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Thursday 20 Jul 2017

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दलित हिन्दी कविता का वैचारिक पक्ष लेखक श्यामबाबू शर्मा की नवीनतम पुस्तक है। स्वाभाविक ही विषय पर चर्चा करते हुए लेखक ने प्रारंभ से अंत तक अनेक कविताओं के उद्धरण सामने रखकर अपनी बात की है। इनमें कुछ कविताएं पूरी हैं, कुछ के अंश लिए गए हैं, लेकिन एक जगह पर इतनी सारी कविताओं को पाना, उन्हें पढऩा और उनसे गुजरना एक भीषण अनुभव है। जैसे कि बस्ती में आग लगी हो और उसकी लपटें झुलसा रहीं हों। इन कविताओं में कांटे हैं जो कदम-कदम पर चुभते हैं, गर्म हवा के थपेड़े हैं जो मर्म तक बेचैन कर देते हैं। भारत की विराट सामाजिक संरचना में दलित समुदाय कहां, कैसे, किन परिस्थितियों में जी रहा है, उसका बयान करतीं ये

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