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Tuesday 21 May 2019

मछली जैसी औरतें

नदी के सूख जाने पर

पानी के बिना तड़प-तड़पकर

मर जाती हैं मछलियाँ,

इससे पहले ही बिक जाती है नदी

किसी मजबूर किसान के खेत की तरह

नदी के साथ बिक गयी हैं- मछलियाँ बाजारों में।

मछलियाँ-

होटलों में परोसी जा रही हंै,

मछलीघरों में नुमाईश बनी जी रही हंै,

घरों में क्रूरता सह रही हैं,

बार में नोटों की बारिश के बीच नाच रही हैं

औरतें मछली की तरह होती हैं

मायके से ससुराल तक का सफर

बनते, बिगड़ते रिश्तों से गुजरते हुए

मछली तड़पती तो जरूर है

हर बार वह अब किसी बगुले पर भरोसा नहीं करती।

याद आते हैं उसे

हरी वादियाँ, बलखाती घाटियाँ, ऊँघते पेड़

उछलती गिलहरी, सुस्त कछुआ, घोंघा, टर्राते मेंढक,

पनिहारिनों का चुहल, परिंदों की चहचहाहट

चाँद को पकडऩे की हर कोशिश नाकाम ही रही है।

कितना मजा आता था उसे

पानी पीते शेर को छेडऩे में,

आनंद आता था कलकल, स्वच्छंद बहने में

निराश होती थी किसी की अस्थियां लेकर

औरतें, मछली जैसी क्यों हैं?

बाजारों के मायाजाल ने भ्रम फैला रखा है

औरतों के मन-मस्तिष्क में किस्म-किस्म के,

अपने फायदे के लिए जब से पानी बोतलों में बिकने लगा

मछलियाँ भटक रही हैं आसरे के लिए

पानी, मछली और औरतों को

नयी दुनिया का बाजार किसी वहशी की तरह देखता है।।

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सन्नाटा

 

पतझर में सूखे पत्ते विदा हो रहे हैं

विदा ले रहे हैं, खाँसतीआवाजें जमाने से

कुछ पल जी लेने की खुशी से

वृद्धों का झुंड टहलने निकल पड़ा है

दड़बों से पार्क की उदास बेंच की ओर

उनकी धीमी चाल और छड़ी से चरमराते पत्ते सिसक पड़े हैं।

बेंच पर बैठे हैं कुछ ठूँठ से पेड़

पतझर में बतियाते अपने किस्से

किसी को रिश्तों की दीमक ने चाटा,

किसी का भरोसा टूटा,

कुछ को अपनों ने बेघर किया.......... ,

गूगल से दुश्मनी ठाने टूटी ऐनक से

झाँक रहा है इनका विश्वास वृद्धाश्रम में

ये पतझड़ कब तक रहेगा?

क्या भविष्य के वक्तका भी ऐसा ही पतझड़ होगा

पीला, सूना, चरमराता, परित्यक्तऔरबुहार दिया गया जैसे?

घर के कूड़े कचरे केजैसा।

वृद्ध इस देश की वैचारिक धरोहर हैं

बौद्धिकता की टकसाल हैं

अनुभवों की पोटली लिए फिरते खुली किताब हैं

इन्हें इस तरह बुहार दिया जाना जमाने को भारी पड़ेगा

भविष्य में सभ्यताएं इसे कोसेंगी।

किसी की राह ताकते जिंदा हैं इनकी सांसे

कभी तो कोई इनकी उँगली थाम कहेगा

कहानी सुनाओ ना दादीजी,

आपकी दाढ़ी कितनीचुभती है,

आपका ऐनक टूट गया है, मेरे गुल्लक में पैसे हैं

आपके बर्थडे में गिफ्ट दूँगा......

बेंच में गूंज रहा है ऐसा ही ठहाका

बचपन की बातें, जवानी की यादें, बुढ़ापे कादर्द

लौट रहे हैं ये कदम शाम ढले अपने घरों की ओर

जहाँ अब उनके नाम की तख्ती बदल दी गयी है

कब्र की ओर बढ़ते कदम धीमे हो जाते हैं।।