Monthly Magzine
Thursday 21 Nov 2019

पीले पड़ते प्रेम-पत्र

जैसे-जैसे उधर

पड़ते जा रहे हैं पीले

तुम्हारे पास रखे मेरे प्रेम-पत्र

वैसे-वैसे इधर

आने लगी है मेरे बालों में सफेदी

 

जैसे-जैसे उधर

धुंधली पड़ती जा रही है उसकी लिखावट

वैसे-वैसे इधर

धुंधलाने लगी हैं मेरी स्मृतियाँ

 

जैसे-जैसे उधर

टूटने लगे हैं उसके तह

वैसे-वैसे इधर

टूटने लगा हूँ अंदर से मैं भी .....

 

जब तक वो बचे रहेंगे तुम्हारे पास

शायद तब तक मैं भी बचा रहूँ इस धरती पर !

      *****

मुझे ईष्वर नहीं, तुम्हारा कंधा चाहिए

पता नहीं ऐसा क्यों होता है अक्सर

जब-जब मैं दुखी और उदास होता हूँ

ईष्वर से ज्यादा तुम याद आती हो

 

मैं ईष्वर को मानता तो हूँ

पर उसे जानता नहीं

और न ही चाहता हँू जानना भी

 

मुझे सिर झुकाने के लिए

ईश्वर नहीं

सिर टिकाने के लिए

कंधा चाहिए

और वो ईश्वर नहीं

तुम दे सकती हो !

यह जो तुम्हारे गाँव से आती बस है

मेरे भीतर इंतजार भरा है इसका

मैं जानता हूँ इसका समय

इसके इंजन तक की आवाज पहचानता हूँ मैं

रोज के वे चेहरे ड्राईवर, कन्डक्टर, खलासी के

 

लोहे के इस ढाँचे में

मेरी संवेदना

और स्मृति का संसार लदा है

कौन जानेगा मेरे सिवा !

 

इसी से आना होता था तुम्हारा

लौटना तीन-बीस की हड़बड़ी में

खचाखच भरी बस में 

 

और वे खिड़की से हिलते हुए

विदा में मुलायम हाथ....

 

इस धरती पर कितनी ही बसें चलती हैं

तुम भी हँसती हो

मुझे अपने गाँव की ओर जाती

बसों के समय का पता नहीं है जानकर !

 

मुझे इस बस से नहीं जाना कभी

शायद ही मुझे इस बस की जरूरत पड़े

पर मैं इस बस के बारे में पूरे विश्वास से

इसके मालिक और सवारियों से ज्यादा जानता हूँ

गोकि उनके लिए यह एक सवारी गाड़ी-भर है!

 

रोज सुबह इंतजार होता है इसका

रोज तीन-बीस में

तुम्हारे वे हिलते हुए हाथ विदा में.....!