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Tuesday 16 Jul 2019

और कितने 'मंडलाचरण

भंडारा 

जीवन में कभी-कभी ऐसी स्थितियों से सामना होता है, जो किसी काल्पनिक कहानी या अविश्वसनीय सपने की तरह लगता है, किन्तु आश्चर्य तब होता है जब वह सच होता है। कुछ दिनों पहले भुज (कच्छ) के गेस्ट हाउस में यह अनुभव मुझे भी हुआ। वह युवा हर दिन मीठी मुस्कान के साथ मेरी मेज पर चाय-नाश्ता लगा जाता। बीच-बीच में आकर कुछ और लाऊं? या थोड़ा और लीजिये न, कहता जाता। मुझसे वह गुजराती में ही बात करता। उम्र लगभग 24 या 25 वर्ष। उसके साथ भोजन कक्ष में काम करने वाले सभी साथी भी अठारह से पच्चीस की आयु के थे। उन सबके चेहरे पर मासूमियत भरी मस्ती और एक बेफिक्र फक्कड़पन। वैसे कच्छ में लगभग सभी गुजराती का ही प्रयोग करते हैं। पर चौंक गई जब उन सब युवाओं को आपस में हिन्दी में हंसी-मजाक और बातें करते देखा। जानना चाहा कि इतनी अच्छी हिन्दी वे कैसे बोल लेते है। पता चला वे सब राजस्थान के रहने वाले हैं।

दिन-रात तो गेस्ट हाउस में ही रहते हो सब, घर नहीं जाते क्या?

'घरÓ?..गंभीरता से उस युवा ने कहा- गया था चार साल पहले, अब कब जाऊंगा मालूम नहीं, इसके बाद उसने अपने विषय में जो बताया उसे जानकर किसे दुख और अचरज न होगा?

राजस्थान के मंडलाचरण गाँव से आए हैं हम। घर की याद तो बहुत आती है पर छुट्टी नहीं ले सकते, पगार कट जाता है। वैसे भी हम अपना ही गुजारा मुश्किल से करते हैं, घर खाली हाथ कैसे जाएँ ? घर में माँ, पिता, भाई, मेरी पत्नी और एक बेटी है तीन साल की। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था पर उसने बताया हाँ, हमारे गाँव में बहुत कम उम्र में ही शादी कर दी जाती है। मेरी तो फिर भी देर से हुई । सोलह साल का था तब। क्या करते हैं पिताजी? कुछ नहीं। बस दारू पीकर गाली-गलोच और घर में मार-पीट करते हैं। भाई मजदूरी करता है। माँ भी जो छोटे-मोटे काम मिले,  करती है। पत्नी को इजाजत नहीं घर से बाहर निकलने की। हमेशा घूँघट में रहना पड़ता है उसे।

तुम कितना पढ़े-लिखे हो? मैं कभी स्कूल नहीं गया। पैसे ही नहीं थे पढऩे के लिए। भाई भी नहीं पढ़ा। गाँव में पाँचवीं तक ही पढ़ाई होती है बाद में शहर जाना पड़ता है। जमींदारों और साहूकारों के बच्चे ही जाते हैं शहर आगे पढऩे के लिए। हम लोग कहाँ से लाए पैसे? फिर दो-चार क्लास पढ़कर भी क्या होता, नौकरी तो मिलती नहीं हमें। मेरे ये सब दोस्त भी अनपढ़ हैं। पर मोबाइल वापरने के कारण थोड़ा बहुत पढऩा-लिखना अपने आप सीख गए हैं। झेंपते हुए वह बोला था।

पूछा- तुम लोग वहाँ के नेता या किसी बड़े अधिकारी से अपनी समस्याओं के विषय में क्यों नहीं बात करते? नेता तो तुम लोग ही चुनते हो न। मतदान करते हो?

अभी पिछले दो-तीन साल से ही हमारे गाँव में चुनाव होने लगे हैं। इसके पहले कभी कोई चुनाव नहीं हुए। दस बारह साल हो गए हम लोग को गाँव छोड़कर यहाँ आए हुए। हमारा कहीं नाम नहीं हैं किसी लिस्ट में वोट डालने के लिए। जितने लोग अब गाँव में रहते हैं बस वो ही वोट डालते हैं। हमें तो मालूम भी नहीं कि मतदान कैसे होता है? आज तक कभी वोट नहीं डाला। अभी तक तो हमारी कोई सरकार नहीं थी। वैसे आज भी पंचायत के फैसले ही सबको मानने पड़ते हैं। कोई मंत्री, कोई नेता पंचायत का विरोध नहीं कर सकता। सब डरते है सरपंच से। लगभग चालीस-पचास हजार की आबादी हैं मंडलाचरण की। और हाँ डाकुओं का अड्डा भी है हमारा गाँव। आस-पास के गांवों में लूट-पाट, हत्या करना कोई बड़ी बात नहीं उनके लिए। आप मानेंगी नहीं कि हमारे गाँव में कोई पुलिस थाना चौकी कुछ नहीं है। बस पंचायत की मनमानी चलती है। मुझे लग रहा था कि कोई बहुत पुरानी फिल्म की कहानी सुन रही हूँ। पर यह आज की सच्चाई है।

तुम सब नौजवान मिलकर ऐसे अन्याय क्यों नहीं रोकते?

की थी कोशिश एक बार कुछ लोगों ने, वो और उनके परिवार का एक भी आदमी जिंदा नहीं बचा। बेटी बहुओं को भी नहीं छोड़ा। अब कौन हिम्मत करें? सब चुपचाप सहते हैं। भुज आने से पहले गाँव में हम पत्थर तोडऩे का काम करते थे। बहुत कठिन काम था, कई बार मेरे हाथ छालों से भर जाते थे। मेरा भाई आज भी यही काम करता है वहाँ। बिजली भी नहीं हमारे यहाँ। अब हम क्या करें वहाँ जाकर? घरवालों को यहाँ भी नहीं ला सकते, पत्नी को भी नहीं क्योंकि पंचायत रुकावट डालती है। उनसे पंगा लेकर कौन अपनी जान आफत में डाले? उनके नियम मानना हमारी मजबूरी है। उत्सुकतावश पूछ बैठी- तो तुम्हारी माँ और पत्नी मिलजुलकर रहती हैं, कोई खटपट नहीं?

नहीं, कभी नहीं क्योंकि यदि पत्नी माँ के सामने मुंह खोलेगी तो उसे तुरंत उसके मायके छोड़ दिया जाएगा हमेशा के लिए। हमारे समाज में शादी के समय ही यह चेतावनी दे दी जाती है कि बहू ने ससुराल में यदि किसी का कहना नहीं माना तो उसे वापस भेज दिया जाएगा। सोच में पड़ गई मैं, उफ्फ कैसे जी पाती होगी वह। तुम्हें उस पर दया नहीं आती? जवाब मिला-आती थी पहले। बेटी होने के बाद बहुत याद भी आती है घर की, पर कुछ नहीं कर सकता। सबसे पहले पैसा चाहिए बस पैसा... अब तो अपने जैसे ही परेशान इन दोस्तों के साथ हँस-बोल कर सब भूल जाते हैं। कम से कम मैं तो किसी पर बोझ नहीं बना, अपना पेट खुद भर लेता हूँ बिना किसी अपमान के।

इनके लिए विकास किस चिडिय़ा का नाम है? आजादी? कहाँ है आजादी? किसे मिली आजादी? इन युवाओं की दास्तान जानकार कौन विश्वास करेगा कि जिस देश की इक्कीसवीं सदी में प्रगति जमीन से आसमान तक अपना परचम लहराने का दावा कर रही है उसी देश के मंडलाचरण जैसे गाँव आज भी अपनी सदियों पुरानी अवस्था में जी रहे हैं, जहां गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और तिस पर शासन करने वाले की दबंगई। भले ही यह चमकते सिक्के का दूसरा, बिलकुल छोटा और धुंधला सा पहलू हो पर है तो सच। और न जाने ऐसे कितने मंडलाचरण होंगे?

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