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Sunday 18 Aug 2019

मन की तीज

'शेखर हम कब तक यूं ही पार्क का कोना ढूंढते रहेंगे या रेस्त्रां के केबिन में बैठते रहेंगे? क्या मैं कभी सबके सामने तुम्हारा हाथ पकड़कर नहीं चल पाऊंगी?’ शेखर के कंधे पर सिर टिकाए हुए सरगम ने कहा।

'अरे, सरगम जी किसने मना किया है। ये लो मेरा हाथ और बताओ कहां चलना है'। शेखर ने अपना हाथ सरगम की ओर बढ़ाते हुए कहा।

'मजाक छोड़ो। कभी तो गंभीर हुआ करो।‘ सरगम ने नाराज होते हुए कहा। उसने शेखर के कंधे से अपना सिर हटा लिया।

'अरे। मेरी प्यारी सरू तुम्हें क्या लगता है मैं गंभीर नहीं। पूरी गंभीरता से कह रहा हूं, पकड़ो हाथ और बताओ कहां चलना है और ये क्या तुमने मेरे कांधे से सिर क्यों हटा लिया। अब इसमें सिर का क्या दोष, उसे क्यों सजा दे रही हो, बेचारा सही जगह पर टिका था और जगह ने भी सही चीज को सहारा दिया था और तुम विलेन कब से बन गईं। प्राण चचा तो कबके स्वर्ग सिधार गए तो यहां कहां से आ गए।‘ शेखर ने सरगम को चिढ़ाते हुए कहा।

इस पर नाराज होते हुए सरगम ने कहा 'जाओ, मैं तुमसे बात नहीं करती’।

'अच्छा... तो किससे बात करोगी मेरी मैना ?’ शेखर ने उसका चेहरा अपनी ओर घुमाते हुए कहा।

सरगम ने डबडबाई आंखों से देखते हुए कहा -'तुम तभी सीरियस होगे, जब मुझे किसी और के पल्ले बांध दिया जाएगा। तब तुम्हारी हंसी-मजाक की आदत जाएगी। देखना जीवन भर रोते रहोगे। तभी तुम्हारी आंखें खुलेंगी जब मैं किसी और की पत्नी बन जाऊंगी। तुम्हें मुझसे शादी नहीं करनी तो बता दो, लगता है यूं ही टाइम पास कर रहे हो। अगर ऐसा है तो अपने आंसुओं को छलकने नहीं दूंगी बल्कि जीवन भर इन्हीं आंसुओं से आपनी यादें साफ करते रहूंगी। अच्छा ही होगा. तुम्हारा क्या जाएगा, कोई और मिल जाएगी तो सरगम को भूल जाओगे। वैसे भी सात सुरों की कहानी इतनी भी बड़ी नहीं कि भूली न जा सके। बस खत्म सरगम।‘

शेखर ने गुस्सा होते हुए कहा- 'हो गया खत्म?  या कुछ और भी बाकी है’। फिर डांटते हुए कहा 'खबरदार, अगर आगे से ऐसी बात कही। जान से मार दूंगा। मेरे जीवन में कोई और इस जनम में तो क्या हजारों-हजारों जनम भी नहीं आएगी। मुझे केवल सरगम चाहिए और कोई नहीं, समझीं? मेरी जान, हंसने का मतलब ये नहीं कि मैं तुम्हें चाहता नहीं। तुम्हें इतना चाहता हूं कि तुम भी खुद को उतना नहीं चाहती होगी। कोई भी किसी को नहीं चाह सकता। तुम कहीं और शादी कर भी लोगी तो भी शेखर का वादा है कि वो इस जनम तो क्या किसी भी जनम में शादी करेगा तो सिर्फ और सिर्फ सरगम से।‘

सरगम ने खुश होते हुए कहा 'अच्छा...!! सरगम के होने वाले दूल्हे मियां। शादी तो तब होगी जब आप घरवालों से मेरा हाथ मांगेंगे। मेरे घरवाले नहीं जाएंगे तुमसे बात करने।‘ सरगम ने शेखर को चिढ़ाते हुए कहा।

'मेरी मैना, बस दो महीने बाद मेरा इंटरव्यू है। वो हो जाए और मुझे पक्का यकीन है कि इस बार मेरा सेलेक्शन जरूर हो जाएगा।‘

'जानते हो दो साल निकल गए। इस बार मांजी ने जिद ठान ली है कि किसी भी हाल में इसी साल मेरी शादी करवा देंगी। तुम तो जानते हो न, हर नारी को अपनी जाई संतान से ही मोह होता है। जिसने मुझे जनम दिया वो तो रही नहीं, ये मां तो वैसे भी मुझे नहीं चाहती या यूं कहूं कि मुझे पसंद ही नहीं करती। अपने बेटे में ही लगी रहतीं हैं। वो भी क्या करें। मेरा भाई मानसिक रूप से जो अस्वस्थ है’। चिंता भरे स्वर में सरगम बोले जा रही थी।

शेखर ने उसे अपनी बांहों के घेरे में लेकर कहा 'तुम चिंता न करो मैं हूं न.... सब ठीक कर दूंगा। तुम कहती हो तो कल ही आकर बात कर लूंगा।‘

'सच’? सरगम ने खुश होते हुए कहा।

'हां, सच मेरी मैना’ सरगम ने उसके घुटनों पर अपना सिर रख दिया।

अगले दिन शाम को शेखर सरगम के घर गया। सरगम ने अपनी मां और पिता जी से उसका परिचय कराया- 'पापा, ये शेखर है। यूनिवर्सिटी में मेरे साथ पढ़ता था और दो साल से सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है। पिछली बार इंटरव्यू तक गया था। इस बार भी इंटरव्यू कॉल आया है।‘

उसकी मां ने बीच में टोकते हुए कहा- 'क्यों सरगम उसके मुंह में जुबान नहीं है या फिर इसी वजह से इंटरव्यू में उसका सिलेक्शन नहीं हुआ। बेचारा गूंगा जो है और इंटरव्यू में तू तो गई नहीं होगी साथ में जो उसके बारे में बतातीÓ। फिर सरगम को डांटते हुए बोली.. 'अब चुपकर बैठ जा। मुझे बात करने दे।‘ सरगम सिर झुकाकर बैठ गई।

सरगम की मां ने शेखर से पूछा - 'घर में कौन-कौन है तुम्हारे’

'जी दो छोटे भाई हैं और एक छोटी बहन है’। बहुत सलीके से शेखर ने जवाब दिया।

'पिताजी क्या करते हैं’

'वो स्कूल में पढ़ाते हैं।‘

'तुम्हारी कैसी तैयारी चल रही है? सारा दिन घूमते ही रहते हो या पढ़ते भी हो और क्या भरोसा कि इस बार भी तुम्हारा सिलेक्शन न हो!’

'जी, पक्का भरोसा है, हो जाएगा’। शेखर ने पूरे आत्म विश्वास से कहा।

'और नहीं हुआ तो’

'पक्का विश्वास है कि सलेक्शन हो जाएगा’ उसकी आवाज में दृढ़ता थी।

'नहीं हुआ तो... एक परसेंट भी’

'तो फिर से तैयारी करूंगा’

'यानी एक और साल बर्बाद, क्या कमाओगे, क्या खिलाओगे ?

'जी... ? शेखर ने प्रश्नभरी निगाहों से मांजी की तरफ देखा

सरगम की मां ने स्पष्ट करते हुए कहा - 'ऐसे क्या देख रहे हो? सही कह रही हूं। मैं एक और साल का इंतजार नहीं कर सकती। अगर कोई लड़का नहीं मिला तो बैठा रखूंगी तुम्हारे लिए, नहीं तो शादी कर दूंगी इसकी।‘

शेखर ने कहा 'नहीं मम्मी जी,’

'मम्मी जी मत बोलो। मैं तुम्हारी मम्मी नहीं, अभी आंटी ही बोलो। अब बोलो क्या बोलना है।‘ उसने रूखेपन से कहा.

शब्द जैसे शेखर के गले में ही अटक गए थे फिर भी खखार-खखार कर उन्हें बाहर निकालते हुए शेखर ने कहा - 'मैं सरगम से प्यार करता हूं और सरगम भी...(सरगम की तरफ देखते हुए) मुझसे प्यार करती है।‘

'तो मैं क्या करूं... ?’ उसकी मां ने बड़ी बेरुखी से कहा।

'जी... जी, मैं उसके बिना जी नहीं पाऊंगा।‘ शेखर ने कहा।

'अब तुम्हारे जीने- मरने की जिम्मेवारी मेरी तो है नहीं।‘

'आंटी जी बस तीन-चार महीने की बात है। सब कुछ फाइनल हो जाएगा, तब तक आप सरगम की शादी कहीं फिक्स मत करिएगा प्लीज।‘

'क्यूं, तुम कौन होते हो हमें मना करने वाले.... ? अच्छा, ये बता कि तुमने अभी जो बताया कि तुम्हारी एक बहन है’

'हां, है, मुझसे छोटी है’

'उससे फर्क नहीं पड़ता, तुम ये बताओ कि क्या तुम अपनी बहन की शादी हमारे बेटे से करोगे?’

'क्या..? उसने आश्चर्य से कहा। आश्चर्य से ज्यादा दिल को धक से लगने वाला था यह प्रश्न। सरगम ने अपने भाई के बारे में बता रखा था कि उसका भाई मानसिक रूप से अस्वस्थ है। फिर वो अपने सुख के लिए अपनी बहन को दुख के नरक में कैसे ढकेल सकता था.।

उसे खामोश देखकर सरगम की मां ने फिर कहा.... 'क्या सोच रहे हो.?’इस हाथ ले, उस हाथ दे’

शेखर ने संभलते हुए कहा, 'आंटी जी ये तो मां- पापा से पूछना होगा और फिर बहन की भी तो कुछ ख्वाहिश होगी’

'देखो शेखर, हमारी शर्त यही है कि जो हमारे बेटे को बेटी देगा, उसे हम सरगम का हाथ सौंप देंगे।‘

इस पर शेखर ने हाथ जोड़ते हुए कहा 'मेरी और सरगम की खुशी एक है। हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं। प्लीज ऐसा न कहिए।‘

'प्यार करते हो तो कीमत चुकाओ। छोटी-सी ही बात कही है। अपनी बहन की शादी हमारे बेटे से कर दो।‘

'आंटी जी, मैं अपनी जिम्मेवारी ले सकता हूं। बहन की लिए हां कैसे कहूं। मैं वादा करता हूं कि आपके बेटे लिए अच्छी लड़की ढूंढूंगा। सरगम के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं।‘ शेखर ने उससे रिक्वेस्ट करते हुए कहा।

'तुमने क्या मुझे बावला समझ रखा है? जो सामने लड़की है तो 'हां’ कर नहीं कर रहे और लड़की ढूंढने की बात कर रहे हो।‘

तभी चुपचाप बातें सुन रही सरगम ने कहा- 'तुम जाओ शेखर। मैं नहीं चाहती कि मेरी खातिर एक मासूम का जीवन नरक हो जाए। अपनी खुशी के लिए मैं शिखा का जीवन बर्बाद नहीं कर सकती।‘

तभी गुस्से से उसकी मां ने कहा- 'अच्छा, तो तूने बताया इसे बुल्लू के बारे में’।

'हां, मां मैंने ही बताया और अपनी खुशी के लिए मैं उसकी बहन का जीवन बर्बाद नहीं कर सकती।‘

'जीवन कहां बर्बाद होगा। राज करेगी घर पर।‘

'सिर्फ घर पर राज करने से जीवन नहीं चलता मां।‘

'ओह... तो किससे चलता है जीवन? बहुत जान गई है और जबान भी खुल गई है?’।

तभी सरगम ने कहा 'तुम जाओ शेखर। ये शादी नहीं होगी।‘

शेखर ने आश्चर्य से कहा 'सरगम ! ऐसा क्यों कह रही हो?’

'मेरा यही फैसला है। तुम्हें मानना होगा। तुम जाओ यहां से’ कहकर अपने कमरे में चली गई और फूट-फूटकर रोने लगी। शेखर भी चला गया। उसके बाद शेखर के कई बार फोन किया मगर सरगम ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ दिन बाद सरगम उससे मिलने गई।

शेखर बहुत उदास था। उसने सरगम से कहा 'तुम मिलने क्यों नहीं आती?

'अब मिलने से कोई फायदा नहीं। हम उस राह के राही नहीं बन सकते जिस पर साथ चल ही न सकें। तुम मुझे भूल जाओ और एक्जाम की तैयारी करो। वो ज्यादा जरूरी है।‘

शेखर ने उलटा उससे प्रश्न किया 'क्या तुम मुझे भूल सकती हो ?’

सरगम खामोश रही। शेखर ने फिर से वही प्रश्न दोहराया- 'क्या तुम मुझे भूल सकती हो?’

'मेरी बात और है शेखर। मैंने तुम्हें अपना सब कुछ माना है.’

'तुम्हारी बात और है और मेरी और, यह कैसे सरगम? हमने साथ जीने के सपने देखे थे।‘ शेखर ने कहा।

'मगर किसी और से विवाह के बाद उससे साथ जीना होगा मुझे। हर रात रोना होगा। मेरी किस्मत में यही है शेखर। घर से भागकर शादी भी नहीं कर पाऊंगी वर्ना मेरी नई मां मुझे जन्म देने वाली मां पर तोहमत लगाएगी। तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूं। तुम जाओ और अब कभी मुझसे मिलने की कोशिश मत करना और न ही फोन करना। नहीं तो मैं कमजोर पड़ जाऊंगी। तुमको दिल से अपना जीवनसाथी स्वीकार किया था, मगर किस्मत को नहीं मंजूर। मेरी खातिर, हमारे प्यार की खातिर, मुझे तुम्हारे बिना जीना सीख लेने दो। शेखर प्लीज।‘ कहते-कहते वो शेखर से लिपट गई और फूट-फूटकर रोने लगी।

शेखर ने उसके सिर को चूमते हुए कहा 'मेरी मैना, मेरी सरू, तुम जैसा चाहोगी, वैसा ही होगा लेकिन मैं अब न तो किसी से प्यार कर पाऊंगा और न शादी।‘

सरगम ने उससे अलग होते हुए कहा 'नहीं, शेखर ये गलत है। तुम भी अपना जीवन बसाओ। सब ठीक हो जाएगा।Ó

'मैंने जो एक बार कह दिया तो कह दिया। मेरा मन का रिश्ता तुमसे था। अब तन के संबंधों की जरूरत नहीं। तुम नहीं तो कोई नहीं।‘ शेखर ने दृढ़ स्वर में कहा।

'नहीं! तुम्हें मुझे वचन देना होगा कि तुम भी शादी कर लोगे’

'मैं वचन नहीं दे सकता। तुम्हारी बात मान रहा हूं तो मेरे जीवन को मुझ पर छोड़ दो। वरना मुझसे पढ़ाई भी नहीं हो पाएगी और तुम ये नहीं चाहोगी कि मैं पढ़ न सकूं’

'ठीक है शेखर जैसा तुम ठीक समझो. अब मुझे जाना चाहिए ! हमेशा के लिए।‘

'एक बार गले लग जाओ न...! मैं तुम्हारी महक जीवन भर याद रखूंगा’ और सरगम शेखर से लिपटकर फिर रोने लगी।

शेखर ने उसके आंसू पोछते हुए कहा 'चलो आज के बाद हम नहीं मिलेंगे लेकिन मैं यहां आकर जरूर बैठूंगा और तुम्हारी यादों से बातें करूंगा। कभी मिलना चाहो तो आ जाना यहीं। इसी समय।‘ 

सरगम भारी मन और भारी कदमों से समय के साथ कदम बढ़ाने लगी। उसे लगा शेखर की यादों से उसके पांव भारी हो गए हैं। उसकी यादों ने उसकी कोख में पलना शुरु कर दिया है। सरगम के रिश्ते तेजी से देखे जाने लगे। मगर उसकी मां की यही शर्त थी कि सरगम की शादी उसी से करेगी जो उसके बेटे से अपनी बेटी की शादी करेगा। कुछ दिन बाद ही एक रिश्ता आया। सरगम की मां-पापा उनसे मिलने गए। आलीशान घर देखकर वो भौंचक्के रह गए।

लड़के के पिता ने कहा 'आइए सूरज बाबू, आपका स्वागत है।‘

सरगम के माता- पिता बैठ गए और उनकी खूब आवभगत हुई।

लड़के के पिता ने कहा 'हमारा लड़का एम.ए. तक पढ़ा है। उसने पढ़ाई छोड़ दी।

सरगम के पिता ने कहा -'बस, केवल एम.ए. तक पढ़ा है ?

लड़के के पिता ने कहा- 'उसे पढ़ाई की क्या जरूरत? फिर उसे तो घर का व्यवसाय ही संभालना है। सब कुछ उसी का है। अभी तो मौज मस्ती का समय है। बच्चे हैं मौज मस्ती करेंगे। फिर कारोबार सम्भालेगा हमारा।‘

'मौज मस्ती मतलब ?’ सरगम के पिता ने पूछा..'अरे, घूमना-फिरना। कुछ समय बाद तो उसे घर- गृहस्थी ही संभालनी है। हां, हम आपसे कुछ छुपाएंगे नहीं। हमारी लड़की को एक तो फिट्स पड़ते हैं कभी-कभी और थायराएड की वजह से शऱीर भारी हो गया है। वैसे मेरे बाद ये सारी प्रापर्टी दोनों में आधी-आधी बंट जाएगी।‘

सरगम की मां बोली- 'हमें रिश्ता मंजूर है। आपकी बेटी भी हमारे यहां राज करेगी। तो रिश्ता पक्का समझें?’

'जी हां, बिलकुल।‘

'तो अगले महीने ही नवरात्र शुरु हो रहे हैं। उसी में कर देते हैं विवाह। चट मंगनी-पट ब्याह’

'कह तो आप ठीक रही हैं भाभी जी’। लड़के के पिता ने कहा

'तो बस हम चलते हैं और शादी की तैयारी करते हैं। बाकी बातें फोन पर होती रहेंगी’। सरगम की मां ने कहा।

सरगम के मां और पिता लौट आए लेकिन सरगम के पिता को एक बात खटक रही थी कि बच्चे हैं मौज-मस्ती करेंगे ही। उसने सरगम की मां से कहा तो उसने जवाब दिया कि ठीक ही तो कह रहे हैं कि जवान बच्चे तो मौज-मस्ती करेंगे ही।

 'कहीं ऐसा न हो बुल्लू की मां, हमारी बेटी जीवन भर रोती रहे।‘

'देखो जी, अब तो बात फाइनल हो गई। वर्ना हमारे खानदान की वंश बेल कैसे बढ़ेगी? कौन करेगा हमारे बेटे से अपनी बेटी की शादी। समझौते तो करने ही हैं न?

सरगम की शादी हो गई और उसने अपनी जिंदगी को अपना भाग्य मानकर अपनी ससुराल में प्रवेश किया।

शादी के बाद ससुराल की पहली रात के सपने जवां आंखों में तारों की तरह झिलमिलाते हैं। सरगम शेखर का ख्याल दिल से निकाल चुकी थी क्योंकि नई जिंदगी में विश्वास ही सबसे मजबूत खम्भा होता है। सरगम अपने जीवन के जाने किन-किन पहलुओं पर विचार कर रही थी कि दरवाजा खुला और संकेत शराब के नशे में धुत्त अंदर आया। संकेत उसके पास आया और बोला- अरे वाह, तुम तो बहुत खूबसूरत हो। मगर खूबसूरत चीज को संभालकर रखते हैं। नहीं तो टूटने पर बहुत दुख होता है’ ये कहते-कहते वो बिस्तर पर गिरा और सो गया।

सारी रात फूलों की सेज को सरगम के आंसू सींचते रहे। अपने जीवन के गर्भ गृह में स्थापित मूर्ति को तोड़ अपनी यादों से उसे पाटकर दूसरी मूर्ति के लिए स्थान बनाया था। जाने कितने सपने तोड़कर कुछ नये सपनों के साथ वो दुल्हन बनकर आई थी मगर वो दुल्हन के लिबास से बाहर नहीं निकल सकी। उसे शेखर की याद आने लगी कितना प्यार करता था वो। उसको छोड़कर पापा ने किसके पल्ले बांध दिया मुझे। मां पराई थी मगर पापा तो अपने थे। उन्होंने एक बार भी नहीं सोचा कि क्या होगा मेरा? सुबह उठकर अपने हाथों से अपनी नथ उतारी, मांग टीका निकाला, अपने लहंगे को उसी तरह तह कर दिया जिस तरह वो आया था। उस पर सिलवटें पड़ी ही नहीं।

समय निकलता गया। चार महीने बीत गए मगर सरगम के बिस्तर की चादर को सिलवटों का इंतजार ही रहा। उसने काकी मां जो बचपन से घर में काम करती थी और अब बूढ़ी हो चली थीं, उनसे पूछा कि 'संकेत रात- रात भर कहां रहते हैं। मुझसे तो बात ही नहीं करते। क्या घरवालों ने जबरदस्ती शादी की है? उनके जीवन में कोई और तो नहीं?Ó

बूढ़ी काकी ने कहा 'अब क्या बताए बहू? वो बचपन से ही बिगड़ा हुआ है। अय्याश है नम्बर एक का। रुपया पानी की तरह बहाता है। पढ़ता- लिखता भी नहीं। इसीलिए कोई लड़की देने को तैयार नहीं था। तुम्हारे मां-बाबूजी को सोचना चाहिए था मगर उनको अपने बेटे की शादी करनी थी और यहां सीमा बिटिया के मोटापे की वजह से कहीं बात नहीं बन रही थी। बस तुम्हारा सौदा हो गया। यही सच है। सब उससे परेशान हैं। पक्का लफंगा है। मैंने तो भइया से कहा था इसको ऐसे ही घूमने दो। जब जिम्मेदारी समझे तब शादी करना वर्ना जो लड़की आएगी, रोती ही रहेगी। मगर तुम्हारी मां को तुम्हारे भाई की शादी करनी थी और अब तो तुम्हें ऐसे ही जीवन काटना है।‘

सरगम की आंखों में निऱाशा के बादल घुमड़ आए थे। कहीं उनकी बारिश में बूढ़ी काकी न भीग जाए, यही सोचकर वो अपने कमरे आ गई। उसको विश्वास हो चला था कि उसकी सूनी सेज पर गुलाब नहीं खिल सकेंगे। उसे केवल गुलाब नहीं बल्कि उनके साथ कांटे भी मिले थे। बिस्तर पर फूल नहीं बल्कि गुलाब के कांटेदार पौधे ही सजा दिये थे। अलबत्ता उसकी भावनाओं के हरसिंगार रोज झड़ेंगे मगर उनको आंचल में समेटने वाला कोई नहीं होगा। एकाएक उसने निश्चय किया कि वो वापस डांस स्कूल में बच्चों को नृत्य सिखाएगी। इस पर घर में बहुत विरोध हुआ लेकिन इस मामले में संकेत ने कहा कि उसे नौकरी करने दीजिए। वैसे भी घर पर रहकर क्या करेगी और उसने डांस स्कूल जाना शुरु कर दिया। कुछ दिन बाद ही तीज पड़ी और उसकी सास ने उसे व्रत रखने के लिए कहा लेकिन सरगम ने मना कर दिया। सरगम ने कहा- 'जब पति-पत्नी का रिश्ता ही नहीं तो व्रत किसके लिए और क्यों। मैं तलाक नहीं दे सकती क्योंकि फिर मेरे पापा, मेरी मां के ताने नहीं बर्दाश्त कर पाएंगे। वर्ना कबकी तलाक दे चुकी होती’ लेकिन सास की जिद के आगे सरगम की एक नहीं चली और उसने तीज का व्रत रखा। व्रत के दिन भी संकेत रात दस बजे आया। सरगम का मन एकदम खिन्न हो गया था। काश! कि वो संकेत से तलाक ले लेती। मगर हालातों से कौन जीत सका? सभी हारते हैं तो परिस्थितियों से।

सरगम की नई जिंदगी शुरु हो गई थी और वो दिन भर जैसे सागर में किल्लोल करती और रात में साहिल किनारे भी प्यासी रहती और उसका हलक सूखता।

एक साल बाद डांस स्कूल का एनुअल फंक्शन था। कार्ड छपे। शहर में पोस्टर लगे। मुख्य अतिथि थे डीएम शेखर सरन। जैसे ही उसे शेखर के बारे में पता चला, उसके ह्रदय में कहीं दबी चिंगारी फिर भड़कने लगी। सरगम भी पोस्टर का हिस्सा बनी। शेखर का मन भी बेचैन हो गया सरगम को देखने के लिए।

अंतत: फंक्शन का दिन आ गया और दोनों का आमना-सामना हुआ। सरगम ने उसको अपने घर खाने पर बुलाया। शेखर का परिचय कराया। सभी उसकी आवभगत में लग गए। आखिर डीएम जो ठहरा वो। सरगम ने मन में ठान लिया था कि अब वो वही करेगी जो उसका मन कहेगा। अब तक वो उधार की जिंदगी जीती आई। घर के लिए उसने अपनी खुशियों के लिए राख कर दिया। अपना जीवन पूरी ईमानदारी से जीती रही मगर किसी ने उसकी खुशी, उसके आंसू, उसकी उमंगे, उसकी भावनाएं नहीं देखीं। उसने ठान लिया कि अब वो अपनी जिंदगी के फैसले खुद करेगी। जीवन भर घर- परिवार के लिए जीती रही। अपने फर्ज- कर्ज निभाती रही और उसके बारे में किसी ने नहीं सोचा। आज फिर तीज थी। आज उसने बहुत मन से व्रत रखा। उसको खुश देखकर संकेत की मां खुश थी कि सरगम और संकेत का मिलाप हो गया। दोपहर में वो डांस क्लास के बहाने निकली और सीधे शेखर के घर पहुंची। शेखर उससे कुछ पूछता कि इससे पहले सरगम उससे लिपट गई।

'सरू, क्या हुआ? सब ठीक तो है न? एक मिनट दरवाजा तो बंद करने दो।‘ सरगम ने कहा आज 'मैंने कुछ फैसले लिए हैं। तुम दोगे न साथ?

'मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं। अपनी आखिरी सांस तक मेरी आंखों में एक ही सूरत रहेगी लेकिन आज तो तुम्हारा व्रत है। तुम्हें नहीं आना चाहिए था। बिना पानी पिये रहना है न? ऐसे आने-जाने में एक एक्जरशन होगा। तुम्हें प्यास लगेगी। तुम परेशान हो जाओगी।‘

'मैं तो जाने कबसे प्यासी हूं। ये फूल कभी खिल नहीं सका। मैंने गलती की कि भाई के लिए अपनी जिंदगी, अपनी खुशियां सब कुर्बान कर दीं।‘

'अब कुछ नहीं हो सकता. सरू। मैं भी जीवन भर तुम्हारे ख्यालों के साथ जियूंगा।‘

'नहीं, शेखर आज के बाद मैं अपनी मर्जी से जियूंगी। आज तीज है और तीज का मैंने व्रत अपने प्यार के लिए रखा है। आज तोड़ दो मेरा व्रत। टूटकर बिखर जाने दो मुझे अपनी बांहों में ताकि मेरी असली तीज हो सके। मुझे सींच दो अपने प्यार से। सिंदूर जरूर संकेत के नाम का है मगर उसमें प्यार का लाल रंग तुम्हारा है।‘ कहकर सरगम उससे लिपट गई.’ दोनों प्रेम की गहराइयों में खो गए। फिर शेखर ने कहा कि 'तुम तलाक क्यों नहीं ले लेती? क्यूं सह रही हो इतना?’

सरगम ने कहा 'ये समाज है। कुछ लोक-लाज तो रखनी ही पड़ेगी न? मुझे अपनी सौतेली मां की फिक्र नहीं लेकिन पापा की हालत पर तरस आता है। मैं कमजोर पड़ गई थी। अपनी खुशी के लिए शिखा की जीवन नहीं बर्बाद कर सकती थी लेकिन अब नहीं, जब संकेत अपने जीवन में व्यस्त रहता है. उसको नई-नई लड़कियां ही चाहिए होती हैं। वो अय्याशी कर सकता है तो मैं क्यूं और किसके लिए घुटूं? उसके लिए क्यूं व्रत रखूं जिसको मेरी फिक्र ही नहीं? मैं अन्य सो कॉल्ड औरतों की तरह नहीं कि पति और ससुराल वाले जुल्म करें और मैं खामोश रहूं। मैंने पूरी ईमानदारी से उसके साथ शादी की थी मगर उसे ही मेरा ख्याल नहीं तो मैं अपना पूरा जीवन उसके खूंटे से बंधी नहीं रह सकती। मैं विवाहिता के बाद भी विवाहित नहीं और वो रोज नई लड़कियों के साथ रंगरलियां मनाए? मेरी डोली जरूर इस घर में आई है पर अर्थी वहां से नहीं उठेगी और अगर वहां से अर्थी उठी भी, तो उस पर लाल चूनर तुम्हारे प्यार की होगी। मैंने अपनी अर्थी उठवाने के लिए जन्म नहीं लिया शेखर। मैं भी जीना चाहती हूं. जब जीवन में खुशियां ही नहीं तो पल्लू में सिर छुपाकर रोने वाली मैं नहीं। मैं अय्याशी नहीं कर रही लेकिन जब पति अपनी पत्नी को उसका हक न दे, तो कब तक घुटेगी नारी? मैंने पूरे मन से अपनाया था उसे। तुमसे दूर होने की तड़प पर अपने कर्तव्यों की मिट्टी डाल दी थी। मगर आज सारी मिट्टी हटाकर अपनी दफन हुई खुशियों को वापस निकाल रही हूं।‘

उस दिन के बाद से डांस क्लास के बाद वो शेखर से मिलने लगी। वो कली से फूल बनने लगी थी और नन्हा फूल भी उसकी कोख में खिलने लगा। जब संकेत को पता चला तो उसने सरगम पर लांछन लगाए। सरगम चुपचाप सुनती रही। बूढ़ी काकी ने सरगम की तरफदारी करते हुए कहा कि 'वो शादी करके यहां कुंवारी रहने तो नहीं आई। अब बवाल क्यों?

सरगम ने अपनी आंखें बंदकर शेखर के प्यार की हिम्मत बटोरी और कहा - 'संकेत, मेरी बात ध्यान से सुनना और मम्मी-पापाजी आप दोनों भी कान खोलकर सुन लीजिए- मैंने बहुत बर्दाश्त किया। सब कुछ आप लोगों की खातिर सहती रही। अपनी ससुराल का मान रखती रही। संकेत रोज नई लड़कियों के साथ अय्याशी करता रहा। मैंने कोई अय्याशी नहीं की। औरत हमेशा उससे प्रेम करती है जो उसे और उसकी भावनाओं को समझता है, उसका सम्मान करता है। एक साल से ज्यादा हो गया शादी हुए और संकेत ने मुझे हाथ तक नहीं लगाया। उसे उन लड़कियों में इंटरेस्ट हैं जो बेशर्मी से किसी के भी साथ सो सकती हैं। जब आपके बेटे को मेरी तड़प का अंदाजा नहीं तो आप किस मुंह से मुझ पर इल्जाम लगा रहे हैं ? उसने फिर हिमम्त करते हुए स्पष्ट कह दिया कि संकेत को या तो बच्चे को अपना नाम देना होगा, नहीं तो तलाक। फैसला आपके हाथों में है।