Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

प्रस्तावना

  • कवि मलय के नए संकलन \'\'असंभव की आंच\'\' की एक कविता \'\'रात में दूना\'\' की ये अंतिम पंक्तियां हैं।
  • January  2015   ( अंक184 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • मेरे सामने एक नई पुस्तक है, आकर्षक मुखपृष्ठ, चिकने पन्ने, उम्दा छपाई, रंगीन तस्वीरें, लालित्यपूर्ण भाषा और विषय भी एकदम नया। ऐसा विषय जिस पर अमूमन हिन्दी में किताबें नहीं लिखी जातीं। लेखक हिंदी जगत के लिए लगभग अपरिचित व्यक्ति हैं- शिक्षा से चिकित्सक, पेशा डॉक्टरी छोड़कर अखबार प्रबंधन, रुचि से प्रकृति प्रेमी और कवि तो नहीं, किन्तु अवश्य ही कवि-हृदय।
  • February  2015   ( अंक185 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • प्रस्तावना :भारत में वरिष्ठ नागरिकों या यूं कहें वृद्धजनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। एक समय था जब साठ वर्ष आयु के व्यक्ति को वृद्ध ही माना जाता था। इधर यह स्थिति बदल गई है, यद्यपि सेवानिवृत्ति की आयु औसतन साठ वर्ष की ही है। रेल किराया, आयकर, बीमा आदि में भी साठ वर्ष को एक तरह से वृद्ध हो जाने का कानूनी दर्जा दिया जाता है। फिर आज के सामाजिक वातावरण में इस आयु समूह के लोग वरिष्ठ नागरिक ही कहलाया जाना पसंद करते हैं। वे वृद्धता का बोझ अपने ऊपर नहीं लादना चाहते और यह बड़ी हद तक उचित भी है।
  • March  2015   ( अंक186 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • विश्व में सर्जनात्मक विधाओं या कलारूपों का इतिहास जितना पुराना है, सेंसरशिप की अवधारणा भी शायद उतनी ही पुरानी है। जैसा कि हम जानते हैं प्लेटो ने \'द रिपब्लिकÓ में महाकवि होमर के ग्रंथों पर प्रतिबंध लगाने की वकालत की थी। उनके अनुसार इन कृतियों को पढ़कर एथेंस की युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित हो सकती थी।
  • April  2015   ( अंक187 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • उज्जैन, अवंतिका या उज्जयिनी। महाकाल, कालिदास, भर्तृहरि और चार कुंभों में से एक सिंहस्थ कुंभ की नगरी। जनमान्यता है कि यह विक्रमादित्य की राजधानी भी थी। इसलिए वेताल की नगरी भी! जाहिर है कि देश के प्राचीनतम नगरों में से एक उज्जैन में आकर्षण बहुत है। महाकालेश्वर की गणना बारह ज्योतिर्लिंगों में की जाती है।
  • May  2015   ( अंक188 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • भीष्म साहनी की रचनाएं
  • June  2015   ( अंक189 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • सारे अतिथि आ चुके हैं। जलपान के साथ स्वागत हो गया है। अब सभास्थल की ओर चलना है। लाउडस्पीकर से लगातार घोषणा हो रही है कि कार्यक्रम प्रारंभ होने ही वाला है। स्वागत गृह से सभास्थल दूर नहीं है, बस यही कोई दो-ढाई सौ मीटर या एक फर्लांग।
  • July  2015   ( अंक190 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशा। जैसा कि शीर्षक से जाहिर है, यह विशद विवेचन का विषय है, जिसे एक व्याख्यान या आलेख में साधना लगभग असंभव है। यदि विषय के साथ न्याय करना है तो इस हेतु एक सुचिंतित, सुदीर्घ ग्रंथ लिखने की आवश्यकता होगी।
  • August  2015   ( अंक191 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • भगवत रावत कविता नहीं लिखते। वे बातचीत करते हैं। वे सुनने या पढऩे वाले को आतंकित नहीं करते, बल्कि साथ लेकर चलते हैं। भगवत जैसे सहज सरल व्यक्तित्व के धनी थे, वैसे ही वे अपनी कविताओं से सामने आते हैं। उन्हें हमारे बीच से गए लगभग दो साल होने आए, लेकिन उनकी कविताएं एक सच्चे और बहुत प्यारे दोस्त की तरह हमारे साथ चल रही हैं।
  • September  2015   ( अंक192 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • वर्तमान समय पर चर्चा करना हो तो पहला प्रश्न यही उठता है कि इसका आरंभ कहां से माना जाए और उसका आधार क्या हो। इसके लिए उन परिवर्तनों को चिन्हित करने की आवश्यकता होगी जो वर्तमान और पूर्ववर्ती समय के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींचते हैं।
  • October  2015   ( अंक193 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format