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अक्षर पर्व का रूपाकार-कलेवर दिन-ब-दिन निखरता जा रहा है। उत्सव अंक देखकर खुशी हुई। अक्षरपर्व में पुस्तक समीक्षा, ग़ज़ल, लघुकथा, अकविता, दोहे, कहानी, संस्मरण, आलेख सब कुछ शामिल करने का आपका साहित्यिक प्रयास सर्वथा गुंजरित है।  

विजय रंजन

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Febuary Edition

Monday, February 06, 2012,8:43:15 AM

उपसंहार: लोकप्रिय और लोकमान्य
इसका पता वृहत्तर भारतीय समाज को पता ही नहींचला। पाश्चात्य और प्राच्य की दो नावों पर पैर रखते-रखते अब हम पूरी तरह भटक चुके हैं। बचा है तो सिर्फ अतिरेक, जिसमें या तो संस्कृति के नाम पर कट्टरता थोपी जा रही है या खुलेपन के नाम पर अश्लीलता। दृश्य माध्यम, विशेषकर आज के प्रचलित धारावाहिकों और तथाकथित रियलिटी शो में जिस तरह की सामग्री परोसी जा रही है, उसमें शालीनता को ताक पर रखकर टीआरपी बढ़ाने का प्रचलन हो गया है। जो जितनी फूहड़ता दिखला सकता है, वो उतना लोकप्रिय होगा। कसौटी अब लोकमान्य होने की नहींहै, लोकप्रिय होने की है। बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ, सारा कारोबार इसी तर्ज पर चल रहा है।
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डायरी विचार / लेख

अपनी समझ का अर्थ : डायरी के पन्नों से
किशन पटनायक कोई सात बजे पहुंचे। वे गैस-पीड़ित इलाकों का दौरा करने गये थे। आगे..

''बहुत नाम है, एक शमशेर भी''
शमशेर बहादुर सिंह 'एक सुदीर्घ काव्य यात्रा के कवि हैं' जिनका काव्य विकास क्रमश: धीरे-धीरे विनम्रता से खुलता है और विकास के उच्चतम आयामों का स्पर्श करता है। वस्तुत: गहराई से परखा जाये तो, शमशेर के कवि मानस की बुनावट अत्यंत जटिल है उसमें प्रेम, सौंदर्य चेतना, मनुज, प्रकृति, जीवन एवं संसार सभी कुछ मिश्रित है जिसे वे उसी रुप में उभारना चाहते हैं। ज्यों का त्यों उभारने की चेष्टा में लय, संवेदना, इमेज, अमूर्तता प्रमुख आधार बन बैठते है। आगे..

संस्मरण पुन: स्मरण

ताइवान: 'सकामोनी बूडा' सामना
अगर किसी काम से आपका ताइवान जाना हो और वहाँ कोई आपसे 'सकामोनी बूडा' बारे में विस्तार से कुछ पूछने लगे तो आप निश्चय ही सोच में पड़ जायेंगे कि आखिर पूछा किसके बारे में जा रहा है। और यह जानकर तो आप भौंचक ही रह जायेंगे कि आपसे भारत के ही एक महान सपूत के बारे में पूछा जा रहा है। ऐसा ही अनुभव मुझे सितंबर 2008 के ताइवान प्रवास में हुआ। पर कुछ क्षण बाद ही प्रश्न का खुलासा दिमाग में कौंध गया। जी हाँ, 'सकामोनी बूडा' र कोई नहीं हमारे 'शाक्यमुनि बुद्ध'के मंडारिन संस्करण 'सकामोनी बूडा'के नाम से याद रखा जाता है।
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थियेटर इंसान की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा है
जर्मनी में बर्तोल्त ब्रेख्त और ब्राजील में अगस्तो बाओल और भारत में हबीब तनवीर ने अपने-अपने देश में लाख विरोध के आगे..

विश्व साहित्य कहानी

पुश्किन निर्वासन, औरतें और इवैले (1)
(महाकवि पुश्किन की जीवनी का एक रोमांचक पृष्ठ। देश-काल: समरकालीन रुस 1821) आगे..

रात और मौत के आगे-आगे (उपन्यास-1)
कहां से शुरू करूं?
सन् उन्नीस सौ साठ में मैंने हायर सेकेण्डरी, तब ग्यारहवीं, की परीक्षा पास की थी, प्रथम श्रेणी में। हिन्दी, संस्कृत, सामाजिक अध्ययन और आंतरिक मूल्यांक ने सहारा दिया अन्यथा रसायन शास्त्र और भौतिकशास्त्र ने तो मेरी नैया डुबो ही दी थी।
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