच्छ स्वस्थ वातावरण और कहां आज यह प्रदूषित नगर। डा. नागपाल पुस्तक को उलट पलट रहे थे उस पर से दृष्टि हटाये बगैर बोले, अन्दाजा तो था पहले से, सुनता रहता था समाचार आदि, मेरे मित्र मुझे हमेशा बताते रहते थे। केवल जबलपुर क्यों? पूरे देश में बुरा हाल है - सभी नदियां अपना विस्तार खो चुकी हैं। पानी गन्दा, हवा प्रदूषित, और मानसिकता भी ...अन्धेरे में निकलना भी मुश्किल, अकेले निकलना मुश्किल। जैसे हम घूमते थे, आज के बच्चे इतनी देर अन्धेरे में सुनसान में रहेंगे तो मां-बाप का तो खून सूख जायेगा जाने कितनी घटनाएं घट सकती हैं। ये किस तरह का विकास है? रहन -सहन का स्तर बहुत ही अच्छा हो गया है, किन्तु बहुत तृष्णा जाग उठी है, लालच भभक उठा है ,  धरती हमारी, लाखों टन कचरे के बोझ से मर रही है और यहां के रहवासी  के दिमाग में बस पैसा, पैसा और अधिक पैसा, अधिक सुविधाएं और अधिक भोग की इच्छा। भौतिक विकास तो बहुत हुआ है पर अब रुक कर विचार  करना चाहिये कि क्या हम गलत दिशा में जा रहे हैं?

छोडि़ऐ न सर आप क्यों इतने मायूस हो रहे हैं, आप तो कुछ दिनों  के बाद वापिस जायेंगे, वे सारे देश कितने स्वच्छ और प्रदूषण रहित हैं।

- नहीं अब वापिस नहीं जाऊंगा। जिस धरती ने मुझे इतने सुख दिए, जिसे सुनकर आप लोग भी दंग रह गईं। आज उस धरती के दु:ख के दिन हैं, रोग लग गया है इस हालत में जरूर कुछ उपाय सोचूंगा, कुछ तो जरूर करूंगा।

- अमृता ने कहा - यहां भी कचरे को ठिकाने लगाने के उपाय ढूॅढे जा रहे हैं। बहुत सारी बातों पर विचार हो रहा है जैसे प्लास्टिक पन्नियों की सड़क, कचरे से खाद बनाना, रिसाइकिलिंग वगैरह

- सब व्यर्थ है। कितनी सड़क बनाओगे क्या चांद तक? क्या उसके नुकसान नहीं हैं? आज सुबह स्नान के बाद मैंने दुर्गा सप्तशती का पाठ किया। जानती हो न उसकी कथा? दोनों ने हां में सिर हिलाया। रक्तबीज जब हजारों की संख्या में स्वयं को बनाता था तो मां भी हजारों हो जाती थी। रक्तबीज जब लाखों हो जाते थे मां भी लाखों बनकर उसका भक्षण करती थी; किन्तु ऐसा कब तक चलता? अन्त में मां ने मूल रक्तबीजासुर का वध किया, जड़ ही समाप्त कर दी  और यही सही उपाय है।

- मतलब कचरा रूपी रक्तबीज को पैदा ही न होने दिया जाये ।

- हां, हम लोगों को याद आता है डा.सा. ने अपने दोस्तों की तरफ देखते हुए कहा, सत्तर के दशक तक कचरे की कोई समस्या नहीं थी। न रेडीमेड चीजों का इतना विशाल बाजार था न इतनी पैकिंग। घरों में झाड़ू लगती थी तो मुट्ठी भर कचरा निकलता था। आजकल हर घर से बाल्टी भरकर कचरा रोज निकलता है।  इस जड़ को समाप्त करने की मुहिम कहीं से तो प्रारम्भ करना है ।

मेहताब खिलखिलाने लगी बोली, मैंने तो पूरी रूपरेखा बना डाली थी एक हृदयविदारक कहानी की । एक व्यक्ति वर्षों बाद जन्मभूमि को देखने आता है औेर उसकी दुर्दशा देख कर उसका दिल टूट जाता है। सब हंसने लगे। डा.सा. ने पुस्तक ''नोबल प्राइज विनर स्टोरीजÓ को बैग के अन्दर बन्द किया और कहने लगे वही कहानी क्यों लिखो जिसका अन्त आंसुओं के नमक और सिसकियों की मिर्च से चटपटा, हाहाकारी बनाया गया हो? उम्मीदों की पताका भी तो फहराती हुई भली लगती है। तुम भी वैसी ही कहानियां लिखो जिनमें सुखद अन्त हो, जैसे कि पुराने समय में नानी हर कहानी के अन्त में कहती थी जैसे उनके दिन फिरे वैसे सबके होंय।