Monthly Magzine
Thursday 23 May 2019

चरखा और नगर

(एक)

 

चरखा और नगर

चरखा ने अंगोछे से

मुंह पोंछकर

नगर से कहा

तेल के धब्बे बदन पर पोतकर

काले धुएं से

गर्भ भरकर

तुम्हारी यात्रा अविराम

तौलिये से पोंछा हुआ

तुम्हारा घाम से नहाया बदन 

जहां बूंद बूंद घाम में

दमक उठता है

कंक्रीट का जंगल

 

थोड़ा ठिठक कर

चरखे ने फिर कहा-

मेरा धागा

जितना लंबा

उससे भी लंबा

तुम्हारा एस्फाल्ट

 

चरखे का

चक्कर जितना

उसे कहीं पीछे छोड़

नगर के दिवास्वप्न का चक्कर

अविराम

 

(दो)

 

नारा सर्वस्व

कंक्रीट

मजदूर खटकर आता है

जिसके चलते

तुम लोगों का डकार

और

श्रांति के कुछ जलबिन्दु

 

मेरे बदन से टकराती है

न्यूनतम हरियाली

आच्छादन क्षत-विक्षत होता है

शरीर के कोषों में समाये हैं

लोहा-लक्कड़-ईंट-पत्थर

 

नारा सर्वस्व कंक्रीट

बूटादार घने जंगल के

सरकंडे

मुरझा जाते हैं

 

(तीन)

 

दूब वन

सीने के बीच तेजी से बढ़ता

दूब वन

बाहर गिरे ओस का प्रतिरूप

कभी उस दूब वन में

धूप के झोले से गिरे

कुछ सुनहरे बिन्दु

दूब वन में तितली बनकर बैठते हैं

 

समय की जंजीर की कई अंगीठियां

दूब वन को घेर कर रखती हैं

तबाह होता है कभी दूब वन

बाहर तब तेज शोरशराबा

लहू से भीगा चीत्कार

उसका जमा हुआ रूप

सीने के बीच दूब वन में लहू

 

मैं कान लगाए रहता हूं

सीने के दूब वन में ओस की बेताबी

धूप के डगमगाते कदमों के लिए

लेकिन सुन पा रहा हूं

मृत रक्त की धड़कन को

 

(चार)

 

दोपहर के तरुण

कंक्रीट उखड़कर

गिरनेवाली

एक दोपहर

 

पोखरी किनारे की

स्मृति कातरता चीरकर

फाइबर की आवाजाही

आंखों के अंदर से

 

कितने गीगाबाइट

अंदर समाकर

स्फीतोदर दोपहरी

 

साइबर  कैफे में

तरुणाई की गहमागहमी

मुंह  खोलते ही

एक एक ब्रह्मांड

(यशोदा ने कृष्ण के मुंह में ही देखा था विश्व ब्रह्मांड)

-