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Friday 20 Sep 2019

लांटुश

''लांटुश होते हैं,’’मेरी चाची येंतील कहती। ''नहीं होते तो अच्छा होता। दरअसल, उनमें से अधिकांश ज्यादा कुछ नुकसान नहीं पहुँचाते-बल्कि काम में ही आते हैं। सब कुछ इस पर निर्भर है कि वे कहाँ और किसके साथ हैं।‘’

येंतील चाची ने छींट के किसी रूमाल में अपनी नाक छिनकी। यद्यपि वह कोई पुस्तक पढ़ते-पढ़ते नहीं बल्कि मन से कहानी सुना रही होगी फिर भी उसने काँस्य फ्रेम में कसे अपनी ऐनक के शीशों को पोंछा। उसने सिर घुड़काया क्या घुड़काया कि अपने सारे फीतों और कृत्रिम हीरों से सिरजा उसका बोनेट(हैट) डगमगाने लगा। येंतील चाची मेरी सगी संबंधी नहीं थी। वह ग्रामीणों- यूँ कहें कि भठियारों, कारिंदों, ग्वालों की वंशज रही आयी। किसी कृषक समान उसकी देहयष्टि के अनंतर उत्तंग वक्षस्थल, चौड़े कंधे, और उभरी हुई गण्डास्थि थी, उसके एंबर वर्णी नयन किसी फाख्ते के ही से सौम्य थे। अंकल जोसफ द्वारा उसे ब्याहे जाने के पूर्व कतिपय गपोडिय़ों ने उसे चेताना चाहा कि पहले कभी वह ग्वालन रही आयी है। चाचा का - ऐसा कहा जाता है कि - जवाब यूँ रहा: तब तो यह जोड़ी माँस और दूध की बेकायदा(अनकोशर) मिश्रण रहेगी।

येंतेल चाची अपनी ऐनक के शीशे साफ करती ही करती गयी कि नतीजन वे चमक उठे और अपराह्नी सूरज के नन्हे नन्हे अक्स चिलकाने लगे। तब उसने उसे पुन: केस में रख दिया।

''हाँ, हम क्या बात कर रहे थे?’’ उसने पूछा, ''अरे हाँ!; लांटुश। मेरे माँ-पिता के घर में एक लांटुश रहता था। उसने अपना बसेरा भठ्ठी और काष्टखोली के दरम्यान विन्यस्त किया हुआ था। उस घर को हमें छोडऩा था; लेकिन वह वहीं जमा रहा। लांटुश यहाँ वहाँ भटकते नहीं हैं; जहाँ आ बसे कि सदा के लिए वहीं जम गये। मैंने उसे देखा कभी नहीं। उन्हें देखा नहीं जा सकता, समझे। मैं छोटी बच्ची ही रही होगी कि सामान बाँध हम तुर्बिन की ओर चल पड़े लेकिन माँ और बहिन बाशा तो उसे परिवार ही का अंग मानती रही आयी थी। जेंटाइल लोग उसे 'डोमोविक ‘-अंतरंग आत्मा-कहते। जब कभी बाशा छींकती वह फुसफुसाता: गेसुंधेइत:।

''प्रांगण में बने हमारे स्टीम बाथ की फर्श पर दो पत्थर रहते। हमारी पोलिश आया कहीं से लकड़ी के ल_े ला उन्हें जला पत्थरों को खूब गरम कर उन पर बालटियों से तब तक पानी डालती कि जब तक भाप बेहद घनी नहीं हो जाती। स्नान के चलते बच्चे को घर ही के भीतर ठहरा रहना होता। किसी बालक को पसीना क्यों छूटता है? बेशक, उस खास क्षण आया संग रूकने से इंकार कर मैं उन्हीं के पीछे चलता। वही एकमात्र पल ऐसा होता जब मुझे माँ और बहिन निर्वस्त्र दीख पड़तीं। मैं शायद बताना भूल गया हूँ कि आया यिदिश बोलती थी। जैसे ही माँ बोलती, 'शिफेले’ वह तत्क्षण पत्थरों पर बाल्टी भर पानी उँडेल देगी, तब वे दोनों उत्तप्त हो सिहरते। जब कभी गर्मी खूब ज्यादा हो जाती माँ चिल्लाती 'तपा गये Ó तब वह दरवाजे को तनिक खोल देती ताकि समीर का झोंका भीतर बह आये। किसी दिन मुझे बड़ा कोहराम मचा उन्हें अपने साथ हम्माम ले जाने के लिए बाध्य करना पड़ा कि जिसकी भ्राँति के अनंतर बहिन अपने साथ तौलिया लेना भूल गयी। नौकरानी की जरूरत यहाँ नहीं रहने पर वह बाड़े जा गायों को संभालने लगी। माँ ने बाशा को तौलियों के लिए फटकारा तब बहिन को जाने क्या सूझा कि गीत गाने लगी:

लांटुश,

ला दो हाँथुश!

''खींच लाने की कोई जरूरत नहीं ? लांटुश तौलिये ले आता है। मुझे तो याद नहीं रहा, लेकिन माँ से और बाशा से कई एक दफा सुना। वे क्यों झूठ बोले होंगे? ऐसी बातें पुराने समय में होती रही हैं। अब संसार इतना विकृत हो गया है कि नरकदूत क्या देवदूत जाने कहाँ दुबक गये हैं।

''बहरहाल, जो कहानी तुम्हें सुनाने जा रही हूँ उसका हमारे घरे से कोई ताल्लुक नहीं। घटना तुर्बिन में घटी जो वहाँ जा हमारे बसने के अर्सा पहले आरंभ हो चुकी होगी। मोरदेसाई यारोस्लेवर नामक कोई शख्स वहाँ रहता था, जिसे जानते आये लोग दावे से कहते वैसा सुन्दर और साधु पुरूष पहले कभी नहीं रहा होगा। उसकी पत्नी का बैला फू्रमा, और एकमात्र पुत्री का पाया नाम था। होली बुक (बाइबल) में कहा गया है कि जिसे ईश्वर  चाहता है उन्हें वह स्वयं किसी सुरक्षित जगह ले जाता है। रेब मोरदेसाई अभी युवा ही होगा, चालीस के अनकरीब। अचानक उसकी छाती पर कोई फुंसी आ उभरी- दरअसल फुंसी नहीं ऐसा फफोला था मानो जल गया हो। वह फफोला पल बीते अनेक फफोलों में तबदील हो गया, हे भगवान, क्या बताऊँ, वह मर गया। बढिय़ा से बढिय़ा चिकित्सक भी उसे बचा नहीं पाये। नगर के धुर सिरे बने उसके घर में एक बगीचा, कतिपय शेड, एक आउट हाउस, एक कोठार था। वह अनाज फ्लेक्स, और पशुओं का व्यापार करता था। वह धनी था, लेकिन जब कोई व्यापारी मरे तो उसके कर्जदार उधारी चुकाने में कतई जल्दी नहीं करते। उन दिनों हर कोई भरोसे ही पर उधार देता था। अपनी किसी नोटबुक में रेब मोर देसाई ने उधारी का हिसाब लिखा हुआ था लेकिन नोटबुक जाने कैसे, जाने कहाँ लोप हो गयी।

''बेला फ्रूमा जहाजों पर सवार हो लगातार यात्रा करती हुई लोगों से दूर बनी रहीं। उसका खाविंद हर किसी के साथ जितना अंतरंग रहा उतनी ही वह उनसे दूर हो गयी। उसने तुर्बिन को 'अभागा ‘ नाम दे दिया। जैसे ही परिवार का चमकता सितारा अस्त हुआ, सब कुछ तितर बितर हो गया। अंत्येष्टि के बाद, बेला फ्रूमा ने बिस्तर जो पकड़ा कि वहीं की वहीं- प्राय: तीस वर्षों क्या ज्यादा ही दिनों तक-पड़ी पड़ी ही मर गयी। उसने नौकरानी की छुट्टी कर दी थी, पाया ही सब कुछ- आया, रसोइया, उसकी माँ की नर्स-बन गयी। पाया सुनहरे केश धारी, गोरी, सौम्य स्त्री थी। उसमें अधिकांश लक्षण पिता के, कतिपय माँ के भी थे। उसकी बाबत् मैं अंशमात्र विज्ञ ही रहा होगा क्योंकि तुर्बिन में बसने हम पहुंचे ही होंगे तब तक घटनाएँ प्राय: सिरे जा लगी। थीं। लड़की का ब्याह तो होना ही चाहिए, मौकापरस्तों ने कई वर सुझाये लेकिन बेला फ्रूमा ने बिस्तर ही से एक एक कर उन्हें ठुकरा दिया। हर प्रत्याशी उसके बिस्तर निकट लाया गया, बेला फ्रूमा ऊपर से नीचे तक देख उससे सवाल करती। उसे कोई भी नहीं भाया। दरअसल, उसे अपनी बच्ची के लिए वर नहीं वरन् स्वयं ही के लिए दामाद चाहिए था, ऐसा कि जो पुकार सुनते ही दरबारी समान समक्ष हाजिर हो जाये। सभी प्रस्तावकों के आगे उसने शर्त रखी कि शादी के बाद पाया को माँ ही के साथ रहना होगा। अपने स्वार्थ के खातिर उसने इतने व्यवधान खड़े किये कि पाया ने अंतत: ऐसे आदमी से ब्याह किया जो धनी तो माना जाता लेकिन उसमें विद्वता नाममात्र को थी जबकि मूलत: उजड्ड ही था। पूरा तुर्बिन सोच रहा था कि पाया किसी भद्दे चंगुल में फंसने जा रही है ; कईयों ने उसे चेताया भी। लेकिन बेला फ्रूमा ने दावे के साथ कहा कि वे उसकी लड़की के सौभाग्य से जल रहे हैं। पाया, क्या कहूँ उसे, पूरी की पूरी गुलाम थी वह माँ की। अगर बेला फ्रूमा उसे कोई गड्ढा खोद जिन्दा दफन हो जाने का आदेश देती, वह तैयार हो जाती। ऐसी लड़कियाँ होती हैं- कौन जाने क्यों? ताकतवर ही का-यतीमखानों में भी- सदैव दबदबा रहता है। बेला फ्रूमा का पक्का यकीन कि दामाद - फेतेल उसका नाम था- उसी का राग अलापेगा, लेकिन उसने उसकी एक न सुनी। जो बेच सकता था वह सब उसने बेच डाला, जो चुरा सकता था चुरा लिया। दीमक की तरह समूचा घर चाट गया। उम्मीद से हुई पाया ने एक लड़की जन्मी, मिरेले नाम पायी वह हर किसी को यूँ लगी मानो अपने नाना की हू ब हू मूरत है। उसने वाकई घर को 'जीवंत ‘बना दिया। लेकिन उसका पिता, हाँ, वही उजड्ड , भद्दा शख्स, अपनी ही गिनती लगा जान गया कि  अब यहाँ लूटने को कुछ नहीं बचा है, सो , स्त्री को तलाक, भगवान जाने कहाँ भाग गया।

''गोदी में बच्चा रखी हर तलाकशुदा खोटा सिक्का नहीं होती। लेकिन अब बेला फ्रूमा ने अपनी लड़की का किसी पुरूष के साथ साझा करना नहीं चाहा। अब वह उसे सर्वथा अपने ही लिये चाहने लगी। पाया अपना साहस खो बैठी। कई लोग होते हैं ना ऐसे कि एक बार किसी झमेले में फंसे कि दोबारा के लिए कान पकड़ लेते हैं। और फिर कौन मिले जो बेला फ्रूमा का चाटुकार बना रहना चाहे? किसी भी पुरूष को तो अपने ही लिए स्त्री चाहिए, सास का टहलुवा क्यों बने वह? कुल मिला यूँ कहूँ कि पाया ने फिर कभी पुनर्विवाह नहीं किया। फेवेल ने प्राय: सब कुछ बर्बाद कर दिया होगा, इसीलिए कुछ दिनों माँ बेटी कतई बुनाई की कमाई पर निर्भर रहीं। पाया तो प्राय: दरजिन ही बन गयी। घर उनका अपना था ही और उन दिनों समय ऐसा कि धेले में पेट भर जाये। सेब, नाशपाती, और चेरी अपने ही बागान से मिल जाते थे। उन्होंने कतिपय एकड़ जमीन किसी किसान को किराये से दे दी जो,  अपनी उगायी सब्जियों  का कुछ हिस्सा उन्हें किराये के रूप में चुकाता। उन दिनों कोई भी भूखा नहीं मरता था, फिर भी, ऐसी जिंदगी का क्या अर्थ?

पाया अचानक बीमार पड़ गयी, उसके साथ भी ठीक वैसा ही हुआ जैसा माँ पर गुजरा था - उसने भी बिस्तर पकड़ लिया। ऐसा वर्षों बाद हुआ। तब मिरेले सात या आठ साल की हो गयी होगी। वक्त के इस मुकाम पर लांटुश का आविर्भाव हुआ। इलाके में आ उपजा यह लांटुश घर का स्वामी बन बैठा। तुम्हें हँसी आ रही है? इसमें हँसने की कोई बात नहीं। पूरा तुर्बिन जानता था। जरा सोचो, अन्यथा दो रूग्ण स्त्रियों और एक युवा बालक से बना परिवार कैसे, कितने दिन चल पाता? आज क्या इस क्षण ही उस बाबत चर्चा करते क्षण मेरी समूची त्वचा पर चींटियाँ सरसराने लगती हैं। ‘’

येंतील चाची थरथरायी। सोफे पर पड़ी अपनी शाल को देखती हुई बोली, ''बच्चों, मेरी हँसी न उड़ाओ, मुझे वाकई ठंड लग रही है।‘’

शाल लपेट पल भर मौन साधी येंतील चाची भौंएँ सिकोड़ सोच में जा पड़ी अफसाना जारी रखूँ कि नहीं। कनखी से मेरी ओर देख रही वह यूँ कहती मालूम दी, ''कोई छोटा बच्चा इन बातों को कैसे समझेगा?’’ तत्क्षण माँ बोल उठी, ''आगे बताओ, येंतील, फिर क्या हुआ?’’

येंतील चाची धीरे से लहरायी।

''बेशक, मैं वहाँ नहीं रही आयी, लेकिन पूरा शहर पागल थोड़े होगा! उनके घर में आ बसे लांटुश ने वाकई प्रभार अपने हस्ते कर लिया। वह लकड़ी काटता चीरता, कुएँ से पानी खींचता-लेकिन, रात में, दिन में कतई नहीं। जाड़े के दिनों अंगीठी जलाता। पहले मैंने बताया था ना कि वे कभी नजर नहीं आते, लेकिन यह दिखायी पड़ता था। उस जाड़े में, तुर्बिन बर्फानी तूफान की चपेट में आया कि उस जैसी किसी विपदा की कोई स्मृति बूढ़े से बूढ़े लोगों की जानकारी में नहीं थी - नमक जैसे सूखे बर्फ  के ढेले गिरे। छतें ढह गयीं। पूरी फिज़ा वाकई नरक समान थी। सारे मकान बर्फ में इतने जा दबे कि उन्हें खोद निकालने में कई दिन लगे। तुर्बिन में 'रोगी के रखवाले’नाम से जाना जाता एक परोपकारी संघ था जिसमें- कोचवान, कसाई, घुड़सवार-जैसे बलिष्ठ आदमी रहे आये। किसी भी बीमार पड़े व्यक्ति को जब भी जरूरत लगी वे मदद के लिए दौड़े आते। तूफान के वक्त, बस्ती के लोगों को सहसा रेब मोरदेसाई यारोस्लेवर के परिवार का ख्याल आया। 'रखवालों ‘ में से कोई- बेहद भीमकाय शख्स - मोतल बेंत्ज़े उनके घर खबर लेने जा पहुँचा। समूचा घर बर्फ  तले जा दबा था। सिर्फ  चिमनी का शिखर बाहर होगा। उसी से दिशा पकड़ उसने खुदाई आरंभ की। कितनी भयानक मशक्कत, ओह! सौ, पचास हाथ मारे होंगे कि बर्फ  के दूसरे सिरे से दाँत पीसती ध्वनि कानों पड़ी। कोई न कोई बर्फ  काट बाहर आने की राह निकाल रहा था। कौन? मोतल बेंत्ज़ की जारी खुदाई ने अंतत: कोई जगह साफ  कर देखा कि कोई नाटा शख्स- ऊँचाई के बरअक्स ज्यादा चौड़ा, फीतों से बंधी कैप पहना वह शख्स जिस बेलचे से बर्फ खोद रहा होगा वह उसकी ऊँचाई से तिगुना लंबा था। झुटपुटा छाने लगा था। मोंत्ज़ मोतल बेंत्ज़ ने नाटे आदमी से बात करना चाहा लेकिन उसने मुँह क्या खोला कि जबान की नोक नाभि छूने लगी। पलक झपकते वह लोप क्या हुआ कि उसका बेलचा सीधे मोतल बेंत्ज़ के ऊपर आ गिरा। वह लांटुश था। कुछ दिनों बाद मोतल बेंत्ज़ ने रबी के पास जा सारा वाकया बयान किया। घटना का ब्योरा सामुदायिक बही खाते में दर्ज किया गया।

''किसी न किसी तरह मिरेले अपनी राह निकाल वयस्क हुई। पूछो मत कैसे। बच्चे बनजारे-वाहनों में, दस्यु-कंदराओं में जीवित बने रहते हैं ना? किसी दिन वह बच्ची थी; दूसरे दिन उठी और वयस्क हो गयी। उसकी माँ पाया बचपन ही से एकांतवासी स्त्री के नाम से ख्यात थी। वह अन्य लड़कियों संग जरा नहीं घुली मिली, और फिर बेला फ्रूमा ने किसी से भी उसकी मेल मुलाकात को हतोत्साहित किया। इसके विपरीत मिरेले खुशमिजाज और मिलनसार थी। वह गाना गाती क्या नाचती भी थी। जाड़े के दिनों अपने मित्रों संग वह गोभी, अचारी खीरे, और सख्त छिलके में बंद मटर छीलती काटती। ग्रीष्म में वे जंगल जा मशरूम और रसभरी तोडते। उसने स्वयं ही सीना पिरोना और कशीदाकारी सीखी क्या सीखी, कैनवस पर भी बेलबूटे काढऩे  का अभ्यास कर लिया । लोग उससे पूछते, ''तुम्हारे घर में लांटुश रहता है ना?’’ जवाब में वह पूछती, '' क्या होता है लांटुश ? मैंने यह नाम ही कभी नहीं सुना!’’वे फिर पूछते, ''तुम्हारे घर का बंदोबस्त कौन करता है? ‘’ वह जवाब देती, '' हम ही करते हैं।‘’ लड़कियाँ उसके घर डांस करने की माँग  करतीं- बेशक उनकी जिज्ञासा होगी ही कि घर में क्या होता है। लेकिन मिरेले हँसते हुए कहती, '' नानी को हल्ला-गुल्ला पसंद नहीं है! ‘’ बस्ती के लोग अटकल  लगाते: अगर ये घोंसलों से अंडे ही बीनते हों, वह कितने दिन चले! खाना कौन पकाता है? और मिरेले के कपड़ों की व्यवस्था कौन करता है? पोशाकें तो किसी जमींदार की लड़की जैसी पहनती है, और चेहरा तो देखे- कैसा लाल, कितना खिला हुआ! कोई न कोई उसे जेबखर्च देता ही होगा! अकसर बेकर ब्रिना की दुकान जा कुरकुरे और खस्ता खरीदती है। उसकी जेब में कुछेक म्राशेष्न-लड़कियों संग खेलने के लिए-रहते ही हैं?

''उनके घर की बनावट ऐसी कि किसी छेद या खिड़की से भीतर झाँका नहीं जा सकता था। दरवाजे ही तक आँगन पार बने उतार में चल कर पहँुचा जा सकता था और फिर, उनके आँगन में आवारा कुत्ते घूमते ही रहते थे। हो सकता है कि वे किरायेदार किसान द्वारा निगरानी के लिए रखे कुत्ते या नगरपालिका की पकड़ से छूटे दोगले कुत्ते हों। कोई भी मिरेले से चाहे जो सवाल पूछ सकता था हालाँकि उसके जवाबों से सच्चाई तक पहँुचना टेढ़ी खीर थी।‘’ तुम्हारा खाना कौन पकाता है?’’ अगर किसी ने पूछा तो जवाब मिलता, ''मेरी माँ।‘’ तत्क्षण जिज्ञासा आगे बढ़ती, ''बिस्तर से बाहर निकलती है वह?’’ सीधा उत्तर होता, '' हाँ, कभी-कभार।‘’ कोई पूछता, ''वह डॉक्टर के यहाँ क्यों नहीं जाती?’’ मिरेले तपाक से बोलती, ''बेहद आलसी है वह,’’ और यों मुस्करा देती मानों कोई चुटकुला कहा हो। छोटे नगर में हर कोई जानता है किसकी डेगची में क्या पक रहा है। सबको ज्ञात रहा आया कि उस घर में अलौकिक घटनाएँ घटती हैं।

''खैर, आगे सुनो-मिरेले किसी अनुपम सुंदर स्त्री की सूरत में वयस्क हुई। उसे देख लड़के गश खा जाते। जोड़ी-प्रबंधक झूम पड़े लेकिन बेला फ्रूमा क्या पाया ही तक नहीं फटक पाये। दरवाजा भिड़ा तो भिड़ा जंजीर से कसा वह तालेे में बंद होता। जोड़ी-प्रबंधकों ने मिरेले ही से संपर्क करना चाहा; लेकिन वह बोली 'मैं क्या जानूँ?’’

''तब उन्होंने पूछा: 'बिल्ली कैसे नदी पार करेगी?’ जिसका मतलब होता- तुम्हारा ब्याह कैसे होगा? - उसका जवाब होता- 'बिल्ली उसी किनारे अटकी रहेगी।‘

''किसी छोटे नगर में - बड़े में भी हो सकता है- तुम स्वयं को हर किसी से अलहदा नहीं’ रख सकते। अगर तुमने अपने को बिरादरी से अलगाया, वे तुम्हारे ऊपर छींटाकशी आरंभ कर देंगे। लोग कहने लगे- बेशक, परिवार का वास्तविक मुखिया कोई शैतान ही है। लकड़ी काटे चीरे, पानी खींचे ढोये, और बर्फ  तले दबे घर को खोद निकाले तब तो वह कोई मामूली सेवक नहीं हो सकता! मासूम सूरत दर्शाती नजर आती मिरेले दरअसल वैसी नहीं थी। मेरे प्यारे बच्चे, लोग उससे दूर छिटकने लगे। सेबाथ के दिन लड़कियाँ अब उसके संग नहीं जातीं। जोड़ी-प्रबंधकों ने उसके आये प्रस्ताव रखना बन्द कर दिया। सगाइयों और विवाहों के आयोजनों पर उसे आमंत्रित किया जाना बंद हो गया। यों तो मैं तब तक बालक ही होगा, लेकिन ध्यान से सुनता समझता था। हमारे घर के सामने से जाती ल्यूबिन स्ट्रीट पर किसी राजकुमारी सी सजी धजी ठुमकती चलती, उसके जूते पैरों पर झलकते, लेकिन लड़कियाँ उस दिशा नजर ही नहीं डालतीं। कतरने सीने के प्रशिक्षु छोकरे और युवा कसाई उसका पीछा करते-हालाँकि निकट पहुँचने की जुर्रत नहीं कर पाते। जब कभी बाजार के बीच से गुजरती लोग उसे खिड़कियों के भीतर से ताकते।-कहाँ जा रही है? उसके मन में आखिर है क्या? उन दो मनहूस स्त्रियों - माँ और नानी- के संग पूरा जीवन कैसे, कब तक बिताएगी?

''एकाएक मिरेले ने बाहर जाना छोड़ दिया। कई एक दिन बीत जाते तब एकाध वार कुछ खरीदने आती, उन क्षणों किसी दुकान पर दीख पड़ती। ऐसा भी पता चला कि कभी कभार कोई डाकिया किसी सीलबंद लिफाफे में परिवार के नाम आता कोई पत्र उनके घर दे जाता है। किसी को नहीं मालूम पड़ सका पत्र कहाँ से आता है। सर्दी के महीनों में वे सर्वथा भुला दिये जाते। जाने क्यों? - बेशक  उनका घर-बस्ती के अन्य स्थानों की तुलना में- बर्फ से ज्यादा घना घिरा होता। खेतों की ओर से वेगवान बवंडर उठते। दरअसल, कोई भी दावे से नहीं बता पाता बेला फ्रूमा अभी भी जिंदा है या मर गयी, लेकिन चूँकि कब्रिस्तान तक उसका शव नहीं आया सो वह जीवितों ही में गिनी जाती रहीं। अगर किसी गाँव में ऐसी स्थिति हो; तब , भगवान जाने, किसी बड़े नगर में क्या हालत होती होगी। एक दफा मेरा पिता, प्रभु उसकी आत्मा को शांति से रखे किसी गरीब आदमी को सेबाथ के अवसर पर हमारे घर खाना खिलाने साथ ले आया था। यहाँ वहाँ भटकता भिखारी नाना भाँति की चीजें देखता और कई तरह के किस्से सुनाता है। हमने उससे ल्युबलिन के बारे में पूछा तो बोल पड़ा, ''वह तो लाशों से भरा नगर है।‘’ मेरे पिता ने जिज्ञासा जताई, ''क्या मतलब?’’तत्क्षण उत्तर मिला, ''किसी छोटे नगर में कोई मरता है तो हर किसी को पता चल जाता है और देह कब्र में दफन रहती है। लेकिन बड़े नगर में हर कोई अजनबी है इसीलिए मृतक तन्हा रहता ऐसा ऊबता है कि उठ बैठता है। मुझे ही ल्युबलिन मे ंएक शख्स मिला जो वर्षों से मृत  होगा। उसका नाम था स्मेर्ल श्रोत्सकर। लेवरट्रोव स्ट्रीट पर घूम रहा मैं जाने क्यों ठिठका क्या कि नजरों आगे आ रहा शख्स भी रूक गया। मैं इतना भौंचक हुआ कि मुँह ही नहीं खुला। पल बीते मैंने पूछा, अरे, स्मेर्ल, तुम यहाँ क्या कर रहे हो? वह तपाक से बोल पड़ा, जितना जैसा तुम जानते हो, उतना ही वैसा ही मैं भी जानता हूँ। तत्क्षण पलटा और लोप हो गया।

''कहाँ पहुँची थी मैं? अच्छा हाँ! लांटुश सबकुछ ठीकठाक रहे तो शैतान तलघर अथवा चिमनी और काष्ट छप्पर के दरम्यान कहीं दुबके रहते हैं, लेकिन जैसे ही घर मालिक ढीले पड़े कि वे हावी हो जाते हैं। शायद वह कोई लांटुश नहीं बल्कि छलिया-शैतान या भोंदू होगा। वे कीचड़ में कहीं, कुकुरमुत्तों समान उभर आते हैं। वो डायन बेला फ्रूमा और पाया का जीवन डकार गयी और अब दोनों मिल कर मिरेले का कबाड़ा करने में जुटी हैं। माँ और नानी से अनवरत घिरी मिरेले भी विकृत हो चली। ऐसी बात फैली कि वह सारे दिन सोती रात भर जागती है। रात्रिकालीन पहरेदार जालमन को उनके घर के निकट से निकलते क्षण हर रात मिरेले का उन्मादी अट्टहास सुनाई देता है। कोई दुष्टात्मा, किसी ऊदबिलाव समान हुआँता हुआ उसे गुदगुदाता है।‘’

''तुम्हारी बात का यही मतलब हुआ ना कि उनके साथ लांटुश के नापाक संबंध रहे आये’’ मेरी माँ ने तनिक झिझकते पूछा।

येंतील चाची मुँह पर दो उंगलियां चिपका बोली, ''मुझे नहीं मालूम। पता भी कैसे चले? बेशक सारे लांटुश नर ही होते हैं मादा कोई नहीं । 'दि राइट मेजऱ’ में किसी तलघर में रहते आये किसी सुनार के बारे में कोई कहानी छपी थी जो किसी मादा-पिशाच को साथ रख उससे पाँच बच्चे पैदा किया हुआ था। ऐसी घटनाएँ सचमुच घटती हैं। तीन स्त्रियाँ बगैर खाविंदों के आखिर तन्हा क्यों रहीं? अगर तुर्बिन उनके लिए बहुत छोटा नगर रहा हो तब वे घर बेच किसी अन्य नगर क्यों नहीं चले गये? हम पर तो दया रखना प्रभु - लोग किन किन बातों के आदी हो जाते हैं? बेला फ्रूमा, ओह, कितनी दुष्ट थी वह। खाविंद जिंदा रहा आया तब भी इसके बारे में विचित्र बातें फैली थीं। उसने दो काली बिल्लियाँ पाल रखीं थीं और पूर्णिमा की रातों उसे खेतों में वनस्पतियाँ, जड़ी-बूटियाँ बीनते देखा गया था। वह जादू-टोना और नजर उतारना जानती थी। बिचारी पाया के पास तो कोई चारा नहीं होगा लेकिन चकित हूँ कि मिरेले ने क्यों घुटने टेके। सच तो यह कि अगर शैतान को घर में घुसने भर ही की जगह दी कि वह सारा इलाका डकार जायेगा। ऐसा सुना गया कि लांटुश नाच-नाच, गा-गा उनका मन बहलाता, कलाबाजी भी करता। किसी ने उसे विवाह के दिनों मसखरी करते विदूषक समान काफियाबंदी करते सुना। उनके किसी कक्ष में विशाल बिछौना था, जिस पर सभी एक साथ सोते। मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकती। बेला फ्रूमा  और मिरेले कभी भी सायनागाग नहीं गयीं। अलबत्ता पाया रोश हाशोनाह  के पर्व पर आयोजित तुरही वादन सुनने आती। वहाँ मैंने उसे पहली दफा देखा; उसका चेहरा मस्सों से भरा था। उसकी एक आँख बछड़े की सी लंबी होगी और दूसरी आधी-मुंदी रहती। शायद, बहरी भी होगी क्योंकि जब भी लोग बात करते वह कोई उत्तर नहीं देती।

''सुकोथ के बाद किसी रात किसी ने बुल्फ काश्तान के द्वार दस्तक दी। तुर्बिन में एक फायर बिग्रेड था जिसका सदर बुल्फ  था। ब्रिगेड में एक वेगन, एक बूढ़ी घोड़ी, और पानी की एक घिसी पिटी कोठी थी। ठकठक किसी शीतल, नम रात उभरी होगी। बुल्फ काश्तान ने पट खोला कि क्या देखा: बाहर कोई विलक्षण जंतु खड़ा है, वह आदमी होगा न जानवर- आधा कुत्ता आधा गधा, जिसका सिर उलझी लटों से और बदन निष्प्रभ रोयें भरा होगा। '' तुम्हें क्या चाहिए?’’ बुल्फ ने पूछा तो वह किकियाया, ''बेला फ्रूमा के घर आग लगी है।‘’ तत्क्षण वह धुंध में घुल मिल गया।

बुल्फ काश्तान ने घोड़ी पर लगाम चढ़ाई-चढ़ाई,कोठी को पानी से भरा और जरा ही चला होगा कि देखा कि बेला फ्रूमा का घर राख का ढेर हो गया है। तीनों की तीनों स्त्रियाँ जल कर कोयला हो गयी थीं। बुल्फ काश्तान द्वारा बयानी उस विकटांग की हुलिया से बिलकुल ठीक अनुमान बैठा लिया गया कि वो लांटुश ही था।‘’

''आग कैसे लगी?’’ माँ ने पूछा।

''क्या मालूम कैसे?’’

''कहीं लांटुश ही ने तो नहीं सुलगा दी?’’ माँ बोली।

''अगर उसने लगाई होती, तो वह फायर हाउस क्यों गया?

''बड़ी देर माथापच्ची कर माँ बोली, ''हो सकता है कि मनुष्यों के समान ही भूत प्रेत भी अपने ही जाल में जा फंसते हों। क्या मालूम लांटुश ही का वक्त आ गया हो।‘’